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रविवार, 22 जनवरी 2023

जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी की परीक्षा, कला प्रबधन में पूछे गए प्रश्न एवं उसके उत्तर। Questions and answers asked in the examination of District Art and Culture Officer, Art Management.



2023

ART MANAGEMENT
कला प्रबंधन


Time Allowed : 3 hours समय: 3 घण्टे

Maximum Marks : 100

पूर्णांक 100

Instructions :


Marks are indicated against each question.

Candidates are required to give their answers in their own words as far as practicable.

All questions have been printed both in Hindi and English. In case of any ambiguity in Hindi version, the English version shall be considered authentic.

Parts of the same question must be answered together and must not be interposed between answers to other questions.


अनुदेश :

उपांत के अंक पूर्णांक के द्योतक है।

परीक्षार्थी यथासम्भव अपने शब्दों में ही उत्तर दें।

सभी प्रश्न हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषा में छपे हैं। यदि हिन्दी भाषा में कोई संदेह है, तो अंग्रेजी भाषा को ही प्रामाणिक माना जाएगा।

एक ही प्रश्न के विभिन्न भागों के उत्तर अनिवार्य रूप से एक साथ ही लिखे जाएँ तथा उनके बीच में अन्य प्रश्नों के उत्तर न लिखे जाएँ।


SECTION-A

खण्ड - A


(Visual Arts)


PART-I

भाग- I


1. Who got the first Padmashri award for Madhubani paintings? मधुबनी चित्रकला के लिए सर्वप्रथम 'पद्मश्री' सम्मान किसको मिला?


2. Name the famous artist of Bihar who got Padmashri in print making.

बिहार के प्रसिद्ध कलाकार का नाम बताइये, जिसको प्रिंट मेकिंग में 'पद्मश्री' मिला।


3. Who was the first Principal of College of Arts and Crafts, Patna? 

पटना के कॉलेज ऑफ आर्ट्स ऐन्ड क्राफ्ट्स के प्रथम प्राचार्य कौन थे?


4. What are the materials used in the creation of Mithila paintings? 

मिथिला चित्रकला की रचना में कौन-कौन सी सामग्रियाँ प्रयुक्त होती हैं?


5. Didarganj Yakshi is considered a prime example of which art? 

'दीदारगंज यक्षी' किस कला का प्रमुख उदाहरण माना जाता है?


PART-11

भाग- II


Answer any two questions: 

किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दें :


6. How will the management of organizing the art fair be done? 

कला मेला के आयोजन का प्रबंधन कैसे होगा?


7. What materials will be required for organizing the exhibition of painting and sculpture? 

चित्रकला एवं मूर्तिकला की प्रदर्शनी के आयोजन के लिए कौन-कौन सी सामग्रियों की आवश्यकता होगी?


8. As an art officer how would you encourage the movement of art and culture in the urban  area?

एक कला पदाधिकारी होने के नाते नगरीय क्षेत्र में कला एवं संस्कृति की गतिविधियों को आप कैसे प्रोत्साहित करेंगे?


PART - III

भाग- III


Answer any one question : 

किसी एक प्रश्न का उत्तर दें :


9. How can an art officer promote regional culture through art activities? Discuss. 

एक कला पदाधिकारी कला गतिविधियों द्वारा क्षेत्रीय संस्कृति को किस प्रकार बढ़ावा दे सकता है? विवेचना कीजिए।


10. Is the art market affecting the original forms of art? Discuss. 

क्या कला बाज़ार कला के मूल रूपाकारों को प्रभावित कर रहा है ? विवेचना कीजिए।


SECTION-B

खण्ड - B 


Performing Arts (Dance and Drama)


PART-1 

भाग-I


11. In which district of Bihar is the Behula festival mainly celebrated? 

बिहार के किस जिले में 'बिहुला' त्यौहार प्रमुख रूप से मनाया जाता है?


12. Name the Bhojpuri folk dancer and theater artist from Bihar who Padmashri in 2021. was awarded 

बिहार के भोजपुरी लोक नर्तक एवं रंगमंचीय कलाकार का नाम बताइये जिसको 2021 में 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया।


13. Jhumeri is the famous folk dance of which region of Bihar? 

'झुमेरी' बिहार के किस क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य है ?


14. Who founded the Bihar Art Theater of Patna? 

पटना के 'बिहार आर्ट थिएटर' की स्थापना किसने की ?


15. Who is considered as the Shakespeare of Bhojpuri?

भोजपुरी के शेक्सपियर के रूप में किसको माना जाता है?


PART-II

भाग- II


Answer any two questions: 

किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दें :


16. Which was the first film of Bhojpuri language? 

भोजपुरी भाषा की पहली फिल्म कौन थी?


17. Mention the features of any two main folk dances of Bihar. 

बिहार के किन्हीं दो प्रमुख लोकनृत्यों की विशेषताएँ बताइये। 


18. What kind of events will you organize as an art officer to popularize folk theater programs?


लोक रंगमंचीय कार्यक्रमों को जनप्रिय बनाने के लिए आप एक कला पदाधिकारी के रूप में किस तरह के आयोजन करेंगे?


PART-III 

भाग- III


Answer any one question:

किसी एक प्रश्न का उत्तर दें :


19. Throw light on the future of famous folk theater of Bihar. 

बिहार के प्रसिद्ध लोकनाट्य के भविष्य पर प्रकाश डालिए।


20. Throwing light on the present condition of folk theater of Bihar, tell the plan to encourage it. 

बिहार के लोकनाट्य की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए उसको प्रोत्साहित करने की योजना बताइये।


SECTION-C

खण्ड - C


Performing Arts (Music, Instrumental and Vocal)


PART-I

भाग-I


21. In which year Ustad Bismillah Khan was awarded the Bharat Ratna, India's highest civilian award ?

किस वर्ष भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से उस्ताद विस्मिल्लाह खान को सम्मानित किया गया ?


22. In which festival the rising and setting sun is worshipped especially by women while singing songs? 

किस पर्व में गीत गाते हुए उदय एवं अस्त होते सूर्य की पूजा विशेषकर महिलाओं द्वारा की जाती है?


23. Which folk song is sung in Bihar to celebrate the birth of a child? 

बच्चे के जन्म की खुशी में बिहार में कौन-सा लोकगीत गाया जाता है?


24. In which district of Bihar the famous Kako festival is celebrated? 

बिहार के किस जनपद में प्रसिद्ध 'काको' त्यौहार मनाया जाता है?


25. Give your opinion on how decency can be saved in the folk songs of Bihar. 

बिहार के लोकगीतों में शालीनता कैसे बचायी जा सकती है? अपनी राय दें। 


PART-II

भाग- II


Answer any two questions: 

किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दें :


26. Discuss the State and Private institutions of Bihar which encourage arts. 

बिहार के राजकीय एवं व्यक्तिगत संस्थाओं की चर्चा कीजिए, जो कलाओं को प्रोत्साहित करती हैं।


27. How would you organize a large art festival? Explain. 

एक बृहद कला समारोह का आयोजन आप कैसे करेंगे? बताइये।


28. An art officer should be knowledgeable about visual and performing arts. Discuss.


एक कला पदाधिकारी को दृश्य एवं प्रदर्शन कलाओं का जानकार होना चाहिए। चर्चा कीजिए।


PART-III 

भाग- III



Answer any one question : 

किसी एक प्रश्न का उत्तर दें :


29. Explain, while defining, classical and folk music. 

शास्त्रीय एवं लोक संगीत को परिभाषित करते हुए समझाइये।


30. What is your plan to maintain the quality of folk music of Bihar? Explain. 

बिहार के लोक संगीत की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए आपकी क्या योजना है? समझाइये।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

बिहार का रंगमंच (Theater of Bihar) जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी परीक्षा के अंतर्गत बिहार की कला परंपरा।

 बिहार का रंगमंच 
(Theatre of Bihar)





       भारत में स्थित हमारा बिहार राज्य हमेशा से प्रतिभाओं का धनी रहा है। यहां पर एक से बढ़कर एक चित्रकार, नृत्यकार, गायक, वादक जन्म लिए हैं एवं अपनी कला से ना सिर्फ बिहार बल्कि देश दुनिया में भी अपना परचम लहराए हैं। रंगमंच की जब चर्चा की जाती है तो हम पाते हैं कि बिहार में पहले एकाध मंडलिया हुआ करती थी, इनका उद्देश्य केवल लोगों का मनोरंजन करना था। यदि इनके नामों की हम चर्चा करें तो पाते हैं कि विक्टोरिया नाटक मंडली, एलिफिस्टन नाटक मंडली, कर्जन थिएटर, पारसी थिएटर अपने समय में काफी प्रसिद्ध थे।


