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गुरुवार, 15 जनवरी 2026

रतन सराय से पटना की यात्रा और ललित से मुलाक़ात।

         छठ पूजा की समाप्ति के बाद ठेकुआं को पैक किये और घर से रतनसराय स्टेशन ससमय तो नहीं लेकिन एक घंटा विलम्ब से आये क्योंकि ट्रैन ही विलम्ब से आने वाली थी। मेरे स्टेशन आने के उपरांत ट्रेन ने विलम्ब नही किया और वो अपने नियत समय से 02 घंटे की देरी से स्टेशन पर आ ही गई। ट्रेन के आने से थोड़ी देर पहले हम स्टेशन पर बैठकर छठ पूजा के विडियो को एडिट कर रहे थे तभी मेरे कानो में एक आवाज सुनाई दी। 

  • विडियो एडिट कर रहे है क्या ?
  • कौन सा App है ?
  • एक विडियो को एडिट करने में कितना समय लगता है ?
  • कुछ कमाई होता है ई सब से ?
 किसी ने एक साथ कई प्रश्न पूछ दिए थे, मैंने उसे देखा और फिर अपना कार्य करते हुए उसके एक-एक प्रश्न का उत्तर देते गए। फिर उसने मुझसे पूछा - आप कौन-सी परीक्षा देने जा रहे है ? 
मैंने हँसते हुए कहा - छठ पूजा के दिन कौन परीक्षा देने जाता है ?
वह थोड़ा मायुश हो गया और बोला - मेरी कल परीक्षा है और सेंटर आरा दिया है यहां से पटना एवं फिर वहां से आरा जायेंगे...
वह अपनी बात पूरी करता उससे पूर्व ही ट्रेन आ चुकी थी, फटाफट हम ट्रेन में चढ़े। हमें अपने लिए सीट ढूढना नही पड़ा क्योंकि पूरी ट्रेन ही खाली थी। कुछ लोग सीटो पर सोये हुए थे। हम आराम से एक विंडो सीट लिए और बैठ गए मेरे सामने की सीट पर वही बैठे जिनसे अभी मेरी वार्तालाप हुई थी और आज के मेरे इस यात्रा के सहयात्री बनने वाले थे। सीट पर बैठने के साथ ही सबसे पहले हमने उनका नाम पूछा - तब उसने कहा - ललित।
मैंने कहा - मेरी किताब "डायरी के पन्नों से..." जो की आने वाली है उसका कवर डिज़ाइन भी ललित नाम के ही एक कलाकार ने किया है और उनका भी घर गोपालगंज में ही है। 
मैंने किताब लिखी है उक्त बाते सुनकर उसे बहुत आश्चर्य लगा। फिर मैंने उसे अपने बारे में संक्षेप में बताया। वजह जो भी रहा हो उसने मेरी बातो को बीच में काटते हुए बोला - मेरी ना कल परीक्षा है और मुझे पढना है। ऐसे भी, "किसी की उपलब्धि किसी बेरोजगार को सुनने में अच्छा नहीं लगता है।" मुझे ऐसा प्रतीत हुआ या यह भी हो सकता है कि मैं कुछ ज्यादा डिटेल में बताने लग गया था। ख़ैर!!! वजह जो भी हो... मैंने कहा - आरे!!! हाँ-हाँ  पढिये ना... आपको कल परीक्षा देना है। फिर हम दोनों अपने-अपने मोबाईल में व्यस्त हो गए।

   पुरी ट्रैन मच्छरो🦟 की गुनगुनाहट से संगीतमय🎶 हो रहा था। मैं तो अपने मोबाईल में और बाकी लोग सोने में व्यस्त थे। एक व्यक्ति अपने मोबाइल का फुल स्पीकर करके छठ का गाना बजा रहे थे। "बहँगी लचकत जाओ"🎶🎶 ट्रेन चलने की स्पीड से ट्रैन में बैठे और सोये लोग भी बहँगी की तरह ही लचक रहे थे। छठ बीतने के बाद भी उसका गाना सुनना सुखद अनुभूति करा रहा था। हमारे सामने की सीट पर बैठे ललित जी कभी सो रहे थे तो कभी-कभी अपने मोबाइल से कुछ नोट्स को पढ़ रहे थे पुरी ट्रैन में कुछ ऐसे भी लोग थे जो की इन सभी से बेखबर ऊँची-ऊँची खराटे💤 ले रहे थे। यह वही लोग थे जो इस कहावत को चरितार्थ कर रहे थे की "स्थिति कोई भी हो हमें अपने कार्य में मग्न रहना चाहिए" पुरी ट्रैन में बाकी लोग तो कुछ-कुछ अंतराल पर अपने कार्यों में परिवर्तन कर रहे थे लेकिन दो ही कार्य था जो कि लगातार चल रहा था और वह यह था -

  1. एक सोने वाले का खराटा 💤 और 
  2. दुसरा मच्छरो🦟 का सुरमई संगीत🎶.
    मैं इन सब से बेखबर अपने राइटिंग✍🏻 के कार्य में लगा हुआ था। अचानक से मेरे मोबाइल पर कुछ पानी की बुंदे गिरी, मालूम चला की बाहर हल्की बारिश हो रही हैं। हम मोबाइल को रख कर फिर बाहर के मौसम का आनंद लेने लगे। उस समय 12:00 बज चुका था लेकिन हमारी ट्रेन अभी दीघा ब्रिज से पहले ही बहुत देर से रुकी हुई थी, मतलब साफ था कि हम 02:00 से पहले रूम पर नहीं पहुंचने वाले थे।


         ...कुछ देर बारिश का एन्जॉय करने के उपरांत फिर हम अपने ब्लॉग लिखने✍🏻 के कार्य में लग गए। अभी तक ललित जी अपने मोबाइल में वीडियो देखने में ही व्यस्त थे। मेरी एक बार ईच्छा हुई की पूछे की परीक्षा कौन सी है?  लेकिन उन्हें मोबाइल में व्यस्त देख करके अपने विचार को त्याग दिए और हम फिर अपने कार्य में लगे रहे। अक्सर हम अपनी "यात्रा-वृतांत" में अपने आसपास के चरित्रो का चित्रण करते हैं लेकिन इस यात्रा वृतांत में वह कार्य भी हम नहीं कर पा रहे थे क्योंकि हमारी बोगी में लाइट ही नहीं थी, और पूरा वातावरण अँधेरे में खोया हुआ था। शक्तिमान के तमराज किलविश का "अंधेरा कायम रहेगा" वाला डायलॉग चरितार्थ हो रहा था। क्योंकि छठ के बाद उसी दिन की यात्रा होने से लगभग ट्रेन खाली थी जनरल बोगी में एक-एक सीट पर एक-एक लोग लेते हुए थे। पुरी बोगी में केवल 02 लोग ही जगे थे, केवल मैं और मेरे सामने की सीट पर बैठे ललित जी। हम दोनों जनरल बोगी के विंडो सीट पर बैठे हुए थे और मोबाइल के विंडो के साथ-साथ ट्रैन के विंडो से भी बाहर का नजारा देख रहे थे। 

        अचानक से मेरा ध्यान ट्रेन की बोगी में आ गया क्योंकि जो सज्जन तभी से छठ का गाना बजा रहे थे अचानक से वह भोजपुरी की ओर शिफ्ट कर गए थे। किसी एक गाने में नायक के द्वारा नायिका से प्रश्न किया जा रहा था। 

प्रश्न - बताओ लिंग केतना तरह के होला?

उत्तर - तीन

नायक - कौन-कौन

नायिका - स्त्रीलिंग, पुलिंग, और डार्लिंग।

     हम यह उत्तर सुनकर भोजपुरी के लेखकों को झुककर नमस्ते 🙏🏻 करने का मन हुआ। लेकिन हम यह नहीं कर पायें क्योंकि तबतक हमारी ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी और रफ्तार ऐसी की सीधे हम पटना जंक्शन पहुँच चुके थे। मैंने ललित से पूछा - आपकी पढ़ाई पूरी हो गई ?

उसने कहा - हां, थोड़ा सा बचा हुआ है। 

तब मैंने पूछा - किस चीज की परीक्षा है, तब उसने कहा - STET

मैंने आश्चर्य से पूछा - आपका अभी उम्र बचा हुआ है ? आपने B.Ed. कब किया ? CTET निकला है या नहीं ?

इस बार मैंने एक साथ कई प्रश्न पूछ दिए थे जिनसे वो बचने की कोशिश कर रहे थे। अबकी बार मुझे मेरा पंसदीदा टॉपिक मिल गया था। उसने बस इतना कहा - UP से किये है और बिहार सरकार ने उम्र में छुट दे रखी है। उस समय तक ट्रेन थोड़ी धीरे हो गई थी लेकिन रुकी नही थी लेकिन वो चलती ट्रेन से उतर गए और जाते-जाते बोले - By Sir👋🏻.

मै ट्रेन के दरवाजे पर खड़ा उन्हें जाते हुए देख रहा था शायद वो अपनी मंजिल की ओर तेज कदमो से बढ़ चले, हमारी ट्रेन अब पूरी तरह से रुक गई थी। ट्रेन से उतरने के बाद मेरी नजरे उन्हें ढुढने की कोशिस की लेकिन वह नही दिखे, शायद!!! पटना जंक्शन की इस भीड़ में कही खो चूके थे। अक्सर कई प्रतिभायें नित्य दिन यूँ ही भीड़ में खोती जा रही है और कुछ उसमे से निकलकर आसमां में अपनी बुलंदी का पटाखा भी फहरा रही है। हम स्टेशन से बाहर आ गए थे और रात के 02:00 बजे जब ऑटो नही मिला तो पैदल ही रूम आयें। रूम आने के उपरांत वही ठेकुआं निकाले जो घर से लाये थे और उसे खाते हुए आज की यात्रा की विवेचना करते रहे।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

देशी दारू की चाय ☕

 बिहार से रांची (झारखण्ड) आये हुए 02 दिन हो गए थें। चुंकि बिहार में अमृत तो बंद है लेकिन झारखंड में पुरी बारिश हो रही थी। 02 दिनों से लगातार सभी इस बारिश में स्नान कर रहे थे। आज तीसरे दिन किसी ने सुझाव दिया की आज कुछ देशी ट्रॉय किया जाएं। फिर क्या था, बस प्लान बन गया। अब समस्या यह थी की इस नेतरहाट की पहाड़ियों में लोकल अमृत मिलेगा कहा? लेकिन कहा जाता है ना की जहा चाह वहा राह। राहे वहां भी मिल गई और जो लोकल ड्राइवर थे उन्ही की मदद से अमृत सीधे रूम तक आ पहुंचा। रात में सभी ने उसका रसास्वदान किया और सुबह देर तक सोये रहे। चुंकि हमें कोयल व्यू पॉइंट भी जाना था और सुबह में सभी को हम जगाते फिर रहे थे। क्योंकि सभी ने कहा था की हमें भी साथ लेकर के जाना। जब हम उस रूम में गए तो बहुत देर तक उन्होंने दरवाजा नहीं खोला और हम भी सोच लिये थे की सभी को लेकर के ही चलेंगे। रूम आख़िरकार खुला और वहा की परिस्थिति देखने लायक थी। ख़ैर मैंने सभी को जगाया एक ने कहा की भाई थोड़ी चाय बना दो ना!!! चुंकि हम चाय पी कर के आये थे इसीलिए बस 02 कप ही बनाये। लेकिन गर्म पानी में जैसे ही दूध डाले वह फट गया। मुझे लगा की क्या हो गया। हिम्मत नहीं हारी और दुबारा पुन: प्रयास किये लेकिन इस बार भी दूध फट गया। अगली बार कैटल को अच्छे से साफ कर के जब दुबारा उसमें पानी डाले तब एक ने कहा - भाई चाय बनाने में इतना विलंब क्यों हो रहा हैं? मैंने कहा - क्या करें!!! बार-बार दूध ही फट जा रहा हैं। अचानक से उसकी नज़र मेरे हाथ में पड़े बॉटल पर गई और वो चिलाते हुए कहा - आरे भाई, इसमें चाय बना रहे हो?

