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बुधवार, 23 सितंबर 2026

वो चाहे शाम को घूमे या आधी रात को घूमे...

                                                                                             Source - BBC बीबीसी

 

वो चाहे शाम को घूमे या आधी रात को घूमे।

अगर वह भींगना चाहे भरी बरसात में घूमे।।

तुम्हें किसने दिया है हक ये दुर्व्यवहार करने का।

वो एक लड़की की मर्जी है वो किसके साथ में घूमे।।


नज़रिया अपना बदलो, उसपे पहरे क्यों बिठाते हो?

उसी की आज़ादी पर तुम सवाल संगीन उठाते हो?

हो सड़क, राहें या कोई सुनसान कोना,

वो निर्भय हो के अपने ख़्वाब में घूमे।।


दरिंदों को सिखाओ पाठ, तुम इंसान होने का,

गुनाहगारों को दो डर,  ज़मीं पर चैन खोने का।

जमुई की  पावन धरा हो, या देश का कोई  कोना,

उसे हक़ है, कि वो अपने स्वाभिमान में घूमे।।


संस्कारों की झूठी आड़ में, तुम उसकी साँसें मत छाँटो,

जो घिनौना काम करे, उस दरिंदे में गुनाह बाँटो।

उसे हक़ है, ज़माने की बंदिशों को तोड़ आगे बढ़ने का,

वो अपनी रोशनी लेकर, घने ज़ुल्मत (अंधेरे) में घूमे।।


तुम्हारी सोच छोटी है, मगर उसके क़दम हैं ऊँचे 

ज़माना के डर से वो क्यों पीछे खिंचे?

तुम्हें किसने दिया अधिकार, उसकी राह रोकने का। 

वो जिसकी हमफ़सर बनना चाहे, उसी के साथ में घूमे।।


वो चाहे शाम को घूमे या आधी रात को घूमे...

उसे आज़ाद रहने दो, वो अपनी शान से घूमे!

अगर वह भींगना चाहे भरी बरसात में घूमे।।

तुम्हें किसने दिया है हक ये दुर्व्यवहार करने का।


वो एक लड़की की मर्जी है वो किसके साथ में घूमे।।

वो एक लड़की की मर्जी है वो किसके साथ में घूमे।।

रविवार, 9 अगस्त 2026

तोहरा बिनाs


गीत-गजल कइसे लिखब ? अब हम तोहरा बिना।

आपन मन के हालात कइसे व्यक्त करब? अब तोहरा बिना।

छोड़ के जात समय तु त तनको ना सोचलू...

गुनगुनाइब अब कईसे, अब तोहरा बिना।


बचपन के ऊ किस्सा, आ ऊ मस्ती के दिन,

 सब याद आवत रहीs, अब तोहरा बिना।

काश!!! तु बस एक बेर देखे खातिर पीछे मुड़ गइल रहतीं...

ओही याद पर हम हम जी लेती, तोहरा बिना।


तू कहत रहलू कि तू हमेशा हमरा साथे में रहबु।

बतावऽ, अब हम कईसे रही तोहरा बिना। 

चाँद भी अब हमरा से पूछेला...

"तू अकेले छत पर का कर रहल बाड़s, अब ओकरा बिना?


नदीयां उजाड़ हो गईल, बगइचा बिरान हो गईल,

फूलवो में भी अब सुगंध नइखे  अब तोहरा बिना।!

यदि हम चहती त तहरा के रोक लेती,

लेकिन उ देह के हम करती भी का, तोहरा आत्मा  के बिना ?


गीत-गजल कइसे लिखब ? अब हम तोहरा बिना।

आपन मन के हालात कइसे व्यक्त करब? अब तोहरा बिना।

छोड़ के जात समय तु त तनको ना सोचलू...