          बिहार की पहली नाट्य-संस्था की स्थापना केशवराम भट्ट ने 1876 ईसवी में "पटना नाटक मंडली" के नाम से गठित की थी। उन्होंने बिहार बंधु पत्रिका के छापा खाने में बने अस्थाई रंगमंच पर इसी मंडली के द्वारा अपने दो नाटकों शमशाद सौशन और सज्जाद सम्बुल को प्रदर्शित किया था। उसके उपरांत उनके द्वारा और भी कई जगह नाटकों के प्रदर्शन किए गए। 1918-19 में बिहार के भोजपुर जिले के अंतर्गत आरा में जैन नाटक मंडली नामक संस्था का उदय हुआ। उसके उपरांत 1919 में छपरा क्लब और शारदा नाट्य समिति (बीसवीं सदी) नाट्य संस्थाए बनी। इन मंडलियों के गठन और रंगकार्यों के पीछे पारसी कंपनियों द्वारा प्रदर्शित नाटकों का प्रभाव था।


       नाटक के दरमियान बार-बार परिदृश्य बदलने में असुविधा को देखकर घुमावदार मंच बनाया गया। इस संस्था का नाम महालक्ष्मी थियेटर रखा गया था। डॉ० एल.एम. घोष, डॉ० ए. के. सेन और राज किशोर प्रसाद ने 1947 ई. में "पटना इप्टा" नामक संस्थान की स्थापना की। इसके उपरांत अनिल मुखर्जी ने इसकी स्थापना 09 अक्टूबर 1974 को बिहार आर्ट थिएटर एवं कालिदास रंगालय (प्रेक्षागृह) का निर्माण किया।


       पटना में वर्तमान में दो महत्वपूर्ण रंगशालाएं हैं-

  1.  कालिदास रंगालय
  2. प्रेमचंद रंगशाला


      इसके साथ ही साथ भारतीय नृत्य कला मंदिर एवं रविंद्र भवन में भी नाटक के मंचन का आयोजन होते रहता है।


बिहार के लोकनाट्य


       बिहार के सांस्कृतिक तथा लोक जीवन में लोकनाट्य का भी एक अपना ही अलग महत्व है। यह लोकनाट्य मांगलिक अवसरों, विशेष पर्वो तथा कभी-कभी मात्र मनोरंजन की दृष्टि से ही आयोजित एवं प्रायोजित किए जाते हैं। इस लोकनाट्य में कथानक, संवाद, अभिनव, गीत, नृत्य तथा विशेष दृश्य आदि कुछ होता है। यदि कुछ नहीं होता है तो वह है, सुसज्जित रंगमंच तथा पात्रों का मेकअप एवं वेशभूषा।


       बिहार में प्रचलित लोक नाट्य निम्न हैं -


  1. जट-जाटिन 
  2. सामा-चकेवा 
  3. विदेशिया 
  4. डोककक्ष 
  5. कीर्तनिया (कीरतनिया)


Reference :-


http://daayari.blogspot.com/2015/07/blog-post.html?m=1


https://rangwimarsh.blogspot.com/search/label/%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%20%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9A


https://biography.sabdekho.in/dramatics-in-bihar/


https://m.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%AF

शनिवार, 14 जनवरी 2023

कला विषयक चुनौतियां (Artistic Challenges) जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी (District Art and Culture Officer)






       कला एक रचनात्मक, क्रियात्मक एवं मनोरंजक विषय है। इसमें मनोरंजक तरीके से हम किसी भी सीखने की प्रक्रिया को सृजनात्मक रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। एक सफल कलाकार/कला शिक्षक भाषण अथवा प्रवचन देने के बदले अपनी कला के प्रदर्शन के द्वारा किसी भी समस्या का समाधान ढूंढ सकता है, लेकिन समय के साथ-साथ कला का उद्देश्य भी परिवर्तित होते गया और कला में पारंपरिक बाध्यतायें ना रहकर स्वतंत्र अभिव्यक्ति का आगमन हो गया। आज कला के ऊपर कई सारी चुनौतियां आ पड़ी है। उसमें यदि सबसे महत्वपूर्ण जो है वह है कला जगत में तकनीकों (Techniques)  का आगमन। आज प्रत्येक कलाकार की अपनी एक अलग तकनीक एवं शैली है। यह कोई निरर्थक बात नहीं है, होनी भी नही चाहिए। लेकिन हमें अपनी कला धरोहरों का भी साथ नहीं छोड़ना चाहिए।


      आज कला का व्यवसायीकरण बहुत अधिक बढ़ गया है। इसे हम कुछ हद तक अच्छा मान सकते हैं लेकिन पूर्णत: नहीं क्योंकि व्यवसायीकरण के साथ-साथ एक और पहलू जुड़ा हुआ होता है और वह है राजनीतिकरण (Politicization). आज कला प्रशिक्षु हो या कला का ज्ञाता हर कोई इस परिवेश में फंसा हुआ है।


     कला के द्वारा मनुष्य अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है। वह चित्रकला, नाट्य कला, संगीत कला, इत्यादि। के माध्यम से जन-जन की आवाज को सभी के समक्ष प्रस्तुत करता है और कई बार उन्हें जागरूक करने का कार्य भी इसके द्वारा संपन्न किया जाता है। एक कलाकार के द्वारा जब किसी कलाकृति का सृजन किया जाता है तब वह ना केवल उस पीड़ा या खुशी को अनुभव करता है बल्कि वह यह भी प्रयासरत रहता है कि जब दर्शकों के बीच यह कलाकृति पहुंचे तब वह भी उसमे उतनी ही गहराई पीड़ा एवं खुशी को अनुभव करें जिसे बनाते वक्त एक कलाकार के द्वारा अनुभव किया गया था। यदि ऐसा करने में वह सफल होता है तो निश्चित ही वह कलाकृति "कल्याणकारी सृजन" (welfare creation) के रूप में विकसित होती है अन्यथा ऐसे निर्माण का कोई औचित्य नहीं रह जाता।


       कला विषय पर चर्चा करने से पूर्व हम यहां कला शिक्षा संस्थानों पर बात करना चाहेंगे क्योंकि यही वह परिवेश होता हैं जहां पर कला के बीज अंकुरित होते हैं और इन्हें एक उपजाऊ भूमि की आवश्यकता होती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उन्हें वैसा परिवेश मिलता है ? आज हम देखते हैं कि अनेक संस्थानों से B.F.A, M.F.A. के अतिरिक्त B.A. in Drawing, M.A. in Drawing सरीके कला विषयक कोर्स संचालित हो रहे हैं और प्रत्येक वर्ष हजारों छात्र प्रमाण-पत्र प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वे सही में सफल हैं ? क्या उनके द्वारा कला का सृजन किया जा रहा है ? क्या वे कला सरीके के विषय के साथ ईमानदारी कर पा रहे हैं ? ऐसे अनेक प्रश्न है जिनके उत्तर हमें तलाश करने हैं ताकि हम कला विषयक चुनौतियां (Artistic Challenges) पर परिचर्चा कर सके।

समाधान 

       यदि हम इसके निवारण की ओर चर्चा करें तो हम पाते हैं कि कला को शिक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो इसके समाधान हो सकते हैं हम अपने कला शिक्षकों एवं छात्रों को जो कला का अध्ययन कर रहे हैं उन्हें रचनात्मकता के साथ-साथ तकनीकी ज्ञान भी दिया जाए ताकि वह अपने सृजन में दोनों प्रतिभाओं का प्रयोग कर सकें हमारे समक्ष एक विस्तृत संसार हमारा देश, प्रदेश, रीति-रिवाज, समाज जैसे अनेकों विषय वस्तु है, जिसे हम देखें अनुभव करें तथा सृजनशील बने तभी हम एक बेहतर कलाकार की परिकल्पना कर सकते हैं हम यहां चर्चा करना चाहेंगे भारत के सुप्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन जी का जिन्होंने कहीं से भी विशेष प्रशिक्षण नहीं लिया लेकिन उन्हें "भारत का पिकासो" की संज्ञा दी गई है हम स्वयं को कला के प्रति जागरूक कर एवं दूसरे को प्रेरित कर बहुत हद तक इस समस्या का निदान पा सकते हैं।


निष्कर्ष 

      कला विषयक चुनौतियों के दृष्टिकोण से यदि भारत की बात की जाए तो यहां की कला परंपरा राज्यश्रय या लोक जीवन में हमेशा से फली-फूली और वहीं इसके संरक्षक भी रहे कई बार उनके संरक्षण के अभाव में कलाकार विस्थापित होकर दूसरे राज्य में चले जाते हैं और वहां फिर नई शैली का जन्म होता है। वर्तमान परिदृश्य में भी स्थिति में बहुत कुछ सुधार नहीं है। कलाकार अपनी सुविधा एवं परिस्थिति के अनुसार कला का सृजन कर रहे हैं और हमें ऐसा प्रतीत होता है कि कला विषयक चुनौतियां (Artistic Challenges) के समाधान में यह सबसे बड़ी बाधा है।


       आप इस लेख✍️ पर क्या विचार रखते हैं हमें कमेंट के माध्यम से बता सकते हैं। धन्यवाद🙏



 Reference :-

https://singhh63.blogspot.com/2017/12/blog-post.html

https://sahayatri.in/2021/05/%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%a0%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87/

कला शिक्षा : स्वरूप एवं चुनौतियां, डॉक्टर अर्चना रानी पेज नंबर 201 से 208 तक।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

कला बाजार (Art Market) जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी (District Art and Culture Officer)



Find Video click here.

