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शनिवार, 13 सितंबर 2025

कपोल गीले😭 हो रहे हैं मेरे...


कपोल गीले😭 हो रहे हैं मेरे,

 स्वयं के खारे पानी से।

 अब तो खड़ा हूं मैं अकेला,

 इस भीड़ भरी जिंदगानी से।


 इधर मैं बेसुध बीमार सा, 

 अपने खेतों में पड़ा हूं।

उधर वो चह-चहा रही है 

 किसी और बगिया के मयखानो में।


 इतना नासाज़ सा हो गया हूं उसके ख्यालों में,

हमेशा रहता हूँ पड़ा अपने घर के विरानो में।

वो तो ऐसे छपक रही है,

 जैसे हो कोई भैंस पानी में।


 मेरा तो किया गया हर एक कार्य बुरा लगता था,

लेकिन बाड़ा अब बहुत प्यारा लग रहा है।

खुश हो रही है ऐसे जैसे हो कोई बकरी, 

हरे-भरे खेतों की हरियाली में।


कपोल गीले हो रहे हैं मेरे,

 स्वयं के खारे पानी से।

 अब तो खड़ा हूं मैं अकेला,

 इस भीड़ भरी जिंदगानी से।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



बुधवार, 3 सितंबर 2025

प्यार तो वह मुझसे कम करता है।



प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


उसका चेहरा जो है ना!!! 

नज़र से कभी नहीं हटता मेरी।

शायद इसीलिये रात-दिन मुझको, 

परेशान बहुत करता है।


जी तो चाहता है भुला दूँ उसे मैं,

लेकिन ख़यालो में आ-आ कर के वो बेज़ार बहुत करता हैं।

ऐसा नही है की मै उसे पसंद नही,

बस ये बताने से वो एहतिराम करता है।


खुश नसीब हो आपलोग जो उसकी कहानियां सुनने के आए हो,

वरना वो तो एक अल्फाज़ हैं।

रहता तो हमेशा मेरे साथ हैं,

लेकिन एतबार नही करता है।


उक्ता गया हूँ उसके इस कार्यो से,

ना कभी वो हाँ और ना कभी ना कहता है।

बस!!! अपनी आँखों के झील में रखता है।

ना डूबने देता है और ना उबरने देता है...

अपनी काजल की लकीरों की, 

वह लक्ष्मण रेखा तैयार रखता है।


प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


विश्वजीत कुमार✍🏻


कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ -

एहतिराम (احترام) - सम्मान, आदर, इज़्ज़त या मान-मर्यादा
अल्फ़ाज़ - "शब्द" या "शब्द समूह
एतबार - (पुल्लिंग) विश्वास, भरोसा।
बेज़ार - परेशान
उक्ता - ऊबा हुआ


सोमवार, 1 सितंबर 2025

...आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


 तेरी दहलीज तो बहुत दूर है वरना, 

जब भी होते उदास हम तेरे पास आ जाते।

 यदि तेरे छोड़े हुए ना होते तो, 

शायद!!! पूरी दुनिया को रास आ जाते।


 कभी-कभी सोचता हूँ, 

काश बचपन में लौट जाता मैं।

सभी पुराने लिबास मेरे काम आ जाते।

शायद!!! अब भी नाराज हो क्या मुझसे,

एक बार तो मुस्कुरा😊 दो मेरी ज़िन्दगी में चार चाँद आ जाते।


कहने को तो है यहां सभी मेरे अपने,

लेकिन, तुम जो तसव्वुर में हो तो। 

पूरी कायनात भी जमीं पर आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


विश्वजीत कुमार✍🏻

कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ 

दहलीज - घर (House)

लिबास - कपड़ा (Clouth)

तसव्वुर - कल्पना (Imagination)

कायनात - सृष्टि, ब्रह्मांड, जगत, संसार या विश्व।


रविवार, 31 अगस्त 2025

कोई बात नही...

