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शनिवार, 13 सितंबर 2025

कपोल गीले😭 हो रहे हैं मेरे...


कपोल गीले😭 हो रहे हैं मेरे,

 स्वयं के खारे पानी से।

 अब तो खड़ा हूं मैं अकेला,

 इस भीड़ भरी जिंदगानी से।


 इधर मैं बेसुध बीमार सा, 

 अपने खेतों में पड़ा हूं।

उधर वो चह-चहा रही है 

 किसी और बगिया के मयखानो में।


 इतना नासाज़ सा हो गया हूं उसके ख्यालों में,

हमेशा रहता हूँ पड़ा अपने घर के विरानो में।

वो तो ऐसे छपक रही है,

 जैसे हो कोई भैंस पानी में।


 मेरा तो किया गया हर एक कार्य बुरा लगता था,

लेकिन बाड़ा अब बहुत प्यारा लग रहा है।

खुश हो रही है ऐसे जैसे हो कोई बकरी, 

हरे-भरे खेतों की हरियाली में।


कपोल गीले हो रहे हैं मेरे,

 स्वयं के खारे पानी से।

 अब तो खड़ा हूं मैं अकेला,

 इस भीड़ भरी जिंदगानी से।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



बुधवार, 3 सितंबर 2025

प्यार तो वह मुझसे कम करता है।



प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


उसका चेहरा जो है ना!!! 

नज़र से कभी नहीं हटता मेरी।

शायद इसीलिये रात-दिन मुझको, 

परेशान बहुत करता है।


जी तो चाहता है भुला दूँ उसे मैं,

लेकिन ख़यालो में आ-आ कर के वो बेज़ार बहुत करता हैं।

ऐसा नही है की मै उसे पसंद नही,

बस ये बताने से वो एहतिराम करता है।


खुश नसीब हो आपलोग जो उसकी कहानियां सुनने के आए हो,

वरना वो तो एक अल्फाज़ हैं।

रहता तो हमेशा मेरे साथ हैं,

लेकिन एतबार नही करता है।


उक्ता गया हूँ उसके इस कार्यो से,

ना कभी वो हाँ और ना कभी ना कहता है।

बस!!! अपनी आँखों के झील में रखता है।

ना डूबने देता है और ना उबरने देता है...

अपनी काजल की लकीरों की, 

वह लक्ष्मण रेखा तैयार रखता है।


प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


विश्वजीत कुमार✍🏻


कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ -

एहतिराम (احترام) - सम्मान, आदर, इज़्ज़त या मान-मर्यादा
अल्फ़ाज़ - "शब्द" या "शब्द समूह
एतबार - (पुल्लिंग) विश्वास, भरोसा।
बेज़ार - परेशान
उक्ता - ऊबा हुआ


सोमवार, 1 सितंबर 2025

...आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


 तेरी दहलीज तो बहुत दूर है वरना, 

जब भी होते उदास हम तेरे पास आ जाते।

 यदि तेरे छोड़े हुए ना होते तो, 

शायद!!! पूरी दुनिया को रास आ जाते।


 कभी-कभी सोचता हूँ, 

काश बचपन में लौट जाता मैं।

सभी पुराने लिबास मेरे काम आ जाते।

शायद!!! अब भी नाराज हो क्या मुझसे,

एक बार तो मुस्कुरा😊 दो मेरी ज़िन्दगी में चार चाँद आ जाते।


कहने को तो है यहां सभी मेरे अपने,

लेकिन, तुम जो तसव्वुर में हो तो। 

पूरी कायनात भी जमीं पर आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


विश्वजीत कुमार✍🏻

कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ 

दहलीज - घर (House)

लिबास - कपड़ा (Clouth)

तसव्वुर - कल्पना (Imagination)

कायनात - सृष्टि, ब्रह्मांड, जगत, संसार या विश्व।


रविवार, 31 अगस्त 2025

कोई बात नही...