गुनगुनाइब अब कईसे, अब तोहरा बिना।


विश्वजीत कुमार✍️

इस कविता का हिंदी अनुवाद

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

एक कविता में सम्पूर्ण रामायण।



राम राम रामा सरयू तट पर राज्य कौसला है नामा,
अयोध्या है जिसकी राजधानी।
जिसके राजा दशरथ कहें नितिन कहानी
रानीयाॅं तीन कोशल्या, कैकेई और सुमित्र
नहीं हुआ तीनों को कोई पुत्र
पुत्र प्राप्ति हेतु वशिष्ट से यज्ञ करवाया
राम लखन भरत और शत्रुघ्न को पाया
चारों अस्त्र शस्त्र और युद्ध में बलवान
विश्वामित्र थे आश्रम में राक्षसों से परेशान
विश्वामित्र के आश्रम गए लखन और रामा
वहाॅं उन्होंने भयंकर-भयंकर राक्षसों को मारा
‌ऋर्षि ने दिव्य अस्त्र दिए राम किया प्रणामा
विश्वामित्र तब ले पहुंचे राम जनक धामा
धनुष तोड़ सीता को राम वधू बनाया
अयोध्या पहुंच मात पिता को शीश नवाया
राम के राजा बनने का जब समय आया
मंथरा ने कैकेई को तब भड़काया
बोली हे भरत मात कैकेई महोदया
कौशल्या पुत्र न बन जाए राजा अयोध्या
तू वचनों को अपने राजा से मांग ले
भरत को राज्य और राम को वनवास दे
वचनों को कैकेई के सुन दशरथ पर आघात हुआ
भरत को राज्य मिला और राम को वनवास हुआ
राम संग सीता और लखन भी बन को चल दिये
कैकेई और मंथरा के ही मन में जलने लगे दिये
इधर राम लखन सीता सहित बन को चले
उधर दशरथ प्राण तन को छोड़ यम को चले
केवट ने तब सरयू पार कराया
राम चित्रकूट में पर्णकुटी बनाया
लंकापति की बहन सुपनखा वहाॅं आ गई
राम लखन की सुंदर छवि उसे भाग गई
उसने दोनों भाइयों से विवाह को आग्रह किया
उन्होंने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया
क्रोधित हुई राक्षसी ने मात पर हमला कर दिया
लखन ने नाक को भी उसकी अलग कर दिया
नकटी बहन को देख रावण क्रोधित हुआ
उससे सीता का वर्णन सुन मोहित हुआ
मारीच हिरन बन कुटिया के पास जा खड़ा हुआ
सुंदर हिरन को देख सिय हिरन पाने का मन हुआ
लखन सिया को छोड़ राम हिरन लेने गए
राम ने जब मारा मारीच को बान
निकलने लगें उसके तन से प्राण
चिल्लाया बचाओ हे सिय हे लखन भाया
लगा सिय को संकट में है पति प्राणा
दे सौगंध सिय ने लखन को भेजा
तब लखन ने एक रेखा खिंचा
हे मात इससे बाहर न जाए
चाहे कितनी भी मुसीबत आए
साधू रुप धर रावन वहां आया
भिक्षांम देही भिक्षांम देही चिल्लाया
माता के भिक्षा देती ही रावण ने उन्हें उठाया
अपने पुष्पक विमान में जबरन बैठाया
माता के रूदन को जब जटायु ने सुना
तुरंत आ वह रावन से लड़ा
जटायु ने ज्यों रावन पर प्रहार किया
उसने उसके परो को काट दिया
राम लखन ने सिय को कुटी में न पाया
उन्होंने सिय खोजने को कदम बढ़ाया
धरा पर पड़े करहाते हुए जटायु राम पाया
जटायु ने जो घटी उस घटना को बताया
विरह में फिरत फिर राम रिशिमुख आए
जहां पवन पुत्र हनुमान को पाए
हुई यही सुग्रीव से मुलाकात
बनें मित्र दोनों थामा मित्रता का हाथ
देख दुखी राम हनुमाना
चले खोजन सिय करत राम प्रणामा
जब समुद्र मार्ग में बना अवरोध
जामवंत कराया हनुमान शक्ति बोध