 ग़ज़ल 



आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


कभी कहते थे मुझसे मेरे बिना जी न सकेंगे,

लाख मुसीबते आये हँस कर आत्मसात करेंगे।


ये तो अब पुरानी बाते हो गई,

और यही सही है तो कोई बात नही।


लानत है मुझको खुद पे कि ताउम्र मैंने वफ़ा की,

फिर भी मुझमें ही कमी है तो कोई बात नही।


धोखा, फरेब, झूठ को कहते हैं इश्क़🥰वो,

फिर भी, इश्क़🥰यही है तो कोई बात नही।


शैवाल पत्थर तक है तब तक ठीक है,

अगर आपके दिल में भी जमा है तो कोई बात नही।


आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


      विश्वजीत कुमार ✍🏻

शुक्रवार, 30 मई 2025

कविता (Poetry)



तुम्हारी गैर मौजूदगी में अक्सर मैंने लिखें हैं।

तुम्हारी मौजूदगी की कविता।

तुम्हारे ना होने पर भी,

तुम्हारी उपस्थिती की कविता।


डायरी का हर एक पन्ना गवाह हैं,

मेरे दिल में उठे तुम्हारे दर्द की कविता।


अक्सर खो जाता हूँ,

तुम्हारे ख्यालों में।

मेरे लिये भी सही हैं, क्योंकि!!

उसी से बनती हैं मेरी भावनाओं की कविता।


देखो प्रिय!!!

कुछ भी असंभव नहीं है इस जहां में,

तुमसे प्रेम💖 करना भी हो तो 

फिर से लिख लेता✍🏻 हूँ मैं कोई कविता।


कविता ही कविता,

मेरे जीवन का अब सार हैं कविता।

बिना इसके अब तो लगता हैं,

बेमानी है मेरे जीवन की गाथा।


कविता के अर्थ को भावार्थ देने,

तुम किसी दिन आओ।

शायद उसी दिन मुक़्क़मल होगी,

मेरी यह कविता।


तुम्हारी गैर मौजूदगी में अक्सर मैंने लिखें हैं।

तुम्हारी मौजूदगी की कविता।

तुम्हारे ना होने पर भी,

तुम्हारी उपस्थिती की कविता।


विश्वजीत कुमार ✍🏻


रविवार, 25 मई 2025

तुम्हारे बिना...




गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


वो बचपन की बाते वो मस्तीयों के दिन,

याद आते रहेंगे अब, तुम्हारे बिना!!!

एक बार मुड़ कर देख भी लेते...

उसी के सहारे मैं जी लेता, तुम्हारे बिना!!!


कहते थे तुम साथ हमेशा रहोगे।

बताओं अब मैं कैसे रहूँ, तुम्हारे बिना!!!

चाँद भी मुझसे अब पूछता है...

अकेले छत पर क्या कर रहे हो, उसके बिना!!!


नदियां विरान है, बगीचे गुमनाम है।

फूलों में अब वो खुश्बू नही हैं, तुम्हारे बिना!!!

चाहता तो मैं तुम्हे रोक सकता था।

लेकिन जिस्म का करता भी क्या, तुम्हारे रूह के बिना!!!


  गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


विश्वजीत कुमार✍️

गुरुवार, 22 मई 2025

एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की...

एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की,

 उसने एक प्यारी सी मेरी तस्वीर बनाई थी।

 शायद!!! दुनिया की भीड़ में मैं कहीं खो ना जाऊं,

 इसलिए अपने दिल में उसने मुझे बंदी बनाई थी।


 शायद वह CBSE से पढ़ी थी,

लेकिन Hi, How are You के बाद हिंदी लगाई थी।

 पहले तो ठीक-ठाक रहता था मैं,

लेकिन उस दिन बिखर गया।


जिस दिन उसने भारतीय परिधान पहना, 

और फिर बिंदी लगाई थी।

 सोचिये🤔 क्या हुआ होगा उस दिन मेरा ?