मैंने कहा - हां, क्या हुआ? 

वो बोला - आरे ये पानी नहीं हैं।

मैंने कहा - दिख तो पानी जैसा ही रहा हैं और पानी के बॉटल में भी हैं। और मैंने एक घूंट मुँह में ली।

वो एकदम से बेड से उछला - आरे!!! रुक जा, रुक जा।

मैं तो सीधे बाथरूम में जाकर रुका। उसका स्वाद अजीब सा लगा था। उससे पूछा की - आरे ये हैं क्या?

वो बोला - आरे रात में जो नहीं मंगाए थे वो देशी... वही हैं।

 मैंने बोला - अरे यार!!! इसे पानी के बोतल में कौन रखता है?

 वह बोला - भाई क्या करते, दुसरा बॉटल मिला ही नहीं।

इस घटनाक्रम एवं शोरगुल से सभी जग गए थे उन्होंने सुबह की चाय तो नहीं पी लेकिन मेरे साथ कोयल व्यू प्वाइंट चलने के लिए तैयार हो गए। वहां का नजारा बहुत ही सुंदर था। शुरू में तो कुछ बादल थे लेकिन जब बादल हटा और सूर्य नारायण ने अपने दर्शन दिये तो वहां का नजारा देखने लायक था। हमने भी बहुत अच्छी-अच्छी फोटो क्लिक📸 की कुछ आपके लिए भी साझा कर रहे हैं।

कोयल व्यू प्वाइंट

कोयल व्यू प्वाइंट के पास स्थित खूबसूरत वन

कोयल व्यू प्वाइंट के पास सेल्फी🤳🏻

कोयल व्यू प्वाइंट के पास स्थित डैम



रविवार, 18 मई 2025

मुंगेर की वो अनोखी शादी।

      19 जनवरी 2025 की सुबह 09 बजकर 05 मिनट पर व्हाट्सएप की घंटी बजी, जब मोबाईल देखा तो पता चला की शादी का निमंत्रण कार्ड आया हैं। वो निमंत्रण हमारे प्रशिक्षु (स्टूडेंट) का था। उसने निमंत्रण कार्ड के साथ लिखा था आपकी उपस्थिति अति आवश्यक है। इस अति आवश्यक को हम समझ नहीं पा रहे थे। जब उससे फोन पर वार्तालाप हुई तो मालूम चला कि किसी क्लास के दरम्यान मैंने कभी उससे कहा था कि आपकी शादी में हम आएंगे। संभवतः चर्चा मुंगेर पर चल रही थी और वह भी मुंगेर का ही था, तब उन्होंने कहा था कि सर, आप मुंगेर आइयेगा कभी!!! ...और शायद यह उचित समय था मुंगेर जाने का, लेकिन उचित रहा नहीं।

आप सभी सोच रहे होंगे - क्यों ?

अब इस क्यों का जवाब पाने के लिए तो आपको पूरा आर्टिकल पढ़ना होगा तो चलिए शुरू करते हैं...

     19 का मूलांक 01 और उसके स्वामी सूर्य☀️, मेरा भी मूलांक एक ही होता है तो पहली बार में ही जाने का प्लान बन गया और दुसरा समय यानी 09 बजकर 05 मिनट तो इसका मूलांक हुआ 05. वो ऐसे की 09+05 = 14, and 1+4 = 5. जो कि मेरा लकी नंबर है और जैसे मूलांक 05 वाले लोगो को यात्रा करना, नई चीजें सीखना और दूसरों की मदद करना पसंद होता हैं, ऐसा ही कुछ गुण मेरे अंदर भी समाहित है। चुंकि मुंगेर हम पहली बार जा रहे थे इसलिए अपने महाविद्यालय से एक सप्ताह की छुट्टी ले लिए और उसे बता दिए कि हम आपकी शादी के बाद मुंगेर को एक्सप्लोर करेंगे और वापस रविवार को आएंगे। आने एवं जाने का टिकट भी उसे व्हाट्सएप पर शेयर कर दिये ताकि उसे पता रहे कि हम कंफर्म आ रहे हैं। 


    पटना से हमारी ट्रेन 13402, भागलपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस थी। उसने मुझे बताया कि मुंगेर में ट्रेन नहीं जाती है हमें जमालपुर में उतर करके आना होगा। ट्रेन अच्छी थी वह मुझे रात्री में 09:00 बजे तक जमालपुर स्टेशन पहुंचा दी थी। जमालपुर एक छोटा सा स्टेशन है तो बाहर ज्यादा भीड़-भाड़ एवं चहल पहल नहीं था। जमालपुर से मुंगेर के लिए हमें आसानी से ऑटो मिल गया। ट्रेन से उतरने के बाद हम अपने उस प्रशिक्षु को लगातार फोन कियें जा रहे थे लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। संभवतः शादी के विधि-विधान में व्यस्त होगा। जमालपुर से मुंगेर के लिए ऑटो रात्री के 09:30 में भी आसानी से मिल गई। 10:00 बजे तक हम मुंगेर में थे। मुंगेर पहुंचने के बाद भी उससे बात नहीं हो पाई जबकि 01 घंटे से उसको हम कॉल किये जा रहे थे। हम सोच रहे थे कि जब हम उसको अपनी पूरी यात्रा विवरणी यहां तक की आने एवं जाने का ट्रेन का टिकट भी भेज दिए हैं तो आदमी को इतना तो sincere होना चाहिए। खैर!!! मेरे पास जब कोई ऑप्शन नहीं बचा तो शादी के कार्ड पर लिखें पते पर पहुंचने का प्रयास किये। उस समय तक रात के 10:30 हो चुके थे और लगभग सारी सड़के सुनसान हो गई थी। मुंगेर को सिटी ऑफ़ गन🔫 भी कहा जाता हैं, आज पहली बार अनुभव कर रहे थे। वह तो भला हो गूगल मैप का वरना वहां तो कोई पता बताने वाला भी नहीं था। मुंगेर से उसके घर की दूरी लगभग ढाई से 03 किलोमीटर रही होगी। दोनों तरफ वीरान खेत, कही-कही एकाध घर वह भी अंधेरे में डूबे हुए। बीच सड़क पर हम इकलौते चल रहे थे। मेरे पास एक बड़ा सा गिफ्ट🎁, एक बैग जिसमें मिरर लेस कैमरा, लैपटॉप, कुछ कपड़े, एवं कुछ कैश भी थे जो किसी भी व्यकित के अंदर डर को पैदा कर सकता है, जब आप ऐसे सड़कों से रात में गुजरो। चुंकि रात का समय था इसलिए हमारे कदम थोड़े तेज चल रहे थे। 03 किलोमीटर की दूरी को कम करने के लिए मैंने ब्लूटूथ से मोबाइल को कनेक्ट कर गाना बजा लिया था।

गाने के धुन थे,

जिंदगी एक सफर है सुहाना,

यहां कल क्या हो किसने जाना ?

      कल का तो नहीं पता लेकिन उस समय मेरे साथ क्या होगा यह भी मुझे नहीं मालूम था। हम गाना सुनते हुये चले जा रहे थे तभी मुझे एहसास हुआ की मेरे पीछे से कोई बाइक आ रही है जो की मुंगेर से चली आ रही थी। मै बीच सड़क से किनारे हो गया, वो भी ठीक मेरे पास यानी बगल में रुके। उस बाइक पर दो लोग सवार थे। मै भी निडर हो कर के उन्हें देखा वो कुछ बोलते उससे पहले मैंने ही पूछा - भाई मुझे आगे उस गाँव तक छोड़ दोगे ? वहां हम अपने एक स्टूडेंट की शादी में जा रहे है। दोनों एक साथ बोले - कहां से आये हो ?

मैंने कहां - पटना से।

उनमे से एक ने पूछा - आपने उस छात्र को कॉल नही किया ?

मैंने कुछ जवाब नही दिया बस अपने मोबाईल का स्क्रीन दिखा दिया, 30+ कॉल थे वो भी एकाध घंटे में।

फिर एक ने पूछा - कौन से गाँव जाना है ?

मैंने शादी के कार्ड में लिखें गाँव का नाम दिखाया।

वो बोले की हम तो उस तरफ नहीं जा रहे हैं लेकिन आप को कुछ दुर तक छोड़ देंगे।

      उस अनजान जगह में दो अजनबी मेरी मदद को तैयार थे लेकिन अभी तक उसने मेरा कॉल रिसीव नहीं किया था और ना ही कॉल बैक। खैर!!! हम कुछ देर में उसके शादी के हॉल में थे। मुंगेर से 03 किलोमीटर दूर होने के बाद भी हॉल अच्छा था, डेकोरेशन भी बहुत अच्छे से किया गया था जगह-जगह पर लड़का एवं लड़की की फोटो लगाई गई थी। वहां की खूबसूरती देखकर अपनी हम सारी थकावट को भूल गए। मालूम चला की बारात अभी तक नहीं आई है उस समय रात के 11:00 बज चुके थे, यह भी बात पता चली की बरात एक किलोमीटर से ही आ रही हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के पास बहुत ही खूबसूरत गणपति जी की प्रतिमा स्थापित की गई थी उसी के बगल में एक सज्जन से व्यक्ति बैठे हुए थे जो आने वाले सभी मेहमानों के नाम लिख रहे थे और उन सभी के द्वारा क्या-क्या गिफ्ट लाया गया है उसका भी ब्यौरा दर्ज कर रहे थे। मैंने भी अपना गिफ्ट🎁 उन्हें दिया और नाम लिखवाया - विश्वजीत कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर निफ़्ट पटना। जैसे उन्होंने पटना सुना तुरंत पूछा - आप (दूल्हे का नाम लेते हुए) उसके मित्र है क्या ? आप ही के साथ ना वो पटना में बिजनेस शुरू किया था...

वह आगे कुछ बोलते हैं उसे पूर्व ही हमने कहा - नहीं, नहीं वह हमारे छात्र हैं, हम ना उनको बरबीघा साईं कॉलेज में पढ़ाए हैं।

उन्होंने हल्की सांस लेते हुए कहा - अच्छा!!! अच्छा!!!

उनका अगला प्रश्न मुझे बहुत अजीब लगा क्योंकि उसने पूछा था - वापस कब जाना है ?

मैंने कहा - रविवार को, तीन-चार दिन मुंगेर में ही रुकना है।

उन्होंने फिर पूछा - रुके कहां है ?

मैंने कहा - अभी तो बस ट्रेन से उतर कर के आप ही के पास आ रहे हैं...

मैं और कुछ बोलता है इससे पूर्व अंकल जी वहां से जा चुके थे।

मैंने गणपति जी के पास अपना बैग रखा और वहां की खूबसूरती को अपने कैमरे में उतारने लगा। लोग वहां आ रहे थे गिफ्ट🎁 दे रहे थे और खाना खाकर जा रहे थे। क्योंकि मुझे वहां कोई जानता नहीं था तो बस यूं ही आसपास के दृश्यों को अपने कैमरे में उतारने लगे। तभी एक व्यक्ति आया और बोला कि आप किसके तरफ के कैमरा 📷 वाले हैं लड़की वाले या लड़का वाले।

मैंने पूछा - काम क्या है ?

उन्होंने कहा - कुछ फोटो खिंचवानी थी।

मैंने कहा - खिंचवा लो, दिक्कत क्या है।

फिर उन्होंने अपने सभी दोस्तों को बुलाया और स्टेज पर जहां पर जयमाला होने वाला था बैठकर कई सारी तस्वीरें खींचवाई।

उन सभी में एक चेहरा मुझे जाना पहचाना सा लगा। मैंने उससे बोला कि आप (लड़के का नाम लेकर) उसके भाई हो क्या ?

