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बुधवार, 23 सितंबर 2026

वो चाहे शाम को घूमे या आधी रात को घूमे...

                                                                                             Source - BBC बीबीसी

 

वो चाहे शाम को घूमे या आधी रात को घूमे।

अगर वह भींगना चाहे भरी बरसात में घूमे।।

तुम्हें किसने दिया है हक ये दुर्व्यवहार करने का।

वो एक लड़की की मर्जी है वो किसके साथ में घूमे।।


नज़रिया अपना बदलो, उसपे पहरे क्यों बिठाते हो?

उसी की आज़ादी पर तुम सवाल संगीन उठाते हो?

हो सड़क, राहें या कोई सुनसान कोना,

वो निर्भय हो के अपने ख़्वाब में घूमे।।


दरिंदों को सिखाओ पाठ, तुम इंसान होने का,

गुनाहगारों को दो डर,  ज़मीं पर चैन खोने का।

जमुई की  पावन धरा हो, या देश का कोई  कोना,

उसे हक़ है, कि वो अपने स्वाभिमान में घूमे।।


संस्कारों की झूठी आड़ में, तुम उसकी साँसें मत छाँटो,

जो घिनौना काम करे, उस दरिंदे में गुनाह बाँटो।

उसे हक़ है, ज़माने की बंदिशों को तोड़ आगे बढ़ने का,

वो अपनी रोशनी लेकर, घने ज़ुल्मत (अंधेरे) में घूमे।।


तुम्हारी सोच छोटी है, मगर उसके क़दम हैं ऊँचे 

ज़माना के डर से वो क्यों पीछे खिंचे?

तुम्हें किसने दिया अधिकार, उसकी राह रोकने का। 

वो जिसकी हमफ़सर बनना चाहे, उसी के साथ में घूमे।।


वो चाहे शाम को घूमे या आधी रात को घूमे...

उसे आज़ाद रहने दो, वो अपनी शान से घूमे!

अगर वह भींगना चाहे भरी बरसात में घूमे।।

तुम्हें किसने दिया है हक ये दुर्व्यवहार करने का।


वो एक लड़की की मर्जी है वो किसके साथ में घूमे।।

वो एक लड़की की मर्जी है वो किसके साथ में घूमे।।

रविवार, 9 अगस्त 2026

तोहरा बिनाs


गीत-गजल कइसे लिखब ? अब हम तोहरा बिना।

आपन मन के हालात कइसे व्यक्त करब? अब तोहरा बिना।

छोड़ के जात समय तु त तनको ना सोचलू...

गुनगुनाइब अब कईसे, अब तोहरा बिना।


बचपन के ऊ किस्सा, आ ऊ मस्ती के दिन,

 सब याद आवत रहीs, अब तोहरा बिना।

काश!!! तु बस एक बेर देखे खातिर पीछे मुड़ गइल रहतीं...

ओही याद पर हम हम जी लेती, तोहरा बिना।


तू कहत रहलू कि तू हमेशा हमरा साथे में रहबु।

बतावऽ, अब हम कईसे रही तोहरा बिना। 

चाँद भी अब हमरा से पूछेला...

"तू अकेले छत पर का कर रहल बाड़s, अब ओकरा बिना?


नदीयां उजाड़ हो गईल, बगइचा बिरान हो गईल,

फूलवो में भी अब सुगंध नइखे  अब तोहरा बिना।!

यदि हम चहती त तहरा के रोक लेती,

लेकिन उ देह के हम करती भी का, तोहरा आत्मा  के बिना ?


गीत-गजल कइसे लिखब ? अब हम तोहरा बिना।

आपन मन के हालात कइसे व्यक्त करब? अब तोहरा बिना।

छोड़ के जात समय तु त तनको ना सोचलू...

