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रविवार, 14 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत प्रबंधन में संकट (Crisis in Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 



प्रबंधन में संकट 
(Crisis in Management) 


प्रबन्ध में संकट का अर्थ 

(Meaning of Crisis in Management) 


       प्रबन्ध में संकट से अभिप्राय है दो पक्षों के मध्य विचारों में भिन्नता और असामंजस्य की स्थिति, अर्थात् जब परस्पर विरोधी विचारधारा के कारण आपस में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता, तब संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए, उसका समाधान खोजना प्रबन्ध का कार्य होता है, इसी को प्रबन्ध में संकट कहा जाता है। शैक्षिक प्रबन्ध में विभिन्न स्तरों पर कई संकटों का सामना करना पड़ता है, कई प्रकार के संघर्ष का सामना करना पड़ता है और कई प्रकार की समस्याओं से रू-ब -रू होना पड़ता है। प्रबन्ध संकट के समय निर्णय लेने और मानवीय क्रियाओं पर नियन्त्रण करने की विधि है जिससे पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। 


        मार्टन डेउश (Morton Deutch) महोदय का मत है कि- "संकट एक अतुलनीय प्रयास है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक अनोखे लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। इससे जो उपलब्धि होगी वह दूसरों के आधार पर होगी। संकट की स्थिति में विजय वा पराजय कोई भी स्थिति हो सकती है किन्तु प्रयास यही किया जाता है कि पराजय न हो और विजय ही मिले।"

      इस स्थिति में समूहों के मध्य परस्पर प्रतियोगिता हो जाती है। यह प्रतियोगिता संघर्ष को जन्म देती है। इसके फलस्वरूप वैचारिक भिन्नता बढ़ती है और द्वेष भावना प्रारम्भ हो जाती है। इस द्वेष भावना से प्रबन्ध में संकट पैदा होता है। 


(Crisis is the Pursuit of incompatible or at least seemingly incompatible goals, such that gains to one side come out at the expense of the other.) 


     अतः कहा जा सकता है कि शैक्षिक संस्थाओं के अनेक कार्य होते हैं और उन्हें अनेक भूमिकाओं का निर्वहन करना होता है तथा विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों और शैक्षिक कार्यकर्त्ताओं से सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। भूमिका निर्वाह में आवश्यक नहीं है कि हमेशा सामान्य सम्बन्ध बने रहें, इसमें अनेक संघर्षों का सामना भी करना होता है। संघर्ष से सम्बन्ध प्रभावित होते हैं, समन्वय प्रभावित होता है और फिर संस्था के कार्य प्रभावित होते हैं। कार्य प्रभावित और विवेकपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाता है तो प्रबन्ध में संकट पैदा हो जाता है। प्रबन्धन को होने से समस्याएँ पैदा होती हैं। इन समस्याओं के समाधान में यदि प्रधानाध्यापक उचित इस संकट से मुक्ति का मार्ग ढूँढना होता है।


प्रबन्ध में संकट के कारण 

(Causes of Crisis in Management) 


       प्रबन्ध में संकट के कारणों के विषय में कुछ कहना अत्यन्त कठिन है क्योंकि परिस्थितियों में परिवर्तन होता रहता है इसलिए कारण भी बदलते रहते हैं। फिर भी कुछ कारणों के विषय में स्पष्टीकरण निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है - 

(1) नियम विरुद्ध निर्णय लेना - जब प्रधानाचार्य किसी कारणवश नियमों के प्रतिकृत कोई निर्णय ले लेता है तो शिक्षक, छात्र, अभिभावक आदि सम्बन्धित व्यक्ति इसके विरोध में हो जाते हैं। ये उसके विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर देते हैं। इस प्रकार गलत निर्णय लेने से प्रबन्ध में संकट पैदा हो जाता है। 

(2) दलबन्दी - विद्यालय में जब कई समूह अलग-अलग संघों के रूप में स्थापित हो जाते हैं, तो विचारधारा में अन्तर आ जाता है। यह विचारधारा व्यक्तियों को अलग-अलग नेताओं के दलों में बाँट देती है जैसे- छात्र संघ, शिक्षक संघ, अभिभावक संघ, आदि। ये संघ रचनात्मक कम होते हैं, आन्दोलनकारी अधिक होते हैं। ये प्रबन्धन की कमजोरियों का पता लगाकर उसके विरुद्ध दल बना लेते हैं। ये दल प्रबन्ध में संकट पैदा करते हैं। 

(3) उद्देश्य और आवश्यकताओं में भिन्नता - विद्यालय के अन्तर्गत क्रियाशील दलों की आवश्यकताएँ और उनके उद्देश्यों में भिन्नता होती है। इसलिए ये एक - दूसरे के विरुद्ध विरोध की भावना से ग्रसित रहते हैं। फलस्वरूप ये विरोध के लिए भी विरोध करते रहते हैं जबकि आपसी प्रेम और समन्वय को ठुकरा देते हैं। यह उद्देश्य भिन्नता प्रबन्ध में संकट का कारण बन जाती है। 

(4) समन्वय का अभाव तथा परिस्थिति को सही रूप में न समझना - मानव की प्रकृति और प्रवृत्ति यह है कि वह स्वयं जैसा सोचता है वैसा ही वह देखना चाहता है। इसलिए वह परिस्थिति को समझने का प्रयास नहीं करता है। यही कारण है कि आपसी समन्वय नहीं हो पाता है और वह अच्छे कार्यों में एवं रचनात्मक कार्यों में सहयोग नहीं करता है। अतः समन्वय के अभाव के कारण प्रबन्ध में संकट पैदा होता है। 

(5) कर्त्तव्य की अपेक्षा अधिकारों की अधिक माँग करना - शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ी है। इससे बालक को अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों का ज्ञान हुआ है। किन्तु जब यह ज्ञान केवल अधिकारों तक ही सीमित हो जाता है, अधिकार न मिलने पर आन्दोलन किये जाते हैं तब यह आन्दोलन ही प्रबन्ध के सम्मुख संकट पैदा करते हैं। 

(6) उपलब्ध स्रोतों का अभाव और प्रतियोगिता - विद्यालय में उपलब्ध स्रोतों से सबकी पूर्ति नहीं होती है। इसलिए इन्हें प्राप्त करने के लिए प्रतियोगिता प्रारम्भ हो जाती है। और इस प्रतियोगिता के कारण विद्यालय का एक घटक दूसरे घटक के कार्यों पर अधिकार  जमाने का प्रयास करता है। यह प्रयास ही आपसी द्वेष बढ़ाता है और प्रबन्ध के सम्मुख संकट पैदा कर देता है। 

(7) रचनात्मक कार्यों का अभाव अथवा अधिकता - कभी-कभी रचनात्मक कार्यों का अभाव संकट का कारण बनता है तो कभी रचनात्मक कार्यों की अधिकता। विद्यालयक के सभी घटक किसी एक बात से सहमत न होकर अलग-अलग मत रखते हैं और जो कार्य प्रारम्भ किया जाता है उसका विरोध करते हैं। यदि कोई कार्य प्रारम्भ न किया जाये तो दुसरे घटक विरोध करते हैं। इस प्रकार विद्यालय में किसी भी नवीन परिवर्तन का विरोध करते हैं और विद्यालय के घटक दल एक-दूसरे पर अधिकार जमाना चाहते हैं। इस कारण प्रबन्ध में  संकट पैदा हो जाता है। 


       अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि संस्था में प्रबन्ध में संकट के अनेक कारण है। इन्हें किसी सीमा में बाँधना कठिन है क्योंकि कब किसकी भावात्मक स्थिति,  अथवा मानसिक स्थिति समन्वय करने से इंकार कर दे और संकट पैदा कर दे। यह भी कहना है कि आकस्मिक रूप से कब, कौन, कैसी परिस्थिति पैदा कर दे और प्रबन्ध की कमजोरियों पर प्रहार कर संकट उत्पन्न कर दे। 

प्रबन्ध में संकट के प्रकार 

(Types of Crisis in Management) 