उसने कहा - जी

फिर मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि शायद आपको याद हो मैंने आपसे 2021 और 22 में अपना ITR Fill करवाया था।

उसने कहा - हां, हां याद आया फिर बोला कि आप यहां तक कैसे आए फोन कर लेते।

मैंने कहा - बस आ गए, तुम्हारा नंबर मेरे पास नहीं था और तुम्हारे भैया को कई बार फोन किये वो जवाब ही नहीं दे रहे। फिर मैंने बात को घुमाते हुए पूछा की बारात कब आएगी ?

वह बोला - सभी लोग घर से चल दिए हैं, 05-10 मिनट में पहुंच जाएंगे। इतना बोलकर वह वहां से चला गया। मैंने कैमरा को बैग में रखा और दो-चार तस्वीरें उसके व्हाट्सएप पर (जिसकी शादी में हम गए थे) भेज दिए। मुझे बहुत आश्चर्य लगा की फोटो भेजने के साथ ही 02 मिनट के अंदर ही फोटो Seen हो गया और उसका रिप्लाई आया।

Sir
कुछ pic or send kr dijiye 

      मैंने उसकी आज्ञा मानते हुए और भी कई सारी तस्वीर भेजी। उस समय तक लगभग लोग खाना खाकर जा चुके थे, 12:00 बजने वाला था, हम पटना से शाम में ही चले थे तो भूख भी लग रही थी। जैसे ही प्लेट में हल्का खाना लेकर, खाना शुरू किये तब तक बारात आ गई। फटाफट खाना कंप्लीट करके स्टेज के पास पहुंचे। वह दूल्हे की ड्रेस में बहुत ही प्यारा👌🏻 लग रहा था। मैंने उसे शादी की बधाई💐 दी एवं साथ में दो-चार फोटो खिंचवाई। एक शिक्षक होने के नाते मेरा इतना तो हक बनता था कि उससे प्रश्न पूछ सकते थे। मैंने उससे पूछा कि फोन क्यों नहीं उठा रहा था ?

उसने सिंपल सा जवाब दिया कि सर फोन साइलेंट में था, फिर आगे बोला कि आप व्हाट्सएप्प कॉल कर लेते।

मैंने मन ही मन सोचा कि फोन तो तुम उठा नहीं रहा था व्हाट्सएप कॉल क्या उठाता ? फिर मैंने उससे बोला कि आप व्हाट्सएप पर रिप्लाई तो बराबर दे रहे थे, बस हमारा मिस कॉल नहीं देख पाए।

वह इधर-उधर के वातावरण को देखते हुये बोला - सर हम लोगो की इच्छा थी की शादी मुंगेर में हो लेकिन लड़की वाले नहीं माने इसीलिए यहां पर करना पड़ रहा है। और इसीलिए किसी को नहीं बुलायें क्योंकि यहां आने में सभी को परेशानी होती।

मैंने बोला यह जगह भी तो अच्छी ही है, हॉल भी बहुत बढ़िया है केवल रास्ते में थोड़ा दिक्कत है।

उसने बोला की - हां रास्ते में थोड़ा बहुत लूटपाट की घटनाएं भी होती है, इसलिए आप देख रहे होंगे बहुत कम लोग आए हैं। तभी अचानक से उसे ध्यान आया और बोला कि आप कैसे आएं ?

मैंने कहा - बस आ गए, एक सुझाव भी उसको दिये की किसी को बुलाओ तो कम से कम फोन उठा लिया करो।

वह कुछ नहीं बोला हम स्टेज से उतर करके सामने कुर्सी पर बैठ गए। जयमाला का कार्यक्रम लगभग रात्री 01:00 बजे तक समाप्त हो गया। जयमाला के बाद वह कहीं चला गया संभवत: अपने रूम में। उस हॉल में केवल तीन लोग थे। एक मैं, एक वीडियोग्राफर और एक फोटोग्राफर। मैंने उस फोटोग्राफर से पूछा कि अब आगे का क्या कार्यक्रम है ? फोटोग्राफर जम्हाई लेते हुए बोला कि अब आगे का क्या, आराम कीजिए। सभी लोग नाश्ता, खाना खाएंगे जो बारात के साथ आए हैं फिर शादी के लिए इसी मंडप में आएंगे। और वह दो कुर्सी को जोड़ करके बैग को किनारे रखा और सो गया। मुझे अपने पुराने फोटोग्राफी के दिन याद आ गए। कई बार नई जगह पर, जब कभी थोड़ा समय मिले सो जाते थे। मैंने उसे जगाया और पूछा कि भाई यहां आस-पास कोई होटल मिलेगा ? बोला कि यहां तो नहीं लेकिन मुंगेर में मिल जाएगा। फिर अपने आप बोला की बाइक से जाना इतनी रात को सही नहीं रहेगा। मैंने उससे कहा कि मेरे पास बाइक नहीं है और अपना बैग लेकर वहां से निकल गए। वहां से निकलने से पूर्व कई बार पुन: कॉल किया इस बार मैंने व्हाट्सएप्प कॉल भी किया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। हमने सोचा कि जैसे आए थे वैसे चले जाएंगे लेकिन वैसा हुआ नहीं। कुछ दूर ही आगे बढ़े थे की तभी पुलिस की एक गाड़ी हमारे पास आकर रुकी। पुलिस ने अपनी ही आवाज में पूछा - ऐ कहां जा रहा है ?
मैंने उन लोगों को सारी बातें बता दी एवं कहां की यहां हम एक शादी में आए थे और वापस मुंगेर जा रहे हैं। पुलिस वालो को मेरी सच्चाई पर यकीन नहीं हुआ उन्होंने एकदम से डांटते हुए बोला - रात को 01:30 बजे तुम शादी से आ रहा है। अब उन्हें हम क्या समझाते की हम बिल्कुल सही बोल रहे हैं। उन्हें समझाने से बेहतर यह लगा कि उन्हें अपना परिचय दे। सबसे पहले मैंने अपने कॉलेज का आई-कार्ड (I-Card) उन्हें दिखाया और बोले हम नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ़्ट) में प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने जब भारत सरकार का राष्ट्रीय प्रतिक चिन्ह देखा, तुरंत उनकी भाषा ही बदल गई अभी तलक जो तल्ख़ियाँ (Bitterness) थी वो सिफारिशे में बदल गई। उन्होंने कहा - सर हम आपको कहां तक छोड़ दें, आपकी ट्रेन कितने बजे है। मैंने उन्हें कहां - हमारी ट्रेन तो तीन दिन बाद है, फिलहाल आप मुझे किसी होटल के पास छोड़ दीजिए ताकि तीन दिन हम वहां रह सके। उन्होंने मुझे स्टेशन के पास एक होटल में रुकवां दिया। ऐसे जब हम उनके साथ आ रहे थे तो उन्होंने पूछा - सर, आप यहां किसकी शादी में आये थे। मैंने कहां - अपने एक छात्र की शादी में। 
"इसके बात के वार्तालाप को हम यहां नहीं लिख रहे हैं, पाठकगण स्वयं से अनुमान लगाएं की हमारे बीच क्या वार्तालाप हुई होगी।"

होटल लेकर शिफ्ट होते-होते रात के 03:00 बज गए थे, सुबह 05:00 बजे का अलार्म सेट किये और सोये। सुबह उठने के साथ ही फ्रेश हो कर के होटल से निकले। मुंगेर के ही एक और प्रक्षिक्षु (इसके और जिसकी शादी में गए थे उसके बीच कॉलेज टाइम में दोनों के बीच बहुत अच्छी बॉन्डिंग थी लेकिन वर्तमान में तल्ख़ियां बढ़ गई थी, इस वजह से उसने उसे शादी में नहीं बुलाया था) से मैंने 02 दिन पूर्व ही बात करके एवं मुंगेर में हम कहां-कहां घूम सकते हैं उसकी पूरी प्लानिंग बना ली थी, उन्होंने बकायदा टाइपिंग करके मुझे व्हाट्सअप पर भेजा था, जो की निम्न हैं -👇🏻

Hostel - raj place / raj hans

Khana khane ke liye

-Vaisali hotel

Chat - model school ke samne

Chhole bhature - raj place ke samne

Ghumne bala jagh

Sbse phle nahane ke liye jana hai morning

1) kastharni ghat

2) chandika asthand

3) bari durga mahrani sadipur

4) company gadan

5) machhli talab

6) sita khund

8)krishan vatika

9)sojhi ghat

10) Oxford library (konrak mor ke pas

Jamalpur me mithayi khana hai

1) jai bangla me


Jamalpur me

1)Kali pahar

2) Jamalpur rel karkhana

3)rishi khud (Jamalpur se subh jakar wanha naha skte hai. Locel train chalti)

होटल की व्यवस्था तो हो चुकी थी अब घूमना था, उपरोक्त सारणी के अनुसार मुझे सबसे पहले कष्टहरनी घाट पर नहाना था, हम भी सोच रहे थे की चलो जो भी मुंगेर में कष्ट हुआ वो कष्टहरनी में नहाने से दूर हो जाएगा। कष्टहरिणी में नहाने के उपरांत सबसे पहले मुंगेर का किला एवं उसके आसपास कई जगहो का भ्रमण किये। जिस प्लेस का नाम उपरोक्त लिस्ट में था उसके अलावा भी बहुत सारी जगह का हम दिनभर भ्रमण करते रहे। रात में 10:00 बजे तक होटल पहुंचे। मुंगेर घूमने की कुछ तस्वीरें मैंने सोशल मीडिया पर डाली।

      पूरे 24 घंटे के बाद उसने मेरे स्टेटस पर रात के 11:23 में कमेंट किया जो कि हम सुबह में 05:10 में देखें और रिप्लाई दिया।

       मुंगेर में तीन-चार दिन मेरे लिये बहुत ही यादगार रहा, इस दरमियान कभी मेरी उससे बात नहीं हुई ना हीं मैंने कॉल किया और ना ही उसने। पटना पहुंचने के बाद मैंने उसकी सारी फोटोग्राफी जो की जयमाला के दरमियान खींची थी उसे भेज दी और साथ में यह लिखा भी...

..........की यात्रा मेरे लिए बहुत यादगार रही,.. I will never forget this trip in my entire life.



पटना में एक प्रोफेसर है डॉक्टर राजीव कुमार उनकी शादी भी मुंगेर में ही हुई है, एक दिन बातचीत में यूं ही मुंगेर का जिक्र आ गया। जब मैंने उपरोक्त कहानी उन्हें बताई तो उन्होंने कहा - सर आप मुंगेर पहली बार गए थे क्या ?

मैंने कहा - हां और शायद दूसरी बार जाने से पहले सोचूंगा।🤔

तब उन्होंने कहा - मुंगेर में ऐसा ही होता है, कुछ नया नहीं है। अरे!!! वहां आप किसी के यहां जाइयेगा तो सबसे पहले यही पूछते हैं कि जाना कब है ?