पल भर में हनुमत समुद्र सीमा पार की
लंक पहुंच प्रभु मुद्रिका सिय को प्रदान की
क्रोध में वाटिका सारी उजाड़ दी
लेकर हनुमत अपने प्रभु का नामा
लंका को बनाया जलता हुआ शमशाना
लौटकर लंका से माता हाल सुनाया
राम लखन अब कुछ चैन सा पाया
राम, हनुमान और सुग्रीव वानरों की सेना बनाई
उठा धनुष और गदा लंका पर कर दि चढ़ाई
राम अनेक राक्षसों को मारा
फिर कुम्भकरण को संहारा
मेघनाथ और लखन भी टकरा गये
सबके मन डर से दहला गये
मेघनाथ ने लखन पर शक्ति आघात किया
मानों श्रीराम के हृदय पर वज्रपात किया
हनुमत तब संजीवनी लाए
राम लखन को जीवित पाए
पुनः लखन मेघनाथ आपस में भिड़ गए
मानो यमराज स्वयं लखन रूप धर गए
लखन ले प्रभु का नाम ऐसा मारा बाण
जो पल भर में लें आया मेघनाथ के प्राण
अब रावण स्वयं युद्ध में आ गया
चहुं दिशाओं में डर का माहौल छा गया
धरा और अम्बर भी घबरा गया
देवता समुह भी अम्बर में अब आ गया
रावण राम के बाण टकरा गये
रावण के भी काल राम में समा गये
राम शीशन पे काटे शीश रावण की ना मृत्यु होए
मारन का रावण को हर प्रयास विफल होए
तब कान में राम के विभिषण फुसफुसा
भाई की मृत्यु का भाई ने ही राज बताया
राम ने ब्रह्मास्त्र का अनुसंधान किया
नाभि का सोम सुखा रावण को मृत्यु दान दिया
रावण को पता था कि उसका गलत था कामा
वो चिल्लाया हे प्रभु राम राम रामा
राम सिय का मिलन हुआ
विभिषण का राज्याभिषेक हुआ
राम सिय लखन अयोध्या है आए
नगरी ने मिलकर स्वागत गीत है गाए
राम को राजा बनाया गया
सिय पर लांछन लगाया गया
सब छोड़ सिय पुनः वन गई
वाल्मीकि के यहां रूक गई
सिय ने दो पुत्र जाये सब थे बहुत खुश
बड़े का नाम लव छोटे का था कुश
राजा राम ने अश्वमेध यज्ञ करवाया
यज्ञ अश्व चहु ओर घुमवाया
सब ने उसे है बस शीश नवाया
लव कुश ने उसे है बन्दी बनाया
अश्व छुड़ाने सेना आई
लव कुश ने है मार भगाई
भरत, शत्रुघ्न और फिर लखन है आए
पर लव कुश वो हरा ना पाए
जब भाई सभी परास्त हुये
स्वयं राम युद्ध में आ गये
ज्यों लव कुश ने धनुष बाण उठाया
तभी गुरु ने आ धमकाया
क्यों तुमने राजा पर धनुष उठाया
क्या यही है मैंने तुम्हें सिखाया
क्षमा मांग लव कुश ने राजा को प्रणाम किया
भरत, शत्रुघ्न और लखन को जीवनदान दिया
जा मात को सारी कथा सुनाई
हराया भरत, शत्रुघ्न, लखन और आए फिर रघुराई
हमने भी रघुवर पर धनुष तान दिया
हाय तुमने जीते जी मुझे मार दिया
अपने पिता पर ही तुमने धनुष बाण तान दिया
प्रथम मुलाकात में ये कैसा है मान दिया
महल जा लव कुश सम्पूर्ण रामायण सुनाई
फिर सिय की भी है वन व्यथा बताई
स्वयं का नाम लव कुश बताया
राम पिता और सिय को है मात बताया
वाल्मीकि तब सिय को लेकर आए
प्रजा जन क्षमा मांगते दिए दिखाए
सिय ने तभी है धरा को पुकारा
यदि हूं पवित्र मैं अपारा
मुझे गोद में अपनी स्थान दें
मेरा जीवन आप ही अब तार दे
तभी धरा फटी धरा-धरा से प्रकट हुई
सिय गोंद में उनके निज धाम गई
फिर राम ने सरयू में किया स्नाना
निज धाम को किया तब प्रस्थाना
बोलो राम राम रामा
नितिन राघव ✍️