गुनगुनाइब अब कईसे, अब तोहरा बिना।


विश्वजीत कुमार✍️

इस कविता का हिंदी अनुवाद

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

एक कविता में सम्पूर्ण रामायण।



राम राम रामा सरयू तट पर राज्य कौसला है नामा,
अयोध्या है जिसकी राजधानी।
जिसके राजा दशरथ कहें नितिन कहानी
रानीयाॅं तीन कोशल्या, कैकेई और सुमित्र
नहीं हुआ तीनों को कोई पुत्र
पुत्र प्राप्ति हेतु वशिष्ट से यज्ञ करवाया
राम लखन भरत और शत्रुघ्न को पाया
चारों अस्त्र शस्त्र और युद्ध में बलवान
विश्वामित्र थे आश्रम में राक्षसों से परेशान
विश्वामित्र के आश्रम गए लखन और रामा
वहाॅं उन्होंने भयंकर-भयंकर राक्षसों को मारा
‌ऋर्षि ने दिव्य अस्त्र दिए राम किया प्रणामा
विश्वामित्र तब ले पहुंचे राम जनक धामा
धनुष तोड़ सीता को राम वधू बनाया
अयोध्या पहुंच मात पिता को शीश नवाया
राम के राजा बनने का जब समय आया
मंथरा ने कैकेई को तब भड़काया
बोली हे भरत मात कैकेई महोदया
कौशल्या पुत्र न बन जाए राजा अयोध्या
तू वचनों को अपने राजा से मांग ले
भरत को राज्य और राम को वनवास दे
वचनों को कैकेई के सुन दशरथ पर आघात हुआ
भरत को राज्य मिला और राम को वनवास हुआ
राम संग सीता और लखन भी बन को चल दिये
कैकेई और मंथरा के ही मन में जलने लगे दिये
इधर राम लखन सीता सहित बन को चले
उधर दशरथ प्राण तन को छोड़ यम को चले
केवट ने तब सरयू पार कराया
राम चित्रकूट में पर्णकुटी बनाया
लंकापति की बहन सुपनखा वहाॅं आ गई
राम लखन की सुंदर छवि उसे भाग गई
उसने दोनों भाइयों से विवाह को आग्रह किया
उन्होंने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया
क्रोधित हुई राक्षसी ने मात पर हमला कर दिया
लखन ने नाक को भी उसकी अलग कर दिया
नकटी बहन को देख रावण क्रोधित हुआ
उससे सीता का वर्णन सुन मोहित हुआ
मारीच हिरन बन कुटिया के पास जा खड़ा हुआ
सुंदर हिरन को देख सिय हिरन पाने का मन हुआ
लखन सिया को छोड़ राम हिरन लेने गए
राम ने जब मारा मारीच को बान
निकलने लगें उसके तन से प्राण
चिल्लाया बचाओ हे सिय हे लखन भाया
लगा सिय को संकट में है पति प्राणा
दे सौगंध सिय ने लखन को भेजा
तब लखन ने एक रेखा खिंचा
हे मात इससे बाहर न जाए
चाहे कितनी भी मुसीबत आए
साधू रुप धर रावन वहां आया
भिक्षांम देही भिक्षांम देही चिल्लाया
माता के भिक्षा देती ही रावण ने उन्हें उठाया
अपने पुष्पक विमान में जबरन बैठाया
माता के रूदन को जब जटायु ने सुना
तुरंत आ वह रावन से लड़ा
जटायु ने ज्यों रावन पर प्रहार किया
उसने उसके परो को काट दिया
राम लखन ने सिय को कुटी में न पाया
उन्होंने सिय खोजने को कदम बढ़ाया
धरा पर पड़े करहाते हुए जटायु राम पाया
जटायु ने जो घटी उस घटना को बताया
विरह में फिरत फिर राम रिशिमुख आए
जहां पवन पुत्र हनुमान को पाए
हुई यही सुग्रीव से मुलाकात
बनें मित्र दोनों थामा मित्रता का हाथ
देख दुखी राम हनुमाना
चले खोजन सिय करत राम प्रणामा
जब समुद्र मार्ग में बना अवरोध
जामवंत कराया हनुमान शक्ति बोध
पल भर में हनुमत समुद्र सीमा पार की
लंक पहुंच प्रभु मुद्रिका सिय को प्रदान की
क्रोध में वाटिका सारी उजाड़ दी
लेकर हनुमत अपने प्रभु का नामा
लंका को बनाया जलता हुआ शमशाना
लौटकर लंका से माता हाल सुनाया
राम लखन अब कुछ चैन सा पाया
राम, हनुमान और सुग्रीव वानरों की सेना बनाई
उठा धनुष और गदा लंका पर कर दि चढ़ाई
राम अनेक राक्षसों को मारा
फिर कुम्भकरण को संहारा
मेघनाथ और लखन भी टकरा गये
सबके मन डर से दहला गये
मेघनाथ ने लखन पर शक्ति आघात किया
मानों श्रीराम के हृदय पर वज्रपात किया
हनुमत तब संजीवनी लाए
राम लखन को जीवित पाए
पुनः लखन मेघनाथ आपस में भिड़ गए
मानो यमराज स्वयं लखन रूप धर गए
लखन ले प्रभु का नाम ऐसा मारा बाण
जो पल भर में लें आया मेघनाथ के प्राण
अब रावण स्वयं युद्ध में आ गया
चहुं दिशाओं में डर का माहौल छा गया
धरा और अम्बर भी घबरा गया
देवता समुह भी अम्बर में अब आ गया
रावण राम के बाण टकरा गये
रावण के भी काल राम में समा गये
राम शीशन पे काटे शीश रावण की ना मृत्यु होए
मारन का रावण को हर प्रयास विफल होए
तब कान में राम के विभिषण फुसफुसा
भाई की मृत्यु का भाई ने ही राज बताया
राम ने ब्रह्मास्त्र का अनुसंधान किया
नाभि का सोम सुखा रावण को मृत्यु दान दिया
रावण को पता था कि उसका गलत था कामा
वो चिल्लाया हे प्रभु राम राम रामा
राम सिय का मिलन हुआ
विभिषण का राज्याभिषेक हुआ
राम सिय लखन अयोध्या है आए
नगरी ने मिलकर स्वागत गीत है गाए
राम को राजा बनाया गया
सिय पर लांछन लगाया गया
सब छोड़ सिय पुनः वन गई
वाल्मीकि के यहां रूक गई
सिय ने दो पुत्र जाये सब थे बहुत खुश
बड़े का नाम लव छोटे का था कुश
राजा राम ने अश्वमेध यज्ञ करवाया
यज्ञ अश्व चहु ओर घुमवाया
सब ने उसे है बस शीश नवाया
लव कुश ने उसे है बन्दी बनाया
अश्व छुड़ाने सेना आई
लव कुश ने है मार भगाई
भरत, शत्रुघ्न और फिर लखन है आए
पर लव कुश वो हरा ना पाए
जब भाई सभी परास्त हुये
स्वयं राम युद्ध में आ गये
ज्यों लव कुश ने धनुष बाण उठाया
तभी गुरु ने आ धमकाया
क्यों तुमने राजा पर धनुष उठाया
क्या यही है मैंने तुम्हें सिखाया
क्षमा मांग लव कुश ने राजा को प्रणाम किया
भरत, शत्रुघ्न और लखन को जीवनदान दिया
जा मात को सारी कथा सुनाई
हराया भरत, शत्रुघ्न, लखन और आए फिर रघुराई
हमने भी रघुवर पर धनुष तान दिया
हाय तुमने जीते जी मुझे मार दिया
अपने पिता पर ही तुमने धनुष बाण तान दिया
प्रथम मुलाकात में ये कैसा है मान दिया
महल जा लव कुश सम्पूर्ण रामायण सुनाई
फिर सिय की भी है वन व्यथा बताई
स्वयं का नाम लव कुश बताया
राम पिता और सिय को है मात बताया
वाल्मीकि तब सिय को लेकर आए
प्रजा जन क्षमा मांगते दिए दिखाए
सिय ने तभी है धरा को पुकारा
यदि हूं पवित्र मैं अपारा
मुझे गोद में अपनी स्थान दें
मेरा जीवन आप ही अब तार दे
तभी धरा फटी धरा-धरा से प्रकट हुई
सिय गोंद में उनके निज धाम गई
फिर राम ने सरयू में किया स्नाना
निज धाम को किया तब प्रस्थाना
बोलो राम राम रामा
नितिन राघव ✍️