मैंने कहा - यह सब बातें तो मुझे नहीं मालूम थी लेकिन मुंगेर का अनुभव बहुत अच्छा रहा। फिर मुंगेर में मैंने जहां-जहां, जो-जो चीजे देखी थी उसके बारे में उनसे देर तक परिचर्चा चलती रही।

विश्वजीत कुमार✍🏻


सोमवार, 31 मार्च 2025

शहर से गाँव (देहात) की यात्रा।🚉

       पटना शहर से देहात यानी अपने गांव की यात्रा आज हमें सम्पन्न करनी थी। 02 दिन पूर्व ही हम रांची की यात्रा से पटना वापस लौटे थे लेकिन यात्राएं तो जीवन का हिस्सा हैं उसे हमें जीना ही होता हैं और ऐसे भी यात्रा जब भारतीय रेल के जनरल डब्बे की हो तो रोमांस और भी बढ़ जाता है। पटना से हमारी ट्रैन का समय दोपहर 12:10 था और हम 11:30 तक पटना जंक्शन आ चुके थे। टिकट काउंटर पर बहुत लंबी कतारे थी मैंने भारतीय रेल का मोबाइल एप्प UTS का प्रयोग करते हुए समान्य टिकट कटाया। पटना से घर जाने के लिये अक्सर हम रात्रि के समय का चयन करते थे लेकिन इस बार दिन का किये हैं और पहली बार पटना थावे स्पेशल ट्रैन का भी। ऐसे इस ट्रेन का रनिंग स्टेटस बहुत बढ़िया था जैसे मैंने कल तक का पता किये थे और इसी वजह से इसका चयन भी किये। ट्रैन के सफर में अक्सर मेरे सहयात्री मेरे मित्र बन ही जाते हैं फिर भी रास्ते के लिये मैंने श्री लाल शुक्ल का उपन्यास राग दरबारी ले लिए थे ताकि उसके सहारे एवं ब्लॉग्स लेखन✍🏻 के द्वारा यात्रा के समय को आनंद पूर्वक बिताया जा सके। ट्रैन मैं बैठने के साथ ही मैंने राग दरबारी का अध्ययन शुरू कर दिये।

शहर से गाँव (देहात) की यात्रा।

     चुंकि यह उपन्यास हम 2019 में पढ़ चुके हैं फिर से दोबारा पढ़ने का मौका मिला। उपन्यास में एक प्रसंग है कि "भारतीय रेल ने उसे धोखा दिया था रोज़ की तरह वो घर से 03 घंटे विलम्ब से निकला लेकिन ट्रैन आज मात्र 02 घंटे विलम्ब से ही आकर के चली गई थी" लेकिन हमारी इस रेल ने ज्यादा धोखा नहीं दिया 12:10 के बदले 12:50 में खुली। हमारे कुछ सहयात्री यह सोच कर या देख कर खुश हो रहे थे की यह ट्रेन 01:00 से पहले खुली क्योंकि अक्सर यह ट्रैन 01:00 के बाद ही पटना जंक्शन से खुलती हैं आज इसके 40 मिनट के ही लेट को ही एन्जॉय कर रहे थे। जब ट्रैन फूलवारी शरीफ़ पहुंची उस समय 01:20 हो रहा था, हम लगभग एक घंटे से नॉवेल को पढ़ रहे थे। अचानक से मुझे नींद आने लगी और नॉवेल को अपनी सीट के बगल में रखकर सो😴 गये। नींद भी बहुत गहरी आ गई और हम सपनो के समंदर में गोते लगाने लगे नींद में उस समय व्याधान आया जब मोबाइल की घंटी बजी। उस समय लगभग 04:00 बज रहा था फ़ोन देखा तो पता चला की शुभम का कॉल हैं। उसने पहला प्रश्न यही किया की - भैया कहां जा रहे हैं ? क्योंकि मैंने सोशल मीडिया में "शहर से गाँव (देहात) की यात्रा।🚉" का एक पोस्ट डाल दिया था जिसपर शुभम ने like 💚 भी किया था। मैंने भी पोस्ट के हिसाब से ही जवाब दिया कि - देहात की ओर.... पहले तो वह नहीं समझा फिर मैंने बताया अपने गाँव जा रहे हैं। उसके उपरान्त जिस कार्य से उन्होंने कॉल किया था उसपर वार्तालाप हुई। फ़ोन रखने के उपरांत मैंने महसूस किया की ट्रेन के सभी लोग कुछ अजीब से परेशान थे और ट्रैन रुकी हुई थी। क्योंकि 04:00 बज चुका था तो मेरे अनुमान से एवं ट्रेन के समयानुसार ट्रैन रतनसराय पहुंचने वाली थी लेकिन मुझे अचंभा उस समय लगा जब मालूम चला की अभी तो ट्रैन पाटलिपुत्र ही हैं जब हम सोये थे उस समय 01:30 हो रहा था और अभी 04:20 हो रहा हैं अभी तक ट्रैन पाटलिपुत्र ही हैं। अब मुझे ट्रैन एवं राग दरबारी का वो व्यग्य कि "भारतीय रेल ने उसे धोखा दिया था" स्मरण होने लगा। वहां से ट्रैन 05:00 बजे खुली और हम अपने गंत्वय पर 05 घंटे विलम्ब से पहुंचे। उससे पूर्व अपने सभी सहयात्रीओ से बाते करते एवं उनके अनुभवो को आत्मसात करते रहे। जिंदगी में दूसरे के अनुभव हमें बहुत काम आते हैं इसीलिए मेरी कोशिश रहती हैं की दूसरे के अनुभवो से हमें बहुत कुछ सीखना चाहिए।

        उस ट्रैन में भी मेरे कई सहयात्री थे उसमे से एक का नाम दीपक था जो की पटना से चले थे और उन्हें मांझा उतरना था। चुंकि ट्रेन तो मांझा रूकती नहीं है तो वह पूरी ट्रेन यात्रा में हमसे चेन पुलिंग करने की प्लानिंग करते आ रहे थे। पहले उनमे डर था कि शायद चेन पुलिंग करेंगे तो पुलिस की मार या फाइन देना पड़ सकता है लेकिन जैसे ट्रैन खैरा स्टेशन से पार की लोगो के द्वारा चेन पुलिंग की घटनाएं बढ़ती गई और दीपक का मोटिवेशन भी बढ़ता जा रहा था। उन्होंने मुझसे कहा कि आदमी दूसरे को देखकर के ही सीखता है। मेरी एक बार ईच्छा हुआ कि उन्हें नीति-शास्त्र का पाठ पढ़ाये क्योंकि बातचीत से मालूम चला कि वह BPSC की तैयारी कर रहे हैं और पटना में ही रह कर के क्लास करते हैं। लेकिन मैंने पुन: छोड़ दिया क्योंकि दोपहर से हर कोई ट्रैन में बैठे-बैठे परेशान हो गया था और इस समय कोई भी उपदेश सुनने वाला नहीं था। फिर भी हम कुछ बोलते उससे पूर्व उनका कॉल आ गया और वो कोई जमीन की खरीद बिक्री की बातो में व्यस्त हो गए। उनके फोन वार्तालाप से यह भी मालूम चला की वह कोई जमीन की रजिस्ट्री के लिये स्पेशल पटना से आ रहे हैं। 

     हमारे सीट के ठीक सामने दूसरे सहयात्री के रूप में एक आंटी जी बैठी हुई थी जो की 02 आदमी की बैठने की जगह को घेरे हुये थी उनके ठीक सामने एक दुबले-पतले अंकल जी बैठे हुये थे जो की अपने सामने आंटी जी के बैठे होने की वजह से थोड़े असहज से महसूस कर रहे थे। अचानक से मुझे आंटी जी की क्रकश आवाज़ सुनाई पड़ी। दरअसल मामला यह था कि अंकल जी ने बस आंटी जी को इतना बोल दिया कि - "आप अपना पैर मेरे सीट पर मत रखिये", दरअसल बात इतना रहता तो कोई और बात रहती लेकिन उसके बाद अंकल जी ने जो शब्द बोला वह आंटी जी को सीधे जाकर लगा था और वह यह था की आपका पैर साफ नहीं हैं, उसमें धूल लगा हैं इससे मेरे कपड़े गंदे हो गये। मुझे उस समय महसूस हुआ की कोई भी औरत अपनी शारीरिक सुंदरता को लेकर कभी भी बुराई नहीं सुन सकती चाहे वो उसके पैर ही क्यों नहीं हो। आंटी जी ने जो बोलना शुरू किया तब पूरी बोगी ख़ामोश हो गई। आंटी जी ने बोलते - बोलते कहां - हमरा गोड़ (पैर) में माटी लागल बाs आ तोरा में का क्रीम लागल बाs कुछ यात्रियों ने उन्हें समझाया की आरे!!! आंटी जी, क्यों गुस्सा हो रहे हैं। एक तो ट्रेन इतनी लेट है कृपया शांत रहिए। तो आंटी जी ने उसी धुन में कहां की हम काहे शांत रहे, ई हमरा काहे बोला!!! फिर उसी अंकल की ओर मुख़ातिफ़ होकर पुन: बोलना शुरू की "हमरा गोड़ में गुह लागल बा आ तहरा में का मोती"। अंकल जी कुछ बोलने को उत्सुक हुये लेकिन फिर पता नहीं क्या सोचकर शांत हो गए। आंटी जी भी धीरे-धीरे बोलते बोलते थक गई थी उन्होंने बोतल से पानी निकाला और पानी पी करके फिर अपने आसपास बैठे लोगों से बात करने लगी। कुछ देर बाद फिर उसी आंटी जी का मुझे जोर से ठठाकर हंसने की आवाज सुनाई दी। मुझे महसूस हुआ की इंसान अपने गम एवं दुःखो को कितना जल्दी भूल जाता हैं लेकिन जब मैंने अंकल जी को देखा तो अभी भी वह उसी मुद्रा में सर को झुकाए हुए बैठे थे। इस घटनाक्रम से मुझे एक चीज समझ में आया कि हमें या तो आंटी जी की तरह गम को भुलाते हुये ठहाका😂 लगाना है या फिर अंकल जी की तरह उसे पास में रखकर सर को झुकाये😔 बैठना हैं। यह निर्णय हम पर निर्भर करता हैं।


   हमारे सहयात्रीयों में एक बड़ी सी मुस्लिम फैमिली भी थी जो ये सोच कर पटना से ट्रैन में बैठे थे की शाम को घर पर रोजा तोड़गे लेकिन यह कार्य उन्हें ट्रैन में ही करना पड़ा क्योंकि ट्रैन 04-05 घंटे विलम्ब से चल रही थी और भारतीय रेल को यात्रियों को हुई इस असुविधा के लिये खेद था।

       दीपक जी उस समय तक अपनी फ़ोन कॉल से बाते कर के फ्री हो गए थे और हम से बोले की - दलाल का भी कार्य अच्छा हैं आराम से एक महीने में 40 से 50 हजार की आमदनी हो जाती हैं और कई बार उससे भी ज्यादा। मैने उन से कहां की यह भी तो हो सकता है कि किसी महीने में आमदनी ना भी हो।

उन्होंने कहां - हां, पॉसिबिलिटी तो यह भी हैं।

फिर मैंने उन्हें समझाते हुए कहा कि - देखिए यह कार्य जो है ना वह बरसात की तरह हैं कभी इतना पानी आ जायेगा की आप उस में डूब भी सकते हैं और कभी इतना कम की आप प्यास से मर सकते हैं। जबकी सरकारी नौकरी या कोई पेशा जिसमे एक निश्चित रकम हमें हर महीने प्राप्त होती हैं वह एक कुएँ की तरह हैं। आपको जब कभी भी जितनी पानी की आवश्यकता हो उतना आराम से निकाल सकते हैं। मेरी यह भारी-भरकम बातें उसे समझ में आई कि नहीं यह तो मुझे नहीं पता लेकिन उसने Hmmm में सर हिला दिया।

उस समय रात का 09:30 हो रहा था रतन सराय स्टेशन पर मैंने भैया को घर से बाइक लेकर आने को बोल चुके थे। मैंने उन्हें 30 मिनट पहले ही कॉल कर दिया था क्योंकि घर से भी आने में उन्हें लगभग 40 मिनट का समय लगता। लेकिन ट्रेन में हो रही चेन पुलिंग की घटनाओं की वजह से हम स्टेशन और 01 घंटे लेट पहुंचे। उन्हें स्टेशन पर ही लम्बा इंतजार करना पड़ा। रतन सराय स्टेशन जैसे ही हम ट्रेन से उतरे वैसे ही दीपक ने मुझसे अपना मोबाइल नम्बर शेयर करने का अनुरोध किया। मैंने उसको दो बार अपना मोबाईल नम्बर बोला - 79035*****.  लेकिन उसने दोनो बार गलत टाइप किया। फिर मैंने उसका मोबाइल लेकर अपना नंबर डायल किये और कॉल भी कर दिये ताकि उसका भी नंबर मेरे पास आ जाए। जाते - जाते मैंने Good Night एवं आगे की यात्रा के लिये Happy जर्नी भी बोला लेकिन मुझे क्या पता था की उसकी ये आगे की यात्रा आसान नहीं होने वाली हैं।

    "दरअसल हुआ ये की मांझा में उसने चेन पुलिंग करने की कोशिश की और उसकी यह कोशिश बेअसर रही उसे CRPF वालों ने पकड़ लिया और थावे तक ले कर के गये जबकी वह नियमत: या तो मेरे साथ रतन सराय में उतर जाता या फिर गोपालगंज क्योंकि यहां से मांझा नजदीक पड़ता है। लेकिन उसका या तो नसीब ही खराब था या फिर कोई सिख की आगे से कभी गलत कार्य नहीं करना हैं। इस पुरे प्रक्रिया में उसके समय के साथ-साथ धन की भी हानि हुई।" 

उक्त सारी बाते मुझे ऐसे पता चली की रात के 11:00 बजे जब हम घर पहुंच गए तो उसे व्हाट्सएप पर मैसेज किये -


I hope you reached home safely.