 ग़ज़ल 



आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


कभी कहते थे मुझसे मेरे बिना जी न सकेंगे,

लाख मुसीबते आये हँस कर आत्मसात करेंगे।


ये तो अब पुरानी बाते हो गई,

और यही सही है तो कोई बात नही।


लानत है मुझको खुद पे कि ताउम्र मैंने वफ़ा की,

फिर भी मुझमें ही कमी है तो कोई बात नही।


धोखा, फरेब, झूठ को कहते हैं इश्क़🥰वो,

फिर भी, इश्क़🥰यही है तो कोई बात नही।


शैवाल पत्थर तक है तब तक ठीक है,

अगर आपके दिल में भी जमा है तो कोई बात नही।


आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


      विश्वजीत कुमार ✍🏻

रविवार, 25 मई 2025

तुम्हारे बिना...




गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


वो बचपन की बाते वो मस्तीयों के दिन,

याद आते रहेंगे अब, तुम्हारे बिना!!!

एक बार मुड़ कर देख भी लेते...

उसी के सहारे मैं जी लेता, तुम्हारे बिना!!!


कहते थे तुम साथ हमेशा रहोगे।

बताओं अब मैं कैसे रहूँ, तुम्हारे बिना!!!

चाँद भी मुझसे अब पूछता है...

अकेले छत पर क्या कर रहे हो, उसके बिना!!!


नदियां विरान है, बगीचे गुमनाम है।

फूलों में अब वो खुश्बू नही हैं, तुम्हारे बिना!!!

चाहता तो मैं तुम्हे रोक सकता था।

लेकिन जिस्म का करता भी क्या, तुम्हारे रूह के बिना!!!


  गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


विश्वजीत कुमार✍️

गुरुवार, 22 मई 2025

एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की...

एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की,

 उसने एक प्यारी सी मेरी तस्वीर बनाई थी।

 शायद!!! दुनिया की भीड़ में मैं कहीं खो ना जाऊं,

 इसलिए अपने दिल में उसने मुझे बंदी बनाई थी।


 शायद वह CBSE से पढ़ी थी,

लेकिन Hi, How are You के बाद हिंदी लगाई थी।

 पहले तो ठीक-ठाक रहता था मैं,

लेकिन उस दिन बिखर गया।


जिस दिन उसने भारतीय परिधान पहना, 

और फिर बिंदी लगाई थी।

 सोचिये🤔 क्या हुआ होगा उस दिन मेरा ?

 जब वह दूर से देखकर मुझे मुस्कुराई☺️ थी।


उस वक्त मैंने नजरे झुकाई, 

और अपने दिल को थाम ली थी।

 वो भी बहुत समझदार थी,

मुझसे नजरें हटाई एवं किसी और से नजरें मिलाई थी।


मैं कैसा था? यह तो पूछो ही मत,

उसकी याद में मैंने रातभर दिल को जलाई❤️‍🔥 थी।

हर कोई मेरा हाल पूछता था,

बार-बार उसका नाम पूछता था।


 मैं भी अपनी निगाहों पर पाबंदी लगा बैठा था,

 बंद करके उसे दिल के किसी कोने में ताला लगा बैठा था।

 वो नहीं चाहती थी उसका नाम जहां में आएं,

 और मुझको ऐसा करने पर उसने पाबंदी लगाई थी।


एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की,

 उसने मेरी एक प्यारी सी तस्वीर बनाई थी।

 शायद दुनिया की भीड़ में मैं कहीं खो ना जाऊं,

 इसलिए अपने दिल में मुझे बंदी बनाई थी।


विश्वजीत कुमार✍️


सोमवार, 21 अप्रैल 2025

असंभव है।

तुमसे मिलना भी असंभव है, 

ना मिलना भी असंभव है।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी असंभव है।


हमें याद हैं वो पल,

जिसमे तुम कहती थी।

सनम आपसे दुर हो के,

एक पल जीना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


हम इस मोड़ पर आकर खड़े हुए हैं जानम!!!