        प्रबन्ध में संकट को किसी एक अवस्था (Stage) या स्तर पर बाँधना कठिन है। संकट के अनेक कारण और परिस्थितियाँ हैं। कहीं दबाव (Stress) है तो कहीं तनाव (Tension) है, कहीं शत्रुता (Hostility) है तो कहीं दुष्चिन्ता (Enxiety) अथवा ईर्ष्या (Jealousy) है और ये सब अवस्थाएँ स्वतन्त्र नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे से अन्तः सम्बन्धित है। अतः प्रबन्ध में संकट के विविध प्रकारों के रूप में इन अवस्थाओं (Stages) को निम्नलिखित रूप में व्यक्त  किया जा सकता है - 

(1) आन्तरिक संकट (Latent Crisis) - यह संकट संस्था के अन्दर गुप्त रूप से पनपता है। 

(2) अभिव्यक्ति संकट (Manifest Crisis) - यह संकट व्यक्त रूप में अर्थात् प्रकट रूप में सामने होता है। इसकी अभिव्यक्ति स्पष्ट कर दी जाती है। 

(3) अनुभव (प्रत्यक्षीकरण) संकट (Perceived Crisis) - जब संकट का अनुभव कर लिया जाता है, फिर उसका समाधान खोजा जाता है, वह अनुभव संकट कहलाता है। इसमें संकट का प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। 

(4) अनुभूति संकट (Felt Crisis) - जब संकट की अनुभूति हो जाती है अर्थात् उसे महसूस कर लिया जाता है, तब उसका समाधान खोजा जाता है। 

(5) पारस्परिक संकट या अन्तः वैयक्तिक संकट (Inter - personal) - यह संकट व्यक्तियों में आपस में द्वेष, प्रतिस्पर्द्धा, ईर्ष्या आदि के कारण पनपता है। 

(6) संगठन के अन्तर्गत संकट (Intra - organization Crisis) - यह संकट संगठन के अन्तर्गत होता है जो व्यवस्था से सम्बन्धित होता है। 

(7) विद्यालय समुदाय का संकट (School - Community Crisis) - यह संकट विद्यालय और समुदाय के सम्बन्धों से सम्बन्धित होता है। समुदाय विद्यालय से और विद्यालय समुदाय से अपेक्षा रखता है। इनकी पूर्ति में कमी के कारण संकट पैदा होता है। 

(8) व्यक्तिगत-संस्थागत संकट (Individual - Institutional Crisis) - यह संकट व्यक्ति और संस्था के सम्बन्धों में कटूता के कारण उत्पन्न होता है। व्यक्ति की अपनी अपेक्षाएं होती हैं और संस्था के अपने नियम व शर्त होती हैं। अतः अपेक्षापूर्ति में कमी संकट को जन्म देती है। 

(9) सांस्कृतिक संकट (Cultural Crisis) - मार्च एवं साइमन (March and Simon) महोदय ने इस संकट को स्वीकार करते हुए कहा है- "जब निर्णय की प्रक्रिया का स्तर गिर जाता है तब परिस्थितियों में गलत ढंग से विद्यालयों में कार्य करने की प्रवृत्ति होने लगती है। इसके कारण विद्यालय में संकट उत्पन्न होते हैं।" निर्णय प्रक्रिया का स्तर गिरना सांस्कृतिक मूल्यों पर निर्भर करता है। सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट से शिक्षक और छात्रों की रचनात्मक प्रवृत्ति में कमी अर्थात् उनमें सकारात्मक सोच का अभाव और नकारात्मक सोच की अधिकता हो जाती है। इसलिए वे द्वेष, ईर्ष्या, हानि की प्रवृत्ति के कारण संकट पैदा कर देते हैं। सकारात्मक सोच के अभाव में शैक्षिक क्षेत्र में अनेक जटिल समस्याएँ पनप रही हैं और ये नये संकट पैदा कर रही है। 


        अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि प्रबन्ध में संकट विविध प्रकार से उपस्थित हो जाता है। यह संकट चाहे आन्तरिक है या अन्य किसी प्रकार से, सम्पूर्ण व्यवस्था को अव्यवस्थित कर देता है। इसे सांस्कृतिक मूल्यों को उच्चतर बनाकर और सकारात्मक सोच से सुगमता से दूर किया जा सकता है। 


प्रबन्ध में संकट को करने की विधियाँ 

(Methods to Remove Crisis in Management) 


          प्रबन्ध में संकट को दूर करने हेतु विद्वानों ने अनेक विधियाँ और प्रतिमान विकसित किये हैं। इनमें से कुछ निम्नलिखित रूप में व्यक्त किये जा सकते हैं 

(1) सौदाकारी अथवा समझौता विधि (Bargaining Method) - यह विधि मूलतः समझौते पर आधारित है। इसमें संकट समाधान के लिए मोल - भाव किया जाता है और कुछ आदान-प्रदान के आधार पर संकट को दूर किया जाता है। इसके अतिरिक्त विद्यालय के सभी संसाधनों, स्रोतों और सुविधाओं को केन्द्रीकृत कर दिया जाता है। इसमें सभी पक्ष इनका उपयोग करते हैं और इनका उपयोग करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि संस्था को कोई हानि न हो। इस विधि में समस्या समाधान के लिए सभी पक्ष अपनी आवश्यकताओं को कम करके भी समझौता कर सकते हैं। अतः इस विधि में दो पक्षों के मध्य सौदा करके अथवा समझौता करके संकट का समाधान खोजा जाता है। 

(2) अधिकारी तन्त्र (नौकरशाही) विधि (Bureaucratic Method) - यह विधि मुख्यतः अधिकारी वर्ग और कर्मचारी वर्ग के सम्बन्धों में होने वाले वैचारिक मतभेद से सम्बन्धित है। उच्च अधिकारी जब अपने अधीनस्थ कर्मचारी को अधिक नियन्त्रित करने का प्रयास करता है तब यह स्थिति अधीनस्थ को सहन नहीं होती है तो संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। इसके अतिरिक्त जब उच्च अधिकारी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करने लगता है, तब स्थिति असन्तुलित हो जाती है और संकट की स्थिति पैदा हो जाती है। अतः इसका समाधान तभी सम्भव है जब उच्च अधिकारी निष्पक्ष रूप में हस्तक्षेप करे और अत्यधिक कठोर साधना का प्रयोग न करें। समस्या की जटिलता बढ़ने से पूर्व ही अधिकारी को लिखित आदेशों को आधार मानकर व्यक्तिगत रूप से समस्या का समाधान करना चाहिए। 

(3) प्रणाली विश्लेषण विधि (System Analysis Method) - इस विधि के अन्तर्गत पहल संकट की स्थिति का पता लगाया जाता है, संकट के करण खोज जाते हैं और उसकी प्रकृति तथा आकस्मिक दशाओं का विश्लेषण किया जाता है और यह प्रयत्न किया जाता है। कि प्रधानाचार्य, शिक्षक और छात्रों में मधुर सम्बन्ध बने रहें और प्रत्येक प्रकार के संकट को दूर करने के प्रयास किया जाए। ये संकट चाहे समान्तर स्थिति के हो अथवा लम्बवत् स्थिति के इन्हें दूर करने के लिए एक क्रम बनाया जाता है ताकि कार्य संचालन निर्बाध गति से एक प्रवाह के रूप में होता रहे। अतः इस संकट को दूर करने हेतु एक प्रणाली के रूप में सेवा सुविधाओं की उपलब्धता, नियमों में एकरूपता और सामूहिक कार्यों का वितरण अत्यन्त सावधानीपूर्वक किया जाना आवश्यक है।  

(4) कैनीथ थामस विधि (Kenneth Thomas Method) - इस विधि का प्रतिपादन कैनीथ थामस महोदय ने किया। यह एक व्यावहारिक विधि है। इसमें प्रशासक उस संकट का भागीदार होता है तब वह इस विधि का उपयोग प्रत्यक्ष रूप में कर सकता है। प्रबन्ध में संकट को दूर करने के लिए व्यक्ति स्वेच्छा से तैयार होता है, सकारात्मक अभिवृत्तियों का विकास और परस्पर सहयोग की भावना विकसित की जाती है। इस प्रकार इसमें दो समूह बन जाते हैं। एक समूह वह जो स्वयं की आवश्यकताओं से पूर्ण है और दूसरा वह समूह जो अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर सकता है। इस संकट को दूर करने के पाँच आधार थामस महोदय ने बताए हैं, ये पाँच आधार इस प्रकार हैं -

