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शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

Blogs क्या होता हैं और ये कार्य कैसे करता है ?




Blog, Blogging & Blogger.







        Blog शब्द ‘Web Log’ का संक्षिप्त रुप है, जहाँ पर कोई  भी  व्यकित जब चाहे तब ऑनलाईन अपने व्यक्तिगत विचारो, किसी विषय-विशेष पर लेख, पेंटिग एवं अपनी कलाकृतियो को प्रकाशित कर सकता है। यह जानकारी वह चाहे तो प्राईवेट भी रख सकता है और चाहे तो इसे सार्वजनिक भी कर सकता है। 


ब्लॉग (Blog) से जुड़े हुए कुछ महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ :-

Blog – ब्लॉग शब्द को अभी तक संज्ञा के रूप में वर्णन हो रहा था, एवं इसका हिन्दी अनुवाद होता हैं - चिट्ठा। परन्तु ब्लॉग शब्द एक क्रिया भी है. जिसका अर्थ होता है - ब्लॉग लिखना अथवा नया कंटेट जोडना। इसे गूगल डिक्शनरी ने इस प्रकार परिभाषित किया है -

“Add new material to or regularly update a blog.”

Blogging – ब्लॉग लिखने✍️ की प्रक्रिया ब्लॉगिंग कहलाती है। यानि नई-नई पोस्ट लिखना, अपडेट करना, होस्टिंग खरीदना, डोमेन नेम खरीदना, थीम इंस्टॉल करना, पोस्ट को संपादित करना, आदि। काम सब ब्लॉगिंग़ में ही आते है।

Blogger – जो व्यक्ति ब्लॉग लिखता✍️ है, उसे ब्लॉगर कहते है।

Traffic – ब्लॉग़ को जितने लोगों के द्वारा पढा जाता है उसे ब्लॉग़ का 
ट्रैफिक कहते है। इस ट्रैफिक में ब्लॉग को एक बार भी विजिट करना गिना जाता है।

Blog Post – आप अपने अनुभव, विचार, जानकारी, आईडिया, जिस प्रारुप (Format) में लिखते है उसे ही ब्लॉग़ पोस्ट कहते है।


खुद का ब्लॉग कैसे बनायें ?

       एक ब्लॉग आप 05 Min. के अन्दर बना सकते है। आप ब्लॉगिंग टूल्स की सहायता से मिनटों में अपना ब्लॉग बनाकर पहली पोस्ट भी प्रकाशित कर सकते है।

ब्लॉग बनाने के लिए आपको निम्न चीजों की जरुरत पड़ती है-

E-mail ID
Domain Name
Content
Some Knowledge

ब्लॉग़ के फायदें – 

       ब्लॉग के अनेको फायदें है -

अभिव्यक्ति की आजादी – आप ब्लॉग के माध्यम से खुद के व्यक्तिगत विचारो को प्रस्तुत कर सकते हैं। आपको यहाँ कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है और ना ही आपके ऊपर किसी का नियंत्रण है कि आप सिर्फ इन मापदण्डों को ध्यान में रखकर ही लिखें क्योंकि यहां कोई संपादक आपको आदेश नहीं देने वाला है। इसलिए ब्लॉग का सहारा लेकर सामान्य लोगों के अलावा जर्नलिस्ट, राजनेता, सोशल एक्टिविस्ट, स्टुडेंट्स अपनी बातें शेयर कर रहे है, जिन बातों को आप अखबार, पत्रिका, न्यूज साईट पर नहीं लिख सकते है उन बातों की आप यहाँ खुलकर अभिव्यक्ति कर सकते है।

पैसा कमाने का साधन – ब्लॉग पैसा कमाने का नया साधन बन गया है क्योंकि ब्लॉगिंग में पैसा बनाने की अपार क्षमता है। बस इसे सही तरह और सही दिशा में इस्तेमाल करने वाला ब्लॉगर चाहिए।

लोकप्रियता – आज-कल इंटरनेट रातों-रात सेलिब्रिटी बनने का टूल भी साबित हो रहा है। आप एक ही दिन में लाखों-करोडों लोगों तक अपनी बात पहुँचाकर उन्हे प्रभावित कर सकते है और खुद की लोकप्रियता बढा सकते है। हजारों लोग ब्लॉग लिखकर इंटरनेट सेलिब्रिटी बन गए है और बन भी रहे है। 

पर्सनल ब्रांड बनाने का तरीका – आपके अंदर कोई हुनर है और आपकी पहचान इस हुनर से हो तो आप ब्लॉगिंग को अपना माध्यम चुन सकते है, क्योंकि इंटरनेट की पहुँच लाखों करोडों लोगों तक है। इसलिए आप कम-से-कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुँच पाते है। यहाँ पर अपने कौशल को लोगों को सीखा सकते है, अपने नए कामों के बारे में जानकारी दे सकते है।

दूसरों की मदद करना – ब्लॉग के द्वारा आप लोगों की मदद भी कर सकते है। कैसे? हम बताते है. जरा सोचिए किसी को बिहार की लोककला के बारे में जानकारी चाहिए तो आप उसे साझा कर दुसरे को मदद कर सकते हैं।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए – ब्लॉग लिखने के लिए आपको अपने विषय की गहराई में जाना पड़ता है और शोध करते समय आप नए-नए आयामों से एक विषय पर सोच पाते है क्योंकि अलग-अलग लोगों की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्ति आपको पढ़ने को मिलती है। इसलिए किसी भी विषय में विषेशज्ञ बनना चाहते है तो ब्लॉगिंग से आप ये जरूर बन सकते है।

धन्यवाद🙏

सोमवार, 30 मई 2022

संज्ञानात्मक विकास क्या होता हैं? Cognitive Development kya hota hai ?



 संज्ञानात्मक विकास 

(Cognitive Development)

 

    'संज्ञान' शब्द का अर्थ है- 'जानना' या 'समझना'। यह एक बौद्धिक प्रक्रिया है, इसमें विचारों के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। मनोवैज्ञानिक 'संज्ञान' का प्रयोग ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में करते हैं। 


     संज्ञानात्मक विकास शब्द का प्रयोग मानसिक विकास के व्यापक अर्थ में किया जाता है। इस में बुद्धि के अतिरिक्त सूचना का प्रत्यक्षीकरण (perception), पहचान (recognition), प्रत्याह्वान (remembering) और व्याख्या (explanation) आदि भी आते हैं। 


       विकिपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार, संज्ञान में मानव की विभिन्न मानसिक गतिविधियों का समन्यवीकरण (coordination) होता है। 'संज्ञानात्मक मनोविज्ञान' शब्द का प्रयोग गुस्ताव नाइसर (Gustav Neisser) ने सन् 1967 ई० में किया था। संज्ञानात्मक विकास इस बात पर बल देता है कि मनुष्य किस प्रकार तथ्यों को ग्रहण करता है और किस प्रकार से उसका उत्तर भी देता है। संज्ञान उस मानसिक प्रक्रिया को सम्बोधित करता है, जिसमें चिन्तन, स्मरण, अधिगम और भाषा के प्रयोग का समावेश होता है। जब हम शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते है तो इसका अर्थ है कि हम तथ्यों और अवधारणाओं की समझ पर बल देते हैं।


       यदि हम विभिन्न अवधारणाओं के मध्य के सम्बन्धों को समझ लेते हैं तो हमारी संज्ञानात्मक समझ में वृद्धि होती है। संज्ञानात्मक सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति किस प्रकार सोचता है, किस प्रकार महसूस करता है और किस प्रकार व्यवहार करता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अपने अन्दर ज्ञान के सभी रूपों यथा स्मृति चिन्तन, प्रेरणा और प्रत्यक्षण को शामिल करती है।


        जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया में मुख्यतः दो बातों को महत्वपूर्ण माना है :-


1. संगठन और 2. अनुकूलन। 


     संगठन से तात्पर्य बुद्धि में विभिन्न क्रियाएँ जैसे प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, चिंतन एवं तर्क सभी संगठित होकर करती है। एक बालक वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों के संबंध में उसकी विभिन्न मानसिक क्रियाएँ पृथक पृथक कार्य नहीं करती है बल्कि एक साथ संगठित होकर कार्य करती है। वातावरण के साथ समायोजन करना संगठन का ही परिणाम है। संगठन व्यक्ति एवं वातावरण के संबंध को आंतरिक रूप से प्रभावित करता है। अनुकूलन बाह्य रूप से प्रभावित करता है।


       पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है:-

1. संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensory Motor) : जन्म के 2 वर्ष 

2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational) : 2 से 7 वर्ष 

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational) : 7 से 11 वर्ष 

4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational) : 11 से 18 वर्ष।

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

Content (सामग्री) हिन्दी एवं English Notes.