तुम्हें पास बुलाना भी असंभव हैं।

तुमसे दुर रहना भी असंभव हैं।


असंभव ही असंभव हैं,

अब प्रत्येक कार्य असंभव हैं।

जो तुम नहीं हो जीवन में,

जीना/मरना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


एक कार्य तो तुम कर ही सकती हो,

असंभव से इस कार्य को अब संभव कर ही सकती हो।

मुझे तो यक़ीन हैं अब भी,

इस नामुमकिन को मुमकिन कर ही सकती हो।


लेकिन हमें लगता है यह सब है व्यर्थ की बातें,

व्यर्थ की चिंता व्यर्थ की जज्बाते।

होना है जो वही तो होगा,

फिर हम क्यों करें बेतकल्लुफ की बातें।


लेकिन असंभव को हम त्याग नहीं सकते,

 इसे संभव करने को करते रहते हैं।

दिन-रात हम फरियादें,

किसी दिन मुकम्मल होगी हमारी ये सारी जज्बातें।


उस दिन तुमसे मिलना भी संभव होगा,

पास आना भी संभव होगा।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी संभव होगा।


विश्वजीत कुमार✍️




बुधवार, 12 मार्च 2025

हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें...



हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो, हम घनश्याम हो जायें।


मिले हम मथुरा, वृन्दावन के वनों में,

राधा-कृष्ण की तरह हमारी जोड़ी बेमिसाल हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


तप करो तुम पार्वती सी,

हम तुम्हारे लियें भोले-नाथ हो जायें।


स्वर्ग बने हमारा ये प्यारा कैलाश,

खुशियों की पूरी सौगात हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


अयोध्या सी पावन नगरी हो हमारी,

राम-सीता की तरह हम महान हो जायें।


लव-कुश की भांति संताने हो हमारी,

जग में ऊंचा हमारा नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


गंगा सा पावन मन रहे तुम्हारा,

भागीरथी जैसे मेरे कार्य हो जायें।


ना तुम रूठो मुझसे ना मैं तुम से रुठू,

जीवन पर्यंत यही कर्म हमारे नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ कुंभ सी तो हम प्रयागराज हो जायें।


स्नान करके इस पावन जलधारा में,

जीवन पर्यंत एक दूसरे के एकाकार हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो हम घनश्याम हो जायें।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



मंगलवार, 4 मार्च 2025

तुमसे मुलाक़ात के मौके...


तुमसे मुलाक़ात के,

मौके तो बहुत आए।

कभी हम तो कभी तुम,

व्यस्त ही नज़र आए।


कभी पटना कभी छपरा,

बुलाते थे हमें लेकिन।

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


राह भटकते रहे,

मंजिल पर पहुँच नही पाये।

कभी इस ओर कभी उस ओर

वो बंधन कभी ख़त्म ना हो पाये।


कभी बिहार कभी यू पी,

में बसें रहे हम।

 किसी दिन तुमने आवाज नहीं लगाई,

किसी दिन हम आवाज नहीं लगायें।


 शेखपुरा से याराना रहा, 

पटना से भी रहा।

 तुम मिलोगी किस ओर, 

हम यह भी समझ नहीं पाए।


तुम्हारे पास आने के, 

सुअवसर भी कम नहीं आए।

 अभी तक हम पावन गंगा के, 

तट पर नहीं आए।


 कभी गंगा कभी यमुना, 

बुलाती थी हमें लेकिन 

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


विश्वजीत कुमार✍️

 


मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

केवल दो रंग चुने हमने...



केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे हंसने का, 

एक रंग तुम्हारे रोने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


 एक रंग तुम्हारे मिलने का, 

इक रंग तुम्हारे बिछड़ने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे यौवन का,

एक रंग तुम्हारे बुढ़ापे का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे खिलखिलाने का,

एक रंग तुम्हारे गुस्साने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे ख़ुशी का,

एक रंग तुम्हारे गम का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे पाने का,

एक रंग तुम्हारे खोने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी सादगी का,

एक रंग तुम्हारी जटिलता का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी उन्नति का,

एक रंग तुम्हारी अवनती का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी सफलता का,

एक रंग तुम्हारी असफलता का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारी जीत का,

एक रंग मेरी हार का।


केवल दो रंग चुने हमने...


एक रंग तुम्हारे आने का,

एक रंग तुम्हारे जाने का।


केवल दो रंग चुने हमने...


Bishwajeet Kumar✍️
Inspired by - Late Rajendra Rajan








सोमवार, 30 दिसंबर 2024

अपनी निगाहों से ऐसे इशारा ना कीजिये...