(1) ध्यान न देना (Neglect or Avoid) - इस संकट को दूर करने के लिए उच्च अधिकारी को छोटी - छोटी बातों पर ध्यान न देना अर्थात् किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न करना। 

(2) समायोजित करना अथवा उन्हें प्रसन्न करना (Accommodate and Appeasement) - इस विधि का आधार स्वेच्छा है अर्थात् इस आधार पर व्यक्ति स्वेच्छा से के साथ कितना समायोजन कर सकता है अथवा उसे कितना प्रसन्न कर सकता है। अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए, भविष्य के लिए हितकारी मानते हुए और संकट को अधिक लम्बे समय तक उपयोगी न मानते हुए कुछ आदान - प्रदान करके भी संकट को दूर किया जा सकता है और स्वयं को समायोजित किया जा सकता है। 

(3) प्रतियोगिता एवं प्रभुत्व (Competition Domination) - यह एक ऐसी स्थिति है जब व्यक्ति अपनी मांग पूर्ण करने पर अड़ जाता है, किसी प्रकार का कोई सहयोग करने को तैयार नहीं होता है और किसी प्रकार भी सन्तुष्ट नहीं होता है। ऐसी स्थिति में प्रबन्धक प्रतियोगिता की भावना का विकास कर सकता है। प्रतियोगिता से उनमें हार - जीत की भावना का विकास होगा और आवश्यकतानुसार नियम व कानूनों का सहारा भी लिया जा सकता है। इस प्रकार प्रतियोगिता और प्रभुत्व दोनों तरीकों से संकट को दूर करने का प्रयास किया जा सकता है। 

(4) समन्वय अथवा एकीकरण (Collaboration or Integration) - इस स्थिति में प्रत्येक संकट का समाधान चाहता है। सभी सदस्य मिल-जुलकर कार्य करना चाहते हैं। और सभी का लक्ष्य जीतना होता है। यह स्थिति समन्वय की स्थिति होती है। अतः सभी समन्वित रूप में कार्य करके संकट का समाधान करते हैं। वास्तव में इसमें आपसी समझ बूझ से संकट को दूर किया जाता है। 

(5) भागीदारी अथवा समझौता (Sharing or Compromise) - इस स्थिति में भी दोनों पक्ष लाभ की स्थिति में होने से सहयोगी भावना रखते हैं और वे इसलिए प्रसन्न होते हैं यदि किसी को कुछ खोना पड़े तो वह और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा। इसमें भी मोल-भाव अथवा समझौते की स्थिति होती है।


     अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि प्रबन्ध में संकट के विविध कारण हैं और उसके समाधान की विविध विधियाँ हैं। थोड़ी सी सावधानी से, सकारात्मक सोच से विविध उपायों को ध्यान में रखकर संकट को दूर किया जा सकता है और संस्था को निर्बाध गति से प्रवाहशील बनाया जा सकता है।


Reference :-


शैक्षिक प्रशासन एवं प्रबंध (Educational Administration & Management) 

लेखक - डॉक्टर गजेंद्र सिंह तोमर

अध्याय - 18  प्रबंधन में संकट 

(Crisis in Management) 

पृष्ठ संख्या - 233-238.

R. Lall Book Depot.

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शनिवार, 13 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत वित्तीय प्रबंधन (Financial Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.


 वित्तीय प्रबंधन 
(Financial Management)

    वित्तीय प्रबंधन, इसे अंग्रेजी में Financial Management कहते हैं। इसका अर्थ धन/फंड के उचित प्रबंधन से हैं ताकि किसी भी संगठन/संस्था के लक्ष्य की प्राप्ति की जा सके। वित्त प्रबंधन का कार्य किसी भी संस्था के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक होता है।


         वित्त किसी भी कार्य/व्यवसाय के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि शरीर में रक्त। इसलिए वित्त जैसे अमूल्य तत्वों का प्रबंधन ही वित्तीय प्रबंधन कहलाता है। आइये इसे हम एक उदाहरण के द्वारा भी समझने का प्रयास करते हैं -


        मान लीजिए आप एक संस्था की शुरुआत करने की सोच रहे हैं तो सबसे पहले, पहला प्रश्न आपके मस्तिष्क में यह आएगा कि इस संस्था की शुरुआत के लिए कितने धन की आवश्यकता होगी ? वह धन कहां से प्राप्त होगा ? इस धन का उपयोग संस्था में किस प्रकार किया जाएगा ? इत्यादि। वित्तीय प्रबंधन में ऐसे ही प्रश्नों के संभावित उत्तर तैयार किए जाते हैं और उन्हें अमल में लाया जाता है।


     वित्तीय प्रबंधन के बारे में वित्त विशेषज्ञों द्वारा दी गई परिभाषाएं -

  • वित्तीय प्रबंधन से आशय नियोजन एवं नियंत्रण (Planing and Control) के कार्यों को वित्त के कार्यों पर लागू करना होता है। 


हावर्ड एवं उपटन 

(Howard and Upton) 


  • वित्तीय प्रबंधन एक व्यवसाय की वह संचालनात्मक  प्रक्रिया (Operational Process) है जो कुशल प्रचालनो (Efficient Operations) के लिए आवश्यक वित्त को प्राप्त करने तथा इसका उसका प्रभावशाली ढंग से उपयोग करने हेतु उत्तरदाई होता है। 


बियरमैन एवं स्मिथ 

(Bearman and Smith)


  • वित्तीय प्रबंध व्यवसाय की वह संचालनात्मक प्रक्रिया (Operational Process)  है जो व्यक्तिगत उद्देश्यों और उपक्रम के उद्देश्यों में समन्वय स्थापित करती है। 

वेस्टर्न एवं ब्राइघम 

  • वित्तीय प्रबंधन व्यवसाय का वह क्षेत्र है जिसका संबंध पूंजी के विवेकपूर्ण उपयोग एवं इसके सतर्कता पूर्ण चयन से है ताकि व्यय करने वाली इकाई अपने उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ सके।

जे. एफ. ब्रेडले

       उपरोक्त परिभाषाओ के आधार पर हम कह सकते हैं कि वित्तीय प्रबंधन के अंतर्गत कोषो को एकत्रित करने के साथ-साथ नियोजन, निर्णयन, संचालन, पूंजी के स्रोतों का निर्धारण से संबंधित होता है।


वित्तीय प्रबंधन के उद्देश्य


 वित्तीय प्रबंधन के उद्देश्य निम्न होते हैं -


  • संगठन/संस्था के लिए धन की पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना। 
  • वास्तविक और सुरक्षित निवेश के अवसर तैयार करना। 
  • निधियों का इष्टतम और कुशल उपयोग। (Optimum and efficient use of funds) 
  • यह सुनिश्चित करना कि उनके शेयरधारकों को उनके निवेश पर अच्छा रिटर्न मिले। 


वित्तीय प्रबंधन की विशेषताएं

(Features of Financial Management)


       वित्तीय प्रबंधन की निम्नलिखित विशेषताएं होती है -

  • आवश्यकता का अनुमान (Estimate of Need) - वित्तीय प्रबंधन के द्वारा संस्था की वित्त संबंधी आवश्यकताओं का अनुमान लगाना आसान हो जाता है। 
  • वित्तीय स्रोतों का निर्धारण (Building Capital Structure) - संस्था/व्यवसाय की पूंजी संरचना, अल्पकालीन, दीर्घकालीन, स्थायी एवं कार्यशील पूंजी (Short Term, Long Term, Fixed and Working Capital) से निर्मित होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि वित्तीय प्रबंधन पूंजी संरचना का निर्माण करता है। 
  • अर्जित आय का प्रबंध (Management of earned Income) - वित्तीय प्रबंध संस्था के कार्यों द्वारा कैसे लाभ प्राप्त किया जा सके प्राप्त आय को किस प्रकार प्रयोग एवं प्रबंध किया जाए इसका भी निर्धारण करता है। 
  • प्रबंधकों हेतु सहायक (Assistant to Manager) - वित्तीय प्रबंधन एक ऐसा प्रबंध है जो संस्था/व्यवसाय की सफलता का कारक होता है यही संस्था/व्यवसाय को स्थाई एवं स्वयं निर्णय लेने में सहायक होता है। 


वित्तीय प्रबंधन इतना महत्वपूर्ण क्यों है ?