शनिवार, 13 सितंबर 2025

कपोल गीले😭 हो रहे हैं मेरे...


कपोल गीले😭 हो रहे हैं मेरे,

 स्वयं के खारे पानी से।

 अब तो खड़ा हूं मैं अकेला,

 इस भीड़ भरी जिंदगानी से।


 इधर मैं बेसुध बीमार सा, 

 अपने खेतों में पड़ा हूं।

उधर वो चह-चहा रही है 

 किसी और बगिया के मयखानो में।


 इतना नासाज़ सा हो गया हूं उसके ख्यालों में,

हमेशा रहता हूँ पड़ा अपने घर के विरानो में।

वो तो ऐसे छपक रही है,

 जैसे हो कोई भैंस पानी में।


 मेरा तो किया गया हर एक कार्य बुरा लगता था,

लेकिन बाड़ा अब बहुत प्यारा लग रहा है।

खुश हो रही है ऐसे जैसे हो कोई बकरी, 

हरे-भरे खेतों की हरियाली में।


कपोल गीले हो रहे हैं मेरे,

 स्वयं के खारे पानी से।

 अब तो खड़ा हूं मैं अकेला,

 इस भीड़ भरी जिंदगानी से।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



बुधवार, 3 सितंबर 2025

प्यार तो वह मुझसे कम करता है।



प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


उसका चेहरा जो है ना!!! 

नज़र से कभी नहीं हटता मेरी।

शायद इसीलिये रात-दिन मुझको, 

परेशान बहुत करता है।


जी तो चाहता है भुला दूँ उसे मैं,

लेकिन ख़यालो में आ-आ कर के वो बेज़ार बहुत करता हैं।

ऐसा नही है की मै उसे पसंद नही,

बस ये बताने से वो एहतिराम करता है।


खुश नसीब हो आपलोग जो उसकी कहानियां सुनने के आए हो,

वरना वो तो एक अल्फाज़ हैं।

रहता तो हमेशा मेरे साथ हैं,

लेकिन एतबार नही करता है।


उक्ता गया हूँ उसके इस कार्यो से,

ना कभी वो हाँ और ना कभी ना कहता है।

बस!!! अपनी आँखों के झील में रखता है।

ना डूबने देता है और ना उबरने देता है...