उसने सुबह 06:00 बजे रिप्लाई दिया।


Yes.


मेरा अगला प्रश्न था -


👍🏻

मांझा में चेन पुलिंग 😊


अबकी बार उसने रिप्लाई नहीं दिया बल्कि कॉल करके अपनी पूरी घटना का विस्तार पूर्वक वर्णन किया जिसे संक्षेप में मैंने आपको ऊपर 👆🏻 बताया हैं।

बुधवार, 26 मार्च 2025

रांची से पटना की ट्रेन यात्रा और धुसका का स्वाद।

    

         अखिल भारतीय दर्शन परिषद के द्वारा आयोजित 69वां त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन की समाप्ति हो चुकी थी। धीरे-धीरे सभी लोग प्रस्थान कर रहे थे, कुछ कर चुके थे एवं हम करने वाले थे। मेरी ट्रेन रांची स्टेशन से शाम में 07:30 की थी रांची गेस्ट हाउस से स्टेशन की दूरी लगभग 07 KM थी यानी कि आधे घंटे का समय काफी था फिर भी हम 06:00 बजे रैपीडो बुक कर लिये ताकि ससमय स्टेशन पर पहुंचा जा सके। रैपीडो वाला भी ससमय आ तो गया लेकिन वह गेस्ट हाउस के दूसरी साइड था। चुंकि बुकिंग करते समय मैंने रूम से ही बुक किया था जिस वजह से गेस्ट हाउस की दूसरी साइड का लोकेशन उसे मिला था। उसे लोकेशन समझाते-समझाते आधे घंटे और लग गए और वह मेरे पास 06:30 में आया और आने के साथ ही बोला कि रास्ता पूरा जाम है हमें स्टेशन पहुंचने में 01 घंटे से भी ज्यादा का समय लग सकता है। मैंने कहां की भाई ट्रैन हैं, देखिये कुछ हो सकता हैं ?

उसने पुरे कॉन्फिडेंस के साथ कहां की - सर, आपकी ट्रैन तो हम नहीं छूटने देंगे।

        ...और फिर उसने रांची के सारे शार्टकट रास्ते से होते हुए मुझे स्टेशन की ओर ले चला। रास्ते में वह बातचीत भी करते जा रहा था मैं भी समय-समय पर रिप्लाई दे रहा था, मालुम चला की उसका नाम विशाल है और वह BBA का कोर्स किया हुआ है, MBA करने के बारे में विचार कर रहा है। उसने मुझे रांची आने एवं यहां के आयोजन के बारे में पूछा। जब उसे पता चला कि हम Ph.D कर रहे हैं तो उसकी उत्सुकता और जागृत हो गई और Ph.D से संबंधित मुझसे कई सारे प्रश्न पूछे। मैंने उसके सारे प्रश्नों का बहुत ही विस्तार से जवाब दिया। हम रांची स्टेशन पहुंच चुके थे लेकिन उसके प्रश्न अभी खत्म नहीं हुए थे। मैंने उसे अपना नंबर दिया और कहां कि जब भी आप को कुछ पूछना हो या जानना हो आप कभी भी मुझे कॉल/मैसेज कर सकते हैं। रैपिडो एप्प में जो किराया दिखा रहा था उससे ज्यादा ही मैंने उसे दिया और Good Night के साथ मैंने उससे विदा लिया उसने जवाब में मुझे Good Night के साथ Happy Journey भी बोला। मैंने भी Thank You के साथ उसे पटना आने का न्योता देते हुये रेलवे स्टेशन पर आ गया। स्टेशन पहुंचने के 05 मिनट के अंदर ही अनाउंस होने लगा की हमारी ट्रेन प्लेटफार्म नंबर एक (01) पर आ रही हैं।

        ट्रैन में मेरी शीट S-3 बोगी में 48 साइड अपर था, लेकिन ट्रेन में हम साइड लोअर की सीट पर ही बैठे हुए थे। ट्रेन का भी एक अनोखा नियम है यदि आप लोअर शीट पर रहते हैं तो आप की शीट पर हर किसी का दावा रहता है लेकिन जैसे ही आप ऊपर की सीट की ओर अग्रसर होते जाते हैं तो आप की वह सीट केवल आपकी ही रह जाती है। यहां मुझे जिंदगी का एक फलसफा भी समझ में आया, जब तक आप निचले स्तर पर रहते हैं तब तक आपको हर तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा यानी आप अपनी इच्छानुसार हर कार्य नहीं कर सकते हैं आपकी संसाधनों में सबका बंटवारा होगा लेकिन जैसे ही आप ऊपर की ओर अग्रसर होंगे वह बस आपका एवं आपका हो कर रह जायेगा। मेरी सीट तो 48 साइड अपर थी लेकिन मैं 47 साइड लोअर पर ही बैठा हुआ था, ट्रेन में बैठने के 05 मिनट के उपरांत ही हमारे सहयात्री भी आ गए, जिनका नाम रौशन था उनकी यात्रा भी हमारी तरह रांची से पटना तक होने वाली थी। मैं अक्सर अपनी यात्राओं में दो कार्य करता हूं एक तो ब्लॉग राइटिंग✍🏻 और दूसरा अपने सहयात्रियों से बातचीत, ताकी ब्लॉग के लिए हमें कुछ कंटेंट मिलते रहे। 

       रांची आये हुये आज तीन दिन हो गए थे और सोशल मीडिया पर अभी तक मैंने मात्र एक ही पोस्ट किया था यही सोच कर ट्रेन में बैठे-बैठे पहाड़ी मंदिर का पोस्ट तैयार करने लगे। तभी जिनकी सीट पर मैंने आधिपत्य कर रखा था जो की रेलवे के नियम के अनुसार सही था हमारे सहयात्री ने कहां - मैं जरा बाथरूम से आता हूं, आप मेरा बैग देखते रहिएगा। आज के समय में भी हम अपने साथ रहने/चलने वाले लोगों पर इतनी जल्दी विश्वास कर लेते हैं भले ही उनसे मुलाकात पहली बार हुई हो। मैंने उन्हें आश्वसत किया कि आप आराम से जाइए कोई दिक्कत नहीं होगा। जब तक वह बाथरूम से आते तब तक मेरा पोस्ट कंप्लीट हो चुका था और सोशल मीडिया पर परिलक्षित भी हो रहा था। मैंने इस पोस्ट में पहाड़ी मंदिर का थोड़ा बहुत इतिहास भी लिख✍🏻 रखा था की इस मंदिर की धार्मिक मान्यता क्या है? और भारत की आजादी से इसका क्या संयोग है? इत्यादि। मुझे यह जानकार भी आश्चर्य हुआ कि प्रत्येक 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को यहां पर तिरंगा झंडा भी फहराया जाता है। इस पोस्ट को तैयार करने में मुझे 20 से 25 मिनट का समय लगा था लेकिन लोगों ने इसे पढ़ने में 01 से 02 मिनट का भी समय नहीं लगाया और और कमेंट में "जय माता दी" लिख कर आने लगा जबकि वह शिवजी का मंदिर था। 

     हमारे सहयात्री तब तक वापस अपनी सीट पर आ चुके थे अक्सर ऐसा होता है कि अपने सहयात्रीओं के साथ बातचीत की शुरुआत मेरे द्वारा की जाती है लेकिन इस बार उल्टा हुआ। मेरे सहयात्री जिनका नाम रौशन था उन्होंने मुझसे पूछा - आप कहां तक जाओगे ?

 मैंने कहां - पटना।

उन्होंने भी कहां - मुझे भी पटना तक ही जाना है।

मैंने उनसे पुन: पूछा - आप 12th की तैयारी करते हो या किसी सामान्य प्रतियोगिता की। क्योंकि अक्सर पटना में रहने वाले छात्र किसी ना किसी प्रतियोगी परीक्षा की ही तैयारी कर रहे होते हैं।

उन्होंने कहां - 12th तो कब का हो गया है, अभी परीक्षा की ही तैयारी कर रहे हैं।

मैंने पूछा - 10th कब हुआ था ?

उसने कहां - 2018 में। 

मैंने अनुमान लगाया की उसकी उम्र तक़रीबन 21-22 साल की रही होगी।

मैंने कहां - आप BPSC की तैयारी कर रहे हो ? 

उसने थोड़ा धीरे से कहां - नहीं।

     BPSC, JPSC या किसी भी राज्य की कोई संस्था जो सिविल सेवकों को नियुक्त करती है अक्सर उस संस्था के नाम से ही उसके द्वारा नियुक्त की जाने वाली परीक्षाओं को लोग जानते हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व BPSC ने बिहार में शिक्षकों की नियुक्ति का कार्य किया था। अब आलम यह है कि उसके द्वारा नियुक्त शिक्षक अपने आप को सबसे सर्वश्रेष्ठ एवं "बीपीएससी से पास शिक्षक" का टैगलाइन लेकर घूम रहे हैं।

खैर....

        हम ट्रेन में वापस लौटते हैं, उस समय तक 08 बज चुका था और मैंने अपनी खाने की प्लेट तैयार कर ली थी आज के रात्रि भोजन में मेरे पास धुसका (एक विशेष प्रकार का फ़ूड जो कि रांची में बनाया जाता है) था। धुसका के बारे में मेरे एक छात्र (हर्ष) जो कि रांची से ही आते हैं एवं वर्तमान में निफ्ट पटना में अपनी पढ़ाई कर रहे है, उन्होंने बताया था और कहां था की - आप एक बार आप इसको टेस्ट कीजिएगा, बहुत अच्छा रहता है। और हुआ ऐसा की सुबह के नाश्ते से लेकर रात के डिनर तक धुसका ही रहा। इसका स्वाद बहुत अच्छा था, ऐसे भी मुझे नहीं-नई जगह घुमने और नई-नई डिश खाने का शौक है। 

Dhuska

       मैंने रौशन से भी पूछ लिया कि आपको धुसका कैसा लगता है ? उन्होंने एकदम से मना करते हुये कहां की मुझे अच्छा नहीं लगता है। मुझे लग गया कि अब इसके बारे में चर्चा करना सही नहीं है और मैंने परिचर्चा के विषय को बदल दिया।

        चूंकि, वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था तो मेरा पहला प्रश्न वही से था। आप अभी तक कोई एग्जाम पास किये हो या नहीं ?

उसने कहां - कई सारा, लेकिन अंतिम चयन अभी तक नहीं हुआ हैं कभी दौर तो कभी रिटेन में रह जाता हैं।

मैंने कहां - कोई बात नहीं मेहनत करते रहिए सफलता एक दिन जरूर मिलेगी ।👍🏻

उसने कहां - Hmmm. 