Why is financial management so important ?


       वित्तीय प्रबंधन, प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण अंग होता है इसी के द्वारा ही पूरी संस्था की दिशा तय होती है इसी वजह से इसकी महत्ता ज्यादा मानी जाती है। कुछ बिंदुओं के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करते हैं -


  • वित्तीय प्रबंधन, वित्तीय योजना और धन के अधिग्रहण में संस्था की सहायता करता है। 
  • संस्था को प्राप्त या अर्जित धन का प्रभावी ढंग से उपयोग और आवंटन करने में सहायता करता है। 
  • महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय लेने में संस्था की मदद करता है। 
  • वित्तीय प्रबंधन संस्था की आर्थिक स्थिरता को प्रदान करता है।


Reference


https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A4%A8


https://www.kailasheducation.com/2020/08/vittiy-prabandh-arth-paribhasha-visheshtaye.html


https://www.pfh-university.com/blog/financial-management-what-is-it-and-why-is-it-important.html


रविवार, 7 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत नवाचार (Innovation) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 




नवाचार (Innovation) 

        नवाचार को अंग्रेजी में Innovation कहते हैं। नवाचार शब्द दो शब्दों के मेल से बना है नव + आचार जिसमें नव का अर्थ होता है नया (New) और आचार का अर्थ हुआ आचरण या परिवर्तन (Conduct or Change). नवाचार किसी उत्पाद, सेवा, प्रक्रिया में परिवर्तन लाने से है नवाचार के अंतर्गत कुछ नया और उपयोगी तरीका अपनाया जाता है। 

जैसे :- नई विधि, नई तकनीक, नया कार्य, नई सेवा, नया उत्पाद, इत्यादि। नवाचार को अर्थतंत्र (Economy) का सारथी भी माना गया है।

        नवाचार वह परिवर्तन है जो पूर्व में स्थित विधियों और पदार्थों में नयापन लाने का प्रयास करता है। नवाचार को विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया है।

  • नवाचार वह विचार (Idea) है जिसका प्रयोग व्यक्ति अपने नवीन कार्यों के रूप में करें।    -रोजर्स
  • नवाचार एक विचार है, व्यवहार है अथवा एक पदार्थ है जो नवीन (New) है और वर्तमान स्वरूप से भिन्न है।    -वारनेट
  • नवाचार आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में एक मूल्य (Value) जोड़ने वाले नवीनता का उत्पादन है। यह एक प्रक्रिया भी है और परिणाम भी।       -क्रोसन एवं अपयदिन
  • नवाचार एक समझ बूझ कर किया जाने वाला नवीन और विशिष्ट परिवर्तन है जिसे किसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तैयार किया जाता है।       -माइल्स

नवाचार की शुरुआत 
(Started of innovation)

      1971 ई० में यूनेस्को सम्मेलन के दौरान नवाचार शब्द को परिभाषित किया गया और यह बताया गया कि नवाचार को स्वीकृति तभी मिल सकती है जब वह इन छह (06) चरणों से होकर गुजरे जो कि निम्न है -
  1. खोज (Search) 
  2. परीक्षण (Test) 
  3. मूल्यांकन (Evaluation) 
  4. विकास (Development) 
  5. विस्तार (Spread)
  6. स्वीकृति (Acceptance)
       नवाचार की शुरुआत किसी खोज के द्वारा होती है फिर इस खोज पर एक परीक्षण किया जाता है परीक्षण करने के उपरांत इसका मूल्यांकन कर उचित दिशा में विकास किया जाता है। विकास के उपरांत विस्तार कर समाज में व्यक्तियों के द्वारा इस नवाचार को कितनी स्वीकृति मिल रही है इसको निरीक्षण के उपरांत नवाचार की संज्ञा उसे प्रदान की जाती है।

नवाचार की विशेषता 
(Characteristic of innovation)

     नवाचार की निम्नलिखित विशेषताएं होती है जो कि निम्न है - 
  • नवाचार को सामान्यत: नए विचारों के निर्माण की संज्ञा दी जाती है। 
  • नवाचार की उत्पत्ति का कारण आवश्यकताएं और परिस्थितियां होती है।
  • इसका जन्म क्रिया के दौरान या दार्शनिक विचारों की गहनता से होता है। 
  • यह वर्तमान में उत्पन्न समस्याओं में सुधार लाने का नूतन प्रयास होता है। 
  • इसमें विशेष गुण वाले तत्व विद्यमान रहते हैं जो परंपरागत परिस्थितियों से भिन्न होते हैं।

निष्कर्ष 
(Conclusion) 

नवाचार नवीन विचारों एवं क्रियाओं को जन्म देने वाला एक साधन है इस को अपनाने हेतु व्यक्तिगत व्यवहार में लचीलापन होना आवश्यक होता है।

Reference :-



शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत कार्यक्रम प्रबंधन (Program Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.




 
कार्यक्रम प्रबंधन  
(Program Management) 

कार्यक्रम की परिकल्पना, कार्यान्वन एवं समीक्षा 
(Program Design, Implementation and Review)

        कार्यक्रम को अंग्रेजी में Program कहते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ होता है - क्रमिक रूप से किया जाने वाला कार्य। 
        समूह कार्य के रूप में कार्यक्रम को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में जाना जाता है। इसके माध्यम से समूह  गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। वास्तव में कार्यक्रम स्वयं एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य समूह की क्रियाओं और गतिविधियों को इस प्रकार नियोजित करके संपन्न करना होता है कि जिससे समाज के सभी वर्गों को लाभ हो।

       कार्यक्रम को परिभाषित करते हुए विद्वानों ने निम्न परिभाषाएं दी है - 
  • कार्यक्रम के अंतर्गत वह सभी कार्य आता है जिसे समाज के सदस्यों द्वारा संपन्न किया जाता है। जैसे - शिल्प, अभिनय, नाटक, खेल-कूद, इत्यादि।     
-क्लीन
  • कार्यक्रम शब्द उन क्रियाओं में प्रयोग किया जाता है जो वार्तालाप के स्थान पर करने को अधिक महत्व देते हैं।           
-मिडलमैन

         इन परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि कार्यक्रम एक समूह द्वारा की जाने वाली वे गतिविधियां होती है जो समूह की व्यक्तिगत अभिरुचियों एवं क्षमताओ पर आधारित तथा निर्धारित होती है। इसके द्वारा समूह में समूह की भावना का विकास होता है और समूह अपनी समस्याओं का समाधान खोजता है। कार्यक्रम के माध्यम से समाज के सदस्यों में समूह भावना (Group spirit) के विकास पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में कार्यकर्ता का यह दायित्व होता है कि वह समूह के सदस्यों की रुचियों एवं क्षमताओं के अनुसार कार्यक्रमों का निर्माण करें एवं सदस्यों को विभिन्न भूमिकाओं के निर्वहन का अवसर प्रदान करें।

कार्यक्रम प्रबंधन
(Program Managment)

     कार्यक्रम प्रबंधन एक या एक से अधिक कार्यक्रमों का संगठन एवं प्रशासन (Organization and Administration) है। इसमें विशेष रूप से जिन बातों पर ध्यान दिया जाता वह है - बजट, संचालन और समीक्षा (Budgeting, Operations and Reviews) इन तीनों के अलावा भी अच्छे संचार एवं विस्तार (Good communication and extension) पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