        Content का शुद्ध हिंदी होता है- सामग्री। इसका प्रयोग हम सूचना और मनोरंजन के लिए करते हैं जो किसी माध्यम के द्वारा हमारे पास पहुंचता है। यदि वह माध्यम इंटरनेट हो तो उसे हम E-Content कहेंगे। यदि वही माध्यम बदलकर किताब या समाचार पत्र हो जाये तो तब हम उसे Paper Content, Audio या Video के रूप में हो तो उसे Audio/Video Content कहते हैं।


Types of Content (सामग्री के प्रकार)


     सामान्यतः हम Content को 03 (तीन) भागों में बांट कर अध्ययन करते हैं-

(1) Text Content (पाठ सामग्री)- वैसा Content जिसमें सिर्फ शब्द प्राप्त होते हैं उन्हें Text Content कहते हैं।

जैसे:- Blogs Articles Webpage, Website, इत्यादि।


(2)Audio Content (ऑडियो/ध्वनि सामग्री):- वैसा Content जिसको केवल आवाज के रूप में सुना जा सकता हैं, ध्वनि सामग्री कहलाता है।

जैसे:- Radio, Telephone, इत्यादि।


(3) Visual Content (दृश्य सामग्री):- वैसी सामग्री जिसमें सूचनाएं दृश्य रूप में हो जैसे:- तस्वीर, वीडियो, इत्यादि। उन्हें हम दृश्य सामग्री (Visual Content) कहते हैं।


Content Writing (सामग्री लेखन)


      Content का अर्थ होता है किसी भी विषय पर लिखा गया लेख या आर्टिकल। Writing का अर्थ हुआ- लिखना✍️ यानी हम कह सकते हैं कि किसी भी विषय पर लिखा गया लेख सामग्री लेखन (Content Writing) कहलाता है।

       वर्तमान समय में बहुत से ऐसे व्यक्ति या संस्थान है जिनके पास कंटेंट लिखने के लिए समय नहीं होता इसलिए वह दूसरों से Content write करवाते हैं। इस कार्य को हम Content writing कहते हैं।


Content Writer:- जो भी व्यक्ति लिखने का कार्य करता है उसे हम कंटेंट राइटर कहते हैं। यदि आप किसी संस्था या व्यक्ति के लिए content लिख रहे हैं तो आप Content Writer हुए।






      Contents means pure Hindi - Samagri.  We use it for 'information and entertainment' which reaches us through some medium.  If that medium is Internet, then we will call it E-Content.  If the same medium is changed to a book or a newspaper, then if we have it in the form of Paper Content, Audio or Video, then it is called Audio/Video Content.



 Types of Content



 Generally we study the content by dividing it into 03 (three) parts-


 (1) Text Content :- Content in which only words are received is called Text Content.


 Such as:- Blogs ArticlesWebpage, Website, etc.



(2) Audio Content (Audio/Sound Content):- The content which can be heard only in the form of voice is called sound content.


 Eg:- Radio, Telephone, etc.



(3) Visual Content:- Content that contains information in a visual form such as: - picture, video, etc.  We call them Visual Content.



 Content Writing



 Content means an article, written on any topic.  Writing  means- writing️ That is, we can say that an article written on any subject is called Content Writing.


 In the present time, there are many such individuals or institutions who do not have time to write content, so they get others to write content.  We call this work 'Content writing'.



 Content Writer:- Whoever does the work of writing, we are called Content Writer.  If you are writing content for any organization or person then you are a Content Writer.

गुरुवार, 10 मार्च 2022

E-Content (ई- सामग्री)


 E-Content (ई- सामग्री) 

          वर्तमान परिदृश्य में हमारे पास अध्ययन के लिए जो सामग्री उपलब्ध है, जैसे:- किताबें, पत्रिकाएं, समाचार-पत्र, इत्यादि। यह सभी अधिकतर पेपर पर उपलब्ध होते हैं। जिन्हें हम साधारण बोलचाल की भाषा में पेपर कंटेंट कह सकते हैं। इसके विपरीत यही सामग्रियां यदि हमारे पास डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध हो तो उन्हें हम E-Content (ई-सामग्री) कहते हैं। उदाहरण के लिए हम E-Book, E-Magazine, E-Newspaper को देख सकते हैं।


E-Content (ई-सामग्री) की उपयोगिता:- हमें E-Content में कुछ ऐसे विशिष्ट विशेषताएं उपलब्ध होती है जिससे इसका महत्व एवं उपयोगिता बहुत अधिक बढ़ जाता है। जिन्हें हम निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं-

  1. E-Content की विशेषता इसका अद्यतन (Updated) होना है। समान्यत: देखा जाता है कि बाजार में उपलब्ध पुस्तकें एक वर्ष या उससे पुरानी होती है। अद्यतन सामग्री का प्रायः उसमें अभाव दिखता है। वही E-Content को हम समय-समय पर अद्यतन प्रक्रिया के द्वारा उसमें जुड़ी जानकारियों को बढ़ा एवं घटा सकते हैं।                Definition of updated:- Made More Modern or up to Date. Eg:- An updated bathroom and Kitchen.
  2. E-Content की दूसरी विशेषता यह होती है कि इसमें हमें रंगीन चित्र, ऑडियो, वीडियो, ग्राफ, इत्यादि। का समावेशन आसानी से हो जाता है जो कि अध्ययन सामग्री को और जीवंत बना देता है। जबकि पेपर कंटेट में बहुत ही कम किताबे ऐसी होती है जिसमें रंगीन चित्र, चार्ट, इत्यादि का समावेश हो। दरअसल ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि इसकी वजह से किताबों के दाम में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है।

कुछ महत्वपूर्ण वेबसाइट एवं वेबपेज जिनकी मदद से आप ई-कंटेन को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।


Shala Darpan


Biswajeetk1


Wikipedia



E-Content


      In the present scenario, the material available with us for study, such as:- books, magazines, newspapers, etc.  All these are mostly available on paper.  Which we can call in simple colloquial language 'Paper Content'.  On the contrary, if these materials are available with us in digital or electronic form, then we call them E-Content.  For example we can see E-Book, E-Magazine, E-Newspaper.



Usability of E-Content:- Some such special features are available in us, E-Content, which increases its importance and usefulness a lot.  Which we try to understand through the following points-


(1) The specialty of e-content is its being updated.  It is generally seen that the books available in the market are one year old or more.  There is often a lack of updated content.  We can increase and decrease the information related to the same E-Content by the process of updating it from time to time.  


Definition of updated:- Made more modern or up to Date.  Eg:- An updated bathroom and kitchen.


(2) The second feature of E-Content is that in this we get color pictures, audio, video, graph, etc.  are easily incorporated which makes the study material more alive.  Whereas there are very few books in paper content in which color pictures, charts, etc. are included.  Actually this does not happen because due to this there is a huge increase in the price of books.



 Some Important Websites and Webpages With the help of which you can get e-content easily.


Shala Darpan


Biswajeetk1


Wikipedia




रविवार, 7 नवंबर 2021

सीखने की योजना क्या है ? What is Learning Plan ? Hindi & English Notes For B.Ed. and D.El.Ed. All University.


सीखने की योजना क्या है? सीखने की योजना बनाते समय सोच के कुछ बिंदुओं की सूची बनाएं।


         एक सीखने की योजना निर्देश और मूल्यांकन के लिए एक व्यापक, अनुकूलन योग्य, बहु-दिवसीय योजना है। दूसरे शब्दों में इसे हम यूं समझ सकते हैं, एक सीखने की योजना एक दस्तावेज (संभवतः एक इंटरैक्टिव या ऑनलाइन दस्तावेज़) है जिसका उपयोग सीखने की योजना बनाने के लिए किया जाता है, आमतौर पर एक विस्तारित अवधि में।

       आज के शिक्षकों को निर्देश में अंतर करने और इसे सीखने के परिणामों से जोड़ने की जरूरत है। सीखने की योजना छात्रों के पढ़ने, सुनने, बोलने और लिखने के कौशल का निर्माण करती है। इसमें भिन्नता के लिए कई अवसर शामिल हैं, जिनमें आवश्यक प्रश्न, रीडिंग और निर्देशक रणनीतियों और आकलन शामिल हैं। सभी पिछड़े डिजाइन के आधार पर एक ढांचे के भीतर व्यवस्थित सभी और अंग्रेजी भाषा के लिए सामान्य कोर राज्य मानकों को गठबंधन करते हैं।

सीखने की योजना बनाते समय सोच के कुछ बिंदु यहां दिए गए हैं:-

1. अधिगम योजना तैयार करते समय, शिक्षार्थियों के स्तर, उनकी भाषाई आवश्यकताओं और पाठ पढ़ाने के उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए।

2. सीखने की योजना के उद्देश्यों को अलग-अलग नहीं समझा जाना चाहिए। उन्हें प्रारंभिक स्तर की पाठ्यचर्या पुस्तक के आधार पर विकसित किया जाना चाहिए।

3. शिक्षण विधियों को चुनते समय कक्षा की स्थिति से संबंधित होने का प्रयास करें।

4. अभिनव टीएलएमएस बनाने का प्रयास करें जो अंग्रेजी पढ़ाने के दौरान वास्तव में एक शिक्षक का समर्थन कर सके।

5. विषयों को शिक्षार्थियों की वास्तविक जीवन स्थितियों और सार्थक गतिविधियों से संबंधित करें।

6. प्रारंभिक अवस्था में मातृभाषा को स्पष्ट रूप से आवश्यक बिंदुओं को समझने की अनुमति दी जा सकती है लेकिन बाद में इसका उपयोग कम से कम किया जाना चाहिए।

7. शिक्षार्थियों को प्रश्न पूछने और उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित करके उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करें।

8. शिक्षार्थियों की व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करें और ब्लैकबोर्ड का प्रभावी ढंग से उपयोग करें।

9. सरल और सही अंग्रेजी का प्रयोग करें।

10. फीडबैक और सुदृढीकरण के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करें।

What is a learning plan? List some points of concern while making a learning plan.


         A learning plan is a comprehensive, customizable, multi-day plan for instruction and assessment. In other words, A learning plan is a document (possibly an interactive or on-line document) that is used to plan learning. usually over an extended period of time. 