अपनी काजल की लकीरों की, 

वह लक्ष्मण रेखा तैयार रखता है।


प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


विश्वजीत कुमार✍🏻


कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ -

एहतिराम (احترام) - सम्मान, आदर, इज़्ज़त या मान-मर्यादा
अल्फ़ाज़ - "शब्द" या "शब्द समूह
एतबार - (पुल्लिंग) विश्वास, भरोसा।
बेज़ार - परेशान
उक्ता - ऊबा हुआ


सोमवार, 1 सितंबर 2025

...आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


 तेरी दहलीज तो बहुत दूर है वरना, 

जब भी होते उदास हम तेरे पास आ जाते।

 यदि तेरे छोड़े हुए ना होते तो, 

शायद!!! पूरी दुनिया को रास आ जाते।


 कभी-कभी सोचता हूँ, 

काश बचपन में लौट जाता मैं।

सभी पुराने लिबास मेरे काम आ जाते।

शायद!!! अब भी नाराज हो क्या मुझसे,

एक बार तो मुस्कुरा😊 दो मेरी ज़िन्दगी में चार चाँद आ जाते।


कहने को तो है यहां सभी मेरे अपने,

लेकिन, तुम जो तसव्वुर में हो तो। 

पूरी कायनात भी जमीं पर आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


विश्वजीत कुमार✍🏻

कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ 

दहलीज - घर (House)

लिबास - कपड़ा (Clouth)

तसव्वुर - कल्पना (Imagination)

कायनात - सृष्टि, ब्रह्मांड, जगत, संसार या विश्व।


रविवार, 31 अगस्त 2025

कोई बात नही...

 ग़ज़ल 



आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


कभी कहते थे मुझसे मेरे बिना जी न सकेंगे,

लाख मुसीबते आये हँस कर आत्मसात करेंगे।


ये तो अब पुरानी बाते हो गई,

और यही सही है तो कोई बात नही।


लानत है मुझको खुद पे कि ताउम्र मैंने वफ़ा की,

फिर भी मुझमें ही कमी है तो कोई बात नही।


धोखा, फरेब, झूठ को कहते हैं इश्क़🥰वो,

फिर भी, इश्क़🥰यही है तो कोई बात नही।


शैवाल पत्थर तक है तब तक ठीक है,

अगर आपके दिल में भी जमा है तो कोई बात नही।


आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


      विश्वजीत कुमार ✍🏻

शुक्रवार, 30 मई 2025

कविता (Poetry)



तुम्हारी गैर मौजूदगी में अक्सर मैंने लिखें हैं।

तुम्हारी मौजूदगी की कविता।

तुम्हारे ना होने पर भी,

तुम्हारी उपस्थिती की कविता।


डायरी का हर एक पन्ना गवाह हैं,

मेरे दिल में उठे तुम्हारे दर्द की कविता।


अक्सर खो जाता हूँ,

तुम्हारे ख्यालों में।

मेरे लिये भी सही हैं, क्योंकि!!

उसी से बनती हैं मेरी भावनाओं की कविता।


देखो प्रिय!!!

कुछ भी असंभव नहीं है इस जहां में,

तुमसे प्रेम💖 करना भी हो तो 

फिर से लिख लेता✍🏻 हूँ मैं कोई कविता।


कविता ही कविता,

मेरे जीवन का अब सार हैं कविता।

बिना इसके अब तो लगता हैं,

बेमानी है मेरे जीवन की गाथा।


कविता के अर्थ को भावार्थ देने,

तुम किसी दिन आओ।

शायद उसी दिन मुक़्क़मल होगी,

मेरी यह कविता।


तुम्हारी गैर मौजूदगी में अक्सर मैंने लिखें हैं।

तुम्हारी मौजूदगी की कविता।

तुम्हारे ना होने पर भी,

तुम्हारी उपस्थिती की कविता।


विश्वजीत कुमार ✍🏻


रविवार, 25 मई 2025

तुम्हारे बिना...




गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


वो बचपन की बाते वो मस्तीयों के दिन,

याद आते रहेंगे अब, तुम्हारे बिना!!!

एक बार मुड़ कर देख भी लेते...

उसी के सहारे मैं जी लेता, तुम्हारे बिना!!!


कहते थे तुम साथ हमेशा रहोगे।

बताओं अब मैं कैसे रहूँ, तुम्हारे बिना!!!

चाँद भी मुझसे अब पूछता है...

अकेले छत पर क्या कर रहे हो, उसके बिना!!!


नदियां विरान है, बगीचे गुमनाम है।

फूलों में अब वो खुश्बू नही हैं, तुम्हारे बिना!!!

चाहता तो मैं तुम्हे रोक सकता था।

लेकिन जिस्म का करता भी क्या, तुम्हारे रूह के बिना!!!


  गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


विश्वजीत कुमार✍️

गुरुवार, 22 मई 2025

एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की...

एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की,

 उसने एक प्यारी सी मेरी तस्वीर बनाई थी।

 शायद!!! दुनिया की भीड़ में मैं कहीं खो ना जाऊं,

 इसलिए अपने दिल में उसने मुझे बंदी बनाई थी।


 शायद वह CBSE से पढ़ी थी,

लेकिन Hi, How are You के बाद हिंदी लगाई थी।

 पहले तो ठीक-ठाक रहता था मैं,

लेकिन उस दिन बिखर गया।


जिस दिन उसने भारतीय परिधान पहना, 

और फिर बिंदी लगाई थी।

 सोचिये🤔 क्या हुआ होगा उस दिन मेरा ?

 जब वह दूर से देखकर मुझे मुस्कुराई☺️ थी।


उस वक्त मैंने नजरे झुकाई, 

और अपने दिल को थाम ली थी।

 वो भी बहुत समझदार थी,

मुझसे नजरें हटाई एवं किसी और से नजरें मिलाई थी।


मैं कैसा था? यह तो पूछो ही मत,

उसकी याद में मैंने रातभर दिल को जलाई❤️‍🔥 थी।

हर कोई मेरा हाल पूछता था,

बार-बार उसका नाम पूछता था।


 मैं भी अपनी निगाहों पर पाबंदी लगा बैठा था,

 बंद करके उसे दिल के किसी कोने में ताला लगा बैठा था।

 वो नहीं चाहती थी उसका नाम जहां में आएं,

 और मुझको ऐसा करने पर उसने पाबंदी लगाई थी।


एक कलाकार थी वह मेरे सपनों की,

 उसने मेरी एक प्यारी सी तस्वीर बनाई थी।

 शायद दुनिया की भीड़ में मैं कहीं खो ना जाऊं,

 इसलिए अपने दिल में मुझे बंदी बनाई थी।


विश्वजीत कुमार✍️


बुधवार, 30 अप्रैल 2025

प्रियतम तुम्हें पिलाने को लेकर आया मधुबला।


मधुबला


प्रियतम तुम्हें पिलाने को,
लेकर आया मधुबला।

अंगूरों की डाली से,
आज निचोड़ लाया हाला।

संग आज मै लाया हूं,
पीने और पिलाने वाला।

संग मे लाया मधु की गगरी,
संग मे लाया मधुशाला।

खोल नयन उठ जा प्यारे,
पूर्ण हुई तेरी माला।

देख खड़ा है सम्मुख तेरे,
पीने और पिलाने वाला।

मेरी मधु की गगरी से,
भर ले तू अपना प्याला।

शब्द हैं मेरे मधु के कतरे,
कविता है मेरी हाला।

कलम है मेरी मधु की गगरी,
पुस्तक मेरी मधुशाला।।
पुस्तक मेरी मधुशाला ।।

साभार - सोशल मीडिया

सोमवार, 21 अप्रैल 2025

असंभव है।

तुमसे मिलना भी असंभव है, 

ना मिलना भी असंभव है।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी असंभव है।


हमें याद हैं वो पल,

जिसमे तुम कहती थी।

सनम आपसे दुर हो के,

एक पल जीना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


हम इस मोड़ पर आकर खड़े हुए हैं जानम!!!

तुम्हें पास बुलाना भी असंभव हैं।

तुमसे दुर रहना भी असंभव हैं।


असंभव ही असंभव हैं,

अब प्रत्येक कार्य असंभव हैं।

जो तुम नहीं हो जीवन में,

जीना/मरना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


एक कार्य तो तुम कर ही सकती हो,

असंभव से इस कार्य को अब संभव कर ही सकती हो।

मुझे तो यक़ीन हैं अब भी,

इस नामुमकिन को मुमकिन कर ही सकती हो।


लेकिन हमें लगता है यह सब है व्यर्थ की बातें,

व्यर्थ की चिंता व्यर्थ की जज्बाते।

होना है जो वही तो होगा,

फिर हम क्यों करें बेतकल्लुफ की बातें।


लेकिन असंभव को हम त्याग नहीं सकते,

 इसे संभव करने को करते रहते हैं।

दिन-रात हम फरियादें,

किसी दिन मुकम्मल होगी हमारी ये सारी जज्बातें।


उस दिन तुमसे मिलना भी संभव होगा,

पास आना भी संभव होगा।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी संभव होगा।


विश्वजीत कुमार✍️




बुधवार, 12 मार्च 2025

हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें...



हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो, हम घनश्याम हो जायें।


मिले हम मथुरा, वृन्दावन के वनों में,

राधा-कृष्ण की तरह हमारी जोड़ी बेमिसाल हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


तप करो तुम पार्वती सी,

हम तुम्हारे लियें भोले-नाथ हो जायें।


स्वर्ग बने हमारा ये प्यारा कैलाश,

खुशियों की पूरी सौगात हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


अयोध्या सी पावन नगरी हो हमारी,

राम-सीता की तरह हम महान हो जायें।


लव-कुश की भांति संताने हो हमारी,

जग में ऊंचा हमारा नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


गंगा सा पावन मन रहे तुम्हारा,

भागीरथी जैसे मेरे कार्य हो जायें।


ना तुम रूठो मुझसे ना मैं तुम से रुठू,

जीवन पर्यंत यही कर्म हमारे नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ कुंभ सी तो हम प्रयागराज हो जायें।


स्नान करके इस पावन जलधारा में,

जीवन पर्यंत एक दूसरे के एकाकार हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो हम घनश्याम हो जायें।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



मंगलवार, 4 मार्च 2025

तुमसे मुलाक़ात के मौके...


तुमसे मुलाक़ात के,

मौके तो बहुत आए।

कभी हम तो कभी तुम,

व्यस्त ही नज़र आए।


कभी पटना कभी छपरा,

बुलाते थे हमें लेकिन।

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


राह भटकते रहे,

मंजिल पर पहुँच नही पाये।

कभी इस ओर कभी उस ओर

वो बंधन कभी ख़त्म ना हो पाये।


कभी बिहार कभी यू पी,

में बसें रहे हम।

 किसी दिन तुमने आवाज नहीं लगाई,

किसी दिन हम आवाज नहीं लगायें।


 शेखपुरा से याराना रहा, 

पटना से भी रहा।

 तुम मिलोगी किस ओर, 

हम यह भी समझ नहीं पाए।


तुम्हारे पास आने के, 

सुअवसर भी कम नहीं आए।

 अभी तक हम पावन गंगा के, 

तट पर नहीं आए।


 कभी गंगा कभी यमुना, 

बुलाती थी हमें लेकिन 

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


विश्वजीत कुमार✍️

 


मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

अंग गरिमा

अंग देश रो हृदय छै चंपा, 

अंगिका छै प्राण।

गंगा, कोशी, चंपा गावै,

हिनको कथा महान...


अंग देश रो हृदय छै चंपा, 

अंगिका छै प्राण।


दैत्यराज बलि राजा रो, 

जेठो बेटा अंग। 

महादेव रो क्रोध सऽ, 

ऐं ठऽ मदनो बनै अनंग।


श्रृंगी शांता रोमपाद रो महिमा अपरंपार,

पुत्रेष्ठि जग रो प्रभाव सऽ राम धरै अवतार।

दानवीर राधेय कर्ण पर चंपा करे गुमान......


गिरिवरनाथ शंखकूट पर जहनु अजगबधारी 

विक्रमशिला तंत्र विद्या रो छै महिमा बलिहारी 

सती बिहुला चांदो सौदागर अंग देश रो शान 

रेशमनगरी नाम सऽ जग मऽ छै हिनको पहचान 

बुद्ध विशाखा आरो मंजूषा, खूब बढ़ावै मान....... 


अष्टावक्र कहोल दीपंकर छै हिनको संतान 

मुगदल जहनु चंदनवाला कर्ण रो चंडी थान 

तिलकामांझी मातृभूमि लऽ झूली गेलै फांसी 

सरहदपाद कजंगला में ही अंगदेश रो वासी 

राहुल सांस्कृत्ययान देलकै अंगिका कऽ नाम.......


मंदार मुकुटधारी ई भूमि, 

छै गंगा हियहार 

पुरबैया हलपै छै आरू पछिया बहै बयार 

कतरनी रो खुशबू आरो छै जरदालू आम

 

जैन धर्म रो पंचकल्याणक,

 चंपापुरी धाम।

वासुपुज्य महावीर सुधर्मा, 

आलोक करै परनाम....🙏🏻


आलोक कुमार ✍🏻 

भारतीय रेल की जनरल बोगी...

 

भारतीय रेल की जनरल बोगी!!!

पता नहीं, आपने भोगी कि नहीं भोगी।


एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा,

प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा।

हमारे पसीने छूटने लगे,

हम झोला उठाकर घर की ओर फूटने लगे।


तभी एक कुली आया,

मुस्कुरा कर बोला - 'अन्दर जाओगे ?'

हमने कहा - 'तुम पहुँचाओगे !'

वो बोला - बड़े-बड़े पार्सल पहुँचाए हैं आपको भी पहुँचा दूंगा,

मगर रुपये पूरे पचास लूँगा।

हमने कहा - पचास रुपैया ?

वो बोला - हाँ भैया!!!

दो रुपये आपके बाकी सामान के...


हमने कहा - सामान नहीं है, अकेले हम हैं

वो बोला - बाबूजी, आप किस सामान से कम हैं!!!