     कार्यक्रम प्रबंधन और परियोजना प्रबंधन दोनों अक्सर एक समान ही होते हैं जबकि इनके कई कार्य भी एक समान होते हैं/प्रतीत होते हैं। यदि इन दोनों में अंतर की बात की जाए तो सबसे प्रमुख अंतर जो मुझे ज्ञात हो रहा है वह यह है कि कार्यक्रम प्रबंधन एक स्थाई चर है जो कई वर्षों तक चलता रहता है इसके विपरीत परियोजना प्रबंधन एक अस्थाई चर है जो कि परियोजना के समाप्ति के साथ ही वह समाप्त हो जाता है।

कार्यक्रम की परिकल्पना 
(Program Design)

      किसी कार्यक्रम/घटना की व्याख्या करने वाला कोई सुझाव या अलग-अलग प्रतीत होने वाली बहुत सी घटनाओं के आपसी संबंध की व्याख्या करने वाला कोई तर्कपूर्ण सुझाव परिकल्पना कहलाता है। इसे शोध के परिदृश्य में Hypothesis कहते हैं।

       सामान्य रूप से परिकल्पना को हम इस रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं जैसे :- परिकल्पना का अर्थ किसी अस्थाई विचार (Provisional Idea) से होता है जिसे अंतिम रूप में व्यक्त करना अभी बाकी होता है।

कार्यान्वयन 
(Implementation)

    कार्यान्वयन का अर्थ होता है किसी चीज को लागू करना या फिर अमल में लाना। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि कार्यान्वयन किसी योजना, विधि या किसी डिजाइन विचार मॉडल भी निर्देश मानक या किसी डिजाइन, विचार, मॉडल, विनिर्देश (Specification), मानक (standard) या कुछ करने की नीति का निष्पादन या अभ्यास है।

      एक कार्यान्वयन योजना एक तरह से परियोजना प्रबंधन है जो किसी लक्ष्य और उद्देश्य को प्राप्त करने के सीढ़ियों की रूपरेखा तैयार करता है। अपने लक्ष्य के आधार पर कार्यान्वयन की योजनाएं भिन्न हो सकती है लेकिन उनमें निम्नलिखित तत्व शामिल रहते हैं -

  • समय रेखा (Time Line) :- कोई भी कार्य को संपन्न करने की एक निश्चित समय सीमा होती हैं। अतः हमें उस कार्य को उसी समय-सीमा में ही संपन्न करना चाहिए।
  • संसाधन योजना (Resource Planning) :- इसमें कार्यान्वयन को पूरा करने के लिए संसाधनों की चर्चा रहती है। 
  • लक्ष्य (Aim) :- यह एक अंतिम परिणाम होता है जिसे एक कार्यान्वयन के द्वारा पूरा करना होता है।
  • उद्देश्य (Objective)  :- लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उद्देश्य का पालन करना चाहिए। 
  • भूमिकाएं और जिम्मेदारियां (Roles & Responsibilities) :- कार्यान्वयन के कार्य में सभी कर्मचारियों को अपनी भूमिका और जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए।

समीक्षा (Review) 

      कार्यक्रम की समीक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो शैक्षणिक कार्यक्रमों की स्थिति प्रभावशीलता और प्रगति का मूल्यांकन करती है और उन कार्यक्रमों के भविष्य के विशाल जरूरतों और परंपराओं की पहचान करने में मदद करती है।


Reference :-

https://www.samajkaryshiksha.com/2022/04/meaning-and-process-of-program.html


https://www.netinbag.com/hi/business/what-is-program-management.html


https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE


https://www.techtarget.com/searchcustomerexperience/definition/implementation


https://www.techtarget.com/searchcustomerexperience/definition/implementation


https://www.provost.iastate.edu/academic-programs/accreditation/academic-program-review--purpose-and-process


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत परियोजना एवं प्रतिवेदन (Project and Report) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 परियोजना एवं प्रतिवेदन 

(Project and Report)





      परियोजना एवं प्रतिवेदन (प्रोजेक्ट एवं रिपोर्ट) जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह दोनों अलग-अलग विषय वस्तु है तो चलिए इस लेख में हम दोनों को अलग-अलग समझने का प्रयास करते हैं। सबसे पहले हम जानेंगे परियोजना यानी की प्रोजेक्ट और उसके उपरांत प्रतिवेदन यानी की रिपोर्ट के बारे में ......

परियोजना (Project)

         परियोजना जिसे हम "कार्ययोजना" भी कह सकते हैं यह किसी समस्या के समाधान या किसी विषय वस्तु से संबंधित जानकारियों को प्रकाशित करने के लिए तैयार की गई एक पूर्ण योजना (Planing) होती है। 

इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि,

      किसी भी क्षेत्र जैसे- चिकित्सा, विज्ञान, व्यापार, इत्यादि में किसी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति हेतु जो विशेष योजना बनाई जाती है एवं उसे क्रियान्वित (पूरा) भी किया जाता है उसे प्रोजेक्ट (परियोजना) कहते हैं।

or

       परियोजना वैज्ञानिक आधार पर विकसित की गई एक कार्य योजना हैं जिसे निश्चित अवधि में विशेष उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तैयार किया जाता है।

        परियोजना के प्रारूप में कार्य की शुरुआत कैसे होगी ? कब, कौन सा कार्य संपादित होगा ? कार्य की समाप्ति कब होगी ? कितने संसाधन लगेंगे ? कितने धन की आवश्यकता होगी ? इत्यादि बातों को भी क्रमबद्ध लिखा रहता है।

      वर्तमान परिदृश्य में समस्याएं हमारे सम्मुख विकराल रूप में आ खड़ी हुई है। जैसे - नौकरी की समस्या, बिजली की समस्या, अनेकों प्रकार के जीवाणु एवं विषाणु से उत्पन्न होने वाले बीमारियों की समस्या, इत्यादी। हमारे आस-पास बहुत सी ऐसी समस्याएं मौजूद रहती है जिन्हें देखकर कि हमें लगता है कि इसका समाधान होना चाहिए यदि हम उस समस्या के तह तक जाकर उसके सभी पहलुओं को जानने के उपरांत उसके निदान के लिए जो संभावित योजना बनाते हैं उसे ही परियोजना कहा जाता है। जैसे:- इसरो की चंद्रयान परियोजना, मंगलयान परियोजना, इत्यादि। 

परियोजना की विशेषताएं 

एक अच्छी परियोजना की निम्नलिखित विशेषताएं होती है :- 
उद्देश्य :- प्रत्येक परियोजना को तैयार करने के पीछे कुछ न कुछ उद्देश्य छिपा हुआ होता है जैसे ही उस उद्देश्य की प्राप्ति हो जाती है वैसे ही परियोजना का समापन हो जाता है। 

अद्वितीय :- प्रत्येक परियोजना अपने आप में अद्वितीय यानी कि यूनिक होता है कभी भी दो परियोजनाएं बिल्कुल एक जैसी नहीं हो सकती। हां उसमें थोड़ी बहुत समानताएं हो सकती है। 
अनिश्चितता (Uncertainty) :- भविष्य किसी ने नहीं देखा और यह भी नहीं जानता की कल क्या होगा ? ठीक उसी परियोजना जब तक समाप्त हो जाए तब तक उसमें अनिश्चितता बनी रहती है 
जोखिम (Risk) :- परियोजना चाहे छोटी हो या बड़ी जोखिम (Risk) हमेशा बना रहता है छोटी परियोजनाओं में कम जोखिम जबकि बड़ी परियोजनाओं में अधिकतम जोखिम रहता है।

प्रतिवेदन (Report)

      किसी परियोजना, घटना, प्रकरण (Episode) इत्यादि के बारे में स्पष्ट देखकर, छानबीन करके, शोध के द्वारा जो लिखित रूप में परिपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया जाता है उसे ही प्रतिवेदन कहते हैं।

     प्रतिवेदन दो शब्दों (प्रति + विद) से बना है जिसका अर्थ होता है - समस्त यानी पूरी जानकारी। प्रतिवेदन में पूरी जानकारी तो दी ही जाती है साथ ही साथ कुछ सुझाव एवं संतोषजनक जवाब भी दिया जाता है।

उदाहरण स्वरूप हम कह सकते हैं कि,

      देश या विदेश में घटित कोई भी घटनाक्रम का निरीक्षण, शोध करके तैयार की गई समस्त विवरण हमारे लिए प्रतिवेदन है।

