शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

केवल दो गीत लिखे मैंने...


 शहरो शहरों गलियों-गलियों

केवल दो गीत लिखे मैंने

इक गीत तुम्हारे मिलने का

इक गीत तुम्हारे खोने का।


सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों

नदियों-नदियों, लहरों-लहरों

विश्वास किए जो टूट गए

कितने ही साथी छूट गए


पर्वत रोए-सागर रोए

नयनों ने भी मोती खोए

सौगन्ध गुँथी-सी अलकों में

गंगा-जमुना-सी पलकों में।


केवल दो स्वप्न बुने मैंने

इक स्वप्न तुम्हारे जगने का

इक स्वप्न तुम्हारे सोने का।


बचपन-बचपन, यौवन-यौवन

बन्धन-बन्धन, क्रन्दन-क्रन्दन

नीला अम्बर, श्यामल मेघा

किसने धरती का मन देखा

सबकी अपनी है मज़बूरी

चाहत के भाग्य लिखी दूरी


मरुथल-मरुथल, जीवन-जीवन

पतझर-पतझर, सावन-सावन

केवल दो गीत लिखे मैंने

इक गीत तुम्हारे मिलने का

इक गीत तुम्हारे खोने का।


Rajendra Rajan✍️


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