अखिल भारतीय दर्शन परिषद के द्वारा आयोजित 69वां त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन की समाप्ति हो चुकी थी। धीरे-धीरे सभी लोग प्रस्थान कर रहे थे, कुछ कर चुके थे एवं हम करने वाले थे। मेरी ट्रेन रांची स्टेशन से शाम में 07:30 की थी रांची गेस्ट हाउस से स्टेशन की दूरी लगभग 07 KM थी यानी कि आधे घंटे का समय काफी था फिर भी हम 06:00 बजे रैपीडो बुक कर लिये ताकि ससमय स्टेशन पर पहुंचा जा सके। रैपीडो वाला भी ससमय आ तो गया लेकिन वह गेस्ट हाउस के दूसरी साइड था। चुंकि बुकिंग करते समय मैंने रूम से ही बुक किया था जिस वजह से गेस्ट हाउस की दूसरी साइड का लोकेशन उसे मिला था। उसे लोकेशन समझाते-समझाते आधे घंटे और लग गए और वह मेरे पास 06:30 में आया और आने के साथ ही बोला कि रास्ता पूरा जाम है हमें स्टेशन पहुंचने में 01 घंटे से भी ज्यादा का समय लग सकता है। मैंने कहां की भाई ट्रैन हैं, देखिये कुछ हो सकता हैं ?
उसने पुरे कॉन्फिडेंस के साथ कहां की - सर, आपकी ट्रैन तो हम नहीं छूटने देंगे।
...और फिर उसने रांची के सारे शार्टकट रास्ते से होते हुए मुझे स्टेशन की ओर ले चला। रास्ते में वह बातचीत भी करते जा रहा था मैं भी समय-समय पर रिप्लाई दे रहा था, मालुम चला की उसका नाम विशाल है और वह BBA का कोर्स किया हुआ है, MBA करने के बारे में विचार कर रहा है। उसने मुझे रांची आने एवं यहां के आयोजन के बारे में पूछा। जब उसे पता चला कि हम Ph.D कर रहे हैं तो उसकी उत्सुकता और जागृत हो गई और Ph.D से संबंधित मुझसे कई सारे प्रश्न पूछे। मैंने उसके सारे प्रश्नों का बहुत ही विस्तार से जवाब दिया। हम रांची स्टेशन पहुंच चुके थे लेकिन उसके प्रश्न अभी खत्म नहीं हुए थे। मैंने उसे अपना नंबर दिया और कहां कि जब भी आप को कुछ पूछना हो या जानना हो आप कभी भी मुझे कॉल/मैसेज कर सकते हैं। रैपिडो एप्प में जो किराया दिखा रहा था उससे ज्यादा ही मैंने उसे दिया और Good Night के साथ मैंने उससे विदा लिया उसने जवाब में मुझे Good Night के साथ Happy Journey भी बोला। मैंने भी Thank You के साथ उसे पटना आने का न्योता देते हुये रेलवे स्टेशन पर आ गया। स्टेशन पहुंचने के 05 मिनट के अंदर ही अनाउंस होने लगा की हमारी ट्रेन प्लेटफार्म नंबर एक (01) पर आ रही हैं।
ट्रैन में मेरी शीट S-3 बोगी में 48 साइड अपर था, लेकिन ट्रेन में हम साइड लोअर की सीट पर ही बैठे हुए थे। ट्रेन का भी एक अनोखा नियम है यदि आप लोअर शीट पर रहते हैं तो आप की शीट पर हर किसी का दावा रहता है लेकिन जैसे ही आप ऊपर की सीट की ओर अग्रसर होते जाते हैं तो आप की वह सीट केवल आपकी ही रह जाती है। यहां मुझे जिंदगी का एक फलसफा भी समझ में आया, जब तक आप निचले स्तर पर रहते हैं तब तक आपको हर तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा यानी आप अपनी इच्छानुसार हर कार्य नहीं कर सकते हैं आपकी संसाधनों में सबका बंटवारा होगा लेकिन जैसे ही आप ऊपर की ओर अग्रसर होंगे वह बस आपका एवं आपका हो कर रह जायेगा। मेरी सीट तो 48 साइड अपर थी लेकिन मैं 47 साइड लोअर पर ही बैठा हुआ था, ट्रेन में बैठने के 05 मिनट के उपरांत ही हमारे सहयात्री भी आ गए, जिनका नाम रौशन था उनकी यात्रा भी हमारी तरह रांची से पटना तक होने वाली थी। मैं अक्सर अपनी यात्राओं में दो कार्य करता हूं एक तो ब्लॉग राइटिंग✍🏻 और दूसरा अपने सहयात्रियों से बातचीत, ताकी ब्लॉग के लिए हमें कुछ कंटेंट मिलते रहे।
रांची आये हुये आज तीन दिन हो गए थे और सोशल मीडिया पर अभी तक मैंने मात्र एक ही पोस्ट किया था यही सोच कर ट्रेन में बैठे-बैठे पहाड़ी मंदिर का पोस्ट तैयार करने लगे। तभी जिनकी सीट पर मैंने आधिपत्य कर रखा था जो की रेलवे के नियम के अनुसार सही था हमारे सहयात्री ने कहां - मैं जरा बाथरूम से आता हूं, आप मेरा बैग देखते रहिएगा। आज के समय में भी हम अपने साथ रहने/चलने वाले लोगों पर इतनी जल्दी विश्वास कर लेते हैं भले ही उनसे मुलाकात पहली बार हुई हो। मैंने उन्हें आश्वसत किया कि आप आराम से जाइए कोई दिक्कत नहीं होगा। जब तक वह बाथरूम से आते तब तक मेरा पोस्ट कंप्लीट हो चुका था और सोशल मीडिया पर परिलक्षित भी हो रहा था। मैंने इस पोस्ट में पहाड़ी मंदिर का थोड़ा बहुत इतिहास भी लिख✍🏻 रखा था की इस मंदिर की धार्मिक मान्यता क्या है? और भारत की आजादी से इसका क्या संयोग है? इत्यादि। मुझे यह जानकार भी आश्चर्य हुआ कि प्रत्येक 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को यहां पर तिरंगा झंडा भी फहराया जाता है। इस पोस्ट को तैयार करने में मुझे 20 से 25 मिनट का समय लगा था लेकिन लोगों ने इसे पढ़ने में 01 से 02 मिनट का भी समय नहीं लगाया और और कमेंट में "जय माता दी" लिख कर आने लगा जबकि वह शिवजी का मंदिर था।
हमारे सहयात्री तब तक वापस अपनी सीट पर आ चुके थे अक्सर ऐसा होता है कि अपने सहयात्रीओं के साथ बातचीत की शुरुआत मेरे द्वारा की जाती है लेकिन इस बार उल्टा हुआ। मेरे सहयात्री जिनका नाम रौशन था उन्होंने मुझसे पूछा - आप कहां तक जाओगे ?
मैंने कहां - पटना।
उन्होंने भी कहां - मुझे भी पटना तक ही जाना है।
मैंने उनसे पुन: पूछा - आप 12th की तैयारी करते हो या किसी सामान्य प्रतियोगिता की। क्योंकि अक्सर पटना में रहने वाले छात्र किसी ना किसी प्रतियोगी परीक्षा की ही तैयारी कर रहे होते हैं।
उन्होंने कहां - 12th तो कब का हो गया है, अभी परीक्षा की ही तैयारी कर रहे हैं।
मैंने पूछा - 10th कब हुआ था ?
उसने कहां - 2018 में।
मैंने अनुमान लगाया की उसकी उम्र तक़रीबन 21-22 साल की रही होगी।
मैंने कहां - आप BPSC की तैयारी कर रहे हो ?