Today's teachers need to differentiate instruction and connect it to learning outcomes. The learning plan does that by building students' reading, listening, speaking and writing skills. It includes multiple opportunities for differentiation, including selecting essential questions, readings, and instructional strategies and assessments-all organized within a framework based on backward design and aligned to the Common Core State Standards for English Language. 

Here are some of the points of concern while making a learning plan - 

1. While preparing a learning plan, one must keep in mind the learners' level, their linguistic needs and the objectives of teaching the lesson. 

2. The Objectives of the learning plan must not be understood in isolation. They must be developed on the basis of the Curriculum Book of Elementary Level.

3. Try to relate to the classroom situation while choosing the teaching methods.

4. Try to create innovative TLMS which can really support a teacher whilę teaching English.

5. Relate the topics to real life situations of the learners and meaningful activities.

6. At the early stage mother tongue may be allowed to be used to understand clearly essential points but later on its use should be minimised.

7. Ensure maximum participation of learners by encouraging them to ask and answer questions.

8.Address the individual needs of learners and use the blackboard effectively.

9.Use simple and correct English.

10.Provide adequate space for feedback and reinforcement.


सोमवार, 1 नवंबर 2021

अधिगमकर्त्ता एवं अधिगम प्रक्रिया का बोध (UNDERSTANDING THE LEARNER AND LEARNING PROCESS) S-1 D.El.Ed. 2nd Year B.S.E.B. Patna.


       अपने जन्म के समय शिशु असहाय अवस्था में रहता है। वह दूसरों पर निर्भर रहता है। कालांतर में वही शिशु अनेक चीजें सीख जाता है। सीखने की यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है। अधिगम अर्थात् सीखना प्राणियों का एक जन्मजात गुण है ।

          अधिगम एक अत्यधिक व्यापक संकल्पना है। मनुष्य अपने जीवन के प्रारम्भ से लेकर अंत तक प्रतिपल कुछ-न-कुछ सीखता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ कुछ अनुवांशिक विशेषताएँ (Genetic features) लेकर जन्म लेता है। इन विशेषताओं में बुद्धि एक ऐसी विशेषता है जो उसे अपने चारों ओर फैले वातावरण के साथ अतः क्रियाएँ करते हुए उसकी समस्त क्रियाएँ और व्यवहारों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान करती है। वस्तुतः मनुष्य की अपने परिवेश से प्रभावित होकर अपने वंशानुक्रम के गुणों के अनुरूप व्यवहार में परिवर्तन करने की क्रिया ही अधिगम है।
      शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालकों को सिखाना और सीखने की ओर अग्रसर करना है।

अधिगम का अर्थ

(MEANING OF LEARNING)

         अधिगम किसी स्थिति के प्रति सक्रिय प्रतिक्रिया है। जैसे:- एक बालक जलती हुई मोमबत्ती की लौ छूने से जल जाता है। उसके लिए यह पहला कटु अनुभव होता है। दूसरी बार वह जलती हुई मोमबत्ती से दूर रहता है। बालक यह सीख जाता है कि लौ को हाथ लगाया जाएगा तो अवश्य ही जलने की पीड़ा उठानी पड़ेगी। इसी प्रकार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अनुभवों के माध्यम से एक व्यक्ति के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन होते रहते हैं। अनुभवों द्वारा व्यवहार में होने वाले इन परिवर्तनों को साधारण रूप में सीखने की संज्ञा दे दी जाती है। 

सीखने की प्रक्रिया की यह बहुत ही सरल व्याख्या है ।

      अधिगम पूर्व अनुभव द्वारा व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन है। इस आधार पर कहा जा सकता है। अधिगम ही शिक्षा है। अधिगम और शिक्षा एक ही क्रिया की ओर संकेत करते हैं। दोनों क्रियाएँ जीवन में सदा और सर्वत्र चलती रहती है। बालक परिपक्वता की ओर बढ़ता हुआ, अपने अनुभवों का लाभ उठाता हुआ वातावरण के प्रति जो उपयुक्त प्रतिक्रिया करता है, वहीं अधिगम है।

अधिगम की परिभाषाएँ

(DEFINITIONS OF LEARNING)

      "ब्लेयर, जोन्स और सिम्पसन के अनुसार- व्यवहार में कोई परिवर्तन जो अनुभवों का परिणाम है और जिसके फलस्वरूप व्यक्ति आने वाली स्थितियों का भिन्न प्रकार से सामना करता है, अधिगम कहलाता है।"
"Any Change of behaviour which is a result of experience and which causes people to face late situation diffcutly may be called learning. 
"Blair, Jones and Simpson."

गेट्स व अन्य के अनुसार– "अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाना ही अधिगम हैं।" 
"Learning in the modification of behaviour through experience and training. 
"Gates and Others"

स्किनर के अनुसार- "सीखना, व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है।" 
"Learning is a process of progressive behaviour adaptation." 
-Skinner

वुडवर्थ के अनुसार— "नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं के प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।
"The process of acquring new knowledge and new responces in the process of learning." 
-Woodworth

क्रो एवं क्रो के अनुसार– "अधिगम, आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों का अर्जन है।" 
"Learning in the acquisition of habits, knowledge and attitudes." 
-Crow and Crow

गिलफोर्ड के अनुसार– "व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में किसी प्रकार का परिवर्तन ही अधिगम है।" 
"Learning is any change in behaviour, resulting from behaviour." -Gilford

अधिगम की प्रकृति

( NATURE OF LEARNING )

      उपर्युक्त परिभाषाओं के अवलोकन विश्लेषण तथा व्याख्या से स्पष्ट है कि अधिगम प्रक्रिया की प्रकृति में निम्न बातें निहित हैं-

1. अधिगम एक सक्रिय प्रक्रिया है।

2. अधिगम व्यक्ति की क्रियाशीलता पर निर्भर होता है।

3. अधिगम विकास की प्रक्रिया है, जहाँ व्यक्ति को स्व-प्रयास करना पड़ता है।

4. अधिगम व्यक्ति के वातावरण के अनुरूप व्यक्ति में परिवर्तन लाता है। ये परिवर्तन स्थायी या अस्थायी हो सकते हैं।

5. अधिगम सहज क्रिया (Reflex Action) नहीं है।

6. अधिगम चेतना का परिणाम भी हो सकता है या जैविक व सामाजिक समंजन के लिए भी हो सकता है।

7. अधिगम सकारात्मक व नकारात्मक दोनों हो सकता है।

8. अधिगम व्यवहार में परिवर्तन की मानवीय क्रिया है।

9. अधिगम प्रक्रिया उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।

10. अधिगम वर्तमान व्यवहार में परिवर्तन या नए व्यवहार के ग्रहण के साथ-साथ वर्तमान व्यवहार पर प्रतिबन्ध भी लगाता है।

11. अधिगम व्यक्ति को आवश्यक समायोजन और ग्राह्यता (Adjustment and adapility) के लिए तैयार करता है।

12. अधिगम का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है जिसमें मानव व्यवहार के सभी क्षेत्र (संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा अनुभवात्मक) सम्मिलित होते हैं।

13. अधिगम सार्वभौमिक एवं निरन्तर प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जीवन पर्यन्त चलती रहती है।

14. क्रो एवं क्रो के अनुसार कार्य करने के तरीके अधिगम में सम्मिलित है, परन्तु इन नए तरीकों को सीखने के साधनों की कोई सीमा नहीं होती। अतः अधिगम के विभिन्न तरीके और विधियाँ होती हैं।

15. परिपक्वता, थकान, बीमारी, नशे आदि। के कारण व्यवहार में परिवर्तन का अधिगम से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

अधिगम की विशेषताएँ

(CHARACTERISTICS OF LEARNING)

      योकम सिम्पसन (Yokom Simpson) और मुर्सेल (Mursel) के अनुसार अधिगम की विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

1. अधिगम परिवर्तन है। (Learning is change)

2. अधिगम सम्पूर्ण जीवन चलता है। (Learning is long-life) 

3.सीखना विकास है। (Learning is growth)

4. सीखना अनुकूलन है। (Learning is adjustment)

5. सीखना सार्वभौमिक है। (Learning is universal)

6. सीखना नया कार्य करना है। (Learning is doing something new)

7. सीखना अनुभवों का सगठन है। (Learning is organisation of experiences)

8. सीखना उद्देश्यपूर्ण है। (Learning is purposive)

9 . सीखना विवेकपूर्ण है। (Learning is understanding)

10. सीखना सक्रियता है। (Learning is activeness)

11. सीखना व्यक्तिगत व सामाजिक दोनों है। (Learning is both individual and social)

12. अधिगम खोज है। (Learning is discovery)

13. अधिगम वातावरण की उपज है। (Learning is a product of environment)

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

Dr. Maria Montessori (डॉ० मारिया मांटेसरी)

 


       "We cannot teach a person to be an Artist but we can help him develop an eye that sees, a hand that obeys, and a soul that feels."