भीड़ देख रहे हैं, कंधे पर उठाना पड़ेगा,

धक्का देकर अन्दर पहुँचाना पड़ेगा।


वैसे तो हमारे लिए बाएँ हाथ का खेल है,

मगर आपके लिए दाँया हाथ भी लगाना पड़ेगा।

मंजूर हो तो बताओ...

हमने कहा - देखा जायेगा, 

तुम उठाओ।


कुली ने बजरंगबली का नारा लगाया,

और पूरी ताकत लगाकर हमें जैसे ही उठाया

कि खुद बैठ गया।

दूसरी बार कोशिश की तो लेट गया

बोला - बाबूजी पचास रुपये तो कम हैं

हमें क्या मालूम था कि आप आदमी नहीं, बम हैं

भगवान ही आपको उठा सकता है

हम क्या खाक उठाएंगे

आपको उठाते-उठाते खुद दुनिया से उठ जायेंगे !


तभी गाड़ी ने सीटी दे दी

हम झोला उठाकर भागे

बड़ी मुश्किल से डिब्बे के अन्दर घुस पाए

डिब्बे के अन्दर का दृश्य घमासान था

पूरा डिब्बा अपने आप में हल्दी घाटी का मैदान था

लोग लेटे थे, बैठे थे, खड़े थे

जिनको कहीं जगह नहीं मिली, वो बर्थ के नीचे पड़े थे।


हमने गंजे यात्री से कहा - भाई साहब

थोडी सी जगह हमारे लिए भी बनाइये

वो सिर झुका के बोला - आइये हमारी खोपड़ी पे बैठ जाइये

आप ही के लिए साफ़ की हैं।

केवल दो रूपए देना, लेकिन फिसल जाओ तो हमसे मत कहना।


तभी एक भरा हुआ बोरा खिड़की के रास्ते चढ़ा 

आगे बढा और गंजे के सिर पर गिर पड़ा।

गंजा चिल्लाया - किसका बोरा है ?

बोरा फौरन खडा हो गया

और उसमें से एक लड़का निकल कर बोला

बोरा नहीं है बोरे के भीतर बारह साल का छोरा है।

अन्दर आने का यही एक तरीका है

हमने आपने माँ-बाप से सीखा है

आप तो एक बोरे में ही घबरा रहे हैं

जरा ठहर तो जाओ अभी गददे में लिपट कर

हमारे बाप जी अन्दर आ रहे हैं

उनको आप कैसे समझायेंगे

हम तो खड़े भी हैं वो तो आपकी गोद में ही लेट जाएँगे।


एक अखंड सोऊ चादर ओढ़ कर सो रहा था 

एकदम कुम्भकरण का बाप हो रहा था 

हमने जैसे ही उसे हिलाया 

उसकी बगल वाला चिल्लाया - 

ख़बरदार हाथ मत लगाना वरना पछताओगे 

हत्या के जुर्म में अन्दर हो जाओगे 

हमने पुछा- भाई साहब क्या लफड़ा है ? 

वो बोला - बेचारा आठ घंटे से एक टाँग पर खड़ा 

और खड़े खड़े इस हालत मैं पहुँच गया कि अब पड़ा है 

आपके हाथ लगते ही ऊपर पहुँच जायेगा 

इस भीड़ में ज़मानत करने क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?


एक नौजवान खिड़की से अन्दर आने लगा

तो पूरे डिब्बा मिल कर उसे बाहर धकियाने लगा

नौजवान बोला - भाइयों, भाइयों

सिर्फ खड़े रहने की जगह चाहिए

एक अन्दर वाला बोला - क्या ?

खड़े रहने की जगह चाहिए तो प्लेटफोर्म पर खड़े हो जाइये

जिंदगी भर खड़े रहिये कोई हटाये तो कहिये

जिसे देखो घुसा चला आ रहा है

रेल का डिब्बा साला जेल हुआ जा रहा है !

इतना सुनते ही एक अपराधी चिल्लाया -

रेल को जेल मत कहो मेरी आत्मा रोती है

यार जेल के अन्दर कम से कम

चलने-फिरने की जगह तो होती है।


एक सज्जन फर्श पर बैठे हुए थे आँखें मूँदे 

उनके सर पर अचानक गिरीं पानी की गरम-गरम बूँदें 

तो वे सर उठा कर चिल्लाये - कौन है, कौन है 

साला पानी गिरा कर मौन है 

दिखता नहीं नीचे तुम्हारा बाप बैठा है ! 

क्षमा करना बड़े भाई पानी नहीं है 

हमारा छः महीने का बच्चा लेटा है कृपया माफ़ कर दीजिये 

और अपना मुँह भी नीचे कर लीजिये 

वरना बच्चे का क्या भरोसा ! 

क्या मालूम अगली बार उसने आपको क्या परोसा !!


