B.Ed. 2nd Year. EPC-4 Notes. लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
B.Ed. 2nd Year. EPC-4 Notes. लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

UNDERSTANDING THE SELF


BEPC - 4 

UNDERSTANDING THE SELF 

Full Marks : 50 

Course Credit : 2 

Practicum : 50

Contents : 

UNIT 1 : Exploring the Aim of Life 

Objectives 

  • To enable students to develop a vision of life for themselves. 
  • To encourage students to give conscious direction to their lives to take responsibility for their actions. 
  • To develop a holistic and integrated understanding of the human self and personality . 


Workshop Themes  


  • Vision as a person : Aspiration and purpose of life. 
  • Giving a conscious direction to life. 
  • Understanding different dimensions of self and personality and way in which they influence the dynamics of identity formation, values and direction of life. 


UNIT 2 : Discovering one's True Potential 


Objectives 

  • To facilitate the personal growth of the students by helping them to identify their own potential. 
  • To develop the power of positive attitudes. 
  • To encourage students to develop the capacity for self - reflection and personal integration.


Workshop Themes.

  • Understanding one's strengths and weaknesses through self observation exercises.  
  • Taking responsibility for one's own actions. 
  • Developing positivity, self - esteem and emotional integration. 
  • Exploring fear and trust : competition and co - operation. 
  • Developing skills of inner self organization and self - reflection. 
  • Writing a self - reflective journal.


UNIT 3 : Developing Sensitivity


Objectives 

  • To enable students to examine and challenge the stereo - typical attitudes and prejudices that influence identity formation and the process of individualization. 
  • To encourage students to develop the capacity for perspective taking and appreciating different points of view. 
  • To develop sensitivity towards needs of children by connecting with one's own childhood experiences. 


Workshop Themes


  • Understand and challenge the unconscious, conditioned attitudes that are stereo - typed and prejudiced (gender, case, class, race, region, disability etc.) and critically examine the sources of stereo - typed messages (e.g. media ). 
  • Defining consciously one's own values towards self and society and develop a capacity to understand and appreciate divergent points of view. 
  • Developing the capacity for empathic listening and communication skills. 
  • Understranding one's own childhood and adult - child gaps in society. 


UNIT 4 : Peace, Progress and Harmony 


Objectives 


  • To develop the capacity to establish peace within oneself. 
  • To develop the capacity to establish harmony within a group and methods of conflict resolution. 
  • To understand the meaning of leadership and develop attitudes and skills of a catalyst. 
  • To understand the basis of social disharmony, the factors those contribute to it and ways to facilitate change . 


Workshop Themes


  • Establishing peace within oneself, exercises of concentration and meditation. 
  • Understanding group dynamics and communications. 
  • Creating group harmony : exploring methods of creating a collective aspiration for progress and conflict resolution.

सोमवार, 30 मई 2022

संज्ञानात्मक विकास क्या होता हैं? Cognitive Development kya hota hai ?



 संज्ञानात्मक विकास 

(Cognitive Development)

 

    'संज्ञान' शब्द का अर्थ है- 'जानना' या 'समझना'। यह एक बौद्धिक प्रक्रिया है, इसमें विचारों के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। मनोवैज्ञानिक 'संज्ञान' का प्रयोग ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में करते हैं। 


     संज्ञानात्मक विकास शब्द का प्रयोग मानसिक विकास के व्यापक अर्थ में किया जाता है। इस में बुद्धि के अतिरिक्त सूचना का प्रत्यक्षीकरण (perception), पहचान (recognition), प्रत्याह्वान (remembering) और व्याख्या (explanation) आदि भी आते हैं। 


       विकिपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार, संज्ञान में मानव की विभिन्न मानसिक गतिविधियों का समन्यवीकरण (coordination) होता है। 'संज्ञानात्मक मनोविज्ञान' शब्द का प्रयोग गुस्ताव नाइसर (Gustav Neisser) ने सन् 1967 ई० में किया था। संज्ञानात्मक विकास इस बात पर बल देता है कि मनुष्य किस प्रकार तथ्यों को ग्रहण करता है और किस प्रकार से उसका उत्तर भी देता है। संज्ञान उस मानसिक प्रक्रिया को सम्बोधित करता है, जिसमें चिन्तन, स्मरण, अधिगम और भाषा के प्रयोग का समावेश होता है। जब हम शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते है तो इसका अर्थ है कि हम तथ्यों और अवधारणाओं की समझ पर बल देते हैं।


       यदि हम विभिन्न अवधारणाओं के मध्य के सम्बन्धों को समझ लेते हैं तो हमारी संज्ञानात्मक समझ में वृद्धि होती है। संज्ञानात्मक सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति किस प्रकार सोचता है, किस प्रकार महसूस करता है और किस प्रकार व्यवहार करता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अपने अन्दर ज्ञान के सभी रूपों यथा स्मृति चिन्तन, प्रेरणा और प्रत्यक्षण को शामिल करती है।


        जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया में मुख्यतः दो बातों को महत्वपूर्ण माना है :-


1. संगठन और 2. अनुकूलन। 


     संगठन से तात्पर्य बुद्धि में विभिन्न क्रियाएँ जैसे प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, चिंतन एवं तर्क सभी संगठित होकर करती है। एक बालक वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों के संबंध में उसकी विभिन्न मानसिक क्रियाएँ पृथक पृथक कार्य नहीं करती है बल्कि एक साथ संगठित होकर कार्य करती है। वातावरण के साथ समायोजन करना संगठन का ही परिणाम है। संगठन व्यक्ति एवं वातावरण के संबंध को आंतरिक रूप से प्रभावित करता है। अनुकूलन बाह्य रूप से प्रभावित करता है।


       पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है:-

1. संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensory Motor) : जन्म के 2 वर्ष 

2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational) : 2 से 7 वर्ष 

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational) : 7 से 11 वर्ष 

4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational) : 11 से 18 वर्ष।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

EPC 4: UNDERSTANCDING THE SELF. EPC- 4: स्वयं की समझ।


 

B.Ed. Two Year Course Study 


EPC 4: UNDERSTANCDING THE SELF 


COURSE CONTENTS 


Unit I: Understanding Self 

  • (a) Self-awareness : Recognition of self-character, self-confidence, self- worth, self-esteem, and self-development and self-assessment. 
  • (b) Understanding adequate self as a product of positive experiences of caring, warmth and appreciation in the family, school, neighbourhood etc, which promote healthy discipline, shunning violence 
  • (c) Development of professional identity of a teacher 
  • (d) Awareness of the influence of scocial milieu on self 
  • (e) Negative experiences generate stress, anger aggression 
Unit II : Yoga and its role in self-well-being 

  • (a) Yoga, mediation, anger/stress management as practices that restore positive physical health and attitudes 
  • (b) Awareness of own identity, social identity, cultural underpinnings 
  • (c) Developing capabilities for meditation- Listening to the conflicting parties, awarness of context fo conflict; conflict between teachers, conflict between teacher and student, skills and strategies for conflict resoution. 

Unit III: Becoming a Humane Teacher 

  • (a) Nurturing capabilities for critical self-reflection : trancscending past negative experiences 
  • (b) Development of sensitivity, importance of empathy 
  • (c) Developing skills of communication Listening to others, sharing feelings, descriptive non-judgmental feedback, empathizing, trusting 
  • (d) self-discipline, self-management. 
  • Removal of prejudices, biases and stereotypes and building multicultural orientation. 
  • Nurturing ethical behaviour, positiveity, non-violence, love and caring, compassion and Habitual self-reaction by using daily journal on experiences. 


B.Ed. दो वर्षीय पाठ्यक्रम अध्ययन


 EPC- 4: स्वयं को समझना


 पाठ्यक्रम सामग्री


यूनिट I: स्वयं की समझ

 (ए) आत्म-जागरूकता: आत्म-चरित्र, आत्मविश्वास, आत्म-मूल्य, आत्म-सम्मान, और आत्म-विकास और आत्म-मूल्यांकन की पहचान।

 (बी) परिवार, स्कूल, पड़ोस आदि में देखभाल, गर्मजोशी और प्रशंसा के सकारात्मक अनुभवों के उत्पाद के रूप में पर्याप्त आत्म को समझना, जो स्वस्थ अनुशासन को बढ़ावा देता है, हिंसा से दूर रहता है।

 (सी) एक शिक्षक की पेशेवर पहचान का विकास।

 (डी) स्वयं पर सामाजिक परिवेश के प्रभाव के बारे में जागरूकता।

 (ई) नकारात्मक अनुभव तनाव, क्रोध आक्रामकता उत्पन्न करते हैं।

यूनिट II: योग और आत्म-कल्याण में इसकी भूमिका

(ए) योग, मध्यस्थता, क्रोध/तनाव प्रबंधन प्रथाओं के रूप में जो सकारात्मक शारीरिक स्वास्थ्य और दृष्टिकोण को बहाल करते हैं।

(बी) अपनी पहचान, सामाजिक पहचान, सांस्कृतिक आधार के बारे में जागरूकता।

(सी) ध्यान के लिए क्षमताओं का विकास- विरोधी पक्षों को सुनना, विरोधाभास के संदर्भ की जागरूकता;  शिक्षकों के बीच विरोधाभास, शिक्षक और छात्र के बीच विरोधाभास, विरोधाभास/संघर्ष के समाधान के लिए कौशल और रणनीतियाँ।

 यूनिट III: एक मानवीय शिक्षक बनना

 (ए) महत्वपूर्ण आत्म-प्रतिबिंब के लिए क्षमताओं का पोषण: पिछले नकारात्मक अनुभवों को पार करना

(बी) संवेदनशीलता का विकास, सहानुभूति का महत्व

 (सी) संचार के कौशल विकसित करना दूसरों को सुनना, भावनाओं को साझा करना, वर्णनात्मक गैर-निर्णयात्मक प्रतिक्रिया, सहानुभूति, भरोसा करना

 (डी) आत्म-अनुशासन, आत्म-प्रबंधन।

  •  पूर्वाग्रहों, पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को दूर करना और बहुसांस्कृतिक अभिविन्यास का निर्माण करना।

  •  अनुभवों पर दैनिक पत्रिका का उपयोग करके नैतिक व्यवहार, सकारात्मकता, अहिंसा, प्रेम और देखभाल, करुणा और आदतन आत्म-प्रतिक्रिया का पोषण करना।


रविवार, 7 नवंबर 2021

सीखने की योजना क्या है ? What is Learning Plan ? Hindi & English Notes For B.Ed. and D.El.Ed. All University.