कला बाजार (Art Market) 

       कला बाजार यानी कि ऐसा बाजार जहां पर कलाकृतियों की खरीद-बिक्री की जाती हो, या जहां कि जाने की संभावना हो। आज के परिदृश्य में वह ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों हो सकता है। वह कलाकृतियां कुछ भी हो सकती है जैसे - काव्य कला, साहित्य कला, चित्रकला, मूर्तिकला, इत्यादि। जैसे बाजार का नियम है कि जो भी वस्तु कम मात्रा में उपलब्ध हो उसका दाम बढ़ जाता है और जिस वस्तु के मांग के अनुरूप उत्पादन ज्यादा हो वह वस्तु सस्ती हो जाती है। कुछ यही नियम हमें कला यानी कि चित्रकला बाजार में भी देखने को प्राप्त होता हैं। जब तक कलाकार जीवित रहे एवं कलाकृतियों का निर्माण करता रहे तब तक उस कलाकार की कलाकृति को उतनी तवज्जो नहीं मिलती जितनी उसके मरने के उपरांत। 



Note:- इस लेख में हम विशेष रूप से चित्रकला बाजार के बारे में चर्चा करेंगे।



       उदाहरण स्वरूप हम विंसेंट वॉनगॉग की चित्रकला सूरजमुखी के फूल की बात करते हैं।







       1889 में वॉनगॉग ने सूरजमुखी के फूल के बारे में कहा था। इनमें से एक भी चित्र 25 पाउंड की भी नहीं बिक सकती। (01 पाउंड की कीमत वर्तमान में लगभग ₹100 हैं) शायद वॉनगॉग अपने सपने या दु:स्वप्न में भी नहीं सोच सकते थे उस दिन से लगभग 100 साल उपरांत  सोमवार 30 मार्च 1987 के दिन लंदन में क्रिस्टीज की नीलामी मैं उनके सूरजमुखी श्रृंखला की एक पेंटिंग ढाई करोड़ पाउंड (24,750,000) में बिककर चित्रकला की दुनिया में एक नया रिकॉर्ड कायम करेगी दरअसल इन दिनों पश्चिम में कला की दुनिया में होने वाली नीलामियों में तस्वीरों की नीलामी के आंकड़े कुछ तरह गिनाए जाते हैं जैसे कोई क्रिकेटर के जीवन के रंगों और रिकार्डों की चर्चा हो रही है।



      सूरजमुखी की इस कीमत ने सभी तरह से लोगों को आतंकित कर दिया। मंगलवार की सुबह कला दीर्घा के बचे हुए चित्रों के सामने लोगों की भीड़ बढ़ गई और तरह-तरह के अनुमान लगाए जाने लगे कि बाकी चित्रों की कीमत क्या रहने वाली है। अखबारों में तरह-तरह के लेख प्रकाशित हुए एक में लिखा गया कि इस एक चित्र की कीमत तो संग्रहालय की कीमत से भी ज्यादा है। एक ने दिलचस्प आंकड़े दिए की इतने कीमत में तो ब्रिटेन में 15,000 एकड़ जमीन खरीदकर अनगिनत सूरजमुखी के फूल उगाए जा सकते हैं।



        सूरजमुखी चित्र 39 x 30 इंच का है और इसमें 15 सूरजमुखी के फूल बने हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि एक फूल की कीमत 1,650,000 पाउंड हुई। यदि हम अर्थशास्त्र की नजर में देखें तो पाते हैं कि कोई भी वस्तु की कीमत उसकी उपलब्धता एवं मांग पर निर्भर करती है ठीक उसी प्रकार वैसा कलाकार जो अभी जीवित ना हो (अधिकतर समय) पहले उसके कला की एवं कलाकार की ब्रांडिंग की जाती है तत्पश्चात किसी महंगे क्रिस्टी जैसे नीलामी घरो से बोली लगाई जाती है और दुनियाभर के धन्नासेठ जब उस कलाकृति को खरीदने के पीछे होड़ लगा देते हैं तब उसकी कीमत अचानक से बढ़ जाती है।



        कला बाजार का अपना एक अलग शास्त्र और राजनीति है। एक समय भारत में एम. एफ. हुसैन बहुत चर्चित कलाकार हुए एवं कभी कुछ पैसों में फिल्म के पोस्टर निर्माण करने वाले यह चित्रकार इतनी ज्यादा प्रसिद्धि को प्राप्त कर लिए कि उनके द्वारा निर्मित कलाकृतियां करोड़ों में बिकने लगी। कलाकृतियों के दामो का निर्धारण दर्शको एवं खरीददारों के साथ-साथ कला समीक्षको एवं कलागैलरीयो पर भी निर्भर करता है। तैयब मेहता की पेंटिंग 1.6 करोड़ में बिकने के कुछ ही महीनों के उपरांत हुसैन की एक बहुत ही बड़ी चित्र अमेरिका के अनिवासी भारतीय ने 02 करोड़ में खरीदकर यह बताने की चेष्टा की, की हुसैन के चित्रों की कीमत अभी कम नहीं हुई है। परंतु कला समीक्षकों ने कहा कि प्रति वर्ग के हिसाब से तैयब मेहता ही नंबर 01 हैं। 2004 में मुंबई की एक नीलामी में राजा की एक पेंटिंग 68 लाख में बेच कर प्रति वर्ग इंच के हिसाब से उन्हें भारत का सबसे महान कलाकार साबित करने की कोशिश की गई लेकिन कला के अनेक जानकार प्रति वर्ग इंच के हिसाब को सही नहीं मानते हैं। क्योंकि एक मिनियेचर एक विशाल म्यूरल से भी महान और महंगा हो सकता है। 



निष्कर्ष 



      कला बाजार में कलाकृतियों कि कीमत में सबसे बड़ा सत्य यह है कि जिस कलाकार की कलाकृति बेची या खरीदी जा रही है उस कलाकार का बाजार मूल्य क्या है ? वह कलाकार जीवित है या मृत्यु को प्राप्त हो चुका है ? यानी हम कह सकते हैं कि कला के बाजार में कलाकार की मृत्यु का बहुत ही बड़ा महत्व है एवं कलाकृतियो का महत्व शायद दूसरे पायदान पर है।



 Reference :-




बृहद आधुनिक कला कोश संपादक 

विनोद भारद्वाज पृष्ठ संख्या 255-267 तक

रविवार, 14 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत प्रबंधन में संकट (Crisis in Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 



प्रबंधन में संकट 
(Crisis in Management) 


प्रबन्ध में संकट का अर्थ 

(Meaning of Crisis in Management) 


       प्रबन्ध में संकट से अभिप्राय है दो पक्षों के मध्य विचारों में भिन्नता और असामंजस्य की स्थिति, अर्थात् जब परस्पर विरोधी विचारधारा के कारण आपस में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता, तब संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए, उसका समाधान खोजना प्रबन्ध का कार्य होता है, इसी को प्रबन्ध में संकट कहा जाता है। शैक्षिक प्रबन्ध में विभिन्न स्तरों पर कई संकटों का सामना करना पड़ता है, कई प्रकार के संघर्ष का सामना करना पड़ता है और कई प्रकार की समस्याओं से रू-ब -रू होना पड़ता है। प्रबन्ध संकट के समय निर्णय लेने और मानवीय क्रियाओं पर नियन्त्रण करने की विधि है जिससे पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। 


        मार्टन डेउश (Morton Deutch) महोदय का मत है कि- "संकट एक अतुलनीय प्रयास है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक अनोखे लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। इससे जो उपलब्धि होगी वह दूसरों के आधार पर होगी। संकट की स्थिति में विजय वा पराजय कोई भी स्थिति हो सकती है किन्तु प्रयास यही किया जाता है कि पराजय न हो और विजय ही मिले।"

      इस स्थिति में समूहों के मध्य परस्पर प्रतियोगिता हो जाती है। यह प्रतियोगिता संघर्ष को जन्म देती है। इसके फलस्वरूप वैचारिक भिन्नता बढ़ती है और द्वेष भावना प्रारम्भ हो जाती है। इस द्वेष भावना से प्रबन्ध में संकट पैदा होता है। 


(Crisis is the Pursuit of incompatible or at least seemingly incompatible goals, such that gains to one side come out at the expense of the other.) 