प्रतिवेदन लिखते समय ध्यान देने योग्य कुछ महत्वपूर्ण बिंदु -
  • प्रतिवेदन हमेशा संक्षिप्त होना चाहिए।
  • प्रतिवेदन का शीर्षक एवं उपशीर्षक ऐसा होना चाहिए कि पूरे मुख्य विषय को रेखांकित करता हो। 
  • जिस किसी भी घटना का हम प्रतिवेदन तैयार कर रहे हैं उसकी तिथि एवं समय उसमें अंकित होना चाहिए। 
  • प्रतिवेदन में हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि केवल महत्वपूर्ण तथ्य ही इस में सम्मिलित हो 
  • प्रतिवेदन में निर्णय की जानकारी होनी चाहिए 

प्रतिवेदन के प्रकार 

      प्रतिवेदन के तीन प्रकार होते हैं या यूं कह सकते हैं कि प्रतिवेदन तीन तरह के लिखे जाते हैं - 

  1. व्यक्तिगत प्रतिवेदन (Personal Report)
  2. संगठनात्मक प्रतिवेदन (Organisational Report)
  3. विवरणात्मक प्रतिवेदन (Descriptive Report)

 
(1). व्यक्तिगत प्रतिवेदन (Personal Report) :- इस प्रतिवेदन में व्यक्ति अपने जीवन से संबंधित घटनाओं का वर्णन करता है। कभी-कभी यह प्रतिवेदन "डायरी" का भी रूप ले लेता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह प्रतिवेदन का श्रेष्ठ रूप नहीं है।

उदाहरण के लिए, मैं अपनी "डायरी" का एक पृष्ठ आपके साथ साझा कर रहा हूं जिसे मैंने 01/01/2022 को लिखा था।

      नए साल की शुभकामनाओं💐 के साथ 2022 की भी हम शुरुआत कर रहे है। इस बार नए साल की शुरुआत पटना के भिखना पहाड़ी से किये। भिखना पहाड़ी में रह हम बीपीएससी के द्वारा आयोजित जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी की तैयारी कर रहे हैं। मेरे साथ नालंदा का सागर भी हैं। जो कला एवं शिल्प महाविद्यालय पटना में हमसे 01 साल जूनियर था। हम दोनों एक साथ तैयारी कर रहे हैं।
Don't Be Same be Better.....


     Don't Be Same be Better..... यह पंक्तियां इस डायरी के कवर पर लिखी हुई है और शायद 2022 मेरे लिए Better भी हो क्योंकि पहली बार किसी परीक्षा के लिए हम इतनी तैयारी कर रहे हैं। कि चूंकि इसका पाठ्यक्रम बिल्कुल अलग है और इसमें वही फार्म भरे हैं जो कला क्षेत्र के हैं तो मेरे लिए एक स्वर्णिम अवसर है। 38 सीट में से मुझे एक सीट लेना है इसी प्रतिज्ञा के साथ हम पटना आये भी हैं और अपनी तैयारी भी कर रहे हैं।

(2). संगठनात्मक प्रतिवेदन (Organisational Report) :- संगठनात्मक प्रतिवेदन में किसी सभा, संस्था, इत्यादि का विवरण रहता है। इस तरह के प्रतिवेदन में प्रतिवेदन लिखने वाला अपने बारे में कुछ ना बता कर सारी बातें संस्थाएं/सभा के सम्मान में ही लिखता है।

जैसे :- राजकीय प्राथमिक कन्या विद्यालय कोइरी-गाँवा जहां मेरी प्राथमिक  शिक्षा पूरी हुई। उक्त बातें 1998-99 की है। उस समय विद्यालय के पास मात्र एक कमरा एक बरामदा और एक कार्यालय था और शिक्षक के रूप में दो मैडम थी। वन से लेकर पांचवी तक कक्षा का संचालन होता था। उस विद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर कई व्यक्ति कई उच्च जगहो पर पहुंच चुके हैं और कई संघर्षरत हैं जिनमें से एक नाम मेरा भी है।
       2022 कि यदि बात करे तो वहां पर वर्तमान में कक्षा आठवीं तक का संचालन होता है और विद्यालय के पास प्रत्येक कक्षा के लिए अपने अलग-अलग कमरे हैं, रसोईघर है और शिक्षकों की संख्या भी पर्याप्त है। जहां पर छात्र शिक्षा प्राप्त कर अपने भविष्य को उज्जवल कर रहे हैं।

विश्वजीत कुमार 
सहायक प्राध्यापक 
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय

(3). विवरणात्मक प्रतिवेदन (Descriptive Report) :- विवरणात्मक प्रतिवेदन में किसी यात्रा वृतांत, मेले, रैली, इत्यादि का विवरण प्रस्तुत रहता है।विवरणात्मक  प्रतिवेदन में बहुत ही सावधानी से पूरी सत्यता को दर्शाना होता है।


उदाहरण के लिए हम अपनी यात्रा वृतांत यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसे आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके प्राप्त कर सकते हैं।



प्रतिवेदन की विशेषताएं :-

  • प्रतिवेदन में अधिकतर किसी घटना या कार्य की प्रमुख बातें ही लिखी जाती है।
  • प्रतिवेदन की बातें ज्यादा विस्तार में नही बल्कि संक्षेप में निरूपित रहती है।
  • प्रतिवेदन सच्ची बातों का विवरण होता है कि यही वजह हैं कि इसमें कल्पना एवं भावना के लिए कोई स्थान नहीं होता।
  • प्रतिवेदन में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं जिनका एक ही अर्थ हो ताकि पढ़ने वालो को कोई परेशानी न हो।
Reference :-




कला प्रबंधन (Art Management) पेपर - 05 के अंतर्गत कार्यालय प्रबंधन (Office Management) का जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के मुख्य परीक्षा का नोट्स। Notes of Main Examination of District Art and Culture Officer.

 कार्यालय प्रबंधन
(Office Management) 


        कार्यालय (Office) किसी भी संस्था का अभिन्न अंग होता है। इसके बिना हम, एक संस्था की कल्पना नहीं कर सकते है। कार्यालय प्रबंधन में संस्थान के द्वारा किये गए/किये जाने वाले व्यवहारिक कार्य को कागजी रूप प्रदान किया जाता है। कोई भी संस्था/संगठन कार्यालय प्रबंधन के ज्ञान के बिना उन्नति नहीं कर सकता। कार्यालय प्रबंधन में आई एक भी गलती सारे कार्य को बिगाड़ सकती है इसलिए इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

      दूसरे शब्दों में यदि हम कहे तो, कार्यालय प्रबंधन उन लोगों के समूह को कहा जाता है जो किसी भी कार्य की योजना, आयोजन, मार्गदर्शन, संचार, निर्देशन, समन्वय एवं नियंत्रण (Planning, organizing, guiding, communicating, directing, coordinating and controlling work) की प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक और आर्थिक रूप से प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं।

       कार्यालय प्रबंधन केवल व्यवसायिक संगठन के लिए ही आवश्यक नहीं है बल्कि गैर-व्यवसायिक संगठन एवं सरकारी कार्यों के लिए भी अति आवश्यक है। किसी भी कार्य को संपन्न करने के लिए उसकी एक रणनीति बनानी होती है और इस रणनीति को दिशा देने के लिए एक कार्यालय एवं कार्यालय के कार्य को सुचारू रूप से संपन्न करने में कार्यालय प्रबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

कार्यालय प्रबंधन की परिभाषा (Definition of office Management  :-

    कार्यालय प्रबंधन कि यदि परिभाषा की बात की जाए तो हम कह सकते हैं कि किसी भी कार्य/उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु ऐसे लोगों का समूह जो वेतन-भोगी हो उनके द्वारा तय समय सीमा के अंदर कलात्मक रूप से कार्यों का निष्पादन करना।

कार्यालय प्रबंधन के कुछ अन्य परिभाषाएं :-

      कार्यालय प्रबंधन, प्रबंधन की कला और विज्ञान की वह शाखा है जो कार्यालय के काम के कुशल प्रदर्शन से संबंधित है। जब भी और जहां भी वह कार्य किया जाता है - विलियम एंगर।