सीखने की योजना क्या है? सीखने की योजना बनाते समय सोच के कुछ बिंदुओं की सूची बनाएं।


         एक सीखने की योजना निर्देश और मूल्यांकन के लिए एक व्यापक, अनुकूलन योग्य, बहु-दिवसीय योजना है। दूसरे शब्दों में इसे हम यूं समझ सकते हैं, एक सीखने की योजना एक दस्तावेज (संभवतः एक इंटरैक्टिव या ऑनलाइन दस्तावेज़) है जिसका उपयोग सीखने की योजना बनाने के लिए किया जाता है, आमतौर पर एक विस्तारित अवधि में।

       आज के शिक्षकों को निर्देश में अंतर करने और इसे सीखने के परिणामों से जोड़ने की जरूरत है। सीखने की योजना छात्रों के पढ़ने, सुनने, बोलने और लिखने के कौशल का निर्माण करती है। इसमें भिन्नता के लिए कई अवसर शामिल हैं, जिनमें आवश्यक प्रश्न, रीडिंग और निर्देशक रणनीतियों और आकलन शामिल हैं। सभी पिछड़े डिजाइन के आधार पर एक ढांचे के भीतर व्यवस्थित सभी और अंग्रेजी भाषा के लिए सामान्य कोर राज्य मानकों को गठबंधन करते हैं।

सीखने की योजना बनाते समय सोच के कुछ बिंदु यहां दिए गए हैं:-

1. अधिगम योजना तैयार करते समय, शिक्षार्थियों के स्तर, उनकी भाषाई आवश्यकताओं और पाठ पढ़ाने के उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए।

2. सीखने की योजना के उद्देश्यों को अलग-अलग नहीं समझा जाना चाहिए। उन्हें प्रारंभिक स्तर की पाठ्यचर्या पुस्तक के आधार पर विकसित किया जाना चाहिए।

3. शिक्षण विधियों को चुनते समय कक्षा की स्थिति से संबंधित होने का प्रयास करें।

4. अभिनव टीएलएमएस बनाने का प्रयास करें जो अंग्रेजी पढ़ाने के दौरान वास्तव में एक शिक्षक का समर्थन कर सके।

5. विषयों को शिक्षार्थियों की वास्तविक जीवन स्थितियों और सार्थक गतिविधियों से संबंधित करें।

6. प्रारंभिक अवस्था में मातृभाषा को स्पष्ट रूप से आवश्यक बिंदुओं को समझने की अनुमति दी जा सकती है लेकिन बाद में इसका उपयोग कम से कम किया जाना चाहिए।

7. शिक्षार्थियों को प्रश्न पूछने और उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित करके उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करें।

8. शिक्षार्थियों की व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करें और ब्लैकबोर्ड का प्रभावी ढंग से उपयोग करें।

9. सरल और सही अंग्रेजी का प्रयोग करें।

10. फीडबैक और सुदृढीकरण के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करें।

What is a learning plan? List some points of concern while making a learning plan.


         A learning plan is a comprehensive, customizable, multi-day plan for instruction and assessment. In other words, A learning plan is a document (possibly an interactive or on-line document) that is used to plan learning. usually over an extended period of time. 

Today's teachers need to differentiate instruction and connect it to learning outcomes. The learning plan does that by building students' reading, listening, speaking and writing skills. It includes multiple opportunities for differentiation, including selecting essential questions, readings, and instructional strategies and assessments-all organized within a framework based on backward design and aligned to the Common Core State Standards for English Language. 

Here are some of the points of concern while making a learning plan - 

1. While preparing a learning plan, one must keep in mind the learners' level, their linguistic needs and the objectives of teaching the lesson. 

2. The Objectives of the learning plan must not be understood in isolation. They must be developed on the basis of the Curriculum Book of Elementary Level.

3. Try to relate to the classroom situation while choosing the teaching methods.

4. Try to create innovative TLMS which can really support a teacher whilę teaching English.

5. Relate the topics to real life situations of the learners and meaningful activities.

6. At the early stage mother tongue may be allowed to be used to understand clearly essential points but later on its use should be minimised.

7. Ensure maximum participation of learners by encouraging them to ask and answer questions.

8.Address the individual needs of learners and use the blackboard effectively.

9.Use simple and correct English.

10.Provide adequate space for feedback and reinforcement.


सोमवार, 1 नवंबर 2021

अधिगमकर्त्ता एवं अधिगम प्रक्रिया का बोध (UNDERSTANDING THE LEARNER AND LEARNING PROCESS) S-1 D.El.Ed. 2nd Year B.S.E.B. Patna.


       अपने जन्म के समय शिशु असहाय अवस्था में रहता है। वह दूसरों पर निर्भर रहता है। कालांतर में वही शिशु अनेक चीजें सीख जाता है। सीखने की यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है। अधिगम अर्थात् सीखना प्राणियों का एक जन्मजात गुण है ।

          अधिगम एक अत्यधिक व्यापक संकल्पना है। मनुष्य अपने जीवन के प्रारम्भ से लेकर अंत तक प्रतिपल कुछ-न-कुछ सीखता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ कुछ अनुवांशिक विशेषताएँ (Genetic features) लेकर जन्म लेता है। इन विशेषताओं में बुद्धि एक ऐसी विशेषता है जो उसे अपने चारों ओर फैले वातावरण के साथ अतः क्रियाएँ करते हुए उसकी समस्त क्रियाएँ और व्यवहारों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान करती है। वस्तुतः मनुष्य की अपने परिवेश से प्रभावित होकर अपने वंशानुक्रम के गुणों के अनुरूप व्यवहार में परिवर्तन करने की क्रिया ही अधिगम है।
      शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालकों को सिखाना और सीखने की ओर अग्रसर करना है।

अधिगम का अर्थ

(MEANING OF LEARNING)

         अधिगम किसी स्थिति के प्रति सक्रिय प्रतिक्रिया है। जैसे:- एक बालक जलती हुई मोमबत्ती की लौ छूने से जल जाता है। उसके लिए यह पहला कटु अनुभव होता है। दूसरी बार वह जलती हुई मोमबत्ती से दूर रहता है। बालक यह सीख जाता है कि लौ को हाथ लगाया जाएगा तो अवश्य ही जलने की पीड़ा उठानी पड़ेगी। इसी प्रकार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अनुभवों के माध्यम से एक व्यक्ति के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन होते रहते हैं। अनुभवों द्वारा व्यवहार में होने वाले इन परिवर्तनों को साधारण रूप में सीखने की संज्ञा दे दी जाती है। 

सीखने की प्रक्रिया की यह बहुत ही सरल व्याख्या है ।

      अधिगम पूर्व अनुभव द्वारा व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन है। इस आधार पर कहा जा सकता है। अधिगम ही शिक्षा है। अधिगम और शिक्षा एक ही क्रिया की ओर संकेत करते हैं। दोनों क्रियाएँ जीवन में सदा और सर्वत्र चलती रहती है। बालक परिपक्वता की ओर बढ़ता हुआ, अपने अनुभवों का लाभ उठाता हुआ वातावरण के प्रति जो उपयुक्त प्रतिक्रिया करता है, वहीं अधिगम है।

अधिगम की परिभाषाएँ

(DEFINITIONS OF LEARNING)

      "ब्लेयर, जोन्स और सिम्पसन के अनुसार- व्यवहार में कोई परिवर्तन जो अनुभवों का परिणाम है और जिसके फलस्वरूप व्यक्ति आने वाली स्थितियों का भिन्न प्रकार से सामना करता है, अधिगम कहलाता है।"
"Any Change of behaviour which is a result of experience and which causes people to face late situation diffcutly may be called learning. 
"Blair, Jones and Simpson."