 - Maria Montessori (31 Aug 1870-06 May 1952)


         31 अगस्त 1870 को इटली में जन्मी डॉ० मारिया मांटेसरी बच्चों को शिक्षा देने की पद्धति में क्रान्तिकारी बदलाव लाने वाली शिक्षाशास्त्री और चिकित्सक थी। रोम विश्वविद्यालय में मंदबुद्धि बालकों की चिकित्सा का कार्य करते हुए उनका ध्यान उन बच्चो की शिक्षा की ओर गया और उन्होंने मांटेसरी पद्धति का विकास किया जो बाद में सामान्य बुद्धि बच्चो के शिक्षा के लिये भी उपयोगी पाया गया। 

      बाल विकास के लिए सबसे लोकप्रिय तरीकों में से एक मोंटेसरी प्रणाली में बच्चों को एक साथ काम करने, खेलने, अनुशासन और स्वतंत्रता पर महत्व दिया जाता है। मोंटेसरी पद्धति में कलात्मक अभिव्यक्ति से जुड़े कौशल पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते है और बच्चे की अपनी मूल और अनूठी कला को प्रोत्साहन देते है। मांटेसरी शिक्षण पद्धति में बच्चों को रंगने के लिए आयु क्षमता के अनुरूप कार्य दिया जाता है इससे बच्चे को न केवल एक बहुत अच्छी आत्म छवि मिलती है, बल्कि अवलोकन और कलात्मक प्रतिभा दोनों का कौशल होता है। 

      डॉ० मारिया मांटेसरी का विश्वास था कि बाल शिक्षा का मूल उद्धेश्य बच्चों के नैसर्गिक विकास (Natural development) में सहायक होना और बच्चों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। चिकित्साशास्त्र से सम्बंधित होने के कारण वे यह भी मानती थीं कि शिक्षा को बच्चों के साधारण मानसिक एवं ऐंद्रिक दोषों जैसे:- भीरुता (Cowardice), वाणीदोष, आदि। के सुधार में भी सहायक होना चाहिए। इस पद्धति पर चलाया जानेवाला पहला स्कूल श्रमिक बच्चो के लिये सेन लोरेंजो में 6 जनवरी 1907 को खुला था और 1913 में आयोजित प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मांटेसरी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में अमरीका, अफ्रीका, भारत तथा कई यूरोपीय देशों के लोग सम्मिलित हुए थे।

       डॉ० मांटेसरी अपने दत्तक पुत्र मारिओ मांटेसरी के साथ 1939 में भारत आई थी और दस वर्ष तक यहां रह कर “शांति के लिए शिक्षा" जैसे विषयों पर कार्य किया। डॉक्टर मारिया मोंटेसरी को विश्वास था कि आप एक बच्चे को एक कलाकार बनने के लिए नहीं "सिखा" सकते हैं, हालांकि, वह बच्चों की रचनात्मक क्षमताओं का पोषण करने और उन्हें एक आंख जो देखती है, एक हाथ जो पालन करती है, और एक आत्मा जो महसूस करती है" विकसित करना सिखाती है।

उनका कहना था-

"We cannot teach a person to be an Artist but we can help him develop an eye that sees, a hand that obeys, and a soul that feels."

 -Maria Montessori.


"हम किसी व्यक्ति को कलाकार बनना नहीं सिखा सकते हैं, लेकिन हम उसे देखने वाली आंख, आज्ञा मानने वाले हाथ और महसूस करने वाली आत्मा विकसित करने में मदद कर सकते हैं।"  

-मारिया मोंटेसरी

        प्रत्येक बच्चा दुनिया के साथ अलग तरह से बातचीत करता है और कलात्मक अभिव्यक्ति बच्चों के रचनात्मक, दृश्य, संवेदी और भावनात्मक विकास के लिए आवश्यक है। व्यावहारिक शिक्षा को ज्यादा महत्त्व देने वाली डॉ० मारिया का विचार था कि वही शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ है जो शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक, संवेगात्मक दृष्टि से बालक का विकास करे। इसलिए उन्होंने संगीत, नृत्य, खेल-कूद, कला तथा रोचक गतिविधियों का समावेश किया।

        मोंटेसरी वातावरण में बच्चों को कला गतिविधियां उनकी रचनात्मकता का पता लगाने और उनका उपयोग करने में मदद करती हैं। इसमें बच्चों के लिए महत्वपूर्ण कला एक प्रक्रिया है न कि उत्पाद, जबकि वयस्कों के लिए कला का लक्ष्य एक उत्पाद का उत्पादन करना होता है। दुनिया में पढ़ाने के तरीक़ों की तस्वीर बदल के रख देने वाली डॉ० मारिया मांटेसरी का निधन 06 मई 1952 को हॉलैंड में हुआ।

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रविवार, 1 अगस्त 2021

केन्द्रीकृत विद्यालय एवं विकेन्द्रीत विद्यालय में क्या अंतर होता हैं ? What is the difference between centralized school and decentralized school? हिन्दी एवं English Notes.

 प्रश्न:- विद्यालय संगठन के दो प्रमुख स्वरूपो के बारे में बताएँ। 

                             Or

विद्यालय संगठन के प्रकारों को बताएँ।

                  Or

केन्द्रीकृत विद्यालय व विकेन्द्रीत विद्यालय में अंतर बताएँ ।

Ans.:- किसी भी विद्यालय संगठन के दो मुख्य स्वरूप होतें हैं जो की निम्न है :- 

(1) केन्द्रीकृत विद्यालय (Centralized Schools)

(2) विकेन्द्रीकृत विद्यालय (Decentralized Schools)

(1) केन्द्रीकृत विद्यालय:- इस विद्यालय का पूरा प्रबंधन प्रधानाध्यापक के हाथ में होता है। विद्यालय में सुव्यवस्था बनाये रखने की पूरी जिम्मेवारी वे स्वयं को मानते हैं। इस कारण विद्यालय के प्रत्येक भाग व कार्यकलाप पर उनका सीधा नियंत्रण होता है ताकि कोई गड़बड़ी न होने पाये। विद्यालय के अन्य कर्मी केवल उनके आदेशों को अमल में लाने का कार्य करते हैं। प्रधानाध्यापक उनके द्वारा किए गए कार्यों का निरंतर निरीक्षण करते हैं और बेहतरी के लिए निर्देश भी देते हैं । 

(2) विकेन्द्रीकृत विद्यालय:- इस विद्यालय में प्रधानाध्यापक के साथ-साथ अन्य सहकर्मियों की भी भागीदारी होती है। प्रधानाध्यापक अपने कई कार्यों को शिक्षकों को दे देते हैं और वे कोई राय लेने से पहले शिक्षकों से सलाह भी करते हैं  सभी कर्मी अपने कार्यों के माध्यम से विद्यालय के दैनिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाते हैं। प्रधानाध्यापक को उनकी क्षमताओं पर विश्वास भी होता है। विद्यालय के विद्यार्थीगण भी कई कार्यों में अपने शिक्षकों का हाथ बँटाते हैं। 


Question:- Tell us about the two main forms of school organization.


 Or


 State the types of school organization.


 Or


 Differentiate between centralized school and decentralized school.


 Ans.:- There are two main forms of any school organization which are as follows :-


 (1) Centralized Schools


 (2) Decentralized Schools


 (1)Centralized School:- The entire management of this school is in the hands of the headmaster.  He considers himself the full responsibility of maintaining order in the school.  Because of this they have direct control over every part and activity of the school so that no disturbances happen.  The other staff of the school only work to implement his orders.  The headmaster constantly monitors the work done by them and also gives instructions for betterment.


 (2) Decentralized School:- In this school, along with the headmaster, there is participation of other colleagues as well.  The headmaster entrusts many of his tasks to the teachers and he also consults the teachers before taking any opinion. All the personnel play their part in the daily process of the school through their tasks.  The headmaster also has confidence in their abilities.  School students also help their teachers in many tasks.

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

कृष्ण कुमार द्वारा रचित 'चुड़ी बाजार में लड़की' से अभिमन्यु की शिक्षा में शिक्षा के मुद्दों को किस प्रकार सार्थक तरीके से उठाया गया है ?

           कक्षा में शिक्षक के प्रश्नों का उत्तर देती हुई लड़को या परीक्षा की तैयारी करती हुई लड़की हमारी दृष्टि में सिर्फ एक विद्यार्थी रह जाती है। हमारी आँखें उसे सामने पाकर रीति-रिवाजों और विश्वासों के दलदल से घिरी हुई लड़की को देख पाने में असमर्थ हो जाती हैं। लड़की के ये दोनों रूप साथ-साथ रहते हैं। स्कूल या कॉलेज और विश्वविद्यालय के संसार में कदम रखती हुई लड़की उस दूसरी लड़की को घर पर नहीं छोड़ आई होती है जो सभ्यता द्वारा निर्धारित निर्भरता और यौन-दृष्टि के चौखटे में सिमटकर जीती है।

          वह लड़की जो घर पर विवाह स्कूल और मातृत्व की केन्द्रीयता का पाठ लगातार सीख रही होती है, इस लड़की से अलग नहीं है जो में जीवन की बहुउद्देशीयता का सपना देख रही होती है। लड़की के इन दो अस्तित्वों के बीच का फासला हर बच्ची के सामने एक असंभव-सी चुनौती पेश करता है। चुनौती का जवाब बहुतों के लिए किशोर होने तक निर्धारित हो चुका होता है। वे सीख चुकी होती हैं कि शिक्षा के वावजूद वे घर में भाई से अलग और नीचे बनी रहेंगी। स्त्री के रूप में उनका जीवन उसी धुरी पर चलेगा जो सभ्यता ने उनके जन्म से पूर्व, बहुत पूर्व, बना दी थी। अपने पूर्व निर्धारित जीवन-चक्र को उस धुरी पर जमाकर ही वे जिंदा रह पाएँगी।