      कार्यालय प्रबंधन अपने निर्दिष्ट उद्देश्यों (specified objectives) को प्राप्त करने के लिए अपने उपयुक्त साधनों के उपयोग में कार्यालय के कर्मियों को मार्गदर्शन करने की कला है। - मिल्स एवं स्टेडिनफोर्ड

कार्यालय प्रबंधन के तत्व (Elements of Office Management) :-

     कार्यालय प्रबंधन के तत्व की तुलना हम किसी मकान की नींव से कर सकते हैं यदि नींव मजबूत हो तो भवन भी मजबूत होगा। इसलिए हम कह सकते हैं कि कार्यालय प्रबंधन का कुशल कार्य, कार्यालय प्रबंधन के तत्वों पर ही निर्भर रहता है। 

कार्यालय प्रबंधन के आवश्यक तत्व निम्नलिखित है -

  • सामग्री :- सामग्री से तात्पर्य, कार्यालय के कार्य को संपन्न करने के लिए उपयोग में लाई जाने वाले उपकरणों से है। जिसमें पेन, पेंसिल, इरेज़र, कागज, स्याही, कार्यालय प्रपत्र (Office form), कंप्यूटर, प्रिंटर, इत्यादि शामिल हैं।
  • वातावरण (माहौल) :- व्यवसाय की प्रकृति, कार्यालय के वातावरण को निर्धारित करती है। विभिन्न कार्यालयों के कार्य को एक विशेष स्थिति एवं वातावरण के तहत रहकर कर्मचारी अपना कार्य संपन्न करते हैं। कार्यालय के कार्य को सुचारू रूप से संपन्न एवं उपयुक्त वातावरण में लाना कार्यालय प्रबंधक का कर्तव्य एवं जिम्मेदारी होती है।
  • उद्देश्य :- कार्यालय के कर्मचारियों को अपने उद्देश्य एवं लक्ष्य के बारे में ज्ञात होना चाहिए ताकि वह अपना कार्य बेहतर तरीके से संपन्न कर सके। यदि एक कर्मचारी अपना कार्य ईमानदारी से पूरा करता है तो दूसरे कर्मचारी भी उसके प्रभाव से प्रभावित होकर अपना प्रदर्शन बेहतर करने का प्रयास करते हैं। यदि कार्यालय के कर्मियों को अपना उद्देश्य ज्ञात ना हो तो संस्था अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकती है।
कार्यालय प्रबंधन का महत्व (Importance of office Management) :-

  • लक्ष्य की प्राप्ति (Goal Attainment) :- Aim या लक्ष्य का अर्थ होता है किसी भी कार्य को एक निश्चित समय-सीमा में प्राप्त करना एवं कुशल प्रबंधक अपने कर्मचारियों को उनके लक्ष्य से अवगत कराता एवं उन्हें प्राप्त करने के लिए निर्देशित भी करता है।
  • संसाधनों का इष्टतम उपयोग (Optimum use of Resources) :- एक कुशल प्रबंधक अपने कार्यालय में उपलब्ध सभी सामग्रियों का इष्टतम प्रयोग करना अपने सभी कर्मचारियों को सिखाता है एवं निरंतर प्रयोग के लिए प्रेरित भी करता है। 
  • लागत को कम करना (Reduce Cost) :- एक कुशल प्रबंधक के मार्गदर्शन और नियंत्रण में ही कार्यालय के लागत को कम किया जा सकता है बेहतर योजना, सुदृढ़ संगठन (Strong organization) और प्रभावी नियंत्रण (Effective control के माध्यम से प्रबंधक लागत को कम कर और प्रदर्शन को बेहतर बनाने का कार्य करता है। 
  • कार्य का सुचारू प्रवाह (Smooth flow of work) :- किसी भी कार्य का निर्बाध प्रवाह तभी संभव है जब उचित योजना और नियंत्रण के द्वारा कार्य को संपन्न किया जाए। एक कुशल प्रबंधक कार्य को सुचारू रूप से प्रवाह को सुनिश्चित करता है।

Reference:-



सोमवार, 25 जुलाई 2022

पेंसिल (एक सूखा माध्यम) ऑनलाइन क्लास नोट्स Pencil (A Dry Medium) Online Class Notes 21-06-2022.

पेंसिल (एक सूखा माध्यम)


    सिडार की लकड़ी का प्रयोग पेंसिल के निर्माण में किया जाता है। पेंसिल हमें 15' पर दिखाई देती है।


     यह एक कार्बन का रूप होता है एवं ग्रेफाइट से बनी होती है। ग्रेफाइट के साथ ही मिट्टी का प्रयोग पेंसिल के निर्माण में किया जाता है।

पेंसिल दो प्रकार की होती है - 

  1.  Hard - हल्की - इंजीनियरिंग ड्रॉइंग में प्रयुक्त
  2. Black - गहरी (Dark) पेंटिंग/ड्रॉइंग में प्रयुक्त
HB पेंसिल मध्यम होती है। जिसमें H का मतलब Hard एवं B का मतलब Black होता है।

पेंसिल के बढ़ते क्रम - 2B, 4B, 6B, 8B, 10B.
पेंसिल के घटते क्रम - 2H, 4H, 6H.

साधारणयत: हल्की पेंसिल (Hard) 6H तक बनती है।

साधारणयत: Dark पेंसिल 10 B तक बनती है।

पेस्टल

पेस्टल दो प्रकार के होते हैं - 
  1. सॉफ्ट पेस्टल 
  2. ऑयल पेस्टल  

       पेस्टल रंग एक शुष्क माध्यम है इसकी प्रकृति अपारदर्शी होती है। इसको ब्रश के बिना स्टिक की सहायता से रंग लगाया जाता है। एक तरफ से रंग को रेखाओ की सहायता से लगाते हैं तत्पश्चात मिश्रण के लिए उंगली या कागज के बने टूल्स का प्रयोग करते है। 

Note:- पेस्टल, क्रेयॉन, चारकोल यह सभी शुष्क माध्यम के अंतर्गत आते हैं।

धरातल - खुरदरा/टिंट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। इन चित्रों को सुरक्षित रखने के लिए फिक्सेटिव की जरूरत पड़ती है। फिक्सेटिव स्थायीकरण की एक विधि हैं।

    पेस्टल की भांति ही क्रेयॉन होता है यह भी दो प्रकार का होता है 

  1. सॉफ्ट क्रेयॉन  
  2. ऑयल क्रेयॉन

कोलॉज

        कोलॉज को 1912 ईस्वी में फ्रांस के घनवादी कलाकारों के द्वारा प्रयोग किया गया। कागज/कपड़ा एवं अन्य प्रकार के टुकड़ों के द्वारा इसमें चित्रों का निर्माण किया जाता है।

बाटीक

      बाटीक कपड़े रंगने की एक विधि हैं। इसकी खोज इंडोनेशिया (एशिया) में हुई थी। मोम विद्या से कपड़ों पर पैटर्न बनाया जाता है। मोम लगाने के टूल्स को तीजान्टिन कहते हैं।

सरगाज फिटो/ सेग्रि फिटो 

      सरगाज फिटो/ सेग्रि फिटो भित्ति चित्रण की एक विधि हैं। 14वीं शताब्दी में इटली में इसकी खोज हुई थी।

एक्शन पेंटिंग (क्रियात्मक चित्रण)

         अमेरिका में रंगों को बहाकर की गई चित्रकारी को एक्शन पेंटिंग कहा गया। एक्शन पेंटिंग के प्रसिद्ध चित्रकार जैकसन पोलॉक है।

इलस्ट्रेशन (दृष्टांत चित्र)

     कहानी से सम्बंधित चित्र को इलस्ट्रेशन चित्रण कहा जाता है।

जांत्विक रंग :- रंगों में चमक बढ़ाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। बसोहली शैली में इसका प्रयोग हमें अधिकतर दिखाई देता है।

टिपाई :- मुगल काल में प्रारंभिक रेखांकन को टिपाई कहां गया है। 

पेट्रोगिल्फ :- प्रागैतिहासिक कालीन चित्र जो कि पत्थरों पर उकेर कर बनाए गए हैं उनके लिए पेट्रोगिल्फ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

आर्मेचर :- मूर्तिकला में मूर्ति को मजबूती प्रदान करने वाले छड़ को आर्मेचर कहते हैं। 

वस्ट :- आवाक्ष शिल्प

युकिए ए :- जापान में स्याही से (काली) की गई चित्रकारी को युकिए ए कहा जाता है। 

बेनिए :- जापान में गुलाबी तथा हरे रंग के प्रयोग से निर्मित चित्र को बेनिए कहते हैं।


मंगलवार, 21 जून 2022

कला के तत्व (एलिमेंट्स ऑफ आर्ट) ऑनलाइन क्लास नोट्स Elements of Art Online Class Notes 16-06-2022.