     अतः कहा जा सकता है कि शैक्षिक संस्थाओं के अनेक कार्य होते हैं और उन्हें अनेक भूमिकाओं का निर्वहन करना होता है तथा विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों और शैक्षिक कार्यकर्त्ताओं से सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। भूमिका निर्वाह में आवश्यक नहीं है कि हमेशा सामान्य सम्बन्ध बने रहें, इसमें अनेक संघर्षों का सामना भी करना होता है। संघर्ष से सम्बन्ध प्रभावित होते हैं, समन्वय प्रभावित होता है और फिर संस्था के कार्य प्रभावित होते हैं। कार्य प्रभावित और विवेकपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाता है तो प्रबन्ध में संकट पैदा हो जाता है। प्रबन्धन को होने से समस्याएँ पैदा होती हैं। इन समस्याओं के समाधान में यदि प्रधानाध्यापक उचित इस संकट से मुक्ति का मार्ग ढूँढना होता है।


प्रबन्ध में संकट के कारण 

(Causes of Crisis in Management) 


       प्रबन्ध में संकट के कारणों के विषय में कुछ कहना अत्यन्त कठिन है क्योंकि परिस्थितियों में परिवर्तन होता रहता है इसलिए कारण भी बदलते रहते हैं। फिर भी कुछ कारणों के विषय में स्पष्टीकरण निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है - 

(1) नियम विरुद्ध निर्णय लेना - जब प्रधानाचार्य किसी कारणवश नियमों के प्रतिकृत कोई निर्णय ले लेता है तो शिक्षक, छात्र, अभिभावक आदि सम्बन्धित व्यक्ति इसके विरोध में हो जाते हैं। ये उसके विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर देते हैं। इस प्रकार गलत निर्णय लेने से प्रबन्ध में संकट पैदा हो जाता है। 

(2) दलबन्दी - विद्यालय में जब कई समूह अलग-अलग संघों के रूप में स्थापित हो जाते हैं, तो विचारधारा में अन्तर आ जाता है। यह विचारधारा व्यक्तियों को अलग-अलग नेताओं के दलों में बाँट देती है जैसे- छात्र संघ, शिक्षक संघ, अभिभावक संघ, आदि। ये संघ रचनात्मक कम होते हैं, आन्दोलनकारी अधिक होते हैं। ये प्रबन्धन की कमजोरियों का पता लगाकर उसके विरुद्ध दल बना लेते हैं। ये दल प्रबन्ध में संकट पैदा करते हैं। 

(3) उद्देश्य और आवश्यकताओं में भिन्नता - विद्यालय के अन्तर्गत क्रियाशील दलों की आवश्यकताएँ और उनके उद्देश्यों में भिन्नता होती है। इसलिए ये एक - दूसरे के विरुद्ध विरोध की भावना से ग्रसित रहते हैं। फलस्वरूप ये विरोध के लिए भी विरोध करते रहते हैं जबकि आपसी प्रेम और समन्वय को ठुकरा देते हैं। यह उद्देश्य भिन्नता प्रबन्ध में संकट का कारण बन जाती है। 

(4) समन्वय का अभाव तथा परिस्थिति को सही रूप में न समझना - मानव की प्रकृति और प्रवृत्ति यह है कि वह स्वयं जैसा सोचता है वैसा ही वह देखना चाहता है। इसलिए वह परिस्थिति को समझने का प्रयास नहीं करता है। यही कारण है कि आपसी समन्वय नहीं हो पाता है और वह अच्छे कार्यों में एवं रचनात्मक कार्यों में सहयोग नहीं करता है। अतः समन्वय के अभाव के कारण प्रबन्ध में संकट पैदा होता है। 

(5) कर्त्तव्य की अपेक्षा अधिकारों की अधिक माँग करना - शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ी है। इससे बालक को अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों का ज्ञान हुआ है। किन्तु जब यह ज्ञान केवल अधिकारों तक ही सीमित हो जाता है, अधिकार न मिलने पर आन्दोलन किये जाते हैं तब यह आन्दोलन ही प्रबन्ध के सम्मुख संकट पैदा करते हैं। 

(6) उपलब्ध स्रोतों का अभाव और प्रतियोगिता - विद्यालय में उपलब्ध स्रोतों से सबकी पूर्ति नहीं होती है। इसलिए इन्हें प्राप्त करने के लिए प्रतियोगिता प्रारम्भ हो जाती है। और इस प्रतियोगिता के कारण विद्यालय का एक घटक दूसरे घटक के कार्यों पर अधिकार  जमाने का प्रयास करता है। यह प्रयास ही आपसी द्वेष बढ़ाता है और प्रबन्ध के सम्मुख संकट पैदा कर देता है। 

(7) रचनात्मक कार्यों का अभाव अथवा अधिकता - कभी-कभी रचनात्मक कार्यों का अभाव संकट का कारण बनता है तो कभी रचनात्मक कार्यों की अधिकता। विद्यालयक के सभी घटक किसी एक बात से सहमत न होकर अलग-अलग मत रखते हैं और जो कार्य प्रारम्भ किया जाता है उसका विरोध करते हैं। यदि कोई कार्य प्रारम्भ न किया जाये तो दुसरे घटक विरोध करते हैं। इस प्रकार विद्यालय में किसी भी नवीन परिवर्तन का विरोध करते हैं और विद्यालय के घटक दल एक-दूसरे पर अधिकार जमाना चाहते हैं। इस कारण प्रबन्ध में  संकट पैदा हो जाता है। 


       अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि संस्था में प्रबन्ध में संकट के अनेक कारण है। इन्हें किसी सीमा में बाँधना कठिन है क्योंकि कब किसकी भावात्मक स्थिति,  अथवा मानसिक स्थिति समन्वय करने से इंकार कर दे और संकट पैदा कर दे। यह भी कहना है कि आकस्मिक रूप से कब, कौन, कैसी परिस्थिति पैदा कर दे और प्रबन्ध की कमजोरियों पर प्रहार कर संकट उत्पन्न कर दे। 

प्रबन्ध में संकट के प्रकार 

(Types of Crisis in Management) 


        प्रबन्ध में संकट को किसी एक अवस्था (Stage) या स्तर पर बाँधना कठिन है। संकट के अनेक कारण और परिस्थितियाँ हैं। कहीं दबाव (Stress) है तो कहीं तनाव (Tension) है, कहीं शत्रुता (Hostility) है तो कहीं दुष्चिन्ता (Enxiety) अथवा ईर्ष्या (Jealousy) है और ये सब अवस्थाएँ स्वतन्त्र नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे से अन्तः सम्बन्धित है। अतः प्रबन्ध में संकट के विविध प्रकारों के रूप में इन अवस्थाओं (Stages) को निम्नलिखित रूप में व्यक्त  किया जा सकता है - 

(1) आन्तरिक संकट (Latent Crisis) - यह संकट संस्था के अन्दर गुप्त रूप से पनपता है। 

(2) अभिव्यक्ति संकट (Manifest Crisis) - यह संकट व्यक्त रूप में अर्थात् प्रकट रूप में सामने होता है। इसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट कर दी जाती है। 

(3) अनुभव (प्रत्यक्षीकरण) संकट (Perceived Crisis) - जब संकट का अनुभव कर लिया जाता है, फिर उसका समाधान खोजा जाता है, वह अनुभव संकट कहलाता है। इसमें संकट का प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। 

(4) अनुभूति संकट (Felt Crisis) - जब संकट की अनुभूति हो जाती है अर्थात् उसे महसूस कर लिया जाता है, तब उसका समाधान खोजा जाता है। 

(5) पारस्परिक संकट या अन्तः वैयक्तिक संकट (Inter - personal) - यह संकट व्यक्तियों में आपस में द्वेष, प्रतिस्पर्द्धा, ईर्ष्या आदि के कारण पनपता है। 

(6) संगठन के अन्तर्गत संकट (Intra - organization Crisis) - यह संकट संगठन के अन्तर्गत होता है जो व्यवस्था से सम्बन्धित होता है। 

(7) विद्यालय समुदाय का संकट (School - Community Crisis) - यह संकट विद्यालय और समुदाय के सम्बन्धों से सम्बन्धित होता है। समुदाय विद्यालय से और विद्यालय समुदाय से अपेक्षा रखता है। इनकी पूर्ति में कमी के कारण संकट पैदा होता है। 

(8) व्यक्तिगत-संस्थागत संकट (Individual - Institutional Crisis) - यह संकट व्यक्ति और संस्था के सम्बन्धों में कटूता के कारण उत्पन्न होता है। व्यक्ति की अपनी अपेक्षाएं होती हैं और संस्था के अपने नियम व शर्त होती हैं। अतः अपेक्षापूर्ति में कमी संकट को जन्म देती है। 