         उक्त बातें ज़्यादातर लड़कियाँ शिक्षा समाप्त होने से पहले जान चुकी होती हैं। इसीलिए उनमें से कई अपनी शिक्षा को खींचते रहने का प्रयास करती हैं, इस विश्वास के तहत कि शादी से पहले जितना पढ़ सकें, पढ़ लें। उसके बाद का भरोसा नहीं। शिक्षा उनके लिए एक प्रकार से जमानत का काम करती है। शिक्षा के नाम पर उन्हें क्या पढ़ने को मिलता है अथवा बौद्धिक कौशलों के विकास के कितने और कौन से अवसर मिलते हैं ये सवाल उनके लिए विशेष महत्त्व नहीं रखते। महत्त्व इस बात का रह जाता है कि पढ़ाई के नाम पर वे जीवन के उस चरण को कुछ वर्ष स्थगित रख लेंगी जिसमें उनकी वह प्राकृतिक चाह जो मनुष्य होने के नाते उनके मन में स्वायत्त सोच और व्यवहार के साथ जीने की इच्छा पैदा करती है। 

          आशय यह है कि शिक्षा लड़कियों के लिए ज्ञान या चेतना का ज़रिया कम, मुख्यतः एक अवधि है जिसमें उनके दमित आत्म की लौ कुछ वर्ष इस पूर्वज्ञान के साथ जल लेती है कि उसे विवाह में निहित हस्तांतरण के तहत एक आक्रामक फूंक के बल से बुझ जाने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्त्रियों के जीवन में लंबी और व्यवस्थित शिक्षा, सांसारिक सफलता और वैवाहिक जीवन के त्रिकोण में प्रकट होने वाले तनाव इतनी जीवनियों में देखने को मिलते हैं कि उन्हें व्यक्तिगत अनुभव के संयोग नहीं, एक अनिवार्य सामाजिक सृष्टि कहना ही उचित होगा।

          शिक्षा का आधुनिक रूप व्यक्तित्त्व के निर्माण का साधन माना जाता है। खासकर जब शिक्षा किसी स्थायी आजीविका या पेशे की तरफ ले जाती हो। शिक्षा का यह प्रभाव स्त्री के उस जीवन-चक्र से टकराता है जो संस्कृति के चौखटे में समाज के विभिन्न वर्गों में जीया जाता है। एक सामान्य भारतीय लड़की के जीवन का निर्धारण करने वाली संस्था विवाह है और उसमें निहित अपेक्षाएँ शिक्षा की संस्थाई अपेक्षाओं से टकराती हैं। इस टकराव में विवाह की विजय समाज के स्थापित ढाँचे में नियति की तरह पूर्व-निश्चित है।

           विवाह की तैयारी लड़की के जीवन में अन्तर्निहित अर्थात् रची-बसी है जबकि शिक्षा की तैयारी एक हस्तक्षेप (Interference) है। कुछ परिस्थितियों में यह हस्तक्षेप बर्दाश्त कर लिया जाता है तो कुछ परिस्थितियों में वह कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है। लड़कियाँ लड़ती रहती हैं और इस मुहावरे का प्रयोग अथक रूप से करती चली जाती हैं कि 'मैं अभी पढ़ाई करना चाहती हूँ।' जैसा कि एक अध्ययन ने दर्शाया है, 'पढ़ाई' एक प्रतीक-भूमि की तरह इस्तेमाल होने लगती है जहाँ लड़की की आवाज़ आधुनिक अर्थव्यवस्था ने वाज़िब या सुनने और बर्दाश्त करने लायक बना दी है। पढ़ाई जारी रखने की मांग का परोक्ष अर्थ होता है विवाह के स्थगन की मांग। पढ़ाई करने दी जाए तो इसका आशय यह नहीं होता कि विवाह की तैयारी रूक जाएगी। विवाह एक घटना के रूप में स्थगित होता है, लड़की के जीवन को आकार देने वाली परिघटना (Phenomenon) "A fact or situation that is observed to exist or happen, especially one whose cause or explanation is in question. एक तथ्य या स्थिति जो अस्तित्व में है या घटित होती है, विशेष रूप से जिसका कारण या स्पष्टीकरण प्रश्न में है।" के रूप में नहीं। उसकी अपेक्षाएँ शिक्षा की अपेक्षाओं और जरूरतों से एकदम भिन्न हो सकती हैं और यह भिन्नता बनी रहती है। 

           शिक्षा एकाग्रता, बौद्धिक अनुशासन और स्वावलंबी सोच या सपने देखने की माँग करती है। विवाह समर्पण की मानसिक और दैहिक तैयारी के प्रबन्धन की माँग करता है। विवाह की तैयारी लड़कियों के बचपन और किशोरावस्था के वर्षों में लगातार चलने वाली उन्मुखीकरण का रूप ले लेती है जिसमें तरह-तरह की सांस्कृतिक क्रियाओं और रस्मों व रिवाज़ों का ज्ञान तथा अभ्यास शामिल रहता है। उधर स्कूल में प्रकृति और समाज को वृहत्तर परिधि से संबंधित ज्ञान और उससे संबंधित कौशलों पर अधिकार की अपेक्षा की जाती है। दोनों के बीच समय को लेकर टकराव होता रहता है जिसे लड़के महसूस नहीं करते केवल लड़कियाँ झेलती हैं। स्कूल विभिन्न विषयों को पढ़ाई में दैनिक स्तर के ध्यान और विकास को अपेक्षा रखता है। इधर घर में लड़कियाँ विवाह की तैयारी से संबंधित सांस्कृतिक ज्ञान और कौशलों से जुड़ी अपेक्षाएँ, धार्मिक मान्यताओं और त्योहारों व रीति-रिवाजों के वार्षिक-चक्र में अवस्थित रहती हैं। 

         ये अपेक्षाएँ लड़की को स्कूल से बार-बार अनुपस्थित होकर ही पूरी हो पाती हैं। कुछ अपेक्षाएँ ऐसी हैं जो स्कूल से अनुपस्थित रहे बिना पूरी हो जाती हैं मगर वे भी स्कूल की दैनन्दिनी में लड़की की भागीदारी को ढीला बना देती हैं। देह को संभालने व सेवा को माँग करने वाली अपेक्षाएँ इसी किस्म की हैं। वे सामान्य स्वास्थ्य-रक्षा से कहीं अधिक विशद् और समयसाध्य हैं। नाखूनों, खाल, आँखों और बालों समेत शरीर के तमाम अंगों की अलग-अलग चिंता विवाह की लम्बी तैयारी का हिस्सा है। इसके अलावा शरीर के वजन और आकार की चिंता लड़की के मानस को देह की छाया में बाँधे रखती है। समय आने पर विवाह के लिए चुना जाना एक तरह की परीक्षा में सफल होने जैसा होता है। इस परीक्षा का सबसे चुनौती भरा पर्चा देह विषयक होता है, उसके बाद सांस्कृतिक ज्ञान और सामाजिक कौशल आते हैं। 

           स्कूल में प्राप्त और विकसित होने वाला ज्ञान और उससे जुड़े कौशल विवाह की दृष्टि से या तो अनुपयोगी हैं अथवा प्रतिस्पर्धी। विज्ञान की पढ़ाई से संबंधित मानसिक कौशल और रुझान जो विश्वासों और अंधविश्वासों पर चोट करते हैं, विवाह की परीक्षा में उत्तीर्ण होने में बाधा डालते हैं। माहवारी से संबंधित पारम्परिक विचार और व्रत व उपवासों से जुड़े विश्वास शिक्षा प्राप्त करती लड़की के मानस को लगातार दुविधा में रखते हैं। वह समझ जाती है कि स्कूल की पढ़ाई का विवाह की तैयारी से मात्र व्यावहारिक संबंध है और वह इस कारण है कि पढ़े-लिखे वर के लिए वधू भी पढ़ी-लिखी होनी चाहिए। लेकिन वधू से यह उम्मीद कतई नहीं की जाएगी कि वह स्कूल में समाज विज्ञान को पढ़ाई के तहत प्राप्त अपने संवैधानिक या मानवाधिकारों के ज्ञान को गंभीरता से लेने लगे या उन्हें परिवार की परिधि में लागू करने लगे। इस नज़रिए से लड़कियों की शिक्षा के बारे में सोचकर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि स्कूल और कॉलिज की पढ़ाई में सफलता हासिल करने वाली लड़कियाँ अपने मानस को दो हिस्से में बाँटकर बड़ी होती होंगी। 

           एक हिस्से में पढ़ाई और परीक्षाओं से पुष्ट ज्ञान का विकास रहता होगा जो संविधान, लोकतंत्र, मानव-मूल्य और विज्ञान की शब्दावली में व्यक्त होता है, दूसरे हिस्से में घर और पड़ोस, त्योहारों, सिनेमा और टीवी के जरिए होने वाले समाजीकरण से प्राप्त वह ज्ञान रहता होगा जो लड़कियों को बताता है कि संविधान में दर्ज समता और अन्य मानवाधिकार ससुराल की दुनिया पर लागू नहीं होते। वह संविधान का परदेस है 

           जो लड़कियाँ अपने शिक्षित संस्करण और गृहस्थिन संस्करण के बीच सामंजस्य बिठा लेती हैं, अपवाद होती हैं। ज्यादातर के लिए शिक्षित संस्करण के आकार और उसमें निहित आकांक्षाओं को सिकोड़ते जाना जरूरी सिद्ध होता है। उसे एक समानान्तर धारा की तरह किसी प्रकार बहाए रखती हैं, पर उसमें इतना नहीं डूब पातीं कि उसे अपने ज्ञान, कौशल या यश की धुरी बन जाने दें। वे दो जिंदगियाँ जीती हैं और इस कारण प्रायः थक जाती हैं। इस थकान का विश्लेषण करें तो दिखता है कि घर और पेशे की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए आवश्यक ऊर्जा का चुक जाना एक कारण हो सकता है, मगर ज्यादा बड़ा लेकिन क्योंकि गहरा कारण वह अकेलापन है जिससे भारत की स्त्री जीवन-भर जूझती है। इस भाव की विवेचना जितनी कठिन है उतना ही इसका प्रमाण देना। ऊपर से देखने पर कौन कहेगा या मानेगा कि भारत में स्त्री लगातार अकेलेपन से जूझती है। इस भाव की विवेचना जितनी कठिन है उतना ही इसका प्रमाण देना। ऊपर से देखने पर कौन कहेगा या मानेगा कि भारत में स्त्री लगातार अकेलेपन से जूझती है ? आखिर वह हमेशा जीवन के हर दौर में किसी-न-किसी के साथ दिखती है। 