गेट्स व अन्य के अनुसार– "अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाना ही अधिगम हैं।" 
"Learning in the modification of behaviour through experience and training. 
"Gates and Others"

स्किनर के अनुसार- "सीखना, व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।" 
"Learning is a process of progressive behaviour adaptation." 
-Skinner

वुडवर्थ के अनुसार— "नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं के प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।
"The process of acquring new knowledge and new responces in the process of learning." 
-Woodworth

क्रो एवं क्रो के अनुसार– "अधिगम, आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है।" 
"Learning in the acquisition of habits, knowledge and attitudes." 
-Crow and Crow

गिलफोर्ड के अनुसार– "व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में किसी प्रकार का परिवर्तन ही अधिगम है।" 
"Learning is any change in behaviour, resulting from behaviour." -Gilford

अधिगम की प्रकृति

( NATURE OF LEARNING )

      उपर्युक्त परिभाषाओं के अवलोकन विश्लेषण तथा व्याख्या से स्पष्ट है कि अधिगम प्रक्रिया की प्रकृति में निम्न बातें निहित हैं-

1. अधिगम एक सक्रिय प्रक्रिया है।

2. अधिगम व्यक्ति की क्रियाशीलता पर निर्भर होता है।

3. अधिगम विकास की प्रक्रिया है, जहाँ व्यक्ति को स्व-प्रयास करना पड़ता है।

4. अधिगम व्यक्ति के वातावरण के अनुरूप व्यक्ति में परिवर्तन लाता है। ये परिवर्तन स्थायी या अस्थायी हो सकते हैं।

5. अधिगम सहज क्रिया (Reflex Action) नहीं है।

6. अधिगम चेतना का परिणाम भी हो सकता है या जैविक व सामाजिक समंजन के लिए भी हो सकता है।

7. अधिगम सकारात्मक व नकारात्मक दोनों हो सकता है।

8. अधिगम व्यवहार में परिवर्तन की मानवीय क्रिया है।

9. अधिगम प्रक्रिया उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।

10. अधिगम वर्तमान व्यवहार में परिवर्तन या नए व्यवहार के ग्रहण के साथ-साथ वर्तमान व्यवहार पर प्रतिबन्ध भी लगाता है।

11. अधिगम व्यक्ति को आवश्यक समायोजन और ग्राह्यता (Adjustment and adapility) के लिए तैयार करता है।

12. अधिगम का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है जिसमें मानव व्यवहार के सभी क्षेत्र (संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा अनुभवात्मक) सम्मिलित होते हैं।

13. अधिगम सार्वभौमिक एवं निरन्तर प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है।

14. क्रो एवं क्रो के अनुसार कार्य करने के तरीके अधिगम में सम्मिलित है, परन्तु इन नए तरीकों को सीखने के साधनों की कोई सीमा नहीं होती। अतः अधिगम के विभिन्न तरीके और विधियाँ होती हैं।

15. परिपक्वता, थकान, बीमारी, नशे आदि। के कारण व्यवहार में परिवर्तन का अधिगम से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

अधिगम की विशेषताएँ

(CHARACTERISTICS OF LEARNING)

      योकम सिम्पसन (Yokom Simpson) और मुर्सेल (Mursel) के अनुसार अधिगम की विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

1. अधिगम परिवर्तन है। (Learning is change)

2. अधिगम सम्पूर्ण जीवन चलता है। (Learning is long-life) 

3.सीखना विकास है। (Learning is growth)

4. सीखना अनुकूलन है। (Learning is adjustment)

5. सीखना सार्वभौमिक है। (Learning is universal)

6. सीखना नया कार्य करना है। (Learning is doing something new)

7. सीखना अनुभवों का सगठन है। (Learning is organisation of experiences)

8. सीखना उद्देश्यपूर्ण है। (Learning is purposive)

9 . सीखना विवेकपूर्ण है। (Learning is understanding)

10. सीखना सक्रियता है। (Learning is activeness)

11. सीखना व्यक्तिगत व सामाजिक दोनों है। (Learning is both individual and social)

12. अधिगम खोज है। (Learning is discovery)

13. अधिगम वातावरण की उपज है। (Learning is a product of environment)

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

Dr. Maria Montessori (डॉ० मारिया मांटेसरी)

 


       "We cannot teach a person to be an Artist but we can help him develop an eye that sees, a hand that obeys, and a soul that feels."

 - Maria Montessori (31 Aug 1870-06 May 1952)


         31 अगस्त 1870 को इटली में जन्मी डॉ० मारिया मांटेसरी बच्चों को शिक्षा देने की पद्धति में क्रान्तिकारी बदलाव लाने वाली शिक्षाशास्त्री और चिकित्सक थी। रोम विश्वविद्यालय में मंदबुद्धि बालकों की चिकित्सा का कार्य करते हुए उनका ध्यान उन बच्चो की शिक्षा की ओर गया और उन्होंने मांटेसरी पद्धति का विकास किया जो बाद में सामान्य बुद्धि बच्चो के शिक्षा के लिये भी उपयोगी पाया गया। 

      बाल विकास के लिए सबसे लोकप्रिय तरीकों में से एक मोंटेसरी प्रणाली में बच्चों को एक साथ काम करने, खेलने, अनुशासन और स्वतंत्रता पर महत्व दिया जाता है। मोंटेसरी पद्धति में कलात्मक अभिव्यक्ति से जुड़े कौशल पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते है और बच्चे की अपनी मूल और अनूठी कला को प्रोत्साहन देते है। मांटेसरी शिक्षण पद्धति में बच्चों को रंगने के लिए आयु क्षमता के अनुरूप कार्य दिया जाता है इससे बच्चे को न केवल एक बहुत अच्छी आत्म छवि मिलती है, बल्कि अवलोकन और कलात्मक प्रतिभा दोनों का कौशल होता है। 

      डॉ० मारिया मांटेसरी का विश्वास था कि बाल शिक्षा का मूल उद्धेश्य बच्चों के नैसर्गिक विकास (Natural development) में सहायक होना और बच्चों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। चिकित्साशास्त्र से सम्बंधित होने के कारण वे यह भी मानती थीं कि शिक्षा को बच्चों के साधारण मानसिक एवं ऐंद्रिक दोषों जैसे:- भीरुता (Cowardice), वाणीदोष, आदि। के सुधार में भी सहायक होना चाहिए। इस पद्धति पर चलाया जानेवाला पहला स्कूल श्रमिक बच्चो के लिये सेन लोरेंजो में 6 जनवरी 1907 को खुला था और 1913 में आयोजित प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मांटेसरी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में अमरीका, अफ्रीका, भारत तथा कई यूरोपीय देशों के लोग सम्मिलित हुए थे।

       डॉ० मांटेसरी अपने दत्तक पुत्र मारिओ मांटेसरी के साथ 1939 में भारत आई थी और दस वर्ष तक यहां रह कर “शांति के लिए शिक्षा" जैसे विषयों पर कार्य किया। डॉक्टर मारिया मोंटेसरी को विश्वास था कि आप एक बच्चे को एक कलाकार बनने के लिए नहीं "सिखा" सकते हैं, हालांकि, वह बच्चों की रचनात्मक क्षमताओं का पोषण करने और उन्हें एक आंख जो देखती है, एक हाथ जो पालन करती है, और एक आत्मा जो महसूस करती है" विकसित करना सिखाती है।

उनका कहना था-

"We cannot teach a person to be an Artist but we can help him develop an eye that sees, a hand that obeys, and a soul that feels."

 -Maria Montessori.


"हम किसी व्यक्ति को कलाकार बनना नहीं सिखा सकते हैं, लेकिन हम उसे देखने वाली आंख, आज्ञा मानने वाले हाथ और महसूस करने वाली आत्मा विकसित करने में मदद कर सकते हैं।"  

-मारिया मोंटेसरी

        प्रत्येक बच्चा दुनिया के साथ अलग तरह से बातचीत करता है और कलात्मक अभिव्यक्ति बच्चों के रचनात्मक, दृश्य, संवेदी और भावनात्मक विकास के लिए आवश्यक है। व्यावहारिक शिक्षा को ज्यादा महत्त्व देने वाली डॉ० मारिया का विचार था कि वही शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ है जो शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक, संवेगात्मक दृष्टि से बालक का विकास करे। इसलिए उन्होंने संगीत, नृत्य, खेल-कूद, कला तथा रोचक गतिविधियों का समावेश किया।

        मोंटेसरी वातावरण में बच्चों को कला गतिविधियां उनकी रचनात्मकता का पता लगाने और उनका उपयोग करने में मदद करती हैं। इसमें बच्चों के लिए महत्वपूर्ण कला एक प्रक्रिया है न कि उत्पाद, जबकि वयस्कों के लिए कला का लक्ष्य एक उत्पाद का उत्पादन करना होता है। दुनिया में पढ़ाने के तरीक़ों की तस्वीर बदल के रख देने वाली डॉ० मारिया मांटेसरी का निधन 06 मई 1952 को हॉलैंड में हुआ।

Click here and Find More Articles.

रविवार, 1 अगस्त 2021

केन्द्रीकृत विद्यालय एवं विकेन्द्रीत विद्यालय में क्या अंतर होता हैं ? What is the difference between centralized school and decentralized school? हिन्दी एवं English Notes.