(9) सांस्कृतिक संकट (Cultural Crisis) - मार्च एवं साइमन (March and Simon) महोदय ने इस संकट को स्वीकार करते हुए कहा है- "जब निर्णय की प्रक्रिया का स्तर गिर जाता है तब परिस्थितियों में गलत ढंग से विद्यालयों में कार्य करने की प्रवृत्ति होने लगती है। इसके कारण विद्यालय में संकट उत्पन्न होते हैं।" निर्णय प्रक्रिया का स्तर गिरना सांस्कृतिक मूल्यों पर निर्भर करता है। सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट से शिक्षक और छात्रों की रचनात्मक प्रवृत्ति में कमी अर्थात् उनमें सकारात्मक सोच का अभाव और नकारात्मक सोच की अधिकता हो जाती है। इसलिए वे द्वेष, ईर्ष्या, हानि की प्रवृत्ति के कारण संकट पैदा कर देते हैं। सकारात्मक सोच के अभाव में शैक्षिक क्षेत्र में अनेक जटिल समस्याएँ पनप रही हैं और ये नये संकट पैदा कर रही है। 


        अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि प्रबन्ध में संकट विविध प्रकार से उपस्थित हो जाता है। यह संकट चाहे आन्तरिक है या अन्य किसी प्रकार से, सम्पूर्ण व्यवस्था को अव्यवस्थित कर देता है। इसे सांस्कृतिक मूल्यों को उच्चतर बनाकर और सकारात्मक सोच से सुगमता से दूर किया जा सकता है। 


प्रबन्ध में संकट को करने की विधियाँ 

(Methods to Remove Crisis in Management) 


          प्रबन्ध में संकट को दूर करने हेतु विद्वानों ने अनेक विधियाँ और प्रतिमान विकसित किये हैं। इनमें से कुछ निम्नलिखित रूप में व्यक्त किये जा सकते हैं 

(1) सौदाकारी अथवा समझौता विधि (Bargaining Method) - यह विधि मूलतः समझौते पर आधारित है। इसमें संकट समाधान के लिए मोल - भाव किया जाता है और कुछ आदान-प्रदान के आधार पर संकट को दूर किया जाता है। इसके अतिरिक्त विद्यालय के सभी संसाधनों, स्रोतों और सुविधाओं को केन्द्रीकृत कर दिया जाता है। इसमें सभी पक्ष इनका उपयोग करते हैं और इनका उपयोग करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि संस्था को कोई हानि न हो। इस विधि में समस्या समाधान के लिए सभी पक्ष अपनी आवश्यकताओं को कम करके भी समझौता कर सकते हैं। अतः इस विधि में दो पक्षों के मध्य सौदा करके अथवा समझौता करके संकट का समाधान खोजा जाता है। 

(2) अधिकारी तन्त्र (नौकरशाही) विधि (Bureaucratic Method) - यह विधि मुख्यतः अधिकारी वर्ग और कर्मचारी वर्ग के सम्बन्धों में होने वाले वैचारिक मतभेद से सम्बन्धित है। उच्च अधिकारी जब अपने अधीनस्थ कर्मचारी को अधिक नियन्त्रित करने का प्रयास करता है तब यह स्थिति अधीनस्थ को सहन नहीं होती है तो संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। इसके अतिरिक्त जब उच्च अधिकारी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करने लगता है, तब स्थिति असन्तुलित हो जाती है और संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। अतः इसका समाधान तभी सम्भव है जब उच्च अधिकारी निष्पक्ष रूप में हस्तक्षेप करे और अत्यधिक कठोर साधना का प्रयोग न करें। समस्या की जटिलता बढ़ने से पूर्व ही अधिकारी को लिखित आदेशों को आधार मानकर व्यक्तिगत रूप से समस्या का समाधान करना चाहिए। 

(3) प्रणाली विश्लेषण विधि (System Analysis Method) - इस विधि के अन्तर्गत पहल संकट की स्थिति का पता लगाया जाता है, संकट के करण खोज जाते हैं और उसकी प्रकृति तथा आकस्मिक दशाओं का विश्लेषण किया जाता है और यह प्रयत्न किया जाता है। कि प्रधानाचार्य, शिक्षक और छात्रों में मधुर सम्बन्ध बने रहें और प्रत्येक प्रकार के संकट को दूर करने के प्रयास किया जाए। ये संकट चाहे समान्तर स्थिति के हो अथवा लम्बवत् स्थिति के इन्हें दूर करने के लिए एक क्रम बनाया जाता है ताकि कार्य संचालन निर्बाध गति से एक प्रवाह के रूप में होता रहे। अतः इस संकट को दूर करने हेतु एक प्रणाली के रूप में सेवा सुविधाओं की उपलब्धता, नियमों में एकरूपता और सामूहिक कार्यों का वितरण अत्यन्त सावधानीपूर्वक किया जाना आवश्यक है।  

(4) कैनीथ थामस विधि (Kenneth Thomas Method) - इस विधि का प्रतिपादन कैनीथ थामस महोदय ने किया। यह एक व्यावहारिक विधि है। इसमें प्रशासक उस संकट का भागीदार होता है तब वह इस विधि का उपयोग प्रत्यक्ष रूप में कर सकता है। प्रबन्ध में संकट को दूर करने के लिए व्यक्ति स्वेच्छा से तैयार होता है, सकारात्मक अभिवृत्तियों का विकास और परस्पर सहयोग की भावना विकसित की जाती है। इस प्रकार इसमें दो समूह बन जाते हैं। एक समूह वह जो स्वयं की आवश्यकताओं से पूर्ण है और दूसरा वह समूह जो अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर सकता है। इस संकट को दूर करने के पाँच आधार थामस महोदय ने बताए हैं, ये पाँच आधार इस प्रकार हैं -

(1) ध्यान न देना (Neglect or Avoid) - इस संकट को दूर करने के लिए उच्च अधिकारी को छोटी - छोटी बातों पर ध्यान न देना अर्थात् किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न करना। 

(2) समायोजित करना अथवा उन्हें प्रसन्न करना (Accommodate and Appeasement) - इस विधि का आधार स्वेच्छा है अर्थात् इस आधार पर व्यक्ति स्वेच्छा से के साथ कितना समायोजन कर सकता है अथवा उसे कितना प्रसन्न कर सकता है। अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए, भविष्य के लिए हितकारी मानते हुए और संकट को अधिक लम्बे समय तक उपयोगी न मानते हुए कुछ आदान - प्रदान करके भी संकट को दूर किया जा सकता है और स्वयं को समायोजित किया जा सकता है। 

(3) प्रतियोगिता एवं प्रभुत्व (Competition Domination) - यह एक ऐसी स्थिति है जब व्यक्ति अपनी मांग पूर्ण करने पर अड़ जाता है, किसी प्रकार का कोई सहयोग करने को तैयार नहीं होता है और किसी प्रकार भी सन्तुष्ट नहीं होता है। ऐसी स्थिति में प्रबन्धक प्रतियोगिता की भावना का विकास कर सकता है। प्रतियोगिता से उनमें हार - जीत की भावना का विकास होगा और आवश्यकतानुसार नियम व कानूनों का सहारा भी लिया जा सकता है। इस प्रकार प्रतियोगिता और प्रभुत्व दोनों तरीकों से संकट को दूर करने का प्रयास किया जा सकता है। 

(4) समन्वय अथवा एकीकरण (Collaboration or Integration) - इस स्थिति में प्रत्येक संकट का समाधान चाहता है। सभी सदस्य मिल-जुलकर कार्य करना चाहते हैं। और सभी का लक्ष्य जीतना होता है। यह स्थिति समन्वय की स्थिति होती है। अतः सभी समन्वित रूप में कार्य करके संकट का समाधान करते हैं। वास्तव में इसमें आपसी समझ बूझ से संकट को दूर किया जाता है। 

(5) भागीदारी अथवा समझौता (Sharing or Compromise) - इस स्थिति में भी दोनों पक्ष लाभ की स्थिति में होने से सहयोगी भावना रखते हैं और वे इसलिए प्रसन्न होते हैं यदि किसी को कुछ खोना पड़े तो वह और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा। इसमें भी मोल-भाव अथवा समझौते की स्थिति होती है।


     अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि प्रबन्ध में संकट के विविध कारण हैं और उसके समाधान की विविध विधियाँ हैं। थोड़ी सी सावधानी से, सकारात्मक सोच से विविध उपायों को ध्यान में रखकर संकट को दूर किया जा सकता है और संस्था को निर्बाध गति से प्रवाहशील बनाया जा सकता है।


Reference :-


शैक्षिक प्रशासन एवं प्रबंध (Educational Administration & Management) 

लेखक - डॉक्टर गजेंद्र सिंह तोमर

अध्याय - 18  प्रबंधन में संकट 

(Crisis in Management) 

पृष्ठ संख्या - 233-238.