 जब वह दूर से देखकर मुझे मुस्कुराई☺️ थी।


उस वक्त मैंने नजरे झुकाई, 

और अपने दिल को थाम ली थी।

 वो भी बहुत समझदार थी,

मुझसे नजरें हटाई एवं किसी और से नजरें मिलाई थी।


मैं कैसा था? यह तो पूछो ही मत,

उसकी याद में मैंने रातभर दिल को जलाई❤️‍🔥 थी।

हर कोई मेरा हाल पूछता था,

बार-बार उसका नाम पूछता था।


 मैं भी अपनी निगाहों पर पाबंदी लगा बैठा था,

 बंद करके उसे दिल के किसी कोने में ताला लगा बैठा था।

 वो नहीं चाहती थी उसका नाम जहां में आएं,

 और मुझको ऐसा करने पर उसने पाबंदी लगाई थी।


एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की,

 उसने मेरी एक प्यारी सी तस्वीर बनाई थी।

 शायद दुनिया की भीड़ में मैं कहीं खो ना जाऊं,

 इसलिए अपने दिल में मुझे बंदी बनाई थी।


विश्वजीत कुमार✍️


सोमवार, 21 अप्रैल 2025

असंभव है।

तुमसे मिलना भी असंभव है, 

ना मिलना भी असंभव है।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी असंभव है।


हमें याद हैं वो पल,

जिसमे तुम कहती थी।

सनम आपसे दुर हो के,

एक पल जीना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


हम इस मोड़ पर आकर खड़े हुए हैं जानम!!!

तुम्हें पास बुलाना भी असंभव हैं।

तुमसे दुर रहना भी असंभव हैं।


असंभव ही असंभव हैं,

अब प्रत्येक कार्य असंभव हैं।

जो तुम नहीं हो जीवन में,

जीना/मरना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


एक कार्य तो तुम कर ही सकती हो,

असंभव से इस कार्य को अब संभव कर ही सकती हो।

मुझे तो यक़ीन हैं अब भी,

इस नामुमकिन को मुमकिन कर ही सकती हो।


लेकिन हमें लगता है यह सब है व्यर्थ की बातें,

व्यर्थ की चिंता व्यर्थ की जज्बाते।

होना है जो वही तो होगा,

फिर हम क्यों करें बेतकल्लुफ की बातें।


लेकिन असंभव को हम त्याग नहीं सकते,

 इसे संभव करने को करते रहते हैं।

दिन-रात हम फरियादें,

किसी दिन मुकम्मल होगी हमारी ये सारी जज्बातें।


उस दिन तुमसे मिलना भी संभव होगा,

पास आना भी संभव होगा।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी संभव होगा।


विश्वजीत कुमार✍️




बुधवार, 12 मार्च 2025

हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें...



हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो, हम घनश्याम हो जायें।


मिले हम मथुरा, वृन्दावन के वनों में,

राधा-कृष्ण की तरह हमारी जोड़ी बेमिसाल हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


तप करो तुम पार्वती सी,

हम तुम्हारे लियें भोले-नाथ हो जायें।


स्वर्ग बने हमारा ये प्यारा कैलाश,

खुशियों की पूरी सौगात हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


अयोध्या सी पावन नगरी हो हमारी,

राम-सीता की तरह हम महान हो जायें।


लव-कुश की भांति संताने हो हमारी,

जग में ऊंचा हमारा नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


गंगा सा पावन मन रहे तुम्हारा,

भागीरथी जैसे मेरे कार्य हो जायें।


ना तुम रूठो मुझसे ना मैं तुम से रुठू,

जीवन पर्यंत यही कर्म हमारे नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ कुंभ सी तो हम प्रयागराज हो जायें।


स्नान करके इस पावन जलधारा में,

जीवन पर्यंत एक दूसरे के एकाकार हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो हम घनश्याम हो जायें।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



मंगलवार, 4 मार्च 2025

तुमसे मुलाक़ात के मौके...