फिर मैने अपने बारे में बताते कहां कि मुझे कभी भी पुलिस या ऐसा कोई जॉब पसंद नहीं रहा लेकिन इनके लिए मन में बहुत ही ज्यादा आदर एवं सत्कार का भाव रहता है।

तब उसने थोड़ी बेरुखी के साथ कहां की - कोई जॉब तो मिलना चाहिए।

मैंने कहां - जॉब क्यों नहीं मिलेगी ? आप उसके लिए तैयारी तो कीजिए, फिर मैंने उसे अपने नवोदय विद्यालय, मधेपुरा के ज्वाइनिंग से लेकर के BPSC के PT एवं मैंस की सफलता की कहानी बताई और यह भी बताया कि कैसे हम उस समय यूट्यूब पर छात्रों को पढ़ाते भी थे। हमारा यह लेक्चर लगभग एक घंटे तक चला। पता नहीं यह लेक्चर उसे कितना समझ में आया लेकिन उसे भूख जरूर लग चुकी थी। उस समय 09:00 बज चूका था और मैं अब आराम करने अपनी सीट पर जा चूका था।

         मेरा सीट नम्बर 48 था और इसका मूलांक 03 होता हैं, "Numerology (अंक ज्योतिष): - अंक ज्योतिष के अनुसार मूलांक 03 वाले लोगों का सम्बन्ध वृहस्पति ग्रह से होता है एवं नंबर 03 का प्रभाव होने की वजह से ऐसे जातकों में ज्ञान की अधिकता होती है। इन्हें धार्मिक कार्यों के साथ-साथ किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक होता है।" मैंने सोचा कि जब नंबर का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता हैं तो वस्तुये उससे अछूती थोड़ी ही हैं वहां पर भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता ही होगा। और शायद यही वजह भी रहा की सीट क्रमांक 48 मूलांक 03 पर जाते ही उसके प्रभाव मेरे उपर परिलक्षित होने लगे और अपने आप ही अगूंलिया मोबाइल के स्क्रीन पर चलने लगी और शब्द अनायास प्रकट होने लगे। देर रात तक हम ब्लॉग्स लिखने और उपन्यास अग्निशिखा जिसे साथ लेकर के गए हुए थे उसे पढ़ने का कार्य रात भर करते रहे। अंक ज्योतिष के अनुसार मेरा मूलांक 01 होता है जिसका मुझपर प्रभाव है और इसे मै महसूस भी करता हूँ खाशकर तब से जब से ज्योतिष विज्ञान का अध्ययन शुरू किया है। 

     सुबह का 04:30 हो रहा था लगभग सभी लोग सोए हुए थे, तभी एक अंकल जी अपने कंधे पर ढेर सारा गमछा लेकर आए  और उनकी आवाज से पूरा ट्रैन गुंजयमान हो गया - सूती गमछा, सूती गमछा। 

एक व्यक्ति उनसे अर्द्धनिंद्रा में ही पूछा - स्टेशन ???

उस अंकल ने कुछ यूं जवाब दिया - गया "मकदुमपुर" का सूती गमछा। 

उन्हें यूँ बोलना था - गया का सूती गमछा लेकिन बीच में मकदुमपुर आ गया।

अंकल जी जब तक अपना गमछा लेकर आगे जाते उससे पूर्व वह व्यक्ति फिर से खर्राटा लेना शुरू कर दिए थे। ट्रेन में ही किसी सज्जन के मोबाइल से मधुर आवाज में गाना बज रहा था - 


लाडला कन्हैया मेरा, जग से निराला इसलिए.........


हम अपने सफ़र के अंतिम पड़ाव पर थे, रात भर मैंने ब्लॉग्स राइटिंग और कुमार विश्वास की सुप्रसिद्ध रचना की कुछ पंक्तियों को गुनगुनाते हुए बिताया था - 


"तुम्हारे और मेरे रात में बस फर्क है इतना ,

तुम्हारी सो के गुजरी है हमारी रो के गुजरी है।" 


हमारी यह रात रो कर तो नहीं लेकिन खर्राटों के बीच जरूर गुजरी थी क्योंकि दो सज्जन व्यक्ति जो की ट्रैन में अपर सीट पर थे दोनों के बीच घमासान खर्राटा वार चल रहा था और मैं निर्दोष सैनिक की भांति अपनी निंद्रा को नहीं चाहते हुए भी कुर्बान कर रहा था।

   .....धीरे -धीरे ट्रैन में भीड़ बढ़ती जा रही थी और स्लीपर क्लास अब जनरल डब्बे में परिवर्तित होते जा रहा था। पटना जंक्शन से 01 KM पहले ट्रेन रुक गई, मैंने अपना बैग वगैरा पैक किया और अपर की सीट से निचे आ गया। रौशन अभी तक सों रहा था, संभवत: रात की खर्राटों से वह भी परेशान रहा हो। फिर भी मैंने उसे जगाया और हल्की मुस्कान के साथ उसे सुप्रभात🌻बोला। लेकिन उसने धीरे से good morning बोला और अपने मोबाइल में गुम हो गया। हम पटना जंक्शन पहुँच चुके थे, आते समय मैंने एक बार फिर से अपने सहयात्रियों को यात्रा में साथ देने के लिये धन्यवाद दिया विशेष कर के उन्हें जो की रात भर खर्राटों से मुझे जगा कर रखे ताकि हम अपना Blogs एवं उपन्यास दोनों पुरा कर पायें। 07:30 बजे तक रूम पर आ चुके थे फिर फटाफट नाश्ता तैयार किये क्योंकि 09:00 बजे से पहले कॉलेज भी जाना था।   

बुधवार, 13 मार्च 2024

Heritage walk (हेरिटेज वॉक)

    08 मार्च 2024 को शाम 04:33 में Nift Patna के ऑफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप में हिंदी में एक मैसेज आता है - "अमूमन इस ग्रुप में सारे मैसेज इंग्लिश में ही आते हैं, संभवत: पहली बार कोई मैसेज हिंदी में आया था।" मैसेज में यह लिखा था कि 10 मार्च को दिन के 10:00 बजे से हेरिटेज वॉक का आयोजन किया जा रहा है। मेरे जन्म की तिथि 10 हैं और 10 का मूलांक 01 होता है, इस 10 अंक के साथ अब घनिष्ठता (Closeness) सी हो गई है। मैंने बिना 10 Min. विचार किये, 10 सेकंड में ही इस हेरिटेज वॉक में सम्मिलित होने के लिए सहमति दे दी लेकिन 10 घंटे बितने के बाद भी जब कोई जवाब नहीं आया तो मैंने जयंत सर पूछा कि - कल आयोजित होनेवाले हेरिटेज वॉक का क्या हुआ???

 सर ने बोला कि वह मेरा नंबर उन्हें शेयर कर दिए हैं, उनके द्वारा मुझे कॉल किया जाएगा।

 तय समय सीमा के अनुसार रविवार को 10:00 बजे से हेरिटेज वॉक शुरू होने को था इसलिए शनिवार को रात के 10:00 बजे ही सो गए ताकि सुबह में जल्दी उठ सके।

रविवार की सुबह जब 08:00 बजे तक कोई कॉल नहीं आया तो हम समझ गए कि लगता है कोई हेरिटेज वॉक नहीं होने वाला है और हम किचन में जाकर अपना पसंदीदा कार्य "कुकिंग" स्टार्ट कर दिए। सब्जी लगभग बन चुका था और पहली रोटी बनने ही वाली थी कि तभी व्हाट्सएप पर कॉल आता है। उस समय 08:41 हो रहा था। वह कॉल, भैरव दास सर का था। सर ने अपना परिचय देने के बाद कहां कि हम 09:15 से 09:30 तक चिरैयाटाड़ पुल को पार करेंगे, आप राजेंद्र नगर साइड में आ जाइए। हम आपको वही से पिक-अप कर लेंगे।

बिना नाश्ता किये ही 09:30 AM तक, हम चिरैयाटाड़ पुल के पास पहुंच गये थे। 10:01 मे सर का पुन: कॉल आता है कि 30 सेकंड में हम आपके पास पहुंच रहे हैं। बस में 10 से ज्यादा लोग थे। बस जैसे-जैसे आगे बढ़ते रही, लोगों की संख्या भी बढ़ती रही। कुछ दूर आगे जाने के उपरांत एक जगह बस रुकी और हमलोगो से कहां गया कि "अrunodaya एक उड़ान" की कुछ बच्चियों भी कादंबिनी सिन्हा मैम के साथ हमारे इस यात्रा में सम्मिलित होगी। भैरव सर ने हम सभी से अनुरोध किया कि तब तक वह सभी यहां पर आते हैं तब तक आप सभी अपना-अपना परिचय दे दीजिये। एक-एक करके हम सभी ने अपना परिचय दिया। उसके उपरांत भैरव सर ने नेपाली मंदिर की विशेषता और उसकी ऐतिहासिक महत्ता को समझाया।

  सबसे पहले हम सभी कौनहारा घाट पहुंचे, कौनहारा घाट गंडक नदी (जिसे नारायणी की भी संज्ञा दी गई है।)  के तट पर हाजीपुर वैशाली की तरफ स्थित है।


 गज एवं ग्राह के युद्ध की कहानी हम कई बार पढ़ चुके हैं यहां आने के बाद मुझे ज्ञात हुआ कि इन दोनों की लड़ाई में हारा कौन? और जीता कौन ? इसी जिज्ञासावश इस घाट का नाम कौनहारा घाट हो गया। चूंकि हमलोगो की यात्रा यहां से शुरू हो चुकी थी इसलिए एक ग्रुप फोटोग्राफ लेने के बाद हम नेपाली मंदिर की ओर अग्रसर हुये।


 नेपाली मंदिर के बाहर एक बोर्ड था जो की बहुत मुश्किल से अपने आप को एक दीवार के सहारे संभाला हुआ था। उस बोर्ड के ऊपर वैधानिक सूचना - पट्ट को ही हम अच्छे से पढ़ पा रहे थे उसके बाद के लिखे शब्द समय के साथ धुंधले पड़ गए थे, जैसे कि हमारी हेरिटेज इमारतें।

 नेपाली मंदिर जिसे स्थानीय भाषा में नेपालीयां मंदिर भी कहा जाता है, नागर शैली में ईंटों से बना एक मंदिर है। इसे नेपाल के महाराजा ने लगभग 250 साल पहले सैनिक छावनी के तौर पर निर्माण कराया था। 2014 में मुझे मध्य प्रदेश के खजुराहो के मंदिरों को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आज इस नेपाली मंदिर को देखकर खजुराहो की सारी स्मृतियां पुन: ताजा हो गई। खजुराहो में मंदिरों के ऊपर जो भी आकृतियां बनाई गई है उसका आधार शैल (Stone) हैं जबकि नेपाली मंदिर में आकृतियों का आधार काष्ठ (Wood) है। यहां आने के उपरांत मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि इस मंदिर को उत्तर का खजुराहो भी कहा जाता है।

 आज के इस डिजिटल युग में भी हमारे यहां के प्रेमी जोड़ों को अपने दिल💌 का हाल बयां करने के लिए शायद सोशल मीडिया भी कम पड़ जाता है तभी तो वह, यहां स्थित हेरिटेज इमारते को अपना निशाना बनाते हैं। और दीवारों को कुरेद कर अपना एवं अपने महबूबा का नाम लिखकर यह समझते हैं कि मैंने अपने प्यार को सर्वोच्च स्थान पर पहुंचा दिया लेकिन उनके इस कार्य से कितनी क्षति होती है शायद इससे वो अनभिज्ञ रहते हैं। नेपाली मंदिर की दीवारों पर भी मुझे ऐसा ही कुछ प्रसंग दिखा। अचानक से मेरी नज़र एक टाइपोग्राफी पर रुक गई, वहां लिखा था - MOM & DAD LOVE 03/03/2024. इसने तो बकायदा तिथी भी बता दी थी। इस पर क्या लिखे,......✍️