R. Lall Book Depot.

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शनिवार, 13 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत वित्तीय प्रबंधन (Financial Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.


 वित्तीय प्रबंधन 
(Financial Management)

    वित्तीय प्रबंधन, इसे अंग्रेजी में Financial Management कहते हैं। इसका अर्थ धन/फंड के उचित प्रबंधन से हैं ताकि किसी भी संगठन/संस्था के लक्ष्य की प्राप्ति की जा सके। वित्त प्रबंधन का कार्य किसी भी संस्था के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक होता है।


         वित्त किसी भी कार्य/व्यवसाय के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि शरीर में रक्त। इसलिए वित्त जैसे अमूल्य तत्वों का प्रबंधन ही वित्तीय प्रबंधन कहलाता है। आइये इसे हम एक उदाहरण के द्वारा भी समझने का प्रयास करते हैं -


        मान लीजिए आप एक संस्था की शुरुआत करने की सोच रहे हैं तो सबसे पहले, पहला प्रश्न आपके मस्तिष्क में यह आएगा कि इस संस्था की शुरुआत के लिए कितने धन की आवश्यकता होगी ? वह धन कहां से प्राप्त होगा ? इस धन का उपयोग संस्था में किस प्रकार किया जाएगा ? इत्यादि। वित्तीय प्रबंधन में ऐसे ही प्रश्नों के संभावित उत्तर तैयार किए जाते हैं और उन्हें अमल में लाया जाता है।


     वित्तीय प्रबंधन के बारे में वित्त विशेषज्ञों द्वारा दी गई परिभाषाएं -

  • वित्तीय प्रबंधन से आशय नियोजन एवं नियंत्रण (Planing and Control) के कार्यों को वित्त के कार्यों पर लागू करना होता है। 


हावर्ड एवं उपटन 

(Howard and Upton) 


  • वित्तीय प्रबंधन एक व्यवसाय की वह संचालनात्मक  प्रक्रिया (Operational Process) है जो कुशल प्रचालनो (Efficient Operations) के लिए आवश्यक वित्त को प्राप्त करने तथा इसका उसका प्रभावशाली ढंग से उपयोग करने हेतु उत्तरदाई होता है। 


बियरमैन एवं स्मिथ 

(Bearman and Smith)


  • वित्तीय प्रबंध व्यवसाय की वह संचालनात्मक प्रक्रिया (Operational Process)  है जो व्यक्तिगत उद्देश्यों और उपक्रम के उद्देश्यों में समन्वय स्थापित करती है। 

वेस्टर्न एवं ब्राइघम 

  • वित्तीय प्रबंधन व्यवसाय का वह क्षेत्र है जिसका संबंध पूंजी के विवेकपूर्ण उपयोग एवं इसके सतर्कता पूर्ण चयन से है ताकि व्यय करने वाली इकाई अपने उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ सके।

जे. एफ. ब्रेडले

       उपरोक्त परिभाषाओ के आधार पर हम कह सकते हैं कि वित्तीय प्रबंधन के अंतर्गत कोषो को एकत्रित करने के साथ-साथ नियोजन, निर्णयन, संचालन, पूंजी के स्रोतों का निर्धारण से संबंधित होता है।


वित्तीय प्रबंधन के उद्देश्य


 वित्तीय प्रबंधन के उद्देश्य निम्न होते हैं -


  • संगठन/संस्था के लिए धन की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना। 
  • वास्तविक और सुरक्षित निवेश के अवसर तैयार करना। 
  • निधियों का इष्टतम और कुशल उपयोग। (Optimum and efficient use of funds) 
  • यह सुनिश्चित करना कि उनके शेयरधारकों को उनके निवेश पर अच्छा रिटर्न मिले। 


वित्तीय प्रबंधन की विशेषताएं

(Features of Financial Management)


       वित्तीय प्रबंधन की निम्नलिखित विशेषताएं होती है -

  • आवश्यकता का अनुमान (Estimate of Need) - वित्तीय प्रबंधन के द्वारा संस्था की वित्त संबंधी आवश्यकताओं का अनुमान लगाना आसान हो जाता है। 
  • वित्तीय स्रोतों का निर्धारण (Building Capital Structure) - संस्था/व्यवसाय की पूंजी संरचना, अल्पकालीन, दीर्घकालीन, स्थायी एवं कार्यशील पूंजी (Short Term, Long Term, Fixed and Working Capital) से निर्मित होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि वित्तीय प्रबंधन पूंजी संरचना का निर्माण करता है। 
  • अर्जित आय का प्रबंध (Management of earned Income) - वित्तीय प्रबंध संस्था के कार्यों द्वारा कैसे लाभ प्राप्त किया जा सके प्राप्त आय को किस प्रकार प्रयोग एवं प्रबंध किया जाए इसका भी निर्धारण करता है। 
  • प्रबंधकों हेतु सहायक (Assistant to Manager) - वित्तीय प्रबंधन एक ऐसा प्रबंध है जो संस्था/व्यवसाय की सफलता का कारक होता है यही संस्था/व्यवसाय को स्थाई एवं स्वयं निर्णय लेने में सहायक होता है। 


वित्तीय प्रबंधन इतना महत्वपूर्ण क्यों है ?

Why is financial management so important ?


       वित्तीय प्रबंधन, प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण अंग होता है इसी के द्वारा ही पूरी संस्था की दिशा तय होती है इसी वजह से इसकी महत्ता ज्यादा मानी जाती है। कुछ बिंदुओं के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करते हैं -


  • वित्तीय प्रबंधन, वित्तीय योजना और धन के अधिग्रहण में संस्था की सहायता करता है। 
  • संस्था को प्राप्त या अर्जित धन का प्रभावी ढंग से उपयोग और आवंटन करने में सहायता करता है। 
  • महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय लेने में संस्था की मदद करता है। 
  • वित्तीय प्रबंधन संस्था की आर्थिक स्थिरता को प्रदान करता है।


Reference


https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%A8


https://www.kailasheducation.com/2020/08/vittiy-prabandh-arth-paribhasha-visheshtaye.html


https://www.pfh-university.com/blog/financial-management-what-is-it-and-why-is-it-important.html


रविवार, 7 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत नवाचार (Innovation) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 




नवाचार (Innovation) 

        नवाचार को अंग्रेजी में Innovation कहते हैं। नवाचार शब्द दो शब्दों के मेल से बना है नव + आचार जिसमें नव का अर्थ होता है नया (New) और आचार का अर्थ हुआ आचरण या परिवर्तन (Conduct or Change). नवाचार किसी उत्पाद, सेवा, प्रक्रिया में परिवर्तन लाने से है नवाचार के अंतर्गत कुछ नया और उपयोगी तरीका अपनाया जाता है। 

जैसे :- नई विधि, नई तकनीक, नया कार्य, नई सेवा, नया उत्पाद, इत्यादि। नवाचार को अर्थतंत्र (Economy) का सारथी भी माना गया है।

        नवाचार वह परिवर्तन है जो पूर्व में स्थित विधियों और पदार्थों में नयापन लाने का प्रयास करता है। नवाचार को विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया है।

  • नवाचार वह विचार (Idea) है जिसका प्रयोग व्यक्ति अपने नवीन कार्यों के रूप में करें।    -रोजर्स
  • नवाचार एक विचार है, व्यवहार है अथवा एक पदार्थ है जो नवीन (New) है और वर्तमान स्वरूप से भिन्न है।    -वारनेट
  • नवाचार आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में एक मूल्य (Value) जोड़ने वाले नवीनता का उत्पादन है। यह एक प्रक्रिया भी है और परिणाम भी।       -क्रोसन एवं अपयदिन
  • नवाचार एक समझ बूझ कर किया जाने वाला नवीन और विशिष्ट परिवर्तन है जिसे किसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तैयार किया जाता है।       -माइल्स

नवाचार की शुरुआत 
(Started of innovation)

      1971 ई० में यूनेस्को सम्मेलन के दौरान नवाचार शब्द को परिभाषित किया गया और यह बताया गया कि नवाचार को स्वीकृति तभी मिल सकती है जब वह इन छह (06) चरणों से होकर गुजरे जो कि निम्न है -
  1. खोज (Search) 
  2. परीक्षण (Test) 
  3. मूल्यांकन (Evaluation) 
  4. विकास (Development) 
  5. विस्तार (Spread)
  6. स्वीकृति (Acceptance)
       नवाचार की शुरुआत किसी खोज के द्वारा होती है फिर इस खोज पर एक परीक्षण किया जाता है परीक्षण करने के उपरांत इसका मूल्यांकन कर उचित दिशा में विकास किया जाता है। विकास के उपरांत विस्तार कर समाज में व्यक्तियों के द्वारा इस नवाचार को कितनी स्वीकृति मिल रही है इसको निरीक्षण के उपरांत नवाचार की संज्ञा उसे प्रदान की जाती है।

नवाचार की विशेषता 
(Characteristic of innovation)

     नवाचार की निम्नलिखित विशेषताएं होती है जो कि निम्न है - 
  • नवाचार को सामान्यत: नए विचारों के निर्माण की संज्ञा दी जाती है। 
  • नवाचार की उत्पत्ति का कारण आवश्यकताएं और परिस्थितियां होती है।
  • इसका जन्म क्रिया के दौरान या दार्शनिक विचारों की गहनता से होता है। 
  • यह वर्तमान में उत्पन्न समस्याओं में सुधार लाने का नूतन प्रयास होता है। 
  • इसमें विशेष गुण वाले तत्व विद्यमान रहते हैं जो परंपरागत परिस्थितियों से भिन्न होते हैं।

निष्कर्ष 
(Conclusion) 

नवाचार नवीन विचारों एवं क्रियाओं को जन्म देने वाला एक साधन है इस को अपनाने हेतु व्यक्तिगत व्यवहार में लचीलापन होना आवश्यक होता है।

Reference :-



शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत कार्यक्रम प्रबंधन (Program Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.