अपनी निगाहों से ऐसे इशारा ना कीजिये।

सरेआम हमको यूं निहारा न कीजिये।।


मानते हैं हम हैं थोड़े बेफिक्र से।

बार-बार यूं हमें उकसाया ना कीजिये।।


ज़िंदगी का बसर नामुमकिन है आप बिन।

यूँ मझधार में मुझको किनारा न कीजिये ।।


जिसे फूल जैसी नज़र कर दे घायल। 

उसे ईंट पत्थर से मारा न कीजिये ।।


लुटा दो भले आप जागीर सारी। 

मगर दिल मुहब्बत में हारा न कीजिये ।।


चुभने लगे जिंदगी में जब कुछ रिश्ते। 

गुजारिश है उसको पुकारा न कीजिये ।।


बने होंगे जो तेरे लिये वह आएंगे एक दिन।

 मोहब्बत से यूं रोज बुलाया ना कीजिए ।।


 विश्वजीत कुमार ✍🏻

रविवार, 29 दिसंबर 2024

अंदाज़ लगाना चाहता था.....

 


अंदाज़ लगाना चाहता था
  *"शख्सियत"*
मेरी कमाई के हिसाब से.....

मैने अपनी यात्राओं ✈️ की लिस्ट थमा दी।


विश्वजीत कुमार✍️

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

सरेआम हमें यूँ ईशारा न कीजिए।



सरेआम हमें यूँ, 

ईशारा न कीजिए। 

नजरें झुका के हमको, 

निहारा न कीजिए।


हर बार मुकम्मल, 

कहां किसी का ख्याल हुआ है। 

हर जगह तीर-ए-तुक्के, 

यूँ मारा न कीजिए।


बचपन के तसव्वुर से है, 

बिल्कुल अलग ये जहां।

जीवन की हकीकत से, 

यूँ किनारा न कीजिए ।


पैदा हुए, पले बढ़े हो, 

इस जमीन में।

पा कर बुलन्दियों को, 

हमें यूँ भूलाया न कीजिए ।


शायर हो ठीक-ठाक, 

परन्तु इंसान बुरे हो।

इस बात को आप, 

नकारा न कीजिए।


चलो मान लिया,

वक्त नहीं है आपके पास।

लेकिन गैरो को तो,

यूँ  निहारा न कीजिये।


दुःख होता है,

आपको मौन देख के।

कभी तो मेरे लिए,

मुस्कुराया☺️ तो कीजिये। 


सरेआम हमें यूँ, 

ईशारा न कीजिए। 

नजरें झुका के हमको, 

निहारा न कीजिए।

विश्वजीत कुमार


कविता में प्रयुक्त कुछ शब्दों के अर्थ -

तसव्वुर (पुल्लिंग) - कल्पना।

रविवार, 15 सितंबर 2024

ऐ शेखपुरा मेरी जान💗 हो तुम। Aye Sheikhpura meri jaan💗 ho tum.