           शास्त्रों ने बाकायदा हिदायत दे रखी है कि बचपन में स्त्री को अपने पिता की, यौवन में पति की और वृद्ध हो जाने पर पुत्र की छत्र-छाया में जीना चाहिए। स्त्री की लोकछवि ऐसी है जो उसे घर-परिवार, बाल-बच्चों से घिरा हुआ दिखाती है। अकेलेपन का अर्थ यदि साथ का अभाव है तो निश्चय ही हमारे समाज में स्त्रियाँ कभी अकेली नहीं पड़ती। पर यदि अकेलेपन का अर्थ अपने अंतस को व्यक्त कर सकनें वाली अस्मिता से है तो यह कहना गलत न होगा कि वे जीवन-भर किसी ऐसे का साथ नहीं पाती जो उनके आत्म को व्यक्त और विकसित होने दे।

             वे अभिमन्यु की तरह एक चक्रव्यूह से घिरी, उससे लड़ती-लड़ती खत्म हो जाती हैं। स्त्री के जीवन-संघर्ष का स्वरूप शिक्षा के ज़रिए एक हद तक बदला जा सकता है पर ऐसा तभी हो सकता है जब स्वयं शिक्षा का चरित्र बदले। अभी तक शिक्षा का स्त्री के जीवन में सामान्यतः यही योगदान रहा है कि वह बचपन और किशोरावस्था की अवधि में घर और कुटुम्ब की चारदीवारी से बाहर रोजाना कुछ घंटे बिता लेती है। आज के भारत में लड़कियों की शिक्षा का विश्लेषण करने के लिए उन तीन पेशों को संदर्भ बनाना उपयोगी होगा जिनका आधुनिकता के निर्माण में योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ये तीन पेशे हैं डॉक्टरी, इंजीनियरी और वकालत। इन पेशों के ज़रिए जीवन और मरण संबंधी मान्यताएँ, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की संरचना और समाज के ढाँचे में व्यक्ति के अधिकारों को अवधारणा का विकास हुआ हैं। ज़ाहिर है, यह विकास एक ज़्यादा बड़ी ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा है और किसी एक कारक पर निर्भर नहीं है। फिर भी इस विकास प्रक्रिया में डॉक्टरी, इंजीनियरी और वकालत का योगदान विश्लेषण का उपयुक्त विषय है। यह विश्लेषण शिक्षा के समाजशास्त्र की दृष्टि से इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इन तीनों पेशों में ज्ञान और विज्ञान के विविध विषयों और उनसे जुड़े बौद्धिक कौशलों का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। इन पेशों में प्रवेश के लिए आवश्यक शैक्षिक अर्हताओं का वितरण एक पैमाना है जिसकी मदद से समाज के विषमतापूर्ण ढाँचे के रहते एक समतामुखी सांस्कृति और राजनैतिक प्रयास में शिक्षा के योगदान का आकलन किया जा सकता है।

           पिछले सवा सौ वर्षों में और विशेषकर आज़ादी के बाद से डॉक्टरो, इंजीनियरी और वकालत के पेशों में महिलाएँ गई हैं और सफल हुई हैं। इस बात से देश को यश मिला है जिसका नशा बहुत व्यापक है। उसके प्रभावश अनेक लोग मानने लगे हैं कि शिक्षा में लड़कियों की बराबरी का लक्ष्य लगभग पा लिया गया है। इस मान्यता के पक्ष में वे यह दलील देते हैं कि सार्वजनिक जीवन में पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ पहले से ही ज्यादा संख्या में दिखाई देने लगी हैं।सरकारी कार्यालय, बैंक, उद्योग और व्यापार, मीडिया और विश्वविद्यालय में शिक्षित स्त्रियों को अपने पुरुष सहकर्मियों के साथ काम करता देखकर यह धारणा पुष्ट होती है कि अब भारत की नारी पर्दे के पीछे या घर की चारदीवारी में नहीं रही। खासकर मीडिया ने इस धारणा को बहुत पोषण दिया है कि स्त्री का शैक्षिक पिछड़ापन एक पुरानी बात हो चुकी है और यह बात यदि आज भी कहीं सच है तो गाँव में ही सच हो सकती है। टेलीविजन से बहुत पहले सिनेमा ने शिक्षित स्त्री को इस तरह पेश करना शुरू कर दिया था जिससे लगे कि प्रेम के सामाजिक संदर्भ में पुरुष और स्त्री बराबरी से खड़े हैं। लगभग तीन-चौथाई सदी इस काल्पनिक विश्वास को फैलाने के निरंतर संपोषण में बीत गई है। लड़कियों की तीन पीढ़ियाँ सिने जगत और सामाजिक जगत के फासले को अपने मानसिक संघर्ष से पाटने में निकल गई हैं। लड़कियों और लड़कों की शैक्षिक बराबरी का भ्रम अखबारों के जरिए भी लगातार फैलता रहा है। खासकर दसवीं और बारहवीं के बोर्ड की परीक्षा के परिणाम की घोषणा के समय 'लड़कियाँ लड़कों से आगे' जैसी सुर्खियां छापने से कोई अख़बार बाज़ नहीं आते। 

             सरकारी अधिकारी और नेता आए दिन कहते रहते हैं कि स्कूलों में लड़कियों की प्रवेश दर लड़कों की बराबर हो चुकी है। 'लेडी डॉक्टर' शब्द सुनने और बोलने के हम इतने ज्यादा अभ्यस्त हो गए हैं कि स्कूल की शिक्षा के बाद डॉक्टरा जैसे पेशे की शिक्षा में लड़कियों के पहुँच का यथार्थ हमें तंग नहीं करता। डॉक्टरी की शिक्षा के क्षेत्र में पहली भारतीय लड़की के प्रवेश को एक शताब्दी से ऊपर समय हो गया है परन्तु आज भी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाली लड़कियाँ कुल विद्यार्थियों की 27 प्रतिशत ही हैं और इनमें भी ज्यादातर महिला रोगों की विशेषज्ञ या फिर सामान्य डॉक्टर बनती हैं। 

               शिक्षा स्त्री की अकेली राह की पाथेय बने, यह तभी संभव है जब हम शिक्षा की परिकल्पना और तैयारी स्त्री के अभिमन्यु को ध्यान में रखकर करें। लड़कियों की शिक्षा पुनर्रचना हमें उस चक्रव्यूह को समझने के उद्देश्य से करनी होगी जो जन्म के साथ ही हर बच्ची को घेर लेता हैं। जैसे-जैसे वह बड़ी होती है उसके अंदर चक्रव्यूह को देख पाने की क्षमता बढ़ती है और साथ ही उसे मंजूर और आत्मसात् करने की विवशता बढ़ती जाती है। चक्रव्यूह को देख पाना उसे भेदने की शुरूआत नहीं है क्योंकि व्यूह का अर्थ यहाँ उसकी मानसिक रचना से अलग नहीं है। चक्रव्यूह एक सामाजिक कृति अवश्य है पर हर लड़की उसे अपने मानस में व्यक्तिगत स्तर पर रचती है, तभी चक्रव्यूह की सामाजिक कृति एक जीवन में सक्रिय हो पाती है। यदि चक्रव्यूह से आशय इस संरचना से है जो लड़की को परतंत्रता (Dependency) में जीना सिखाती है तो इसे गुलामी की आवश्यक संरचना भी कहा जा सकता है कहा जा सकता है क्योंकि गुलाम के लिए अपनी गुलामी से संतुष्ट रहना बहुत जरूरी है। कष्ट, अपमान, निर्भरता और अपने जीवन की क्षुद्रता (Meanness) का बोध तभी जीवनपर्यन्त सहनीय बने रह सकते हैं जब उन्हें अपने संस्कार बना लिया जाए। 

             यही काम जन्म से शुरू होने वाली व्यूह-रचना मानसिक स्तर पर करती है जिसके अलग-अलग पक्षों की झलक इस पुस्तक में दी गई है। अभिमन्यु होने के कई अर्थ संभव हैं परन्तु जिस अर्थ से लड़की के अस्तित्व की व्यंजना सबसे स्पष्ट रूप में व्यक्त होती है यह एक दुर्जेय संघर्ष से अकेले निपटने का नियति का है। अभिमन्यु सा शौर्य उसे बचा नहीं सकता, जिता भी नहीं सकता, यह शुरू से तय था। लड़कियों के जीवन में भी उनके अकेलेपन की अनिवार्यता रोजमर्रा से लेकर स्थायी किस्म के संघर्षों को समेटती है। 

             विवाह की रस्मों के बाद बारात के साथ जाती हुई लड़की का अकेलापन मात्र विदाई गीतों या उनका साथ देने वाले संगीत का विषय नहीं है। वह एक साथ एक भौतिक और सांस्कृतिक सच है। यदि इस सच को लड़कियों की नई शिक्षा की धुरी बनाया जाए तो उसका पहला अर्थात् सबसे बड़ा उद्देश्य हर लड़की को ऐसे बौद्धिक और भावनात्मक कौशल देना होगा जो उसे अपने अकेलेपन को पहचानने और उसे स्पष्टत: देखकर उत्पन्न होने वाली घबराहट और आत्मदया पर काबू पाने की क्षमता दे। 