 
कार्यक्रम प्रबंधन  
(Program Management) 

कार्यक्रम की परिकल्पना, कार्यान्वन एवं समीक्षा 
(Program Design, Implementation and Review)

        कार्यक्रम को अंग्रेजी में Program कहते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ होता है - क्रमिक रूप से किया जाने वाला कार्य। 
        समूह कार्य के रूप में कार्यक्रम को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में जाना जाता है। इसके माध्यम से समूह  गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। वास्तव में कार्यक्रम स्वयं एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य समूह की क्रियाओं और गतिविधियों को इस प्रकार नियोजित करके संपन्न करना होता है कि जिससे समाज के सभी वर्गों को लाभ हो।

       कार्यक्रम को परिभाषित करते हुए विद्वानों ने निम्न परिभाषाएं दी है - 
  • कार्यक्रम के अंतर्गत वह सभी कार्य आता है जिसे समाज के सदस्यों द्वारा संपन्न किया जाता है। जैसे - शिल्प, अभिनय, नाटक, खेल-कूद, इत्यादि।     
-क्लीन
  • कार्यक्रम शब्द उन क्रियाओं में प्रयोग किया जाता है जो वार्तालाप के स्थान पर करने को अधिक महत्व देते हैं।           
-मिडलमैन

         इन परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि कार्यक्रम एक समूह द्वारा की जाने वाली वे गतिविधियां होती है जो समूह की व्यक्तिगत अभिरुचियों एवं क्षमताओ पर आधारित तथा निर्धारित होती है। इसके द्वारा समूह में समूह की भावना का विकास होता है और समूह अपनी समस्याओं का समाधान खोजता है। कार्यक्रम के माध्यम से समाज के सदस्यों में समूह भावना (Group spirit) के विकास पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में कार्यकर्ता का यह दायित्व होता है कि वह समूह के सदस्यों की रुचियों एवं क्षमताओं के अनुसार कार्यक्रमों का निर्माण करें एवं सदस्यों को विभिन्न भूमिकाओं के निर्वहन का अवसर प्रदान करें।

कार्यक्रम प्रबंधन
(Program Managment)

     कार्यक्रम प्रबंधन एक या एक से अधिक कार्यक्रमों का संगठन एवं प्रशासन (Organization and Administration) है। इसमें विशेष रूप से जिन बातों पर ध्यान दिया जाता वह है - बजट, संचालन और समीक्षा (Budgeting, Operations and Reviews) इन तीनों के अलावा भी अच्छे संचार एवं विस्तार (Good communication and extension) पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

     कार्यक्रम प्रबंधन और परियोजना प्रबंधन दोनों अक्सर एक समान ही होते हैं जबकि इनके कई कार्य भी एक समान होते हैं/प्रतीत होते हैं। यदि इन दोनों में अंतर की बात की जाए तो सबसे प्रमुख अंतर जो मुझे ज्ञात हो रहा है वह यह है कि कार्यक्रम प्रबंधन एक स्थाई चर है जो कई वर्षों तक चलता रहता है इसके विपरीत परियोजना प्रबंधन एक अस्थाई चर है जो कि परियोजना के समाप्ति के साथ ही वह समाप्त हो जाता है।

कार्यक्रम की परिकल्पना 
(Program Design)

      किसी कार्यक्रम/घटना की व्याख्या करने वाला कोई सुझाव या अलग-अलग प्रतीत होने वाली बहुत सी घटनाओं के आपसी संबंध की व्याख्या करने वाला कोई तर्कपूर्ण सुझाव परिकल्पना कहलाता है। इसे शोध के परिदृश्य में Hypothesis कहते हैं।

       सामान्य रूप से परिकल्पना को हम इस रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं जैसे :- परिकल्पना का अर्थ किसी अस्थाई विचार (Provisional Idea) से होता है जिसे अंतिम रूप में व्यक्त करना अभी बाकी होता है।

कार्यान्वयन 
(Implementation)

    कार्यान्वयन का अर्थ होता है किसी चीज को लागू करना या फिर अमल में लाना। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि कार्यान्वयन किसी योजना, विधि या किसी डिजाइन विचार मॉडल भी निर्देश मानक या किसी डिजाइन, विचार, मॉडल, विनिर्देश (Specification), मानक (standard) या कुछ करने की नीति का निष्पादन या अभ्यास है।

      एक कार्यान्वयन योजना एक तरह से परियोजना प्रबंधन है जो किसी लक्ष्य और उद्देश्य को प्राप्त करने के सीढ़ियों की रूपरेखा तैयार करता है। अपने लक्ष्य के आधार पर कार्यान्वयन की योजनाएं भिन्न हो सकती है लेकिन उनमें निम्नलिखित तत्व शामिल रहते हैं -

  • समय रेखा (Time Line) :- कोई भी कार्य को संपन्न करने की एक निश्चित समय सीमा होती हैं। अतः हमें उस कार्य को उसी समय-सीमा में ही संपन्न करना चाहिए।
  • संसाधन योजना (Resource Planning) :- इसमें कार्यान्वयन को पूरा करने के लिए संसाधनों की चर्चा रहती है। 
  • लक्ष्य (Aim) :- यह एक अंतिम परिणाम होता है जिसे एक कार्यान्वयन के द्वारा पूरा करना होता है।
  • उद्देश्य (Objective)  :- लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उद्देश्य का पालन करना चाहिए। 
  • भूमिकाएं और जिम्मेदारियां (Roles & Responsibilities) :- कार्यान्वयन के कार्य में सभी कर्मचारियों को अपनी भूमिका और जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए।

समीक्षा (Review) 

      कार्यक्रम की समीक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो शैक्षणिक कार्यक्रमों की स्थिति प्रभावशीलता और प्रगति का मूल्यांकन करती है और उन कार्यक्रमों के भविष्य के विशाल जरूरतों और परंपराओं की पहचान करने में मदद करती है।


Reference :-

https://www.samajkaryshiksha.com/2022/04/meaning-and-process-of-program.html


https://www.netinbag.com/hi/business/what-is-program-management.html


https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE


https://www.techtarget.com/searchcustomerexperience/definition/implementation


https://www.techtarget.com/searchcustomerexperience/definition/implementation


https://www.provost.iastate.edu/academic-programs/accreditation/academic-program-review--purpose-and-process


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत परियोजना एवं प्रतिवेदन (Project and Report) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 परियोजना एवं प्रतिवेदन 

(Project and Report)





      परियोजना एवं प्रतिवेदन (प्रोजेक्ट एवं रिपोर्ट) जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह दोनों अलग-अलग विषय वस्तु है तो चलिए इस लेख में हम दोनों को अलग-अलग समझने का प्रयास करते हैं। सबसे पहले हम जानेंगे परियोजना यानी की प्रोजेक्ट और उसके उपरांत प्रतिवेदन यानी की रिपोर्ट के बारे में ......

