पिता का विवाहित पुत्री के प्रश्न ‘‘सच बात पूछती हूँ, बताना ना बाबूजी’’ का जवाब...
सच बात मेरे मन की सुनाता हूँ लाड़ली,
बताता हूँ लाड़ली।
तेरी याद दिल से जाती नहीं।
पैदा हुई थी तुम तो मेरा दिल था खिल गया,
सीने से लगाकर लगा संसार मिल गया।
एक हूक सी उठती है, होती फ़िक्र सी जरा,
माँ ज़ब तेरी कर बैठती है जिक्र भी तेरा,
रोती है वो, तो मूक हो जाता हूँ लाड़ली,
रो जाता हूँ लाड़ली,
पर याद दिल से जाती नहीं।
विधना विरह की आग में झुलसी, चली गई।
अँगना यहीं, चौरा यहीं, तुलसी चली गई,
सूनीं है घर की ड्योढ़ियाँ, सूना है ओसारा,
बस गूँजता है "बाबूजी" का स्वर वो तुम्हारा।
यादें समेट कर ही सो जाता हूँ लाड़ली,
सो जाता हूँ लाड़ली,
तेरी याद दिल से जाती नहीं।
जिस दिन दुवार से तेरी डोली निकल गई,
उस दिन से हंसी और ठिठोली निकल गई,
मन में रखे सब मान-मनौती निकल गए,
श्रृंगार थे, गलहार के मोती निकल गए।
अब अश्रु खालीपन के पिरोता हूँ लाड़ली,
सुनाता हूँ लाड़ली,
तेरी याद दिल से जाती नहीं
दरवाजा भी अब दूर से पुकारता नहीं,
हाथों से थैलियाँ कोई उतारता नहीं,
अब कौन जिद करे, दुलार कौन लगाए?
कोई नहीं जो होली-दिवाली भी मनाये?
त्यौहार सूनेपन का मनाता हूँ लाड़ली,
सुनाता हूँ लाड़ली,
हाँ याद तेरी जाती नहीं
सारी परंपराओं को, सारे विधान को
बेटी ही ढोती है ज़मीन आसमान को
टुकड़ों में जिस तरह तेरा संसार बंट गया
क्यूँ सोचती है बाबूजी का प्यार बंट गया।
एक बाप का ही प्यार तो पूरा है लाड़ली,
न अधूरा है लाड़ली,
हाँ याद तेरी जाती नहीं।
Piyush Pranav ✍️