बुधवार, 3 सितंबर 2025

प्यार तो वह मुझसे कम करता है।



प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


उसका चेहरा जो है ना!!! 

नज़र से कभी नहीं हटता मेरी।

शायद इसीलिये रात-दिन मुझको, 

परेशान बहुत करता है।


जी तो चाहता है भुला दूँ उसे मैं,

लेकिन ख़यालो में आ-आ कर के वो बेज़ार बहुत करता हैं।

ऐसा नही है की मै उसे पसंद नही,

बस ये बताने से वो एहतिराम करता है।


खुश नसीब हो आपलोग जो उसकी कहानियां सुनने के आए हो,

वरना वो तो एक अल्फाज़ हैं।

रहता तो हमेशा मेरे साथ हैं,

लेकिन एतबार नही करता है।


उक्ता गया हूँ उसके इस कार्यो से,

ना कभी वो हाँ और ना कभी ना कहता है।

बस!!! अपनी आँखों के झील में रखता है।

ना डूबने देता है और ना उबरने देता है...

अपनी काजल की लकीरों की, 

वह लक्ष्मण रेखा तैयार रखता है।


प्यार तो वह मुझसे कम करता है,

लेकिन ऐलान ख़ूब करता है।

इस तरह वो मेरा,

नुकसान बहुत करता है।


विश्वजीत कुमार✍🏻


कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ -

एहतिराम (احترام) - सम्मान, आदर, इज़्ज़त या मान-मर्यादा
अल्फ़ाज़ - "शब्द" या "शब्द समूह
एतबार - (पुल्लिंग) विश्वास, भरोसा।
बेज़ार - परेशान
उक्ता - ऊबा हुआ


सोमवार, 1 सितंबर 2025

...आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


 तेरी दहलीज तो बहुत दूर है वरना, 

जब भी होते उदास हम तेरे पास आ जाते।

 यदि तेरे छोड़े हुए ना होते तो, 

शायद!!! पूरी दुनिया को रास आ जाते।


 कभी-कभी सोचता हूँ, 

काश बचपन में लौट जाता मैं।

सभी पुराने लिबास मेरे काम आ जाते।

शायद!!! अब भी नाराज हो क्या मुझसे,

एक बार तो मुस्कुरा😊 दो मेरी ज़िन्दगी में चार चाँद आ जाते।


कहने को तो है यहां सभी मेरे अपने,

लेकिन, तुम जो तसव्वुर में हो तो। 

पूरी कायनात भी जमीं पर आ जाते।


उस दिन तुम जरा मेरे और पास आ जाते, 

शायद!!! मेरे होशो-हवास आ जाते।

 एक दिन में जितना खर्चा हुआ, 

उतने में तो पुरे महीने के राशन आ जाते।


विश्वजीत कुमार✍🏻

कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ 

दहलीज - घर (House)

लिबास - कपड़ा (Clouth)

तसव्वुर - कल्पना (Imagination)

कायनात - सृष्टि, ब्रह्मांड, जगत, संसार या विश्व।


रविवार, 31 अगस्त 2025

कोई बात नही...

 ग़ज़ल 



आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


कभी कहते थे मुझसे मेरे बिना जी न सकेंगे,

लाख मुसीबते आये हँस कर आत्मसात करेंगे।


ये तो अब पुरानी बाते हो गई,

और यही सही है तो कोई बात नही।


लानत है मुझको खुद पे कि ताउम्र मैंने वफ़ा की,

फिर भी मुझमें ही कमी है तो कोई बात नही।


धोखा, फरेब, झूठ को कहते हैं इश्क़🥰वो,

फिर भी, इश्क़🥰यही है तो कोई बात नही।


शैवाल पत्थर तक है तब तक ठीक है,

अगर आपके दिल में भी जमा है तो कोई बात नही।


आपको मुझसे इश्क़🥰 नही है तो कोई बात नही,

आंखो में नमी😓 नही है तो कोई बात नही।


      विश्वजीत कुमार ✍🏻

शुक्रवार, 30 मई 2025

कविता (Poetry)



तुम्हारी गैर मौजूदगी में अक्सर मैंने लिखें हैं।

तुम्हारी मौजूदगी की कविता।

तुम्हारे ना होने पर भी,

तुम्हारी उपस्थिती की कविता।


डायरी का हर एक पन्ना गवाह हैं,

मेरे दिल में उठे तुम्हारे दर्द की कविता।


अक्सर खो जाता हूँ,

तुम्हारे ख्यालों में।

मेरे लिये भी सही हैं, क्योंकि!!

उसी से बनती हैं मेरी भावनाओं की कविता।


देखो प्रिय!!!

कुछ भी असंभव नहीं है इस जहां में,

तुमसे प्रेम💖 करना भी हो तो 

फिर से लिख लेता✍🏻 हूँ मैं कोई कविता।


कविता ही कविता,

मेरे जीवन का अब सार हैं कविता।

बिना इसके अब तो लगता हैं,

बेमानी है मेरे जीवन की गाथा।


कविता के अर्थ को भावार्थ देने,

तुम किसी दिन आओ।

शायद उसी दिन मुक़्क़मल होगी,

मेरी यह कविता।


तुम्हारी गैर मौजूदगी में अक्सर मैंने लिखें हैं।

तुम्हारी मौजूदगी की कविता।

तुम्हारे ना होने पर भी,

तुम्हारी उपस्थिती की कविता।


विश्वजीत कुमार ✍🏻


रविवार, 25 मई 2025

तुम्हारे बिना...




गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


वो बचपन की बाते वो मस्तीयों के दिन,

याद आते रहेंगे अब, तुम्हारे बिना!!!

एक बार मुड़ कर देख भी लेते...

उसी के सहारे मैं जी लेता, तुम्हारे बिना!!!


कहते थे तुम साथ हमेशा रहोगे।

बताओं अब मैं कैसे रहूँ, तुम्हारे बिना!!!

चाँद भी मुझसे अब पूछता है...

अकेले छत पर क्या कर रहे हो, उसके बिना!!!


नदियां विरान है, बगीचे गुमनाम है।

फूलों में अब वो खुश्बू नही हैं, तुम्हारे बिना!!!

चाहता तो मैं तुम्हे रोक सकता था।

लेकिन जिस्म का करता भी क्या, तुम्हारे रूह के बिना!!!