        दूसरा उद्देश्य भविष्य की संभावनाओं पर विश्वास उत्पन्न करना होगा, इस संभावना पर कि ऐसे संसार का जन्म संभव है जिसमें लड़कियाँ सुरक्षित जी सकेंगी और जीवन की पूर्णता की अनुभव कर सकेंगी। आज की दुनिया को देखते हुए यह बात एक आस्था का विषय ही हो सकती है जिसे पल्लवित करना शिक्षा का काम है।

सोमवार, 26 जुलाई 2021

कृष्ण कुमार द्वारा रचित "चूड़ी बाजार में लड़की" B.Ed.1st Year EPC-1 Unit-2 आधुनिक और समकालीन साहित्य। हिंदी एवं English नोट्स।

 


         कृष्ण कुमार द्वारा रचित चूड़ी बाजार में लड़की उपन्यास को आज की प्रत्येक लड़कियों को जरूर पढ़नी चाहिए ताकि उन परिस्थितियों को समझने में उन्हें सहूलियत मिल सके जो अनावश्यक रूप से उनकी प्रगति की राह में बाधा हैं। इस उपन्यास को राजकमल प्रकाशन के द्वारा 2014 में प्रकाशित किया गया था।
             स्त्री को लेकर प्रचलित मान्यताओं का घेरा निश्चित वर्ष की आयु की लड़की को जिस पूर्णता से कसता है, वह किसी अन्य आयु पर लागू नहीं होता। इस उम्र में परिवार, समाज, धर्म, नैतिकता यह सबकुछ एक साथ हावी होने लगते हैं। ऐसा लगने लगता है जैसे वह लड़की एक निश्चित आयु की होकर गुनाह कर बैठी हैं। एक अलग तरह के भय को साथ लेकर जीना उसकी आदत में शुमार हो जाता है। 
          उसे तमाम हिदायतें दी जाने लगती हैं... ऐसे मत चलो, ऐसे मत रुको, ऐसे मत बोलो, ऐसे मत देखो... और फिर वह एक भय के साथ जीने लगती है। सच कहें तो वह भय नहीं आतंक होता है। भय तो उसे कहते हैं जो कभी-कभार लगे। जैसे अंधेरे से लगे तो उजाले में आकर दूर हो जाए, पिता से लगे तो उसके ऑफिस जाने पर हट जाए। लेकिन यहाँ तो पुरे समाज से डर होता हैं और लड़कियां भी उसी डर के साथ जीना सीखती हैं और इसी तरह जीना उनके लड़की होने की परिभाषा बन जाता है।
          भारत के संदर्भ में देखें तो नारी एक जटिल सामाजिक रचना है। मानव के रूप में वह बस जन्म लेती है, परंतु उसके बाद से ही उसकी पुनर्रचना का उपक्रम संस्कृति के कठोर औजार के बल से आरंभ हो जाता है। संस्कृति के इसी कठोर औजार पर जब एक शिक्षाविद की नजर पड़ती हैं तो उसके लिए समाज के इस सांस्कृतिक चेहरे की क्रूरता को देखना काफी कष्टकारी हो जाता है वह बेचैन हो उठता है कि शुरू होती है उसकी अपनी यात्रा।
          उसे याद आने लगती है बचपन की वह घटना जहां वह लड़कियों को अपनी मां एवं औरतों के साथ चूड़ी की दुकान में जाते देखा करते थे। जहां कोई लड़की चूड़ी पहनने के लिए दुकानदार के सामने अपना हाथ बढ़ाती थी। उसे वह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना जान पड़ती है एवं उसे समझ में आता है कि चूड़ी पहनाई जाने की इच्छा का जन्म और चूड़ी को अपनी सुंदरता का साधन मान लेने का भाव छोटी लड़की को पुरुष प्रधान सभ्यता में ढालने के एक सहज चरण है इसमें यह पुरुष प्रधान समाज सफल भी होता है।

चूड़ी बाजार में लड़की को 05 अध्याय में बांटा गया है-

  1. पहला अध्याय समता का मिथक, भिन्नता के ध्रुव 
  2. दूसरा अध्याय अंत: जगत और चारों ओर 
  3. तीसरा अध्याय चूड़ी का चिन्ह-शास्त्र 
  4. चौथा अध्याय ताज की कक्षा 
  5. पांचवा अध्याय अभिमन्यु की शिक्षा
                इन पांच अध्याय में सिमटी भारतीय स्त्री की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक व्यवस्था पर गहन पड़ताल करती यह एक क्लासिकल कृति है। इस पुस्तक में घर और परिवार में लड़कियों के प्रति होने वाले व्यवहार और इससे उसके जीवन में क्या बदलाव होता है इसका काफी सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। तमाम तरह के साहित्यिक और सांस्कृतिक मिथकों पर गहन चिंतन के साथ ही एक बच्ची के बचपन से लेकर जवानी और फिर उसके कई रूपों में स्थापित होने तक अर्थात बच्ची से युवती और फिर औरत बनने की पूरी प्रक्रिया कैसे पुरुषवादी सोच के आस-पास सांस्कृतिक क्रियाकलापों द्वारा संचालित हो रही है लेखक कृष्ण कुमार ने इसका विश्लेषण इस पुस्तक में काफी गहराई से किया है।
           किसी पुरुष के द्वारा सफल महिला को शक भरी नजरों से देखना उस पुरुष के सामाजिक और सांस्कृतिक संकट को दर्शाता है। केवल पुरुष ही नहीं बल्कि समाज में प्रचलित मान्यताओं सांस्कृतिक मिथको और नैतिकता के नाम पर एक घेरे में महिलाओं को बांधने के चलन की प्रक्रिया काफ़ी पुरानी है जिस का संचालन बड़े सुनियोजित ढंग से परिवार, समाज, शिक्षा और धार्मिक सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए किया जाता है। हमें जरूरत है कि जहां भी जिस स्वरुप में ऐसे मिथक सामने आए उस पर खुलकर चर्चा हो। लड़के और लड़कियों के सामने चर्चा हो। इस पुस्तक के माध्यम से कृष्ण कुमार ने एक बच्ची से औरत बनने की सारी सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया को काफी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।

‘चूड़ी की दुकान’ के मायने क्या हैं?

           “नाजुक होने के साथ चूड़ी रंगीन भी होती है। रंगों की विविधता और चमक देखकर चूड़ियों की दुकान में प्रवेश करने वाली नन्ही बच्ची अपनी माँ या बहन के साथ एक ऐसे मायाजगत में प्रवेश करती है जिससे अप्रभावित रहकर बाहर निकल आना लगभग असंभव है। चूड़ी की दुकान उन संस्थाओं में से एक है जो भारत की औरतों की व्यक्तिगत जिन्दगियों को पुरुष के कब्जे और काबू में रखने में संस्कृति की मदद करती हैं। बाज़ार का हिस्सा होने के नाते चूड़ी की दुकान एक अलग संस्था की तरह हमारी नज़रों में आने से बच जाती है।”
पृष्ठ संख्या- 73
पुस्तक का एक अन्य अंश इस प्रकार है, 

                   “लड़की होने का यह अर्थ – कि उसे गहराई से सोचने, समझने, प्रश्न करने की जरूरत नहीं है कि ये लड़कों के काम हैं, पुरुष की प्रवृत्ति के अंग हैं– लड़कियां अपने स्वभाव में ढाल लेती हैं। शिक्षा की औपचारिक प्रक्रियाओं, जैसे परीक्षा और स्कूल की दैनन्दिनी के प्रति निष्ठा और लगन में वे लड़कों से आगे रहती हैं। ऊपर से देखने पर यह बात अंतर्विरोधी प्रतीत होती है कि परीक्षा में लड़कों के मुकाबले ज्यादा मेहनत करने और सफल होने के बावजूद यहाँ लड़कियों की बौद्धिक क्षमताओं को अनावश्यकता के सामाजिक बोध से जोड़ा जा रहा है। इस बात में अंतर्विरोध इसलिए नहीं है क्योंकि हमारे देश में लागू परीक्षा व्यवस्था अपने में पूर्ण है और कक्षा के जीवन में संभव बौद्धिक क्रियाओं के प्रति तटस्थ रहती है।”

              “परीक्षा में अधिक अंक लेने वाले विद्यार्थी के लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि वह चीज़ों या अवधारणाओं के बारे में गहराई अथवा मौलिक दृष्टि से सोचे, शिक्षक की सोच पर कक्षा में टिप्पणी करे और अपनी सोच पर सहपाठियों की टिप्पणियों को सुने, उन पर गौर करे। परीक्षा एक औपचारिकता है और लड़कियां इस औपचारिकता को निभाने में उतनी ही प्रवीण हो जाती है जितनी कुशल वे घर और बिरादरी की औपचारिकताओं को निभाने में बनाई जाती है। वे शिक्षा व्यवस्था में आगे बढ़ती दिखाई देती हैं पर उन बौद्धिक औजारों से आम तौर पर बेगानी रखी जाती हैं जो शिक्षा के अनुभव में परीक्षा की तैयारी नहीं, संजीदा और प्रेरक शिक्षकों और कक्षा में विचारशील वातावरण की माँग करते हैं।”