ऐ शेखपुरा मेरी जान💗 हो तुम।


मेरे गांव का वह कच्चा मकान हो तुम।

जहां खेल-कूद कर हम बड़े हुए,

उस बचपन से लेकर जवानी तक की पहचान हो तुम।


 ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


कभी किसी की खौफ की कहानी,

तो वही राजो सिंह की कल्पना का आकार हो तुम।


ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम। 


गणेश होटल की कभी ना भूलने वाली समोसा हो,

तो वही निताई चौक के पास मिलने वाली तीखे गोलगप्पे का स्वाद हो तुम।


बंगाली चाय की सौंधी-सी महक हो।

चांदनी चौक के मोमो की दुकान पर लगी, 

भीड़ की चहक हो तुम।

खुद के चार्ट को एक दूसरे से बेहतर बताने वाली कटरा चौक की वह दुकान हो तुम।


ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम। 


गिरीहिंदा पहाड़ पर स्थित, 

बाबा कामेश्वर नाथ का धाम हो तुम। 

बुधौली का वो कभी ना हटने वाला जाम हो तुम।


गिरीहिंदा माता के मंदिर में बजने वाला, 

वह रिमझिम-सी आवाज हो तुम।

वही श्यामा सरोवर पार्क में, 

टहलते लोगों के पैरों की पदचाप हो तुम।

अनुमंडल ग्राउंड में खेलते खिलाड़ियों की संतुष्टि भरी थकान हो तुम।


ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


गिरीहिंदा बस स्टैंड पर आती-जाती बसों में, 

बैठी सवारियों का ब्यौरा हो तुम।

हॉस्पिटल रोड में घुसते ही एंबुलेंस की आवाज हो तुम।

पुलिस लाइन में खड़े उस सिपाही की वर्दी की गर्मी हो तुम।

नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए, 

पढ़ते एवं पढ़ाते छात्रों का मेला हो तुम।


 ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


सब्जी मंडी में बिकती भाजियों का बाजार हो तुम। 

तो वहीं बैठ कर भीख मांगती, 

उस बुड्ढी मां के सर का छत हो तुम। 

लेबर चौक के पास बैठे कार्य की तलाश में, 

उन मजदूरों की आस हो तुम।


 ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


दशहरा में घूमने आए लोगों का बलखाता रेला हो तुम।

शेखपुरा स्टेशन से गुजरती वह धर-धराती सी ट्रेन हो तुम।

तो वही पास सड़क से निकलता हुआ कोई राहगीर हो तुम।

 टाटी नदी का बहता कल-कल पानी हो तो

वही अरघवटी छठ घाट पर आई व्रतियों की आस्था की कहानी हो तुम।


 ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


बड़ी दुर्गा जी के पास वह बड़ा वाला दुर्गा पंडाल हो तुम।

कच्ची रोड पर कोचिंग पढ़ने आए छात्रों के सपनों की सुनहरी मुस्कान हो तुम।

ए टू जेड मैथ क्लासेस की सेवा प्रणायता की, 

दर्शनाथ हो तुम।


 ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


स्कूल से छुटे बच्चों की मौजूद किलकारी हो तुम। 

दल्लू मोड़ में बेफिक्र घूमते मस्त मौलो की, 

सीटी बजाती टिटकारी हो तुम।

हुसैनाबाद से आती वह अजान हो 

शिव मंदिर बंगाली पर की शंखनाद हो तुम। 


....और क्या बताएं कहां-कहां और क्या-क्या हो तुम।


बस इतना जान लो इस शहर में बसने वाले हर एक वाशिंदे के नस-नस में हो और सबके चेहरे की वह मीठी मुस्कान 😊 हो तुम। 


किसी और का तो पता नहीं लेकिन

 ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


  ऐ शेखपुरा मेरी तो जान हो तुम।

  ऐ शेखपुरा मेरी तो जान हो तुम।


विश्वजीत कुमार ✍🏻

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

शनिवार, 18 मई 2024

लईका जब बिगड़े लागेला, तब ढेर चढ़ावल ना जाला।

 गांव के बुढ़ पुरनिया लोग एगो बरा निमन शिक्षा दे गईल। रउवा सभे पढ़ी...👨🏻‍💻



लईका जब बिगड़े लागेला,

तब ढेर चढ़ावल ना जाला।

जब काम बने लतीआवे से,

तब वेद पढ़ावल ना जाला।।


 शिवरात पचईया दुइये दिन,

नागिन🐍 के पूजा होखेला।

 बाकी हर दिन कुचल जाला,

नित दूध पियावल ना जाला।।


रऊरा अमृत बरसवला से,

गरकट गद्दारी ना छोड़ी -2

 मानेला ओल खटाई से,

गुड़ घी मिलावल ना जाला।।


 तु जीव-जंतु से प्यार करs,

बाकीर ई सीख जरूरी बा।

 बिच्छी🦂 के डंक बिना तूड़ले,

चुमल सुघरावल ना जाला।।


लईका जब बिगड़े लागेला,

तब ढेर चढ़ावल ना जाला।

जब काम बने लतीआवे से,

तब वेद पढ़ावल ना जाला।।

शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

तुम थी या था कोई ख़्वाब!!!



तुम थी या था कोई ख़्वाब,

बस इतना बता दो....