 ......हम मंदिर के अंदर प्रवेश किये। अंदर का दृश्य ऐसा था कि एक के ऊपर दूसरा नाम अधिव्यापन (Overlap) हो रहा था। हम सुने एवं देखे थे कि शिव मंदिर में पूजा करने के उपरांत भक्तगण नंदी जी के कान में अपनी इच्छाओं (wishes) को कहते हैं, ताकि वह शिवजी के पास तुरंत पहुंच जाए। लेकिन यहां तो उनके भक्तगण सीधे दीवार पर ही अपनी इच्छाएं व्यक्त कर दिए हैं ताकि दिन-रात शिवजी इसे पढ़ते रहे एवं उन्हें जब समय मिले तत्काल पूरा कर दे।

 नेपाली मंदिर के पास में ही श्री विशालनाथ महादेव मंदिर था उसका भी दर्शन करते हुए हम लोग कबीर आश्रम की ओर बढ़े। यहां पर हमें श्री श्री १०८ बाबा निर्मल दास जी साहेब की जिंदा समाधि स्थल दिखी। सबसे आश्चर्य हमारे लिये यह रहा की यहां पर नौ ग्रहो को समर्पित 1640 ई० मे निर्मित एक नवग्रह कुआं दिखाई दिया। दावा यह था की ग्रहों के हिसाब से ही जल का सेवन किया जाता है। ग्रहों का तो नहीं पता लेकिन जल का टेस्ट हमने भी ले लिया।😊

 पुनः हम सभी बस में बैठे और 16वी शताब्दी में निर्मित पत्थर की मस्जिद देखने पहुंचे। सफेद रंग की चादर ओढ़े वह मस्जिद बहुत ही अलौकिक लग रहा था। पटना सिटी में स्थित पत्थर की मस्जिद मैंने सुना था आज पता चला कि हाजीपुर में भी पत्थर की मस्जिद है और इन दोनों का निर्माण एक ही कालखंड यानी कि मुगल काल में किया गया है। एक और बाद मुझे पता चली जिसकी सत्यता पर मुझे भी एवं बताने वाले को भी थोड़ी शंका थी। वह यह थी कि "इस पत्थर की मस्जिद से लेकर पटना सिटी में स्थित पत्थर की मस्जिद तक एक सुरंग का निर्माण किया गया था ताकि नमाजी एक मस्जिद से दूसरे मस्जिद तक आसानी से आ जा सके।"

 वहां से निकलने के बाद हम सभी सीधे सोनपुर पहुंचे। हमारे लंच की व्यवस्था वही पर की गई थी। सोनपुर के घाटों का सौन्दर्यकरण बहुत ही बेहतरीन किया गया था। इस हेरिटेज यात्रा में जय भास्कर जी से परिचय हुआ। उनसे यूट्यूब, वेबसाइट एवं ब्लॉगस्पॉट पर लंबी बातचीत हुई। सोनपुर के घाटों पर हमने बहुत सारी तस्वीर भी खिंचवाई। घाट पर घूमते हुए मेरी नजर एक दुकान पर गई जिसका नाम था - बेवफा चाय वाला I ❤️ Sonpur "प्रेमी जोड़ो के लिए ₹15 की चाय" "प्यार में धोखा खाये लोगो के लिए ₹10 की चाय" क्योंकि यह दोनों ऑफर मेरे ऊपर फिट नहीं हो रहे थे इसीलिए हम आगे बढ़ते रहे। रास्ते में हमें नौका स्टेशन, पौराणिक एवं ऐतिहासिक कष्टहरिया घाट, एवं आपरूपी गौरी शंकर मंदिर दिखाई दिया। सबके दर्शन कर हम आगे बढ़ते रहे।

 उस समय तक दो बज चुका था, और हमारे सामने CHAUPATI RESTURENT दिखा। अचानक से मुझे ध्यान आया कि सुबह से तो कुछ खाये ही नहीं है। खैर!!! रेस्टोरेंट के अंदर पहुंचे। इत्तेफाक कहिए या फिर संयोग मेरे टेबल का नंबर 05 था जो की मेरा लकी नंबर भी हैं।


 लंच करने के उपरांत फिर हम बाबा हरिहर नाथ के दर्शन करने गए। हमारी आज की यह यात्रा मेरे लिए एवं संभवत: सभी लोगो के लिए भी एक अविस्मरणीय पलों में से एक रही। इसी आशा एवं उम्मीद के साथ वापस पटना की ओर लौट चले की हम सभी एक बार फिर से ऐसे ही किसी और यात्रा में सम्मिलित होंगे।

धन्यवाद 🙏🏻


नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर आप इस हेरिटेज वॉक के सभी फोटोग्राफ आप प्राप्त कर सकते हैं।👇🏻

Photograph Link


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

स्लीपर (Sleeper) बोगी में स्लीपर (Slipper) ले गया चोर !


       मुझे याद है भारतीय रेल के जनरल बोगी की वो तमाम यात्राएं जिसमे थोड़ी सी जगह बनाने के लिए, वहां बैठे लोगों से हमेशा हेल्दी ग्रुप डिस्कशन करना पड़ता था, उनको इंप्रेस करना पड़ता था, इतना इंप्रेस तो आज तक किसी लड़की को नहीं किये जितना कि कई बार सिर्फ थोड़ी-सी जगह के लिए वहां बैठे लोगों से कर लिये थे। यदि उसमे से थोड़ा भी इंप्रेस किसी ख़ूबसूरत बला👩‍🦰 को किए रहते तो आज तक शायद सिंगल नही रहते। ख़ैर!!! आपने विषय पर लौटते हैं। हम चर्चा कर रहे थे जनरल बोगी में सीट लेने की, कई बार तो सीट पर बैठे लोगों को भैया, चाचा, सर🙏 सब बोलकर रिश्ता बनाना पड़ता था, तब जाकर लोग कबूल करते थे और थोड़ी सी जगह मिलती थी बैठने की। हालांकि, उस थोड़ी सी जगह को देखकर मेरी तशरीफ भी घबरा जाती थी क्योंकि ट्रेन जब थोड़ी सी भी हिलती थी तो अक्सर मेरी तशरीफ फिसल कर सीट से नीचे उतर जाती थी ।


        जेनरल बोगी की इन तमाम यात्राओं में एक दिन गुस्से में हम एक खतरनाक UP/बिहारी मजदूर से भयंकर झगड़ा हो गया, वो भी जगह बनाने को लेकर। वो जो मजदूर था ना वो मुंबई से लौट रहा था, कमाकर। मुझे तो एक बार ऐसा लगा की उसने अपनी पूरी कमाई के पैसा से बहुत सारा सामान खरीद लिया था और वो सब वहीं सीट के नीचे ऊपर लोड कर दिया था। जब उससे मेरी सीट को लेकर बहस हो रही थी तब उसने मेरी ओर गौर से देखा और उसे यकीन हो गया कि हम फुल फ्रस्टेट बेरोजगार हैं। 


       हम बस इतना बोले कि भाई साहब, सामान का लगेज बुकिंग करवाना चाहिए ना!!! यहां क्यों भर दिए हो। आने-जाने एवं बैठने में परेशानी हो रही है। मेरा इतना बोलते ही वह और भड़क😠 गया और बोला -

      "तोर पैसा से खरीदे हैं का रे.....??? कि एतना समझा रहा है हमको!!! बहुते बैठ के, अफसर बने के शौक है न, तो रिजर्वेशन कराके स्लीपर में काहें नहीं जाता है रे.... 

चला हैं, यहां अंग्रेजी झाड़ने। हमको अनपढ़ समझा है का रे़...."


      वो और चार्ज होने लगा और उसको देखकर बाकी उसके साथी मजदूर भी जोश में आने लगे, इसलिए माहौल अनुकूल ना देखते हुए हम जल्दी से आगे बढ़ गए। 


        आपको लग रहा होगा कि बात आई गई हो गई लेकिन सच बताएं, वो स्लीपर वाली बात हमको लग गई, बेरोजगार जो थे। बेरोजगारों को कोई भी बात उतनी ही जल्दी खराब लगती है जितनी जल्दी नई बहू को सास की बात।


      उसके बाद हम भी निर्णय कर लिए कि अब और बेइज्जती नहीं करवाएंगे, जाएंगे अब हम भी स्लीपर से ही और वो भी बकायदे रिजर्वेशन कराके। जब टिकट काउंटर पर टिकट लेने गए तब वहां बैठे रेलवे के कर्मचारी ने फॉर्म दिया। नाम था उसका - रिजर्वेशन फॉर्म। परीक्षा का फॉर्म तो हमेशा भरते थे पर उस दिन टिकट कटने वाला एक फॉर्म भरे, मजा आ गया देखकर। बढ़िया सुंदर राइटिंग बना-बना कर फॉर्म भरके जमा किए। टिकट काटने वाले कर्मचारी ने कंप्यूटर में पता नहीं क्या-क्या टाइप किया और मेरी ओर देख कर कुछ बोले- उनके द्वारा बोले गए पहले दो चार शब्द तो हम समझ नहीं पाए बस इतना समझे कि वह पूछ रहे हैं टिकट काट दे ? मैंने जैसे सुना - टिकट काट दे ? मुझे लगा कि जब फार्म भरकर उनको दे ही दिये हैं तब पूछ क्यों रहे हैं ? मैंने पूछा - सीट है ना!!! , क्योंकि मैंने सुना था कि कई बार रिजर्वेशन में सीट नहीं मिलता हैं। तब वो बोले कि सीट तो मिल जाए लेकिन..... उनकी बात पूरी होती उससे पहले ही हम चहकते हुए बोलो - टिकट काट दीजिये। एक बार वो मेरी तरफ़ घुर कर देखे और टिकट प्रिंट होने के लिए दे दिया। आखिरकार टिकट करवा ही लिए थे, स्लीपर का। टिकट बढ़िया प्रिंट हुआ, कागज़ पर। खच-खच करने वाले प्रिंटर से। और जब हम उसको देखे, तो उसपर लिखा हुआ था, RAC 26 । इतना तो पढ़े थे ही हम। समझ गए कि स्लीपर में एक्चुअली रैक जैसा बना रहता है, उसी में आदमी सब सोता है, उसी को RAC (रैक) कह रहा है और हमारा छब्बीस नंबर का रैक है ।


     अगले दिन सुबह 06 बजे ट्रेन थी मेरी। रिज़र्वेशन करा लेने से टेंशन हो गया था क्योंकि हम जो जूता पहन कर जाते थे, वो कई दिनो से अपने सोल से जुदा होने लगा था, इसलिए एक मोची से सिलवा दिए थे। सही में देखने में अच्छा नहीं लग रहा था। कहीं स्लीपर बोगी में बड़े बड़े लोग आएंगे वो हमको गरीब टाइप ना समझें इसलिए हम जल्दी से बढ़िया कंपनी का एकदम नया चमड़ा टाइप वाला स्लीपर 600 रुपया में, बार्गेनिंग कराके ले लिए, एक पास के दुकान से। स्लीपर में रेडियम💎 लगा था जो रात में चमकता था ।


    रिजर्वेशन कराए थे तो ससुरा रात भर नींद😴 भी नहीं आई। ऐसा लग रहा था कि कहीं सोए ना रह जाएं और ट्रेन निकल जाए, कहीं अलार्म धोखा ना दे दे। पर फिर भी, आंखें भले ही लाल😳 हो गईं थी मेरी नहीं सोने से, पर उत्साह दस गुना था हो भी क्यों ना!!! रिजर्वेशन जो था स्लीपर में।