              “ये दोनों स्त्रोत हमारी शिक्षा-व्यवस्था में लड़कियों को अनुपलब्ध रहते हैं। लड़कियों को पढ़ाने वाले शिक्षक पुरुष हों या स्त्री, उनके मन में अपनी छात्राओं के बारे में ऐसी ही धारणाएं होती हैं जैसी आम परिवारों में पाई जाती हैं। इस धारणा का केंद्र यह विचार होता है कि लड़कियों के जीवन का उद्देश्य विवाह है और शिक्षा उन्हें इसीलिए दी जा रही ताकि विवाह में आसानी हो और वे किसी अच्छे घर में ब्याही जा सकें। इस धारणा के चलते शिक्षा के तहत विभिन्न विषयों के ज्ञान को बौद्धिक विकास का साधन मानने की दृष्टि और लड़कियों के संदर्भ में ऐसी दृष्टि को कक्षा में अमल में लाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अपवादों को छोड़ दें तो यह कतई सम्भव नहीं है कि गणित व विज्ञान में बालिकाओं की रुचि और समझ को बढ़ावा देना आज का शिक्षक अपना उद्देश्य बना ले।”

           The novel Churi Bazar Mein Ladki by Krishna Kumar is a must read by every girl of today to help her understand the situations which unnecessarily hinder her progress. This novel was published by Rajkamal Prakashan in 2014.
The extent to which the circle of prevailing beliefs about women tightens the girl of a certain age, does not apply to any other age. At this age, family, society, religion, morality all these things start dominating together. It seems as if the girl, being of a certain age, is committing a crime. It becomes a habit to live with a different kind of fear.
All the instructions are given to her... don't walk like this, don't stop like that, don't speak like that, don't look like that... and then she starts living with a fear. To be honest, it is not fear but terror. Fear is called that which is felt occasionally. Just as if you are attracted by darkness, you get away by coming in the light, if you get attached to your father, you will get away when he goes to his office. But here there is fear from the whole society and girls also learn to live with the same fear and living like this becomes their definition of being a girl.
In the context of India, woman is a complex social construct. She is simply born as a human, but from then on, the process of her reconstruction begins with the force of the hard tools of culture. When an educationist has an eye on this hard tool of culture, it becomes very painful for him to see the cruelty of this cultural face of the society, he becomes restless that his own journey begins.
He starts remembering that childhood incident where he used to see girls going to the bangle shop with their mothers and women. Where a girl used to raise her hand in front of the shopkeeper to wear a bangle. She finds it to be an important cultural phenomenon and understands that the birth of the desire to wear bangles and the feeling of considering the bangle as an instrument of her beauty is a natural step in molding the little girl into a male dominated civilization. The dominant society is also successful.

The girl in the bangle market is divided into five chapters-

Chapter 1 The Myth of Equality, the Pole of Difference
Chapter 2 The Inner World and Around
Chapter 3 The Symbols of the Bangles
Fourth Chapter Taj's Class
The fifth chapter Abhimanyu's education


It is a classical work that deeply examines the social, cultural and moral system of the Indian woman confined in these five chapters. The book deals with the behavior of girls at home and in the family and how it changes their lives. Deep reflection on a variety of literary and cultural myths as well as how the entire process of a child's transition from infancy to youth and then becoming established in its many forms i.e. from child to girl and then to woman through cultural activities around masculine thinking Author Krishna Kumar has analyzed it in great depth in this book.
Seeing a successful woman with suspicious eyes by a man shows the social and cultural crisis of that man. Not only men, but the practice of tying women in a circle in the name of prevailing beliefs, cultural myths and morals in the society is very old, which is conducted in a very well-planned manner through family, society, education and religious cultural events. . We need to openly discuss the form in which such myths come to the fore. Discuss in front of boys and girls. Through this book, Krishna Kumar has presented the entire social and cultural process of becoming a woman with great sensitivity.


What is the meaning of 'Bangle Shop'?

“Besides being delicate, the bangle is also colourful. Seeing the variety and brightness of colours, the little girl who enters the bangle shop along with her mother or sister enters into a world of illusions from which it is almost impossible to come out unaffected. The bangle shop is one of the organizations that help culture in keeping the personal lives of women in India in the possession and control of men. Being a part of the market, the bangle shop escapes our sight as a separate institution.”
Page No- 73
Another part of the book is as follows,

“The meaning of being a girl – that she does not have to think deeply, understand, question that these are boys’ actions, part of man’s instinct – girls take in their nature. They are ahead of the boys in their devotion and dedication to the formal processes of education, such as examinations and the daily routine of the school. Viewed from above, it seems contradictory that the intellectual abilities of girls are being linked to the social sense of redundancy here, despite working harder and succeeding in examinations than boys. There is no contradiction in this because the examination system implemented in our country is complete in itself and is neutral to the intellectual activities possible in the life of the classroom.


“It is not necessary for the student who scores high in the test to think deeply or fundamentally about things or concepts, to comment on the teacher's thinking in the class and listen to the comments of classmates on his thinking, Pay attention Examination is a formality and girls become as proficient in performing this formality as they are skilled in carrying out the formalities of home and fraternity. They appear to advance in the education system, but are generally shunned by the intellectual tools that the education experience calls for, rather than exam preparation, serious and persuasive teachers and a thoughtful atmosphere in the classroom.”

“Both these sources remain unavailable to girls in our education system. Teachers teaching girls whether male or female, they have similar beliefs about their girl students as are found in ordinary families. Central to this belief is the idea that the purpose of life of girls is marriage and that education is being given to them so that marriage becomes easier and they can get married in a good home. Due to this perception, the question of considering the knowledge of various subjects as a means of intellectual development under education and applying such a vision in the classroom in the context of girls does not arise. Barring exceptions, it is not possible that today's teacher should make it her aim to promote the interest and understanding of girls in mathematics and science.

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

लिब्रे ऑफिस क्या होता है? What is Libre Office ? Libre office kya hota hai. संपूर्ण जानकारी हिंदी में।

प्रश्न.- लिब्रे ऑफिस क्या है? (What is Libre Office?

उत्तर:- Libre Office एक आफिस Suit है जो ऑफिसियल कार्य करने के लिए बनाया गया है। यह M.S. Office (Microsoft Office) की तरह ही एक Open Source Software है, जो कि एकदम फ़्री है। यानी इसके प्रयोग के लिए आपको कोई भी पैसे नहीं देने पड़ते। लिब्रे ऑफिस का निर्माण 2010 में किया गया था लेकिन इसे 25 जनवरी 2011 को लांच किया गया।
       
       Libre Office डॉक्युमेण्ट फाउण्डेशन (The Document Foundation) द्वारा विकसित एक निःशुल्क यानी की बिल्कुल मुफ्त 'office suit' है।

       Libre Office सभी Microsoft Windows, Apple Mac OS, Linux इत्यादि GUI Based Operating system पर आसानी से कार्य करता है।

        लिब्रे आफिस में Libreoffice Writer दिया गया है जो MS Word की तरह कार्य करता है। Libreoffice Impress, MS Powerpoint की तरह कार्य करता है। MS Excel की जगह Libreoffice Calc कार्य करता है। इसी तरह MS Access के तरह Libreoffice Base कार्य करता है। अगर आपको drawing बनानी है तो आप Libreoffice Draw का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके साथ ही Libreoffice Math का इस्तेमाल आप Mathematical Equation के लिए भी कर सकते हैं।

Libre Office और MS Office में अंतर
Difference Between Libre Office and MS Office

लिब्रे ऑफिस के प्रकार
Libre Office Components

       अब आगे हम जान लेते है कि MS Office में और Libre Office के component के बीच क्या क्या समानताये हैं।


Libreoffice Writer ~ MS Word

Libreoffice Calc ~ MS Excel

Libreoffice Impress ~ MS Powerpoint

Libreoffice Base ~ MS Access

Libreoffice Draw ~ Paint

LibreOffice Math ~ Excel Formula


Libreoffice Writer
 
           Libreoffice Writer एक word processor है जो पूरी तरह से MS Word की तरह ही कार्य करता हैं। जिस तरह हम MS Word पर कार्य करते है, उसी तरह वही काम हम Libreoffice Writer में कर सकते हैं। इसमें भी किसी भी फ़ाइल या डॉक्यूमेंट को एडिट किया जा सकता है, प्रिंट किया जा सकता है तथा उसे सेव किया जा सकता है। MS Word की तरह यहां भी सभी Options व Menu दिए गए होते हैं।

Libreoffice Impress

          Libreoffice Impress, MS Powerpoint की ही भाँति एक सॉफ्टवेयर है जिसमे की आप presentations, slides, Images, videos, media etc को edit कर सकते है व इनको create कर सकते है और फिर बाद में सेव कर सकते हैं। 


Libreoffice Calc

       Libreoffice Calc भी MS Excel के जैसा एक सॉफ्टवेयर है जिसमे सभी official calculations, formulas, होते है, जिनका इस्तेमाल करके Banking Chart, Year wise data chart, student percentages, calander dates, इत्यादि को create किया जाता है। इसमें भी वही सारा काम किया जा सकता है जो हम अभी तक MS Excel में करते आये हैं। 

Libreoffice Calc 

         यदि आपको drawing बनानी अच्छी लगती है तो आप Libreoffice Draw का इस्तेमाल कर सकते हैं। यही सुविधा हमे Microsoft Window के पेंट नाम के Application में प्राप्त होती है।


LibreOffice Math

Libreoffice Math का इस्तेमाल आप Mathematical Eqautions के लिए कर सकते हैं जोकि हमें माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के Excel Formula में प्राप्त हो जाता है।