 प्रश्न:- विद्यालय संगठन के दो प्रमुख स्वरूपो के बारे में बताएँ। 

                             Or

विद्यालय संगठन के प्रकारों को बताएँ।

                  Or

केन्द्रीकृत विद्यालय व विकेन्द्रीत विद्यालय में अंतर बताएँ ।

Ans.:- किसी भी विद्यालय संगठन के दो मुख्य स्वरूप होतें हैं जो की निम्न है :- 

(1) केन्द्रीकृत विद्यालय (Centralized Schools)

(2) विकेन्द्रीकृत विद्यालय (Decentralized Schools)

(1) केन्द्रीकृत विद्यालय:- इस विद्यालय का पूरा प्रबंधन प्रधानाध्यापक के हाथ में होता है। विद्यालय में सुव्यवस्था बनाये रखने की पूरी जिम्मेवारी वे स्वयं को मानते हैं। इस कारण विद्यालय के प्रत्येक भाग व कार्यकलाप पर उनका सीधा नियंत्रण होता है ताकि कोई गड़बड़ी न होने पाये। विद्यालय के अन्य कर्मी केवल उनके आदेशों को अमल में लाने का कार्य करते हैं। प्रधानाध्यापक उनके द्वारा किए गए कार्यों का निरंतर निरीक्षण करते हैं और बेहतरी के लिए निर्देश भी देते हैं । 

(2) विकेन्द्रीकृत विद्यालय:- इस विद्यालय में प्रधानाध्यापक के साथ-साथ अन्य सहकर्मियों की भी भागीदारी होती है। प्रधानाध्यापक अपने कई कार्यों को शिक्षकों को दे देते हैं और वे कोई राय लेने से पहले शिक्षकों से सलाह भी करते हैं  सभी कर्मी अपने कार्यों के माध्यम से विद्यालय के दैनिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाते हैं। प्रधानाध्यापक को उनकी क्षमताओं पर विश्वास भी होता है। विद्यालय के विद्यार्थीगण भी कई कार्यों में अपने शिक्षकों का हाथ बँटाते हैं। 


Question:- Tell us about the two main forms of school organization.


 Or


 State the types of school organization.


 Or


 Differentiate between centralized school and decentralized school.


 Ans.:- There are two main forms of any school organization which are as follows :-


 (1) Centralized Schools


 (2) Decentralized Schools


 (1)Centralized School:- The entire management of this school is in the hands of the headmaster.  He considers himself the full responsibility of maintaining order in the school.  Because of this they have direct control over every part and activity of the school so that no disturbances happen.  The other staff of the school only work to implement his orders.  The headmaster constantly monitors the work done by them and also gives instructions for betterment.


 (2) Decentralized School:- In this school, along with the headmaster, there is participation of other colleagues as well.  The headmaster entrusts many of his tasks to the teachers and he also consults the teachers before taking any opinion. All the personnel play their part in the daily process of the school through their tasks.  The headmaster also has confidence in their abilities.  School students also help their teachers in many tasks.

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

कृष्ण कुमार द्वारा रचित 'चुड़ी बाजार में लड़की' से अभिमन्यु की शिक्षा में शिक्षा के मुद्दों को किस प्रकार सार्थक तरीके से उठाया गया है ?

           कक्षा में शिक्षक के प्रश्नों का उत्तर देती हुई लड़को या परीक्षा की तैयारी करती हुई लड़की हमारी दृष्टि में सिर्फ एक विद्यार्थी रह जाती है। हमारी आँखें उसे सामने पाकर रीति-रिवाजों और विश्वासों के दलदल से घिरी हुई लड़की को देख पाने में असमर्थ हो जाती हैं। लड़की के ये दोनों रूप साथ-साथ रहते हैं। स्कूल या कॉलेज और विश्वविद्यालय के संसार में कदम रखती हुई लड़की उस दूसरी लड़की को घर पर नहीं छोड़ आई होती है जो सभ्यता द्वारा निर्धारित निर्भरता और यौन-दृष्टि के चौखटे में सिमटकर जीती है।

          वह लड़की जो घर पर विवाह स्कूल और मातृत्व की केन्द्रीयता का पाठ लगातार सीख रही होती है, इस लड़की से अलग नहीं है जो में जीवन की बहुउद्देशीयता का सपना देख रही होती है। लड़की के इन दो अस्तित्वों के बीच का फासला हर बच्ची के सामने एक असंभव-सी चुनौती पेश करता है। चुनौती का जवाब बहुतों के लिए किशोर होने तक निर्धारित हो चुका होता है। वे सीख चुकी होती हैं कि शिक्षा के वावजूद वे घर में भाई से अलग और नीचे बनी रहेंगी। स्त्री के रूप में उनका जीवन उसी धुरी पर चलेगा जो सभ्यता ने उनके जन्म से पूर्व, बहुत पूर्व, बना दी थी। अपने पूर्व निर्धारित जीवन-चक्र को उस धुरी पर जमाकर ही वे जिंदा रह पाएँगी।

         उक्त बातें ज़्यादातर लड़कियाँ शिक्षा समाप्त होने से पहले जान चुकी होती हैं। इसीलिए उनमें से कई अपनी शिक्षा को खींचते रहने का प्रयास करती हैं, इस विश्वास के तहत कि शादी से पहले जितना पढ़ सकें, पढ़ लें। उसके बाद का भरोसा नहीं। शिक्षा उनके लिए एक प्रकार से जमानत का काम करती है। शिक्षा के नाम पर उन्हें क्या पढ़ने को मिलता है अथवा बौद्धिक कौशलों के विकास के कितने और कौन से अवसर मिलते हैं ये सवाल उनके लिए विशेष महत्त्व नहीं रखते। महत्त्व इस बात का रह जाता है कि पढ़ाई के नाम पर वे जीवन के उस चरण को कुछ वर्ष स्थगित रख लेंगी जिसमें उनकी वह प्राकृतिक चाह जो मनुष्य होने के नाते उनके मन में स्वायत्त सोच और व्यवहार के साथ जीने की इच्छा पैदा करती है। 

          आशय यह है कि शिक्षा लड़कियों के लिए ज्ञान या चेतना का ज़रिया कम, मुख्यतः एक अवधि है जिसमें उनके दमित आत्म की लौ कुछ वर्ष इस पूर्वज्ञान के साथ जल लेती है कि उसे विवाह में निहित हस्तांतरण के तहत एक आक्रामक फूंक के बल से बुझ जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्त्रियों के जीवन में लंबी और व्यवस्थित शिक्षा, सांसारिक सफलता और वैवाहिक जीवन के त्रिकोण में प्रकट होने वाले तनाव इतनी जीवनियों में देखने को मिलते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत अनुभव के संयोग नहीं, एक अनिवार्य सामाजिक सृष्टि कहना ही उचित होगा।

          शिक्षा का आधुनिक रूप व्यक्तित्त्व के निर्माण का साधन माना जाता है। खासकर जब शिक्षा किसी स्थायी आजीविका या पेशे की तरफ ले जाती हो। शिक्षा का यह प्रभाव स्त्री के उस जीवन-चक्र से टकराता है जो संस्कृति के चौखटे में समाज के विभिन्न वर्गों में जीया जाता है। एक सामान्य भारतीय लड़की के जीवन का निर्धारण करने वाली संस्था विवाह है और उसमें निहित अपेक्षाएँ शिक्षा की संस्थाई अपेक्षाओं से टकराती हैं। इस टकराव में विवाह की विजय समाज के स्थापित ढाँचे में नियति की तरह पूर्व-निश्चित है।

           विवाह की तैयारी लड़की के जीवन में अन्तर्निहित अर्थात् रची-बसी है जबकि शिक्षा की तैयारी एक हस्तक्षेप (Interference) है। कुछ परिस्थितियों में यह हस्तक्षेप बर्दाश्त कर लिया जाता है तो कुछ परिस्थितियों में वह कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है। लड़कियाँ लड़ती रहती हैं और इस मुहावरे का प्रयोग अथक रूप से करती चली जाती हैं कि 'मैं अभी पढ़ाई करना चाहती हूँ।' जैसा कि एक अध्ययन ने दर्शाया है, 'पढ़ाई' एक प्रतीक-भूमि की तरह इस्तेमाल होने लगती है जहाँ लड़की की आवाज़ आधुनिक अर्थव्यवस्था ने वाज़िब या सुनने और बर्दाश्त करने लायक बना दी है। पढ़ाई जारी रखने की मांग का परोक्ष अर्थ होता है विवाह के स्थगन की मांग। पढ़ाई करने दी जाए तो इसका आशय यह नहीं होता कि विवाह की तैयारी रूक जाएगी। विवाह एक घटना के रूप में स्थगित होता है, लड़की के जीवन को आकार देने वाली परिघटना (Phenomenon) "A fact or situation that is observed to exist or happen, especially one whose cause or explanation is in question. एक तथ्य या स्थिति जो अस्तित्व में है या घटित होती है, विशेष रूप से जिसका कारण या स्पष्टीकरण प्रश्न में है।" के रूप में नहीं। उसकी अपेक्षाएँ शिक्षा की अपेक्षाओं और जरूरतों से एकदम भिन्न हो सकती हैं और यह भिन्नता बनी रहती है। 