  गीत-गजलें लिखूंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

दिल के हाल को व्यक्त करूँगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!

छोड़ कर जाते हुए तुमने सोचा नही...

गुनगुनाऊंगा मैं कैसे, तुम्हारे बिना!!!


विश्वजीत कुमार✍️

सोमवार, 21 अप्रैल 2025

असंभव है।

तुमसे मिलना भी असंभव है, 

ना मिलना भी असंभव है।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी असंभव है।


हमें याद हैं वो पल,

जिसमे तुम कहती थी।

सनम आपसे दुर हो के,

एक पल जीना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


हम इस मोड़ पर आकर खड़े हुए हैं जानम!!!

तुम्हें पास बुलाना भी असंभव हैं।

तुमसे दुर रहना भी असंभव हैं।


असंभव ही असंभव हैं,

अब प्रत्येक कार्य असंभव हैं।

जो तुम नहीं हो जीवन में,

जीना/मरना भी असंभव हैं।


तुमसे मिलना भी असंभव...


एक कार्य तो तुम कर ही सकती हो,

असंभव से इस कार्य को अब संभव कर ही सकती हो।

मुझे तो यक़ीन हैं अब भी,

इस नामुमकिन को मुमकिन कर ही सकती हो।


लेकिन हमें लगता है यह सब है व्यर्थ की बातें,

व्यर्थ की चिंता व्यर्थ की जज्बाते।

होना है जो वही तो होगा,

फिर हम क्यों करें बेतकल्लुफ की बातें।


लेकिन असंभव को हम त्याग नहीं सकते,

 इसे संभव करने को करते रहते हैं।

दिन-रात हम फरियादें,

किसी दिन मुकम्मल होगी हमारी ये सारी जज्बातें।


उस दिन तुमसे मिलना भी संभव होगा,

पास आना भी संभव होगा।

तुम्हें यादों में बुलाकर, 

गुफ्तगू करना भी संभव होगा।


विश्वजीत कुमार✍️




मंगलवार, 4 मार्च 2025

तुमसे मुलाक़ात के मौके...


तुमसे मुलाक़ात के,

मौके तो बहुत आए।

कभी हम तो कभी तुम,

व्यस्त ही नज़र आए।


कभी पटना कभी छपरा,

बुलाते थे हमें लेकिन।

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


राह भटकते रहे,

मंजिल पर पहुँच नही पाये।

कभी इस ओर कभी उस ओर

वो बंधन कभी ख़त्म ना हो पाये।


कभी बिहार कभी यू पी,

में बसें रहे हम।

 किसी दिन तुमने आवाज नहीं लगाई,

किसी दिन हम आवाज नहीं लगायें।


 शेखपुरा से याराना रहा, 

पटना से भी रहा।

 तुम मिलोगी किस ओर, 

हम यह भी समझ नहीं पाए।


तुम्हारे पास आने के, 

सुअवसर भी कम नहीं आए।

 अभी तक हम पावन गंगा के, 

तट पर नहीं आए।


 कभी गंगा कभी यमुना, 

बुलाती थी हमें लेकिन 

किसी दिन तुम नहीं आई,

किसी दिन हम नहीं आए।


विश्वजीत कुमार✍️

 


सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

वो गुलाब🌹 नहीं, भरोसा लाया था।


वो गुलाब🌹 नहीं,

भरोसा लाया था...

महक गई रूह मेरी।


वो झुमके नहीं,

ताल्लुक लाया था...

हार गई मेरे जीवन की

परेशानियां-दुश्वारियां सारी।


वो बिंदिया नहीं,

संपूर्ण ब्रह्मांड लाया था...

सुधर गई मेरे ग्रह-नक्षत्रों की 

बिगड़ी चाल सारी।


वो लौंग-लतिका नहीं,

प्रेम कविता लिख लाया था।

खुमारी में डूब गई 

मेरी देह पर लिखी कहानियां सारी।


वो पायल नहीं,

हौसला लाया था।

जिसे पग बांधे‌

ब्रह्मांड की परिक्रमा लगाती मैं 

उसकी बलैयां ले नजर उतारती

उसपर जाती वारी-बलिहारी।


वो स्वयं नहीं,

उसका अहसास आया था।

जिसमें उसे खोजती मैं

ईश्वर का पता पा गई।

 

सुजाता✍🏻

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

केवल दो गीत लिखे मैंने...