उसने थोड़ा धीरे से कहां - नहीं।
BPSC, JPSC या किसी भी राज्य की कोई संस्था जो सिविल सेवकों को नियुक्त करती है अक्सर उस संस्था के नाम से ही उसके द्वारा नियुक्त की जाने वाली परीक्षाओं को लोग जानते हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व BPSC ने बिहार में शिक्षकों की नियुक्ति का कार्य किया था। अब आलम यह है कि उसके द्वारा नियुक्त शिक्षक अपने आप को सबसे सर्वश्रेष्ठ एवं "बीपीएससी से पास शिक्षक" का टैगलाइन लेकर घूम रहे हैं।
खैर....
हम ट्रेन में वापस लौटते हैं, उस समय तक 08 बज चुका था और मैंने अपनी खाने की प्लेट तैयार कर ली थी आज के रात्रि भोजन में मेरे पास धुसका (एक विशेष प्रकार का फ़ूड जो कि रांची में बनाया जाता है) था। धुसका के बारे में मेरे एक छात्र (हर्ष) जो कि रांची से ही आते हैं एवं वर्तमान में निफ्ट पटना में अपनी पढ़ाई कर रहे है, उन्होंने बताया था और कहां था की - आप एक बार आप इसको टेस्ट कीजिएगा, बहुत अच्छा रहता है। और हुआ ऐसा की सुबह के नाश्ते से लेकर रात के डिनर तक धुसका ही रहा। इसका स्वाद बहुत अच्छा था, ऐसे भी मुझे नहीं-नई जगह घुमने और नई-नई डिश खाने का शौक है।
Dhuska
मैंने रौशन से भी पूछ लिया कि आपको धुसका कैसा लगता है ? उन्होंने एकदम से मना करते हुये कहां की मुझे अच्छा नहीं लगता है। मुझे लग गया कि अब इसके बारे में चर्चा करना सही नहीं है और मैंने परिचर्चा के विषय को बदल दिया।
चूंकि, वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था तो मेरा पहला प्रश्न वही से था। आप अभी तक कोई एग्जाम पास किये हो या नहीं ?
उसने कहां - कई सारा, लेकिन अंतिम चयन अभी तक नहीं हुआ हैं कभी दौर तो कभी रिटेन में रह जाता हैं।
मैंने कहां - कोई बात नहीं मेहनत करते रहिए सफलता एक दिन जरूर मिलेगी ।👍🏻
उसने कहां - Hmmm.
फिर मैने अपने बारे में बताते कहां कि मुझे कभी भी पुलिस या ऐसा कोई जॉब पसंद नहीं रहा लेकिन इनके लिए मन में बहुत ही ज्यादा आदर एवं सत्कार का भाव रहता है।
तब उसने थोड़ी बेरुखी के साथ कहां की - कोई जॉब तो मिलना चाहिए।
मैंने कहां - जॉब क्यों नहीं मिलेगी ? आप उसके लिए तैयारी तो कीजिए, फिर मैंने उसे अपने नवोदय विद्यालय, मधेपुरा के ज्वाइनिंग से लेकर के BPSC के PT एवं मैंस की सफलता की कहानी बताई और यह भी बताया कि कैसे हम उस समय यूट्यूब पर छात्रों को पढ़ाते भी थे। हमारा यह लेक्चर लगभग एक घंटे तक चला। पता नहीं यह लेक्चर उसे कितना समझ में आया लेकिन उसे भूख जरूर लग चुकी थी। उस समय 09:00 बज चूका था और मैं अब आराम करने अपनी सीट पर जा चूका था।