           शिक्षा एकाग्रता, बौद्धिक अनुशासन और स्वावलंबी सोच या सपने देखने की माँग करती है। विवाह समर्पण की मानसिक और दैहिक तैयारी के प्रबन्धन की माँग करता है। विवाह की तैयारी लड़कियों के बचपन और किशोरावस्था के वर्षों में लगातार चलने वाली उन्मुखीकरण का रूप ले लेती है जिसमें तरह-तरह की सांस्कृतिक क्रियाओं और रस्मों व रिवाज़ों का ज्ञान तथा अभ्यास शामिल रहता है। उधर स्कूल में प्रकृति और समाज को वृहत्तर परिधि से संबंधित ज्ञान और उससे संबंधित कौशलों पर अधिकार की अपेक्षा की जाती है। दोनों के बीच समय को लेकर टकराव होता रहता है जिसे लड़के महसूस नहीं करते केवल लड़कियाँ झेलती हैं। स्कूल विभिन्न विषयों को पढ़ाई में दैनिक स्तर के ध्यान और विकास को अपेक्षा रखता है। इधर घर में लड़कियाँ विवाह की तैयारी से संबंधित सांस्कृतिक ज्ञान और कौशलों से जुड़ी अपेक्षाएँ, धार्मिक मान्यताओं और त्योहारों व रीति-रिवाजों के वार्षिक-चक्र में अवस्थित रहती हैं। 

         ये अपेक्षाएँ लड़की को स्कूल से बार-बार अनुपस्थित होकर ही पूरी हो पाती हैं। कुछ अपेक्षाएँ ऐसी हैं जो स्कूल से अनुपस्थित रहे बिना पूरी हो जाती हैं मगर वे भी स्कूल की दैनन्दिनी में लड़की की भागीदारी को ढीला बना देती हैं। देह को संभालने व सेवा को माँग करने वाली अपेक्षाएँ इसी किस्म की हैं। वे सामान्य स्वास्थ्य-रक्षा से कहीं अधिक विशद् और समयसाध्य हैं। नाखूनों, खाल, आँखों और बालों समेत शरीर के तमाम अंगों की अलग-अलग चिंता विवाह की लम्बी तैयारी का हिस्सा है। इसके अलावा शरीर के वजन और आकार की चिंता लड़की के मानस को देह की छाया में बाँधे रखती है। समय आने पर विवाह के लिए चुना जाना एक तरह की परीक्षा में सफल होने जैसा होता है। इस परीक्षा का सबसे चुनौती भरा पर्चा देह विषयक होता है, उसके बाद सांस्कृतिक ज्ञान और सामाजिक कौशल आते हैं। 

           स्कूल में प्राप्त और विकसित होने वाला ज्ञान और उससे जुड़े कौशल विवाह की दृष्टि से या तो अनुपयोगी हैं अथवा प्रतिस्पर्धी। विज्ञान की पढ़ाई से संबंधित मानसिक कौशल और रुझान जो विश्वासों और अंधविश्वासों पर चोट करते हैं, विवाह की परीक्षा में उत्तीर्ण होने में बाधा डालते हैं। माहवारी से संबंधित पारम्परिक विचार और व्रत व उपवासों से जुड़े विश्वास शिक्षा प्राप्त करती लड़की के मानस को लगातार दुविधा में रखते हैं। वह समझ जाती है कि स्कूल की पढ़ाई का विवाह की तैयारी से मात्र व्यावहारिक संबंध है और वह इस कारण है कि पढ़े-लिखे वर के लिए वधू भी पढ़ी-लिखी होनी चाहिए। लेकिन वधू से यह उम्मीद कतई नहीं की जाएगी कि वह स्कूल में समाज विज्ञान को पढ़ाई के तहत प्राप्त अपने संवैधानिक या मानवाधिकारों के ज्ञान को गंभीरता से लेने लगे या उन्हें परिवार की परिधि में लागू करने लगे। इस नज़रिए से लड़कियों की शिक्षा के बारे में सोचकर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि स्कूल और कॉलिज की पढ़ाई में सफलता हासिल करने वाली लड़कियाँ अपने मानस को दो हिस्से में बाँटकर बड़ी होती होंगी। 

           एक हिस्से में पढ़ाई और परीक्षाओं से पुष्ट ज्ञान का विकास रहता होगा जो संविधान, लोकतंत्र, मानव-मूल्य और विज्ञान की शब्दावली में व्यक्त होता है, दूसरे हिस्से में घर और पड़ोस, त्योहारों, सिनेमा और टीवी के जरिए होने वाले समाजीकरण से प्राप्त वह ज्ञान रहता होगा जो लड़कियों को बताता है कि संविधान में दर्ज समता और अन्य मानवाधिकार ससुराल की दुनिया पर लागू नहीं होते। वह संविधान का परदेस है 

           जो लड़कियाँ अपने शिक्षित संस्करण और गृहस्थिन संस्करण के बीच सामंजस्य बिठा लेती हैं, अपवाद होती हैं। ज्यादातर के लिए शिक्षित संस्करण के आकार और उसमें निहित आकांक्षाओं को सिकोड़ते जाना जरूरी सिद्ध होता है। उसे एक समानान्तर धारा की तरह किसी प्रकार बहाए रखती हैं, पर उसमें इतना नहीं डूब पातीं कि उसे अपने ज्ञान, कौशल या यश की धुरी बन जाने दें। वे दो जिंदगियाँ जीती हैं और इस कारण प्रायः थक जाती हैं। इस थकान का विश्लेषण करें तो दिखता है कि घर और पेशे की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए आवश्यक ऊर्जा का चुक जाना एक कारण हो सकता है, मगर ज्यादा बड़ा लेकिन क्योंकि गहरा कारण वह अकेलापन है जिससे भारत की स्त्री जीवन-भर जूझती है। इस भाव की विवेचना जितनी कठिन है उतना ही इसका प्रमाण देना। ऊपर से देखने पर कौन कहेगा या मानेगा कि भारत में स्त्री लगातार अकेलेपन से जूझती है। इस भाव की विवेचना जितनी कठिन है उतना ही इसका प्रमाण देना। ऊपर से देखने पर कौन कहेगा या मानेगा कि भारत में स्त्री लगातार अकेलेपन से जूझती है ? आखिर वह हमेशा जीवन के हर दौर में किसी-न-किसी के साथ दिखती है। 

           शास्त्रों ने बाकायदा हिदायत दे रखी है कि बचपन में स्त्री को अपने पिता की, यौवन में पति की और वृद्ध हो जाने पर पुत्र की छत्र-छाया में जीना चाहिए। स्त्री की लोकछवि ऐसी है जो उसे घर-परिवार, बाल-बच्चों से घिरा हुआ दिखाती है। अकेलेपन का अर्थ यदि साथ का अभाव है तो निश्चय ही हमारे समाज में स्त्रियाँ कभी अकेली नहीं पड़ती। पर यदि अकेलेपन का अर्थ अपने अंतस को व्यक्त कर सकनें वाली अस्मिता से है तो यह कहना गलत न होगा कि वे जीवन-भर किसी ऐसे का साथ नहीं पाती जो उनके आत्म को व्यक्त और विकसित होने दे।

             वे अभिमन्यु की तरह एक चक्रव्यूह से घिरी, उससे लड़ती-लड़ती खत्म हो जाती हैं। स्त्री के जीवन-संघर्ष का स्वरूप शिक्षा के ज़रिए एक हद तक बदला जा सकता है पर ऐसा तभी हो सकता है जब स्वयं शिक्षा का चरित्र बदले। अभी तक शिक्षा का स्त्री के जीवन में सामान्यतः यही योगदान रहा है कि वह बचपन और किशोरावस्था की अवधि में घर और कुटुम्ब की चारदीवारी से बाहर रोजाना कुछ घंटे बिता लेती है। आज के भारत में लड़कियों की शिक्षा का विश्लेषण करने के लिए उन तीन पेशों को संदर्भ बनाना उपयोगी होगा जिनका आधुनिकता के निर्माण में योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ये तीन पेशे हैं डॉक्टरी, इंजीनियरी और वकालत। इन पेशों के ज़रिए जीवन और मरण संबंधी मान्यताएँ, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की संरचना और समाज के ढाँचे में व्यक्ति के अधिकारों को अवधारणा का विकास हुआ हैं। ज़ाहिर है, यह विकास एक ज़्यादा बड़ी ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा है और किसी एक कारक पर निर्भर नहीं है। फिर भी इस विकास प्रक्रिया में डॉक्टरी, इंजीनियरी और वकालत का योगदान विश्लेषण का उपयुक्त विषय है। यह विश्लेषण शिक्षा के समाजशास्त्र की दृष्टि से इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इन तीनों पेशों में ज्ञान और विज्ञान के विविध विषयों और उनसे जुड़े बौद्धिक कौशलों का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। इन पेशों में प्रवेश के लिए आवश्यक शैक्षिक अर्हताओं का वितरण एक पैमाना है जिसकी मदद से समाज के विषमतापूर्ण ढाँचे के रहते एक समतामुखी सांस्कृति और राजनैतिक प्रयास में शिक्षा के योगदान का आकलन किया जा सकता है।