 शहरो शहरों गलियों-गलियों

केवल दो गीत लिखे मैंने

इक गीत तुम्हारे मिलने का

इक गीत तुम्हारे खोने का।


सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों

नदियों-नदियों, लहरों-लहरों

विश्वास किए जो टूट गए

कितने ही साथी छूट गए


पर्वत रोए-सागर रोए

नयनों ने भी मोती खोए

सौगन्ध गुँथी-सी अलकों में

गंगा-जमुना-सी पलकों में।


केवल दो स्वप्न बुने मैंने

इक स्वप्न तुम्हारे जगने का

इक स्वप्न तुम्हारे सोने का।


बचपन-बचपन, यौवन-यौवन

बन्धन-बन्धन, क्रन्दन-क्रन्दन

नीला अम्बर, श्यामल मेघा

किसने धरती का मन देखा

सबकी अपनी है मज़बूरी

चाहत के भाग्य लिखी दूरी


मरुथल-मरुथल, जीवन-जीवन

पतझर-पतझर, सावन-सावन

केवल दो गीत लिखे मैंने

इक गीत तुम्हारे मिलने का

इक गीत तुम्हारे खोने का।


Rajendra Rajan✍️


शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

Valentine Special.😍❤️



मीठे से भी मीठे का है अपवाद मिल गया,

धड़कन को जैसे दिल का है संवाद मिल गया।

होठों से जुठी करके जो तुमने चखाई थीं,

उस चॉकलेट में जहाँ का स्वाद मिल गया ।


💗💗💗


"ज़ख्म भर जाएंगे, तुम मिलो तो सही।

दिन सँवर जाएंगे, तुम मिलो तो  सही।

रास्ते में खड़े दो अधूरे सपने,

एक घर हो जाएंगे, तुम मिलो तो सही..!" 


💗💗💗


 “ये मेरे हाथों में जो फूलों का गुलदस्ता है,

ये मेरे पाँव के कांटो पे बहुत हँसता है..!”


💗💗💗


“क़ुबूल हैं किसी गुमनाम के भेजे हुए गुल,

हमने तो अपनों के पत्थर तलक सँभाले हैं..!”


💗💗💗


बयां तो नही कर सकता मगर प्यार करता हूँ,

कब से मिला नही तुमसे मगर इंतिज़ार करता हूँ।

तुम मिलो ना मिलो इस पे मेरा कोई जोर नही, 

मगर कोशिश तुमको पाने की हर बार करता हूँ।


💗💗💗


मै जब भी लिखता हूँ,

बस प्यार लिखता हूँ।

तुम से मिलने की चाहत, 

या इंतिज़ार लिखता हूँ।


💗💗💗


ना मोहब्बत💗, ना मेरे हिस्से में गुलाब🌹 आया।

कई बार पूछा तुमसे, कहा कोई जवाब आया।


हकीकत यही है, जिंदगी अब भी अधूरी है।

थोड़ी खमोशी और मेरे हिस्से में ख्वाब आया।


💗💗💗


"ये तेरी बेरुख़ी की हम से आदत ख़ास टूटेगी,

कोई दरिया न ये समझे कि मेरी प्यास टूटेगी,

तेरे वादे का तू जाने मेरा वो ही इरादा है,

कि जिस दिन साँस टूटेगी उसी दिन आस टूटेगी !" ❤️


💗💗💗


ख़ुद रूठ जाऊँगा कभी तुमको मनाऊँगा 

रोने नहीं दूँगा तुझे अक्सर हसाऊँगा 

पावन-पवित्र दिन पे यही करता हूँ 'प्रॉमिस्'  