 (3) रूप (फॉर्म) - वह स्थान या क्षेत्र जिसका अपना निश्चित रंग तथा आकार होता है उसे रूप कहते हैं। कलाकार के चित्र भूमि पर अंकन मात्र से ही रूप का निर्माण शुरू हो जाता है और इस रूप के सृजन के साथ ही रूप दो भागों में विभक्त हो जाता है- 

(1) सक्रिय रूप 

(2) सहायक रूप



Note:- अंकन:- किसी यंत्र के माध्यम से धरातल पर चिन्हित एवं चित्रित करना।


रूप को दो भागों में विभाजित किया जाता है - 

(1) नियमित रूप (ज्योमेटिकल फॉर्म) 

(2) अनियमित रूप (आज्योमेटिकल फॉर्म) 


(1) नियमित रूप (ज्योमेटिकल फॉर्म)  जिन आकारों का अपना नियम होता है। जिन चित्रों का निर्माण बौद्धिकता से करते हैं तथा जिसके दोनों भाग बराबर हो जैसे - गिलास, बाल्टी, घन, आयत, इत्यादि। ये सब नियमित रूप कहलाते हैं। 

(2) अनियमित रूप (आज्योमेटिकल फॉर्म)  इसका अपना कोई नियम नहीं होता तथा चित्र भूमि पर संयोजित करना कठिन होता है। इसका एक भाग दूसरे के समान नहीं होता। उदाहरण - पेड़, केतली, शंख नियमित इसके अंतर्गत आते हैं।


रुपो का वैज्ञानिक प्रभाव 


आयताकार रूप - शक्ति, स्थायित्व, एकता। 

वृत्ताकार रूप - इसके द्वारा हम पूर्णता को दिखाते हैं। इसके अलावा गति, आकर्षण, विशालता, समानता को निरूपित किया जाता है। 

वर्गाकार रूप - स्थिरता एवं दृढ़ता।

अंडाकार रूप - लावण्य, सौंदर्य, सृजन। 

त्रिभुजाकार रूप - सुरक्षा, विकास। 

विलोम त्रिभुजाकार रूप - अशांति, लिप्तता का प्रभाव।


       महाभारत में 19 प्रकार के रूपों का वर्णन किया गया है। इस को आधार मानकर अवनींद्र नाथ टैगोर में 16 प्रकार के रूपों के बारे में बताया।


  • स्थिर मुख - अंडाकार 
  • प्रसन्न नेत्र - खंजन पक्षी 
  • योगी के कान - ॐ के भांति 
  • चंचल मुख - पान के पत्ते का रूप


(4) तान (Tone) :- रंग के हल्के तथा गहरेपन को तान कहा जाता है। इसमें काले रंग की मात्रा बढाने से उस रंग की तान बढ़ेगी तथा मान घटेगा। किसी रंग में सफेद रंग मिलाने से उच्च रंग की तान घटेगी तथा मान बनेगा। इसे मुख्यत: तीन भागों में विभक्त किया गया है 

  1. प्रकाशित तान (हल्का तान) लाइट टोन - खुशी 
  2. मध्यम तान (मिडिल टोन) - समानता 
  3. गहरा तान (डार्क टोन) - गंभीरता एवं अवसाद


     चित्र में परिपेक्ष तथा 3D प्रभाव डालने के लिए टोन का प्रयोग किया जाता है।


वयन/गठन/पोत (Texture) :-  पोत का अनुभव मुख्यतः दो तरह से किया जाता हैं।


स्पर्श

दृश्य


       पोत धरातल का गुण कहलाता है, पोत मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- 

(1) प्राप्त पोत (Nature Texture)

(2) अनुकृत पोत (Copy Texture)

(3) सृजित पोत (Created Texture)


(1) प्राप्त पोत (Nature Texture):- इस पोत के अंतर्गत वे सभी धरातल आते हैं जो प्रकृति में सहजता से मौजूद हैं। जैसे:- शीला, गुफाएं।


(2) अनुकृत पोत (Copy Texture):- यह प्रकृति पोत का अनुकरण करते हैं। इस पोत का प्रयोग कंपनी शैली के चित्रकारों ने किया हैं। इस पोत के माध्यम से 3D प्रभाव दर्शाया जाता है।


(3) सृजित पोत, कृतिम पोत, आर्टिफिशियल पोत (Created Texture):- इस पोत का निर्माण कलाकार अपने अनुसार करते हैं। जिसमें प्रमुख रूप से K.K. Haiber, P.N. चोयल, जे. स्वामीनाथन करते थे। 

Note:-  सृजित पोत का प्रयोग सर्वाधिक आधुनिक कलाकारों के द्वारा किया गया है। पोत से चित्र के एकरसता को कम किया जाता हैं।


(6) अंतराल (Space):- भारतीय शास्त्रों में अंतराल को अन्य नामों से भी बुलाया गया है। 

समरांगण सूत्रधार इसके लेखक राजा भोज है उसमें अंतराल को भूमि-बंधन कहा गया है। उसी तरह अभिलातिर्थ चिन्तामणि जो कि सोमेश्वर की रचना है। इसमें अंतराल को स्थान निरूपण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण जिसके लेखक मार्कंडेय मुनि है, उसमें अंतराल को स्थान के नाम से बुलाया गया है।


परिभाषा - कलाकार का कार्यक्षेत्र अंतराल कहलाता है। चित्रकला में अंतराल का विशेष महत्व है, जिसके अभाव में चित्र रचना संभव नहीं है। अंतराल को दो भागों में बांटा गया है - 

(1) सक्रिय अंतराल 

(2) सहायक अंतराल


अंतराल का विभाजन 


      चित्र का निर्माण करते वक्त इसके अंतराल को दो भागों में रखा जाता है। 

  1. सम विभाजन (फॉर्मल)
  2. असम विभाजन/विषम विभाजन (इनफॉरमल)


(1) सम विभाजन:- यह रेखाओं की सहायता से चित्र भूमि में इस प्रकार विभक्त किया जाता है की इसके अगल-बगल, ऊपर-नीचे एक समान स्थान छुटा हो। प्राचीन काल के चित्रकारों तथा रूबेंस ने इसका खूब प्रयोग किया। इस विभाजन में संतुलन, शांति, एकता, निश्चिता आदि दिखाए जाते हैं।


(2) असम विभाजन:- इस प्रकार के विभाजन में कलाकार पूर्ण रूपेण से स्वतंत्र होता है। इसके द्वारा मौलिकता का सृजन किया जाता है। इस प्रकार के विभाजन का प्रयोग आधुनिक कलाकारों के द्वारा किया जा रहा है।


प्रश्न:- गोल्डन सेक्शन (स्वर्णिम विभाजन) क्या होता है ?


उत्तर:- यूनान के विद्वान यूम्लीड के द्वारा यह विभाजन प्रयोग में सर्वप्रथम लाया गया था। इसका विभाजन अनुपात के रूप में होता है पीछे वाले क्रम को साथ वाले क्रम में जोड़कर आगे लिखते जाते हैं।

जैसे:-  2 : 3 : 5 : 8 : 13 : 21 : .................


  गोल्डन सेक्शन (स्वर्णिम विभाजन) विभाजन को पहचानिए ?


(१) 2 : 3 ✅

(२) 4 : 6

(३) 1 : 4

(४) 4 : 8