           पिछले सवा सौ वर्षों में और विशेषकर आज़ादी के बाद से डॉक्टरो, इंजीनियरी और वकालत के पेशों में महिलाएँ गई हैं और सफल हुई हैं। इस बात से देश को यश मिला है जिसका नशा बहुत व्यापक है। उसके प्रभावश अनेक लोग मानने लगे हैं कि शिक्षा में लड़कियों की बराबरी का लक्ष्य लगभग पा लिया गया है। इस मान्यता के पक्ष में वे यह दलील देते हैं कि सार्वजनिक जीवन में पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ पहले से ही ज्यादा संख्या में दिखाई देने लगी हैं।सरकारी कार्यालय, बैंक, उद्योग और व्यापार, मीडिया और विश्वविद्यालय में शिक्षित स्त्रियों को अपने पुरुष सहकर्मियों के साथ काम करता देखकर यह धारणा पुष्ट होती है कि अब भारत की नारी पर्दे के पीछे या घर की चारदीवारी में नहीं रही। खासकर मीडिया ने इस धारणा को बहुत पोषण दिया है कि स्त्री का शैक्षिक पिछड़ापन एक पुरानी बात हो चुकी है और यह बात यदि आज भी कहीं सच है तो गाँव में ही सच हो सकती है। टेलीविजन से बहुत पहले सिनेमा ने शिक्षित स्त्री को इस तरह पेश करना शुरू कर दिया था जिससे लगे कि प्रेम के सामाजिक संदर्भ में पुरुष और स्त्री बराबरी से खड़े हैं। लगभग तीन-चौथाई सदी इस काल्पनिक विश्वास को फैलाने के निरंतर संपोषण में बीत गई है। लड़कियों की तीन पीढ़ियाँ सिने जगत और सामाजिक जगत के फासले को अपने मानसिक संघर्ष से पाटने में निकल गई हैं। लड़कियों और लड़कों की शैक्षिक बराबरी का भ्रम अखबारों के जरिए भी लगातार फैलता रहा है। खासकर दसवीं और बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा के परिणाम की घोषणा के समय 'लड़कियाँ लड़कों से आगे' जैसी सुर्खियां छापने से कोई अख़बार बाज़ नहीं आते। 

             सरकारी अधिकारी और नेता आए दिन कहते रहते हैं कि स्कूलों में लड़कियों की प्रवेश दर लड़कों की बराबर हो चुकी है। 'लेडी डॉक्टर' शब्द सुनने और बोलने के हम इतने ज्यादा अभ्यस्त हो गए हैं कि स्कूल की शिक्षा के बाद डॉक्टरा जैसे पेशे की शिक्षा में लड़कियों के पहुँच का यथार्थ हमें तंग नहीं करता। डॉक्टरी की शिक्षा के क्षेत्र में पहली भारतीय लड़की के प्रवेश को एक शताब्दी से ऊपर समय हो गया है परन्तु आज भी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाली लड़कियाँ कुल विद्यार्थियों की 27 प्रतिशत ही हैं और इनमें भी ज्यादातर महिला रोगों की विशेषज्ञ या फिर सामान्य डॉक्टर बनती हैं। 

               शिक्षा स्त्री की अकेली राह की पाथेय बने, यह तभी संभव है जब हम शिक्षा की परिकल्पना और तैयारी स्त्री के अभिमन्यु को ध्यान में रखकर करें। लड़कियों की शिक्षा पुनर्रचना हमें उस चक्रव्यूह को समझने के उद्देश्य से करनी होगी जो जन्म के साथ ही हर बच्ची को घेर लेता हैं। जैसे-जैसे वह बड़ी होती है उसके अंदर चक्रव्यूह को देख पाने की क्षमता बढ़ती है और साथ ही उसे मंजूर और आत्मसात् करने की विवशता बढ़ती जाती है। चक्रव्यूह को देख पाना उसे भेदने की शुरूआत नहीं है क्योंकि व्यूह का अर्थ यहाँ उसकी मानसिक रचना से अलग नहीं है। चक्रव्यूह एक सामाजिक कृति अवश्य है पर हर लड़की उसे अपने मानस में व्यक्तिगत स्तर पर रचती है, तभी चक्रव्यूह की सामाजिक कृति एक जीवन में सक्रिय हो पाती है। यदि चक्रव्यूह से आशय इस संरचना से है जो लड़की को परतंत्रता (Dependency) में जीना सिखाती है तो इसे गुलामी की आवश्यक संरचना भी कहा जा सकता है कहा जा सकता है क्योंकि गुलाम के लिए अपनी गुलामी से संतुष्ट रहना बहुत जरूरी है। कष्ट, अपमान, निर्भरता और अपने जीवन की क्षुद्रता (Meanness) का बोध तभी जीवनपर्यन्त सहनीय बने रह सकते हैं जब उन्हें अपने संस्कार बना लिया जाए। 

             यही काम जन्म से शुरू होने वाली व्यूह-रचना मानसिक स्तर पर करती है जिसके अलग-अलग पक्षों की झलक इस पुस्तक में दी गई है। अभिमन्यु होने के कई अर्थ संभव हैं परन्तु जिस अर्थ से लड़की के अस्तित्व की व्यंजना सबसे स्पष्ट रूप में व्यक्त होती है यह एक दुर्जेय संघर्ष से अकेले निपटने का नियति का है। अभिमन्यु सा शौर्य उसे बचा नहीं सकता, जिता भी नहीं सकता, यह शुरू से तय था। लड़कियों के जीवन में भी उनके अकेलेपन की अनिवार्यता रोजमर्रा से लेकर स्थायी किस्म के संघर्षों को समेटती है। 

             विवाह की रस्मों के बाद बारात के साथ जाती हुई लड़की का अकेलापन मात्र विदाई गीतों या उनका साथ देने वाले संगीत का विषय नहीं है। वह एक साथ एक भौतिक और सांस्कृतिक सच है। यदि इस सच को लड़कियों की नई शिक्षा की धुरी बनाया जाए तो उसका पहला अर्थात् सबसे बड़ा उद्देश्य हर लड़की को ऐसे बौद्धिक और भावनात्मक कौशल देना होगा जो उसे अपने अकेलेपन को पहचानने और उसे स्पष्टत: देखकर उत्पन्न होने वाली घबराहट और आत्मदया पर काबू पाने की क्षमता दे। 

        दूसरा उद्देश्य भविष्य की संभावनाओं पर विश्वास उत्पन्न करना होगा, इस संभावना पर कि ऐसे संसार का जन्म संभव है जिसमें लड़कियाँ सुरक्षित जी सकेंगी और जीवन की पूर्णता की अनुभव कर सकेंगी। आज की दुनिया को देखते हुए यह बात एक आस्था का विषय ही हो सकती है जिसे पल्लवित करना शिक्षा का काम है।

बुधवार, 28 जुलाई 2021

स्वयं की मजबूतियों और कमजोरियों को समझना (Understanding Your own Strengths and weaknesses) B.Ed. & D.El.Ed. S-4 and EPC-4 Hindi or English Notes.

  स्वयं की मजबूतियों और कमजोरियों को समझना 

(Understanding Your own Strengths and weaknesses) 

           स्वयं की मजबूतियों एवं कमजोरियों को पहचानने में सक्षम होकर परिवार, विद्यालय और विभिन्न स्थानों पर अपनी पहचानों और भूमिकाओं को समझ पाना ही स्वयं की पहचान है। 

         विद्यालय में आपसे शायद कभी पूछा गया होगा- "बड़े होकर आप क्या बनना चाहते हो?" इस प्रश्न में "क्या" की बजाय "कौन" पर अधिक जोर दिया गया है। सवाल यह उठता है कि हम क्या बनना चाहते हैं, क्या इसके पहले हमें यह पता है कि हम क्या है? 

आइए इस लेख में इसी मुद्दे पर चर्चा करते हैं। मुझे लगता है कि निम्नलिखित बातें अपने आप को समझने में हमारी मदद कर सकती है-

• अपनी शक्तियों को समझना :- आप में स्वाभाविक रूप से कौन-सी योग्यताएँ, विद्यमान है तथा किनका पोषण व विकास करना चाहते हैं? वे शक्तियाँ जो आपमें विद्यमान हैं और जिन्हें आप पोषित और विकसित करना चाहते हैं, आपकी निजी परिसम्पत्ति हैं। इनके कारण आप जीवन में एक अलग स्थान रखते हैं जो दूसरों से भिन्न हैं। इनसे आपको अवगत होना चाहिए। इसमें आपकी सांवेगिक शक्तियों (Emotional forces) और प्रेम अभिव्यक्ति की योग्यता तथा गुण-दोष विवेचन की योग्यता सम्मिलित है। 

• अपने मनोवेगों को जानना :- वह क्या है जिसकी आपको एक धुन रहती है। वह क्या है जिससे आप उत्तेजित या उत्साहित हो जाते हो एवं उसे आपकी एकाग्रता की आवश्यकता है ? वे कौन से क्रियाकलाप और लक्ष्य हैं जिनसे आप वास्तव में सजीव अनुभव करते हो ? आप अपने जीवन का निर्माण उन मनोवेगों के इर्द-गिर्द नहीं कर सकते यदि आपने उन्हें सही रूप में पहचाना नहीं है। जब आप आन्तरिक समन्वय उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हों। यह सुनिश्चित करना कि आपके मनोवेग तथा आपके मूल्य और मानक एक दिशा में हैं, आपके लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होगा। 

• अपने मूल्यों की जानकारी :- ये वे बातें हैं जो गहनतम स्तर पर आपके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। आपके निजी मूल्य एवं मानदंड (मानक) क्या है ? आपकी प्राथमिकताएँ तथा विश्वास या आस्थाएँ क्या है ? आप इन्हें इतना महत्त्व क्यों देते हैं ? आप अपने निजी मानकों और नैतिक मूल्यों को किस स्तर की वचनवद्धता देना चाहते हैं ? आप अपने वास्तविक आत्म के प्रति कितना सच्चा रहना चाहते हैं ? 