 तुमसे किये अब तक सभी 'प्रॉमिस्' निभाऊँगा


💗💗💗



यादें तुम्हारी कितने ही रंगों में ढल गई

हर फूल हर कली में अपनी बात चल गई

जिस दिन से तुमने यार गले से लगाया है

उस दिन से मेरे शर्ट की ख़ुशबू बदल गई


💗💗💗


"एक दो दिन में वो इकरार कहाँ आएगा  

हर सुबह एक ही अखबार कहाँ आएगा 


 आज जो बाँधा है इनमें तो बहल जायेंगे 

रोज़ इन बाँहों का त्यौहार कहाँ आएगा?”❤️ 

#Hug_Day 🫂



साभार - सोशल मीडिया


शनिवार, 13 अगस्त 2022

श्रीमती माया गोविंद जी की रचना✍️

 मैंने जब आँखिन में डाला आज कजरा तो,

काली-काली घटा घबड़ाये के चली गई। 

जैसे घुघडाड़ी मैंने अलके सँवारी-2 

एक नागिन ने देखा बलखाये के चली गई।


जैसे अंगराईली पड़ोस की कुंवारी छोरी-2 

दाँतन में अंगूरी दबाए के चली गई। 

रूप की चमक चिंगारी बन ऐसे फूटी,

सौतन अंगीठी सुलगाये के चली गई।


बनी ठनी पेंटिंग


मांग भर बिंदिया लगाई जब राधिका ने, 

लागे जैसे भोर वाला सूरज है झोडी में।

कजरा लगावे तो यह लागे की समुंदर में, 

मछली फंसाये ली मछुअन डोरी में।


गोरे-गोरे मुखड़े पर घुंघट सुनहरा "यूँ" जैसे, 

चांद रखे कोई सोने की कटोरी में।

नाक में नथुनिया धीरे-धीरे डाले ऐसे जैसे, 

कोई मालदार ताला दे तिजोरी में।


@@@


मुंदरी उरझ गई राधिका के लट बीच,

दूदंत फिरत श्याम अपनी मुंदरीया।

ललिता ने पाई लई मुंदरी सहेज लई,

 श्याम जूं को जाय दई,

हीरे दी मुंदरीया।।


तो बोली इठलाई,

कछु भेंट तो निकारो, श्याम। 

तो बोले श्याम,

चूमी लो मोरो या अंगुरिया...


चूमत हसत जात, 

ललिता कहत जात।

राम करे खोई जाए, 

तोरी या बांसुरिया ।।


श्रीमती माया गोविंद जी✍️

शनिवार, 11 जून 2022

ऐ मधेपुरा तुम बहुत याद आवोगे। Madhupura, I'll Miss You So Much.


ऐ मधेपुरा तुम बहुत याद आवोगे।


 आ..आ.. कर यादों में कितना सताओगे -2

बस कर, ठहर जा और कितना रुलाओगे😓

गुजरे थे लम्हे जो तुम्हारे साथ,

उन्हें कितना याद दिलाओगे।


ऐ मधेपुरा तुम बहुत याद आवोगे। -2


 आया था जब मैं तेरी गलियों में, 

था बहुत मगरूर। 

तुने संभाला और बनाया मुझे,

हीरे से कोहिनूर💎


सीधा-साधा था पहले मैं,

बनाया मुझे अनुभव से परिपूर्ण 

रुख़सत को था जब मैं तैयार, 

देखा मैंने तेरी आंखों में नूर। 


बस इन्हीं लम्हों को बारंबार सताओगे


ऐ मधेपुरा तुम बहुत याद आवोगे। 

ऐ मधेपुरा तुम बहुत याद आवोगे। 

विश्वजीत कुमार✍️

Madhupura, I'll Miss You So Much


Oh Madhupura, you'll be deeply missed.


Always Coming, in memories, how much will you torment? -2

Stop now, pause, how much more will you make me cry?

The moments spent with you, how much will you remind me of them?


Oh, Madhupura, you'll be deeply missed. -2


When I came to your streets, I was quite arrogant.

You nurtured me and transformed me, 

from a stone to a Kohinoor diamond.


I was simple and naive, 

you made me rich with experience.

When I was ready to depart, 

I saw a glow in your eyes.


It's those very moments you'll repeatedly haunt me with.


Oh, Madhupura, you'll be deeply missed.

Oh, Madhupura, you'll be deeply missed.


Bishwajeet Kumar✍️

शुक्रवार, 4 मार्च 2022

मोहब्बत है अगर हमसे, तो जताया भी करो। (गजल Gazal.)

 


मोहब्बत है अगर हमसे, तो जताया भी करो।

हाल औरों से क्यू पूछते हो?, पास आया भी करो।


सुनूँगा सारी बातों को, जो तुमको मुझसे कहना है।

कुछ कह कर भी रुक जाते हो, न छुपाया भी करो।


बनूं हमराज तेरे हर राज का, अगर जो समझो तुम।

जता कर मुझसे अपनापन, बताया भी करो।


सब लोग है वाकिफ, तेरी चाहत जो मुझसे है।

जो कह दो गर मुझे बस तुम, न सताया भी करो।


तेरी सूरत नही मुझको, तेरी बस रूह प्यारी है।

की नजरों को मिलाकर, तुम न झुकाया भी करो।



विश्वजीत कुमार ✍️

साभार:- Social Media.