तुमसे मुलाक़ात के,

मौके तो बहुत आए।

कभी हम तो कभी तुम,

व्यस्त ही नज़र आए।


कभी पटना कभी छपरा,

बुलाते थे हमें लेकिन।

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


राह भटकते रहे,

मंजिल पर पहुँच नही पाये।

कभी इस ओर कभी उस ओर

वो बंधन कभी ख़त्म ना हो पाये।


कभी बिहार कभी यू पी,

में बसें रहे हम।

 किसी दिन तुमने आवाज नहीं लगाई,

किसी दिन हम आवाज नहीं लगायें।


 शेखपुरा से याराना रहा, 

पटना से भी रहा।

 तुम मिलोगी किस ओर, 

हम यह भी समझ नहीं पाए।


तुम्हारे पास आने के, 

सुअवसर भी कम नहीं आए।

 अभी तक हम पावन गंगा के, 

तट पर नहीं आए।


 कभी गंगा कभी यमुना, 

बुलाती थी हमें लेकिन 

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


विश्वजीत कुमार✍️

 


सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

वो गुलाब🌹 नहीं, भरोसा लाया था।


वो गुलाब🌹 नहीं,

भरोसा लाया था...

महक गई रूह मेरी।


वो झुमके नहीं,

ताल्लुक लाया था...

हार गई मेरे जीवन की

परेशानियां-दुश्वारियां सारी।


वो बिंदिया नहीं,

संपूर्ण ब्रह्मांड लाया था...

सुधर गई मेरे ग्रह-नक्षत्रों की 

बिगड़ी चाल सारी।


वो लौंग-लतिका नहीं,

प्रेम कविता लिख लाया था।

खुमारी में डूब गई 

मेरी देह पर लिखी कहानियां सारी।


वो पायल नहीं,

हौसला लाया था।

जिसे पग बांधे‌

ब्रह्मांड की परिक्रमा लगाती मैं 

उसकी बलैयां ले नजर उतारती

उसपर जाती वारी-बलिहारी।


वो स्वयं नहीं,

उसका अहसास आया था।

जिसमें उसे खोजती मैं

ईश्वर का पता पा गई।

 

सुजाता✍🏻

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

केवल दो रंग चुने हमने...



केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे हंसने का, 

क रंग तुम्हारे रोने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


 एक रंग तुम्हारे मिलने का, 

इक रंग तुम्हारे बिछड़ने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे यौवन का,

एक रंग तुम्हारे बुढ़ापे का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे खिलखिलाने का,

एक रंग तुम्हारे गुस्साने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे ख़ुशी का,

एक रंग तुम्हारे गम का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे पाने का,

एक रंग तुम्हारे खोने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी सादगी का,

एक रंग तुम्हारी जटिलता का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी उन्नति का,

एक रंग तुम्हारी अवनती का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी सफलता का,

एक रंग तुम्हारी असफलता का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी जीत का,

एक रंग मेरी हार का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे आने का,

एक रंग तुम्हारे जाने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


Bishwajeet Kumar✍️
Inspired by - Late Rajendra Rajan








सोमवार, 30 दिसंबर 2024

अपनी निगाहों से ऐसे इशारा ना कीजिये...