परियोजना (Project)

         परियोजना जिसे हम "कार्ययोजना" भी कह सकते हैं यह किसी समस्या के समाधान या किसी विषय वस्तु से संबंधित जानकारियों को प्रकाशित करने के लिए तैयार की गई एक पूर्ण योजना (Planing) होती है। 

इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि,

      किसी भी क्षेत्र जैसे- चिकित्सा, विज्ञान, व्यापार, इत्यादि में किसी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति हेतु जो विशेष योजना बनाई जाती है एवं उसे क्रियान्वित (पूरा) भी किया जाता है उसे प्रोजेक्ट (परियोजना) कहते हैं।

or

       परियोजना वैज्ञानिक आधार पर विकसित की गई एक कार्य योजना हैं जिसे निश्चित अवधि में विशेष उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तैयार किया जाता है।

        परियोजना के प्रारूप में कार्य की शुरुआत कैसे होगी ? कब, कौन सा कार्य संपादित होगा ? कार्य की समाप्ति कब होगी ? कितने संसाधन लगेंगे ? कितने धन की आवश्यकता होगी ? इत्यादि बातों को भी क्रमबद्ध लिखा रहता है।

      वर्तमान परिदृश्य में समस्याएं हमारे सम्मुख विकराल रूप में आ खड़ी हुई है। जैसे - नौकरी की समस्या, बिजली की समस्या, अनेकों प्रकार के जीवाणु एवं विषाणु से उत्पन्न होने वाले बीमारियों की समस्या, इत्यादी। हमारे आस-पास बहुत सी ऐसी समस्याएं मौजूद रहती है जिन्हें देखकर कि हमें लगता है कि इसका समाधान होना चाहिए यदि हम उस समस्या के तह तक जाकर उसके सभी पहलुओं को जानने के उपरांत उसके निदान के लिए जो संभावित योजना बनाते हैं उसे ही परियोजना कहा जाता है। जैसे:- इसरो की चंद्रयान परियोजना, मंगलयान परियोजना, इत्यादि। 

परियोजना की विशेषताएं 

एक अच्छी परियोजना की निम्नलिखित विशेषताएं होती है :- 
उद्देश्य :- प्रत्येक परियोजना को तैयार करने के पीछे कुछ न कुछ उद्देश्य छिपा हुआ होता है जैसे ही उस उद्देश्य की प्राप्ति हो जाती है वैसे ही परियोजना का समापन हो जाता है। 

अद्वितीय :- प्रत्येक परियोजना अपने आप में अद्वितीय यानी कि यूनिक होता है कभी भी दो परियोजनाएं बिल्कुल एक जैसी नहीं हो सकती। हां उसमें थोड़ी बहुत समानताएं हो सकती है। 
अनिश्चितता (Uncertainty) :- भविष्य किसी ने नहीं देखा और यह भी नहीं जानता की कल क्या होगा ? ठीक उसी परियोजना जब तक समाप्त हो जाए तब तक उसमें अनिश्चितता बनी रहती है 
जोखिम (Risk) :- परियोजना चाहे छोटी हो या बड़ी जोखिम (Risk) हमेशा बना रहता है छोटी परियोजनाओं में कम जोखिम जबकि बड़ी परियोजनाओं में अधिकतम जोखिम रहता है।

प्रतिवेदन (Report)

      किसी परियोजना, घटना, प्रकरण (Episode) इत्यादि के बारे में स्पष्ट देखकर, छानबीन करके, शोध के द्वारा जो लिखित रूप में परिपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया जाता है उसे ही प्रतिवेदन कहते हैं।

     प्रतिवेदन दो शब्दों (प्रति + विद) से बना है जिसका अर्थ होता है - समस्त यानी पूरी जानकारी। प्रतिवेदन में पूरी जानकारी तो दी ही जाती है साथ ही साथ कुछ सुझाव एवं संतोषजनक जवाब भी दिया जाता है।

उदाहरण स्वरूप हम कह सकते हैं कि,

      देश या विदेश में घटित कोई भी घटनाक्रम का निरीक्षण, शोध करके तैयार की गई समस्त विवरण हमारे लिए प्रतिवेदन है।

प्रतिवेदन लिखते समय ध्यान देने योग्य कुछ महत्वपूर्ण बिंदु -
  • प्रतिवेदन हमेशा संक्षिप्त होना चाहिए।
  • प्रतिवेदन का शीर्षक एवं उपशीर्षक ऐसा होना चाहिए कि पूरे मुख्य विषय को रेखांकित करता हो। 
  • जिस किसी भी घटना का हम प्रतिवेदन तैयार कर रहे हैं उसकी तिथि एवं समय उसमें अंकित होना चाहिए। 
  • प्रतिवेदन में हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि केवल महत्वपूर्ण तथ्य ही इस में सम्मिलित हो 
  • प्रतिवेदन में निर्णय की जानकारी होनी चाहिए 

प्रतिवेदन के प्रकार 

      प्रतिवेदन के तीन प्रकार होते हैं या यूं कह सकते हैं कि प्रतिवेदन तीन तरह के लिखे जाते हैं - 

  1. व्यक्तिगत प्रतिवेदन (Personal Report)
  2. संगठनात्मक प्रतिवेदन (Organisational Report)
  3. विवरणात्मक प्रतिवेदन (Descriptive Report)

 
(1). व्यक्तिगत प्रतिवेदन (Personal Report) :- इस प्रतिवेदन में व्यक्ति अपने जीवन से संबंधित घटनाओं का वर्णन करता है। कभी-कभी यह प्रतिवेदन "डायरी" का भी रूप ले लेता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह प्रतिवेदन का श्रेष्ठ रूप नहीं है।

उदाहरण के लिए, मैं अपनी "डायरी" का एक पृष्ठ आपके साथ साझा कर रहा हूं जिसे मैंने 01/01/2022 को लिखा था।

      नए साल की शुभकामनाओं💐 के साथ 2022 की भी हम शुरुआत कर रहे है। इस बार नए साल की शुरुआत पटना के भिखना पहाड़ी से किये। भिखना पहाड़ी में रह हम बीपीएससी के द्वारा आयोजित जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी की तैयारी कर रहे हैं। मेरे साथ नालंदा का सागर भी हैं। जो कला एवं शिल्प महाविद्यालय पटना में हमसे 01 साल जूनियर था। हम दोनों एक साथ तैयारी कर रहे हैं।
Don't Be Same be Better.....


     Don't Be Same be Better..... यह पंक्तियां इस डायरी के कवर पर लिखी हुई है और शायद 2022 मेरे लिए Better भी हो क्योंकि पहली बार किसी परीक्षा के लिए हम इतनी तैयारी कर रहे हैं। कि चूंकि इसका पाठ्यक्रम बिल्कुल अलग है और इसमें वही फार्म भरे हैं जो कला क्षेत्र के हैं तो मेरे लिए एक स्वर्णिम अवसर है। 38 सीट में से मुझे एक सीट लेना है इसी प्रतिज्ञा के साथ हम पटना आये भी हैं और अपनी तैयारी भी कर रहे हैं।

(2). संगठनात्मक प्रतिवेदन (Organisational Report) :- संगठनात्मक प्रतिवेदन में किसी सभा, संस्था, इत्यादि का विवरण रहता है। इस तरह के प्रतिवेदन में प्रतिवेदन लिखने वाला अपने बारे में कुछ ना बता कर सारी बातें संस्थाएं/सभा के सम्मान में ही लिखता है।

जैसे :- राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय कोइरी-गाँवा जहां मेरी प्राथमिक  शिक्षा पूरी हुई। उक्त बातें 1998-99 की है। उस समय विद्यालय के पास मात्र एक कमरा एक बरामदा और एक कार्यालय था और शिक्षक के रूप में दो मैडम थी। वन से लेकर पांचवी तक कक्षा का संचालन होता था। उस विद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर कई व्यक्ति कई उच्च जगहो पर पहुंच चुके हैं और कई संघर्षरत हैं जिनमें से एक नाम मेरा भी है।
       2022 कि यदि बात करे तो वहां पर वर्तमान में कक्षा आठवीं तक का संचालन होता है और विद्यालय के पास प्रत्येक कक्षा के लिए अपने अलग-अलग कमरे हैं, रसोईघर है और शिक्षकों की संख्या भी पर्याप्त है। जहां पर छात्र शिक्षा प्राप्त कर अपने भविष्य को उज्जवल कर रहे हैं।

विश्वजीत कुमार 
सहायक प्राध्यापक 
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय

(3). विवरणात्मक प्रतिवेदन (Descriptive Report) :- विवरणात्मक प्रतिवेदन में किसी यात्रा वृतांत, मेले, रैली, इत्यादि का विवरण प्रस्तुत रहता है।विवरणात्मक  प्रतिवेदन में बहुत ही सावधानी से पूरी सत्यता को दर्शाना होता है।


उदाहरण के लिए हम अपनी यात्रा वृतांत यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसे आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके प्राप्त कर सकते हैं।



प्रतिवेदन की विशेषताएं :-

  • प्रतिवेदन में अधिकतर किसी घटना या कार्य की प्रमुख बातें ही लिखी जाती है।
  • प्रतिवेदन की बातें ज्यादा विस्तार में नही बल्कि संक्षेप में निरूपित रहती है।
  • प्रतिवेदन सच्ची बातों का विवरण होता है कि यही वजह हैं कि इसमें कल्पना एवं भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता।
  • प्रतिवेदन में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जिनका एक ही अर्थ हो ताकि पढ़ने वालो को कोई परेशानी न हो।
Reference :-