रविवार, 19 जनवरी 2020

"बेड़ियाँ" (Bediya)







बेड़ियाँ

है बड़ी कठिन ये बेड़ियाँ, किसने जकड़ी है तुमको यह लड़ियाँ। तुम्हें तो थी चारु दिखने की इच्छा। जो बन गई थी मेरी इक अभिलाषा। वात्सल्य में अभिभूत हो, मैंने बाँधा था एक काला धागा। लेकिन था किसे पता, ये बेड़ियाँ इतनी कठोर हो जाएगी। नाजुक सी दिखने वाली इतनी सख्त हो जाएगी। कहने को तो है, यह एक बंधन। -2 चाहे, वो पैरो में पायल हो या फिर हो हाथों में कंगन। उसकी तो मंशा यही है रखना है तुम्हें बना कर बंधक। अपनी बेड़ियों को तोड़ !!! क्या तुम मुक्त वातावरण में विचरण कर पाओगी??? या यूँ ही प्रतिबंध में रह जिंदगी शेष गवाओगी। प्रश्न तो है बहुत विकट एक तरफ है बंधन तो एक तरफ है पथ दुर्गम। लेकिन तुम्हें तो बीच का एक रास्ता खोजना होगा.... जहां बंधन भी रहे और बेड़ियाँ भी ना रहे। संशय है, ये मुमकिन नहीं। लेकिन प्रण कर लो तो ये नामुमकिन भी नहीं। है बड़ी कठिन ये बेड़ियाँ, किसने जकड़ी है तुमको ये लड़ियाँ।
तुम्हारा रूप है महीयसी, यूँ ना बनो मितभाषी। भाराक्रान्त से ऊपर उठो, अथक परिश्रम से तोड़ दो इन बेड़ियों को। तब तुम्हारे हृदय के सुर लोक में खिलेंगे सुमन भी। तब तुम्हारे हृदय के सुर लोक में खिलेंगे सुमन भी।
-विश्वजीत कुमार

इस कविता में प्रयुक्त कुछ शब्दों के अर्थ मैं यहां बता देता हूं- चारु -सुंदर/सुंदरता, महीयसी -महान स्त्री, मितभाषी-कम बोलने वाला, भाराक्रान्त- भार से दबा हुआ.


शनिवार, 29 जून 2019

हां, मैं एक कलाकार हूं। (Haa, Mai ek kalakar hu)




हाँ, मैं एक कलाकार हूँ।


हाँ, मैं एक कलाकार हूँ।

नित्य नई-नई रचनाओं को रचित करता है,

फिर उन्हें देख-देख कर हर्षित भी होता है।
मेरे मन को जो भा जाए ऐसी आकृति बनाना चाहता हूँ,
 तुम्हारे तस्वीर में मैं वो रंग भरना चाहता हूँ।

जो अमिट हो।
ऐसी एक छवि का निर्माण करना चाहता हूँ।
जो मेरे हृदय में बस जाए, ऐसी शबीह बनाना चाहता है।
हाँ मैं एक कलाकार हूँ।

ख़ुद से ही रूठता हूँ।
ख़ुद से ही ख़ुद को मनाता हूँ।
दूसरों की खुशी के लिए खुद को अर्पित भी कर देता हूं।
 कभी नहीं गम करूंगा।

ऐसी कसमें खाई है।
सदा लोगों के बीच मुस्कुराउंगा,
ऐसा इनायत भी किया है।
 हाँ मैं एक कलाकार हूं।

कभी नही आने पाएंगे आंसू मेरे आंखो में।
यूँ ही हँसते मुस्कुराते दुनिया से रूखस्त हो जाउंगा।
मेरे जाने के बाद तु मेरे उल्फत की तारीफ़ जरूर करना।
क्योंकि सुना है तारीफ़ उन्ही की होती है।
जो जिन्दा नहीं होते।

लेकिन मैं इस भ्रम को भी मिटाउंगा। 
जीते जी मैं अपनी तारीफ तुमसे करवाउंगा।
यदि तुम्हें मेरी छायाकारी पसंद नही तो, 
मैं तुम्हारी शबीह भी बनाउंगा।

मेरे चित्रों में यदि तुमने कमी निकाल दी, 
फिर उन्ही शब्दों को कविता की माला में गूँथ तुम्हें पहनाउंगा।
यदि उससे भी तुम नही मानी तुम्हारे लिए गीत-गजलें भी गुनगुनाऊंगा
हर एक वो कार्य करूंगा,
तुम्हारी खुशी के लिए...
क्योंकि मैं एक कलाकार हूँ।

जब तक है हाथो में तुलिका की ताकत,
जब तक मैं तुम्हारी ही शबीह बनाउंगा।
एक कलाकार का क्या फर्ज होता है।
 वो मैं दुनिया को बताऊंगा।
 हाँ मैं अपनी कलाकृति सबको दिखाउंगा।
और चीख-चीख कर दुनिया को ये बताउंगा।

हाँ मैं एक कलाकार हूँ,

हाँ मैं एक कलाकार हूँ।

-विश्वजीत कुमार

कविता में प्रयुक्त कुछ शब्दों के अर्थ

शबीह - व्यक्ति चित्र (Portrait)

रूखस्त – प्रस्थान, विदा लेना

उल्फत - प्यार, स्नेह, या दोस्ती

तुलिका - ब्रश, कुची