अपनी निगाहों से ऐसे इशारा ना कीजिये।

सरेआम हमको यूं निहारा न कीजिये।।


मानते हैं हम हैं थोड़े बेफिक्र से।

बार-बार यूं हमें उकसाया ना कीजिये।।


ज़िंदगी का बसर नामुमकिन है आप बिन।

यूँ मझधार में मुझको किनारा न कीजिये ।।


जिसे फूल जैसी नज़र कर दे घायल। 

उसे ईंट पत्थर से मारा न कीजिये ।।


लुटा दो भले आप जागीर सारी। 

मगर दिल मुहब्बत में हारा न कीजिये ।।


चुभने लगे जिंदगी में जब कुछ रिश्ते। 

गुजारिश है उसको पुकारा न कीजिये ।।


बने होंगे जो तेरे लिये वह आएंगे एक दिन।

 मोहब्बत से यूं रोज बुलाया ना कीजिए ।।


 विश्वजीत कुमार ✍🏻

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

सरेआम हमें यूँ ईशारा न कीजिए।



सरेआम हमें यूँ, 

ईशारा न कीजिए 

नजरें झुका के हमको, 

निहारा न कीजिए।


हर बार मुकम्मल, 

कहां किसी का ख्याल हुआ है। 

हर जगह तीर-ए-तुक्के, 

यूँ मारा न कीजिए।


बचपन के तसव्वुर से है, 

बिल्कुल अलग ये जहां।

जीवन की हकीकत से, 

यूँ किनारा न कीजिए 


पैदा हुए, पले बढ़े हो, 

इस जमीन में।

पा कर बुलन्दियों को, 

हमें यूँ भूलाया न कीजिए ।


शायर हो ठीक-ठाक, 

परन्तु इंसान बुरे हो।

इस बात को आप, 

नकारा न कीजिए।


चलो मान लिया,

वक्त नहीं है आपके पास

लेकिन गैरो को तो,

यूँ  निहारा न कीजिये


दुःख होता है,

आपको मौन देख के

कभी तो मेरे लिए,

मुस्कुराया☺️ तो कीजिये 


सरेआम हमें यूँ, 

ईशारा न कीजिए 

नजरें झुका के हमको, 

निहारा न कीजिए।

विश्वजीत कुमार


कविता में प्रयुक्त कुछ शब्दों के अर्थ -

तसव्वुर (पुल्लिंग) - कल्पना।

बुधवार, 13 नवंबर 2024

अगर दुनिया में होता न मुहब्बत का फलसफ़ा...


अगर दुनिया🌎 में होता न मुहब्बत❤️ का फलसफ़ा। 

सच मानिए होता न किसी से कोई खफ़ा😞 ।।


हमें इतना कहां है शऊर जानते हो तुम। 

हमको नहीं पता है क्या होती है ये वफ़ा ।।


नुख्सा हर एक नाकाम है तुमको भुलाने का। 

आजमा के खुद को देखा है हमने कई दफ़ा ।।


हमसे कोई न कीजिए उम्मीद वफ़ा की। 

दुश्मनों के लिए हमें करना है सिर्फ जफ़ा ।।


हमने दुनिया में दिल क्या लगा लिया। 

न जाने कितनी हम पे लगा दी गई दफ़ा ।।



साभार - सोशल मीडिया

कविता में प्रयुक्त कुछ उर्दू के शब्दों के अर्थ -

1. फ़लसफ़ा (पुल्लिंग) - ज्ञान, विद्या, दर्शन शास्त्र, तर्क विद्या, Philosophy.
2. शऊर (पुल्लिंग) - तरीक़ा, ढंग, सामान्य योग्यता, Mannerliness
3. वफ़ा (स्त्रीलिंग) - वचन पालना, निष्ठा, Manners.
4. जफ़ा (स्त्रीलिंग) - अत्याचार, ज़ुल्म, अन्याय पूर्ण कार्य।

बुधवार, 31 जुलाई 2024

आपसे मिलकर हम भी ग़ज़ल हो जाएँगे।


यह किसको ज्ञात था,  

ये वक़्त भी आ जाएगा।

आप मेरी ज़िंदगी के,

राशिफल हो जाएँगे।


आपसे मिलकर हम भी ग़ज़ल हो जाएँगे।


आपके मन में अचानक, 

यूँ सजल हो जाएँगे।

क्या ख़बर थी, 

हम इतने मुकम्मल हो पायेंगे।


आपसे मिलकर हम भी ग़ज़ल हो जाएँगे।


लिखने लगेंगे अल्फ़ाज आपके लिये,

मुश्किलो में भी संवर जायेंगे।

आप मुझे देखो मै आप को देखु,

वेपरवाही में हम बह जायेंगे।


आपसे मिलकर हम भी ग़ज़ल हो जाएँगे।


वो वक्त भी ख़ूब था,

दिलों में ख्वाहिशो का जोड़ था।

किसको क्या मालुम था,

हम इतने बेखबर हो जायेंगे।


आपसे मिलकर हम भी ग़ज़ल हो जाएँगे।



मुकम्मल - संपूर्ण, समग्र (जिसमे कुछ भी करने को बाकी न हो)
सजल - बादल, नम, शोकाकुल।