मेरा सीट नम्बर 48 था और इसका मूलांक 03 होता हैं, "Numerology (अंक ज्योतिष): - अंक ज्योतिष के अनुसार मूलांक 03 वाले लोगों का सम्बन्ध वृहस्पति ग्रह से होता है एवं नंबर 03 का प्रभाव होने की वजह से ऐसे जातकों में ज्ञान की अधिकता होती है। इन्हें धार्मिक कार्यों के साथ-साथ किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक होता है।" मैंने सोचा कि जब नंबर का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता हैं तो वस्तुये उससे अछूती थोड़ी ही हैं वहां पर भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता ही होगा। और शायद यही वजह भी रहा की सीट क्रमांक 48 मूलांक 03 पर जाते ही उसके प्रभाव मेरे उपर परिलक्षित होने लगे और अपने आप ही अगूंलिया मोबाइल के स्क्रीन पर चलने लगी और शब्द अनायास प्रकट होने लगे। देर रात तक हम ब्लॉग्स लिखने और उपन्यास अग्निशिखा जिसे साथ लेकर के गए हुए थे उसे पढ़ने का कार्य रात भर करते रहे। अंक ज्योतिष के अनुसार मेरा मूलांक 01 होता है जिसका मुझपर प्रभाव है और इसे मै महसूस भी करता हूँ खाशकर तब से जब से ज्योतिष विज्ञान का अध्ययन शुरू किया है।
सुबह का 04:30 हो रहा था लगभग सभी लोग सोए हुए थे, तभी एक अंकल जी अपने कंधे पर ढेर सारा गमछा लेकर आए और उनकी आवाज से पूरा ट्रैन गुंजयमान हो गया - सूती गमछा, सूती गमछा।
एक व्यक्ति उनसे अर्द्धनिंद्रा में ही पूछा - स्टेशन ???
उस अंकल ने कुछ यूं जवाब दिया - गया "मकदुमपुर" का सूती गमछा।
उन्हें यूँ बोलना था - गया का सूती गमछा लेकिन बीच में मकदुमपुर आ गया।
अंकल जी जब तक अपना गमछा लेकर आगे जाते उससे पूर्व वह व्यक्ति फिर से खर्राटा लेना शुरू कर दिए थे। ट्रेन में ही किसी सज्जन के मोबाइल से मधुर आवाज में गाना बज रहा था -
लाडला कन्हैया मेरा, जग से निराला इसलिए.........
हम अपने सफ़र के अंतिम पड़ाव पर थे, रात भर मैंने ब्लॉग्स राइटिंग और कुमार विश्वास की सुप्रसिद्ध रचना की कुछ पंक्तियों को गुनगुनाते हुए बिताया था -
"तुम्हारे और मेरे रात में बस फर्क है इतना ,
तुम्हारी सो के गुजरी है हमारी रो के गुजरी है।"
हमारी यह रात रो कर तो नहीं लेकिन खर्राटों के बीच जरूर गुजरी थी क्योंकि दो सज्जन व्यक्ति जो की ट्रैन में अपर सीट पर थे दोनों के बीच घमासान खर्राटा वार चल रहा था और मैं निर्दोष सैनिक की भांति अपनी निंद्रा को नहीं चाहते हुए भी कुर्बान कर रहा था।
.....धीरे -धीरे ट्रैन में भीड़ बढ़ती जा रही थी और स्लीपर क्लास अब जनरल डब्बे में परिवर्तित होते जा रहा था। पटना जंक्शन से 01 KM पहले ट्रेन रुक गई, मैंने अपना बैग वगैरा पैक किया और अपर की सीट से निचे आ गया। रौशन अभी तक सों रहा था, संभवत: रात की खर्राटों से वह भी परेशान रहा हो। फिर भी मैंने उसे जगाया और हल्की मुस्कान के साथ उसे सुप्रभात🌻बोला। लेकिन उसने धीरे से good morning बोला और अपने मोबाइल में गुम हो गया। हम पटना जंक्शन पहुँच चुके थे, आते समय मैंने एक बार फिर से अपने सहयात्रियों को यात्रा में साथ देने के लिये धन्यवाद दिया विशेष कर के उन्हें जो की रात भर खर्राटों से मुझे जगा कर रखे ताकि हम अपना Blogs एवं उपन्यास दोनों पुरा कर पायें। 07:30 बजे तक रूम पर आ चुके थे फिर फटाफट नाश्ता तैयार किये क्योंकि 09:00 बजे से पहले कॉलेज भी जाना था।