• अपनी प्रवृत्तियों को पहचानना :- आपकी प्रवृत्तियाँ चाहे वे अच्छी हो या बुरी, आपकी आदत बन जाती हैं। क्या आप अपनी सोच के आधार पर किन्हीं कार्यों को करना चाहोगे ? या आप चाहोगे कि कार्यों को टालते रहें या अत्यधिक प्रक्रिया करोगे ? अपनी अभ्यसित प्रवृत्तियों को जानना, आपके लिए उन क्षेत्रों के विश्लेषण में सहायक हो सकता है जिनमें कुछ सुधार की आवश्यकता है। इससे आपको यह जानने में मदद मिलेगी कि कौन-सी प्रवृत्तियाँ आपकी प्रबलताओं और सफलताओं में अत्यधिक योगदान देती हैं। 

• अपनी कमियों (परिसीमाओं) को स्वीकार करना :- यह समझ लें कि आप प्रत्येक प्रयास या क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ नहीं बन सकते। यह जान लेना अच्छा होगा कि इस समय कौन से कौशल एवं क्रियाकलाप आपकी योग्यताओं से परे हैं। ऐसा जानते हुए आप ऐसे क्रियाकलाप का दायित्व किसी और को दे सकते हैं तथा अपनी ऊर्जा का प्रयोग वहाँ करेंगे जहाँ सबसे प्रभावी हो सकता है। हम जीवन के अधिकांश क्षेत्रों में अपनी योग्यताओं में सुधार ला सकते हैं अत: वर्तमान कमियों को स्थाई न समझें। अपने निजी मूल्यांकन में यथार्थवादी तथा व्यावहारिक बने। अपने वास्तविक आत्म को जानने में आपकी सत्यनिष्ठा (ईमानदारी) एक पूर्वापेक्षा (Prerequisite) है। 

• अपने लक्ष्य निर्धारित करना :- आप वास्तव में किस वस्तु को प्राप्त करना चाहते हो। आप किस तरह के व्यक्ति के रूप में विकसित होना चाहते हो ? आपके लक्ष्य विशिष्ट, निर्धारणीय तथा वास्तविक या यथार्थवादी होने चाहिए। जब बात लक्ष्य निर्धारण की होती है तो इसका मुख्य तत्त्व स्पष्टता है। स्पष्टता कार्य को प्रेरित करती है एवं स्पष्टता का अभाव, गड़बड़, विभ्रम तथा निष्क्रियता की ओर ले जाता है। 

• अपनी दिशा स्थापित करना :- आपका वास्तविक आत्म जीवन में किस ओर जाना चाहता है ? एक बार जब आप अपने मूल्यों, शक्तियों, मनोवेगों, प्रवृत्तियों, सीमाओं और लक्ष्यों को समझ जाते हो तो आपको एक गन्तव्य  की आवश्यकता पड़ती है जिस ओर आप गमन करना चाहोगे। यही आपकी दिशा होगी। अपने गन्तव्य पर पहुँचने के बारे में चिन्ता न करें क्योंकि जो महत्त्वपूर्ण है वह 'यात्रा' है। अत: एक ऐसी दिशा को चुनें जो वास्तविक प्रसन्नता का निरूपण करती हो तथा इस और आगे बढ़ो। तब देखोगे कि जीवन आपके सम्मुख कैसे खुल जाता है और खिल उठता है।


Understanding Your own Strengths and weaknesses


              Being able to recognize one's own strengths and weaknesses and being able to understand one's own identities and roles in the family, school and various places is self-identity.

You might have been asked in school, "What do you want to be when you grow up?" In this question the emphasis is on "who" rather than "what". The question arises, what do we want to be, before we know what we are?

Let us discuss this issue in this article. I think the following things can help us to understand ourselves-

• Understanding your strengths: - What abilities are naturally present in you and which do you want to nurture and develop? The forces that exist in you and that you wish to nurture and develop are your personal assets. Because of these you hold a different place in life which is different from others. You should be aware of them. This includes your emotional forces and the ability to express love and to discuss merits and demerits.

• Knowing your passions:- What is it that you have a passion for. What is it that gets you excited or excited and that requires your concentration? What are the activities and goals that make you feel really alive? You cannot build your life around those emotions if you do not identify them properly. When you are trying to create internal coordination. Making sure that your passions and your values ​​and standards are in one direction will be very important to you.

• Knowing Your Values:- These are the things that are most important to you at the deepest level. What are your personal values ​​and standards? What are your preferences and beliefs or beliefs? Why do you give so much importance to them? What level of commitment do you want to give to your personal standards and moral values? How true to your true self do you want to be?

• Recognizing your tendencies:- Your tendencies, whether they are good or bad, become your habit. Would you like to do any work based on your thinking? Or would you like to keep postponing tasks or over-processing? Knowing your habitual tendencies can help you analyze areas that need some improvement. This will help you to know which tendencies contribute the most to your strengths and successes.

• Accepting your limitations:- Realize that you cannot be the best in every endeavor or field. It would be good to know which skills and activities are beyond your abilities at the moment. Knowing this, you can delegate such activities to someone else and use your energy where it can be most effective. We can improve our abilities in most areas of life, so don't take the present shortcomings as permanent. Be realistic and practical in your personal assessment. Your integrity is a prerequisite in knowing your true self.

• Setting your goals:- What do you really want to achieve. What kind of person do you want to grow into? Your goals should be specific, determinable and realistic or realistic. When it comes to goal setting, the key element is clarity. Clarity drives action and lack of clarity leads to confusion, confusion and passivity.

• Establishing your direction:- Where does your real self want to go in life? Once you understand your values, strengths, impulses, tendencies, limitations and goals, you need a destination to which you would like to travel. This will be your direction. Don't worry about reaching your destination because what is important is the 'journey'. So choose a direction that represents real happiness and move on. Then you will see how life opens up and blossoms in front of you.

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

लिब्रे ऑफिस क्या होता है? What is Libre Office ? Libre office kya hota hai. संपूर्ण जानकारी हिंदी में।

प्रश्न.- लिब्रे ऑफिस क्या है? (What is Libre Office?

उत्तर:- Libre Office एक आफिस Suit है जो ऑफिसियल कार्य करने के लिए बनाया गया है। यह M.S. Office (Microsoft Office) की तरह ही एक Open Source Software है, जो कि एकदम फ़्री है। यानी इसके प्रयोग के लिए आपको कोई भी पैसे नहीं देने पड़ते। लिब्रे ऑफिस का निर्माण 2010 में किया गया था लेकिन इसे 25 जनवरी 2011 को लांच किया गया।
       
       Libre Office डॉक्युमेण्ट फाउण्डेशन (The Document Foundation) द्वारा विकसित एक निःशुल्क यानी की बिल्कुल मुफ्त 'office suit' है।

       Libre Office सभी Microsoft Windows, Apple Mac OS, Linux इत्यादि GUI Based Operating system पर आसानी से कार्य करता है।

        लिब्रे आफिस में Libreoffice Writer दिया गया है जो MS Word की तरह कार्य करता है। Libreoffice Impress, MS Powerpoint की तरह कार्य करता है। MS Excel की जगह Libreoffice Calc कार्य करता है। इसी तरह MS Access के तरह Libreoffice Base कार्य करता है। अगर आपको drawing बनानी है तो आप Libreoffice Draw का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके साथ ही Libreoffice Math का इस्तेमाल आप Mathematical Equation के लिए भी कर सकते हैं।

Libre Office और MS Office में अंतर
Difference Between Libre Office and MS Office

लिब्रे ऑफिस के प्रकार
Libre Office Components

       अब आगे हम जान लेते है कि MS Office में और Libre Office के component के बीच क्या क्या समानताये हैं।


Libreoffice Writer ~ MS Word

Libreoffice Calc ~ MS Excel

Libreoffice Impress ~ MS Powerpoint

Libreoffice Base ~ MS Access

Libreoffice Draw ~ Paint

LibreOffice Math ~ Excel Formula


Libreoffice Writer
 
           Libreoffice Writer एक word processor है जो पूरी तरह से MS Word की तरह ही कार्य करता हैं। जिस तरह हम MS Word पर कार्य करते है, उसी तरह वही काम हम Libreoffice Writer में कर सकते हैं। इसमें भी किसी भी फ़ाइल या डॉक्यूमेंट को एडिट किया जा सकता है, प्रिंट किया जा सकता है तथा उसे सेव किया जा सकता है। MS Word की तरह यहां भी सभी Options व Menu दिए गए होते हैं।

Libreoffice Impress

          Libreoffice Impress, MS Powerpoint की ही भाँति एक सॉफ्टवेयर है जिसमे की आप presentations, slides, Images, videos, media etc को edit कर सकते है व इनको create कर सकते है और फिर बाद में सेव कर सकते हैं। 


Libreoffice Calc

       Libreoffice Calc भी MS Excel के जैसा एक सॉफ्टवेयर है जिसमे सभी official calculations, formulas, होते है, जिनका इस्तेमाल करके Banking Chart, Year wise data chart, student percentages, calander dates, इत्यादि को create किया जाता है। इसमें भी वही सारा काम किया जा सकता है जो हम अभी तक MS Excel में करते आये हैं। 

Libreoffice Calc 

         यदि आपको drawing बनानी अच्छी लगती है तो आप Libreoffice Draw का इस्तेमाल कर सकते हैं। यही सुविधा हमे Microsoft Window के पेंट नाम के Application में प्राप्त होती है।


LibreOffice Math

Libreoffice Math का इस्तेमाल आप Mathematical Eqautions के लिए कर सकते हैं जोकि हमें माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के Excel Formula में प्राप्त हो जाता है।

बुधवार, 30 जून 2021

चेतन, अचेतन और अवचेतन मन में क्या अंतर है ? What is the difference between Conscious, unconscious and subconscious Mind ? Hindi & English Notes.