गुरुवार, 27 जून 2024

मेरे मोहन तेरा मुस्कुराना, भूल जाने के काबिल नहीं हैं।


मेरे मोहन तेरा मुस्कुराना,

भूल जाने काबिल नहीं हैं।

चोट खाई है जो दिल पर,

वो दिखाने के काबिल नहीं है।


शीशा पत्थर से टकरा कर टूटा,

टूटने की सजा सबने पाई।

आज दिल मेरा टूट रहा है,

दिखाने के काबिल नहीं है।


मैंने पूछा कल तुम कहां थे,

पहले मुस्कराए फिर हंस के बोले।

ऐसी बातो को क्यों पूछती हो,

जो बताने के काबिल नही है।


मोहब्बत का तगाजा नहीं हम

न बदलेंगे तुम भी ना बदलो।

तुम तो ऐसे बदलने लगे हो,

आज तक कोई बदला नही है।


मेरे मोहन तेरा मुस्कुराना,

भूल जाने काबिल नहीं हैं।

चोट खाई है जो दिल पर,

वो दिखाने के काबिल नहीं है।


साभार - सोशल मीडिया

सोमवार, 24 जून 2024

ग़ज़ल

 


फूल सा ज़ख्म खिला था मुझ में।

यार का प्यार बसा था मुझ में।


लब पे मुस्कान सजा रक्खी थी।

ग़म का सागर भी छिपा था मुझ में।


मैंने भी साथ दिया है उसका।

जिसने विश्वास रखा था मुझ में।


हार मानी नहीं थी दुश्मन से।

जीत का जज्बा बचा था मुझ में।


दोस्त गर्दिश में नहीं था कोई।

सिर्फ  ईमान रहा था मुझ में।


नफ़रतें ख़त्म हुई थीं सारी।

प्रेम का दरिया बहा था मुझ में।


मेरा दिल जिसने चुराया कश्यप।

उसकी उल्फ़त का नशा था मुझ में।

प्रदीप कश्यप✍️

मंगलवार, 11 जून 2024

कोई तो जिंदगी में रात आखिरी होगी।



कोई तो जिंदगी में रात आखिरी होगी। 

जिगर से निकली हुई बात आखरी होगी ।।


थक गया हूं मैं रोज-रोज याद करके तुम्हें। 

कब मेरे दिल में तेरी याद आखिरी होगी ।।


मेरे हो जाओगे इक रोज भरोसा है मुझे। 

मुझपे तब गम की ये बरसात आखिरी होगी ।।


कि जिस भी रोज मौत बन गई मेरी दुल्हन 

जिंदगी से मेरी मुलाकात आखिरी होगी ।।


जिस दिन मेरी कलम तुमसे ऊब जाएगी। 

मेरी लिखी हुई किताब आखिरी होगी।।


तुम्हें भुलाके ये दिल तोहफा तो देदे मुझको । 

पर 'रघुवंशी' वो सौगात आखिरी होगी ।।

रघुवंशी ✍️

गुरुवार, 2 मई 2024

तुम (You)

More White in surrounding Black...

कभी ख्याल हो,

और कभी, सवाल हो तुम।

ख़ुदा जाने,

करिश्मा हो, या कमाल हो तुम।


फ़िजा की महक हो,

बसंत हो, बहार हो तुम।

या पिघलते हुए सोने का

"शबाब" हो तुम।


गुलाब हो, चमेली हो,

या हिजाब हो तुम।

या सुलगती हुई,

शम्मा की महताब हो तुम।


कभी शबनम, कभी "फुहार",

कभी वर्षा हो तुम।

कभी रेशम, कभी गुलशन

जलाल हो तुम।


सुनहरी धूप हो, चांदनी हो,

शबे-बरात हो तुम।

महक हो इत्र की, जन्नत हो,

एक ताज हो तुम।

SUDHIR✍️