ओ मेरे सपनो के हमराज।

तुम थी या था कोई ख़्वाब


छठ की छुट्टियां थी,

घर जाने को मैं बस में था सवार।

सफर में तुम बन कर आये

मेरे लिये एक दर्शनाथ।


वो सफेदी की लालिमा लिये

चेहरे पर थी एक मुस्कान 😊

पता नहीं तूने मेरे ही दाएं बैठना क्यों चुना,

शायद बाएं बैठने का मन में हो ख़्याल।


छठ के गीतों से पूरा बस था गुलज़ार,

मेरे मन में तो एक ही गीत चल रहे थे।

किसी तरह तुम्हारा,

नाम पता कर लूं मैं ज्ञात।


उसकी ख़ामोशी को देखकर

समझ गया मैं यह बात।

विश्वजीत यूं दिल फ़ेंक ना बन,

करने दे उसे सफर में थोड़ा विश्राम।


यदि वो बनी होगी तेरे लिये,

एक दिन आयेगी जरूर तेरे पास।

अभी कविता तक ही रहने दो,

उसके बारे में मत सोचो बारम्बार।


तुम थी या था कोई ख़्वाब

बस इतना बता दो

ओ मेरे सपनो के हमराज

तुम थी या था कोई ख़्वाब।


विश्वजीत कुमार ✍️

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

मुझे ख़ामख़ा ही फंसाया गया है। (I have been falsely implicated.)



मुझे ख़ामख़ा ही फंसाया गया है।

जहर-ए-मुहब्बत का पिलाया गया है ।।


जो बेबात हँसता है उसको समझिए।

हजारों दफ़ा दिल उसका दुःखाया😢 गया है।।


जिसे अपनी तन्हाई से है मुहब्बत।

बहुत इश्क़ में वो सताया गया है।।


शराफ़त का चोला है जिसके बदन पे।

उन्हीं का ज़ेहन काला पाया गया है।।


 हम भी चाह बैठे थे उसको अपना।

 जिसे मेरे काबिल बताया गया है।।


हुई उसकी कामिल तमन्ना आज पुरी।

मज़ार मेरा सजाया गया है।।


 साभार - सोशल मीडिया


I have been falsely implicated.


I have been falsely implicated.


 Fed the poison of love for me.



 Understand the one who laughs unnecessarily.

Thousands of times his heart has been hurt.



 Who is in love with his loneliness.

He has been tortured a lot in love.



 On whose body is the robe of decency.

 His mind has been found to be black.


We too wanted him as our own.

 Who has not been made capable of me.


 His wish came true today.

My tomb was decorated.


Courtesy - Social Media

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

प्यार करके हमे तुम भी पछताओगे।


प्यार💗 करके हमें तुम भी पछताओगे। 

छोड़कर हमको तुम भी चले जाओगे😓 ।।


हम हैं नाकाम दुनिया में हारे हुए । 

जोड़के रिश्ता तुम हमसे क्या पाओगे ।।


आज नजदीकियों को हो आतुर मगर । 

दूरियां अच्छी हैं कल ये समझाओ गे ।।


इतना आसां नहीं गम मेरा बांटना । 

गम मेरा देखकर तुम सिहर जाओगे ।।


करते-करते दवा जख्म-ए-दिल की मेरी । 

दर्द से एक रोज तुम भी भर जाओगे ।।


मैं तो हूँ स्वं से उजड़ा हुआ ।

मुझे कहां एकत्र कर पाओगें।।


मत समेटो मुझे बिखरा ही रहने दो । 

देखोगे जो मेरा हाल डर जाओगे ।।


जानता हूं तुम बनना चाहते हो मेरे हमसफर ।

वादा करो ताउम्र साथ निभा पाओगें ।।


कहानियां अपनी भी एक दिन उजागर होगी ।

क्या उस पल को तुम सम्हाल पाओगें ।।


छोड़ कर दुनिया को खुद में ढूंढो सुकून । 

वरना इस कश्मकश में यूं ही मर जाओगे।।


साभार - सोशल मीडिया।

Edit & Modify - Bishwajeet Verma


रविवार, 12 मार्च 2023

वक़्त पड़े पे कौन यहाँ काम आया है।

 


वक़्त पड़े पे कौन यहाँ काम आया है। 

जो तुमने उसपे इल्ज़ाम लगाया है ।।


नहीं मुनासिब भला-बुरा कहना उसको। 

उसने तो अपना किरदार निभाया है।।



साभार- सोशल मीडिया।