अचानक डिब्बे में बड़ी जोर का हल्ला हुआ 

एक सज्जन दहाड़ मार कर चिल्लाये - 

पकड़ो-पकड़ो जाने न पाए 

हमने पुछा क्या हुआ, क्या हुआ ? 

वे बोले - हाय-हाय, मेरा बटुआ किसी ने भीड़ में मार दिया 

पूरे तीन सौ रुपये से उतार दिया टिकट भी उसी में था ! 

कोई बोला - रहने दो यार भूमिका मत बनाओ 

टिकट न लिया हो तो हाथ मिलाओ 

हमने भी नहीं लिया है गर आप इस तरह चिल्लायेंगे 

तो आपके साथ क्या हम नहीं पकड़ लिए जायेंगे?

वे सज्जन रोकर बोले - नहीं भाई साहब 

मैं झूठ नहीं बोलता मैं एक टीचर हूँ

कोई बोला - तभी तो झूठ है टीचर के पास और बटुआ ? 

इससे अच्छा मजाक इतिहास मैं आज तक नहीं हुआ ! 

टीचर बोला - कैसा इतिहास मेरा विषय तो भूगोल है 

तभी एक विद्यार्थी चिल्लाया - बेटा इसलिए तुम्हारा बटुआ गोल है !


बाहर से आवाज आई - 'गरम समोसे वाला' 

अन्दर से फ़ौरन बोले एक लाला - दो हमको भी देना भाई 

सुनते ही ललाइन ने डाँट लगायी - बड़े चटोरे हो ! 

क्या पाँच साल के छोरे हो ? 

इतनी गर्मी में खाओगे ? 

फिर पानी को तो नहीं चिल्लाओगे ? 

अभी मुँह में आ रहा है समोसे खाते ही आँखों में आ जायेगा 

इस भीड़ में पानी क्या रेल मंत्री दे जायेगा ?


तभी डिब्बे में हुआ हल्का उजाला 

किसी ने जुमला उछाला ये किसने बीड़ी जलाई है ? 

कोई बोला - बीड़ी नहीं है स्वागत करो 

डिब्बे में पहली बार बिजली आई है 

दूसरा बोला - पंखे कहाँ हैं ? 

उत्तर मिला - जहाँ नहीं होने चाहिए वहाँ हैं 

पंखों पर आपको क्या आपत्ति है ? 

जानते नहीं रेल हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है 

कोई राष्ट्रीय चोर हमें घिस्सा दे गया है 

संपत्ति में से अपना हिस्सा ले गया है 

आपको लेना हो आप भी ले जाओ 

मगर जेब में जो बल्ब रख लिए हैं 

उनमें से एकाध तो हमको दे जाओ !


अचानक डिब्बे में एक विस्फोट हुआ 

हालाँकि यह बम नहीं था 

मगर किसी बम से कम भी नहीं था 

यह हमारा पेट था उसका हमारे लिए संकेत था 

कि जाओ बहुत भारी हो रहे हो हलके हो जाओ 

हमने सोचा डिब्बे की भीड़ को देखते हुए 

बाथरूम कम से कम दो किलोमीटर दूर है 

ऐसे में कुछ हो जाये तो किसी का क्या कसूर है 

इसीलिये रिस्क नहीं लेना चाहिए 

अपना पडोसी उठे उससे पहले अपने को चल देना चाहिए 

सो हमने भीड़ में रेंगना शुरू किया 

पूरे दो घंटे में पहुँच पाए 

बाथरूम का दरवाजा खटखटाया तो भीतर से एक सिर बाहर आया 

बोला - क्या चाहिए ? 

हमने कहा - बाहर तो आजा भैये हमें जाना है 

वो बोला - किस किस को निकालोगे ? अन्दर बारह खड़े हैं 

हमने कहा - भाई साहब हम बहुत मुश्किल में पड़े हैं 

मामला बिगड़ गया तो बंदा कहाँ जायेगा ? 

वो बला - क्यूँ आपके कंधे 

पे जो झोला टँगा है 

वो किस दिन काम में आयेगा ... 

इतने में लाइट चली गयी 

बाथरूम वाला वापस अन्दर जा चुका था 

हमारा झोला कंधे से गायब हो चुका था 

कोई अँधेरे का लाभ उठाकर अपने काम में ला चुका था |


अचानक गाड़ी बड़ी जोर से हिली 

एक यात्री ख़ुशी के मारे चिल्लाया - 'अरे चली, चली' 

कोई बोला - जय बजरंग बली, कोई बोला - या अली 

हमने कहा - काहे के अली और काहे के बली ! 

गाड़ी तो बगल वाली जा रही है 

और तुमको अपनी चलती नजर आ रही है ? 

प्यारे ! सब नज़र का धोखा है 

दरअसल ये रेलगाडी नहीं हमारी ज़िन्दगी है 

और ज़िन्दगी में धोखे के अलावा और क्या होता है ?


 प्रदीप चौबे✍🏻