चेतन मन (Conscious Mind):- जब हम कोई कार्य सक्रिय अवस्था में रहकर करते हैं तब उसे हम चेतन मन कहते हैं। मतलब हमारा मन उस समय पूरी तरह तत्पर (Active) होता है। चेतन मन को हम तत्पर दिमाग (Active Mind) भी कह सकते हैं।

उदाहरण स्वरूप,

            जब हम कोई कार्य पहली बार सीखते या करने की कोशिश करते हैं तब उस समय हमारा मन पूरी तरह चेतन अवस्था में होता है। हमारा पूरा ध्यान उस कार्य के प्रति हो जाता है इसी को हम चेतन मन कहते हैं।

Conscious Mind Controls:-

  • Always available & accessible (सुलभ) information.
  • Willpower (इच्छाशक्ति)
  • Decision Making
  • Thinking Logically
 अचेतन मन (Unconscious Mind):- यह हमारे मस्तिष्क का लगभग 50% हिस्सा होता हैं। यह वह मानसिक स्तर है जो न ही पूर्णतः चेतन होता है और ना ही पूर्णतः अवचेतन। अर्थात,
      हमारे अचेतन मन में जो भी विचार होते हैं वह चेतन स्तर पर कार्यरत नहीं होते हैं।

Unconscious Mind Controls:-
  • Data you have to dig (खोदना) to access.
  • Reoccurring thoughts (विचारों को फिर से समझना)
  • Behaviors, Habits & Feelings.
  • Recent Memories.

अवचेतन मन (Subconscious Mind):- जिसके कार्य के बारे में व्यक्ति को जानकारी नहीं रहती यह मन की स्वस्थ एवं अस्वस्थ क्रियाओं पर प्रभाव डालता है। इसका बोध व्यक्ति को आने वाले सपनों से हो सकता है।

Subconscious Mind Controls:-
  • Memories, Beliefs (मान्यताएं) & Habits from age 0-7.
  • Traumatic (दर्दनाक) Stored Events.
  • Phobias & Addictions.
  • Information that's kept hidden, locked & Resists Change. (परिवर्तन का विरोध करना).
  • Overriding (अधिभावी) more important than any other considerations.  Information stored in other two areas. अन्य दो क्षेत्रों में संग्रहीत जानकारी को ओवरराइड करना।
  • You and Your life.

Conscious Mind:- When we do any work while in an active state, then we call it conscious mind. Meaning our mind is fully active at that time. We can also call conscious mind as active mind.

For example,

When we learn or try to do something for the first time, then at that time our mind is in a completely conscious state. Our full attention becomes towards that task, this is what we call the conscious mind.

Conscious Mind Controls:-

  • Always available & accessible information.
  • Willpower
  • Decision Making
  • Thinking Logically
Unconscious Mind:- It is about 50% of our brain. It is that mental level which is neither wholly conscious nor wholly subconscious. meaning,
Whatever thoughts we have in our unconscious mind are not working on the conscious level.

Unconscious Mind Controls:-

  • Data you have to dig (dig) to access.
  • Reoccurring thoughts
  • Behaviors, Habits & Feelings.
  • Recent Memories.


Subconscious Mind:- The function of which the person is not aware of, it affects the healthy and unhealthy activities of the mind. This can be realized by the dreams coming to the person.

Subconscious Mind Controls:-

  • Memories, Beliefs & Habits from age 0-7.
  • Traumatic Stored Events.
  • Phobias & Addictions.
  • Information that's kept hidden, locked & Resists Change. (opposing change).
  • Overriding is more important than any other considerations. Information stored in other two areas. Overriding the information stored in the other two fields.
  • You and Your life.

गुरुवार, 17 जून 2021

अपने जीवन मे स्वयं को समझते हुए लक्ष्यों को निर्धारित करने में कौन-कौन सी बातें सहायता करती है ? What are the factors that help in determining your goals while understanding yourself in your life?

प्रश्न:- अपने जीवन मे स्वयं को समझते हुए लक्ष्यों को निर्धारित करने में कौन-कौन सी बातें सहायता करती है ? 

Question:- What are the factors that help in determining your goals while understanding yourself in your life?




Answer:- हम अपने जीवन में जो भी लक्ष्य का निर्धारण करते हैं उनमें कहीं ना कहीं हमारी मनोदशा, आर्थिक दशा, हमारा परिवेश, हमारे रिश्तेदार, इत्यादि। इन सभी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि इन सभी के सानिध्य में रह करके ही हम अपनी भूमिका को स्पष्ट करनी होती है। यदि हमारे द्वारा कोई लक्ष्य का चुनाव किया जाता है या करना होता है तो मेरा मानना है कि सबसे पहले हमें स्वयं को समझ लेना चाहिए। 

           हम अपने स्वयं के साथ चौबीसों घंटा (24 hrs.) रहते हैं। दूसरा व्यक्ति दो या चार घंटा या फिर उससे भी कम समय में वह मुझे कैसे समझ सकता है? इसीलिए जब भी लक्ष्य का निर्धारण करना हो चाहे वह भविष्य के लिए हो या जीवन से संबंधित। हमें सबसे पहले स्वयं से वार्तालाप करना चाहिए कि अमुक कार्य जो हम करने जा रहे हैं या मेरे द्वारा किया जा रहा है वह उचित है या अनुचित। उसका भविष्य में क्या परिणाम हो सकता है क्या दुष्परिणाम हो सकता है। जब तक इन सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर न प्राप्त हो जाए तब तक हमें उस कार्य को शुरू नहीं करना चाहिए।

          अब हम चर्चा कर लेते हैं उन कारकों (Factors) के बारे में जो लक्ष्यों के निर्धारण के उपरांत हमारे सम्मुख प्रस्तुत होते हैं उनमें से कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो आपको सहायता प्रदान करते हैं तो दूसरा आपको कार्य से विचलित भी कर सकते हैं। हमें ऐसे कार्यों की पहचान करके उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए ताकि हम बेहतर ढंग से अपने कार्य को संपन्न कर पाए।

            अपने जीवन में स्वम् को समझते हुए लक्ष्य को निर्धारित करने में निम्न बातें सहायता प्रदान कर सकती है-

(1) घर वालों का आप के प्रति सकारात्मक विचार:- यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उससे आपके घर वालों की पूर्ण सहभागिता (Full Participation) होनी चाहिए तभी आप अपने लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं अन्यथा भविष्य में परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है।

(2) स्वयं के प्रति ईमानदार होना:- अधिकतर बार देखा गया है कि लक्ष्य का निर्धारण करने के उपरांत हमारे द्वारा इतनी ईमानदारी से मेहनत नहीं की जाती जितनी की होनी चाहिए जो कि लक्ष्य को प्राप्त करने में परेशानी खड़ी कर सकती है।

(3) मित्रों का सहयोग:- हम अपने जीवन में कई तरह के व्यक्तियों से मिलते हैं कुछ लोगों के आचरण एवं व्यवहार की वजह से वह हमारे मित्र भी बन जाते हैं। अच्छे मित्रों के उचित सहयोग एवं मार्गदर्शन की वजह से हमें अपने लक्ष्य निर्धारित एवं प्राप्त करने में काफी सुविधा होती है।

(4) अच्छे शिक्षकों की भूमिका:- छात्रों के भविष्य निर्माण में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है वह अपने छात्रों के प्रत्येक गुण एवं दोषों से वाकिफ होते हैं एवं उन्हें पता होता है कि उनका अमुक छात्र किस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। उनके उचित सलाह एवं निर्णय से छात्रों के अपने लक्ष्य निर्धारण एवं उन्हें पूरा करने में काफी सहायता प्राप्त होती है।

(5) छात्रों का परिवेश:- अपने लक्ष्यों का निर्धारण एवं उसे क्रियान्वयन करने में छात्रों के परिवेश की भूमिका सर्वोपरि होती है। वह अपने परिवेश में हो रही गतिविधियों को देख कर के ही अपने लक्ष्य का चुनाव करते हैं। उदाहरण स्वरूप यदि किसी क्षेत्र विशेष के छात्रों का यदि कहीं चुनाव (Selection) हो जाता है तो उस से प्रेरणा पाकर वहां के क्षेत्र के लड़के वही कार्य संपन्न करना शुरू कर देते हैं उन्हें लगता है कि यदि अमुक व्यक्ति ने यह कार्य संपन्न किया है तो वह भी कर सकते हैं। यहां पर वह अपने स्वयं को पहचाने की गलती कर बैठते हैं जिस वजह से उन्हें निराशा हाथ लगती है।

              अंततः हम कह सकते हैं कि जीवन में हमें सफलता तभी मिल सकती है जब हम स्वयं को पहचानते हुए किसी कार्य को संपन्न करें।