      सुबह होते ही पहुंच गए स्टेशन, मस्त नहा-धोकर, नया शर्ट-पैंट और स्लीपर पहनकर। ट्रेन आई तो घुस गए हम सामने वाली बोगी में और 26 नंबर के सीट पर आ गए। उसपर एक लड़की सो रही थी। हुलिया ऐसा बना हुआ था उसका जैसे बारात में दम भर नाचने के बाद सीधे आकर सो गई हो। अलग टाइप का खर्राटा भी ले रही थी।


      15 मिनट छोड़ दिए कि जाने दो, लड़की है। सो लेगी थोड़ा देर, फिर उठा देंगे। विवेकानंद से सीखे थे कि लड़की औरत का इज्जत करना चाहिए, इसलिए किए। थोड़ी देर बार उसको उठाए तो नींद में कह रही है कि "कौन हो, जाओ यहां से, ये मेरी सीट है, क्यों डिस्टर्ब कर रहे हो और सो गई "। 


     हम उसको बताए कि मेरी है ये सीट, मैने रिजर्वेशन कराया है। तभी एक ठो लौंडा जो उसकी हवा से उड़ती हुई जुल्फों को देखकर बहुत देर से आशिकी फ़िल्म का गाना "बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए" गाते हुए टाइम पास कर रहा था। हम को देखते हुए बोला कि - 


"ढेर अंग्रेजी बोल रहा है तुम। लड़की देख के यहां नाटक कर रहा है, आए हो यहां तुम लौंडियाबाजी करने।" 


      हम भी जोश में आ गए और उसको अपना टिकट दिखाए तो हंस के कहता है अनपढ़े हैं का रे, RAC टिकट में सुत के जाएगा। हमको समझ में नही आ रहा था कि वह कहना क्या चाहता हैं ??? उससे हम बहस कर ही रहे थे कि तभी टीटी  महोदय आ गये मैंने उनको बताया कि मेरी सीट पर लड़की सो रही है और जब कहां तो ये भाई साहब हमसे झगड़ रहे हैं। तब टीटी ने मेरा टिकट लिया और अपने पास स्थित एक बड़े से लिस्ट में मिलान किया और कहां - भाई साहब, कौन कॉलेज में पढ़ते हैं ? S-12 में 07 नंबर का सीट है आपका। सीधे जाइए ये S-2 है। हम चल तो दिए पर अभी भी समझ में नहीं आ रहा था की रेलवे पागल है क्या, जब सीट नंबर अलग है तो हमको 26 नंबर काहे लिख के दिया।


      खैर!!! कई डब्बों को पर करते हुए और लोगों से पूछते हुए अपने सीट पर आ गए। वहां साला अलग ही गांजा हो रखा था। सेम सीट नंबर का उसका भी टिकट था जो मेरे सीट पर बैठा था। हम सोचे कि साला ऊ मजदूरवा के फेर में आज दर-दर का ठोकर खा रहे हैं। मन कर रहा था कि मिल जाता ससुरा तो उसका नरेटी दबा देते। 


       एक घंटा तक बैठ नहीं पाए थे आराम से, और नींद भी आ रही थी और उपर से मेरे सीट पर तीन लोग बैठा हुआ था। अभी सोच ही रहे थे कि वहां बैठा एक आदमी मुस्कुराकर बोला कि - 


"अरे, काहे परेशान हो रहे हैं जी, आइए बैठिए, सबको चलना है एडजस्ट करके चला जाए"। 


     मानना पड़ेगा उस आदमी को। मेरे ही सीट पर हमको एडजस्ट कर दिया। सीट पर बैठे-बैठे उसने मुझे समझाया की RAC का मतलब क्या होता है। आप भी पढ़िए उसी की जुबानी।

"RAC यानी कि एक दुल्हन जिसका दो दूल्हा होता है, दोनो दूल्हा अपनी दुल्हन पर अधिकार दिखाने का कोशिश करता है पर दुल्हन अंत तक उन दोनों में से किसी की नहीं होती"


       हम भी RAC की कहानी सुन हताश होकर चुप-चाप एडजस्ट हो गए और अब आने लगी हमको नींद, रात भर जो सोए नहीं थे। ऊपर की सीट में गिद्ध जैसा गर्दन निकाल कर बैठा था एक आदमी जो झांक रहा था तब से। हमसे कहता है कि नींद आ रही है का ? तो आइए सो जाइए थोड़ी देर ऊपर, हम नीचे बैठ जाते हैं। उस दयालु आदमी को दंडवत  प्रणाम🙏 करने का मन किया। 


     हम जल्दी से चप्पल खोल कर ऊपर जाकर सो गए। करीब दो घंटे बाद नींद खुली तो लोग कम हो गए थे। मैं नीचे उतरा, की चलो थोड़ा नजारा देखा जाए, चाय-वाय☕ पिया जाए। उतरने के बाद अपना नया वाला चप्पल खोजने लगे, दिख ही नहीं रहा था। तभी एक आदमी जो खिड़की के पास बैठकर झाल-मूढ़ी खा रहा था, पूछा कि - का खोज रहे हैं भाई जी ? हम बोले कि "यार, मेरा स्लीपर नहीं मिल रहा" ? पूछा की कैसा था। हम बताए कि "यार, नया था, रेडियम लगा था उसमे" । वो हंसकर बोला कि 

"भाई जी, गया 

मैंने कहां - गया, मतलब!! 

तब वह मुस्कुराते हुए बोला - गया, स्टेशन अभी क्रॉस हुआ है, आपका स्लीपर गया।


     स्लीपर (Sleeper) बोगी में सबसे पहले आपको स्लीपर (Slipper) का ध्यान रखना चाहिए, इसलिए देखिए, हम बैठे हैं नीचे, लेकिन स्लीपर है मेरा पंखा के ऊपर" । 


      हम ऊपर देख रहे थे उसका स्लीपर (Slipper) वो हमको देखकर मुस्कुरा😊 रहा था और हम सोच रहे थे कि मेरा जनरल बोगी ही अच्छा था। कहां फंस गए इस स्लीपर के चक्कर में.......



शनिवार, 9 जुलाई 2022

भारतीय रेल के AC Class की यात्रा।

        भारतीय रेल की जनरल और स्लीपर क्लास में यात्राएं मैंने बहुत की थी आज यूंही मन में ख़्याल आया कि चलो थोड़ा सा AC Class कि भी यात्रा करके देखते हैं। हमेशा ऑनलाइन टिकट लेने की आदत के बावजूद उस दिन पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन गये और टिकट बुकिंग का फॉर्म लिया। राइटिंग तो अच्छी नहीं है फिर भी फार्म को भरकर के काउंटर पर जमा किया। हमे भारतीय रेलवे यह सुविधा देता है कि एक ही फार्म से आप वापसी का भी टिकट करा सकते हैं। मैंने सोचा कि बस AC के सफर का अहसास ही तो करना है आने का मैंने उसी ट्रेन में स्लीपर क्लास (SL) के लिए फॉर्म भर दिया। टिकट काटने वाले महोदय ने यह देखा कि जब जाने का AC Class का है तो आने का भी AC ही होगा। उन्होंने फॉर्म को अच्छे से देखे बिना दोनों टिकट AC में ही Book कर दिया और मुझसे बोले कि 2700 हुआ। मेरा माथा ठनका की रेलवे ने इतना किराया कब से बढ़ा दिया। जब टिकट को देखा तो पता चला दोनों टिकट AC का हुआ है। फिर मैंने बड़े ही विनम्रता से कहां - सर, मैंने रिटर्निंग का स्लीपर के लिए लिखा था। एक बार तो वह मुझे खा जाने वाली नजरो से घुरे और बिना कुछ बोले फॉर्म को गौर से देखने लगे। फर्म में स्पष्ट कैपिटल लेटर में SL लिखा हुआ था। वह बिना कुछ बोले टिकट को कैंसिल किये और मुझे रिटर्निंग के लिए स्लीपर का टिकट दे दिए। मेरा टिकट जाने का तो कंफर्म लेकिन आने का RAC - 90 था। जो उम्मीद थी कि संभवत कंफर्म हो जाएगा क्योंकि ट्रेन मगध थी।


          तय समय से हम रेलवे स्टेशन आ गए। बाहर जितनी ज्यादा गर्मी थी अंदर उतनी ही ठंडक थी। ट्रेन कब खुली, कब चली, कब स्टेशन पर रुकी इसका अहसास नहीं हो रहा था। सभी लोग अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे। कोई मोबाइल की शतरंगी दुनिया में खोया था तो कोई अपने-आप मे व्यवस्त था। किसी को किसी से मतलब नहीं थी मुझे तो अपने स्लीपर और जनरल क्लास की याद आने लगी जिसमें सभी लोग कितने मिलजुल कर यात्रा करते हैं खासकर दो औरतें यदि साथ मिल गई तो ससुराल से लेकर नईहर तक और घर से लेकर बथान तक का बखान हो जाता है। पटना से ट्रेन को खुले हुए लगभग 02 घंटे से ऊपर हो गया था। धीरे-धीरे सभी लोग अपने-अपने बैग से कंबल और चादर निकालने लगे क्योंकि रेलवे ने कोरोना के बाद से यह सुविधा देना बंद कर दिया था। मुझे तो इसका अहसास नही था और वैसे भी इतनी भीषण गर्मी में कम्बल का एक और luggage कौन बढ़ाये इसलिए मैंने कम्बल और चादर लिया नहीं था और शायद यह मेरी सबसे बड़ी गलती साबित हुई।😓

            AC Class में बैठने के साथ ही अपने आप अमीरी वाली वाले फीलिंग आने लगती हैं। इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने ₹15 वाली पानी की बोतल ₹30 में और ₹100 वाली खाने की थाली ₹200 में लिया। यहां तक तो सब ठीक-ठाक रहा। खाना खाकर जब रात में सोये तब आधी रात को अचानक से नींद खुल गई ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे किसी ने बर्फ के टुकड़ों पर लिटा दिया हो। आस-पास नजर दौड़ाई तो देखा कि सभी लोग कम्बल में लिपटे मस्ती से सो रहे हैं। समय देखा तो ठीक 12:00 बज रहा था यानी आधी रात पूरी बितानी थी लेकिन यहां तो एक मिनट बिताना मुश्किल लग रहा था। अपने सीट से उतर AC Class से बाहर निकले। बाहर निकलते ही गर्म हवा के लपटों ने चेहरे को एकदम से झुलझा🥵 दिया। वापस पुनः अपने स्थान पर आ गए। यहां पर तो शीतलता-ही-शीतलता🥶 थी। मेरे साथ समस्या यह हो रही थी कि अंदर आते तो ठंडक और बाहर निकलते तो प्रचण्ड गर्मी। पूरी रात यूं ही AC Class से बाहर आते एवं जाते ही बीती। मुझे परेशान देख मेरे एक बुजुर्ग सहयात्री ने सहानुभूति जताते हुए कहा - बेटा आपको कम्बल लेकर आनी चाहिए थी ना!!! अब उन्हें कौन समझाए कि हम तो अहसास के चक्कर में  AC Class में टिकट करा लिए थे जो की अब महंगा पड़ रहा था। हम तो बस यही सोच रहे थे कि ट्रैन कब दिल्ली पहुंचे ताकी मुझे गर्मी में इस ठंडक से छुटकारा मिले। ट्रैन तो अपने समय से ही दिल्ली पहुंची और जिस अहसास के लिए मैंने टिकट बुक कराया था वह अहसास दरवाजे पर खड़े होकर महसूस किया क्योंकि यहां पर AC की ठंडी हवा और बाहर की गर्म हवा मिलकर माहौल को खुशनुमा बना रहे थे।

           दिल्ली ससमय पहुंच गए फिर मेट्रो से अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचे। रूम पर जिनके यहां जाना था वो नही थे। उनके एक दोस्त ने स्वागत-सत्कार किया। जब वह 02-03 घंटे के उपरांत रूम पर आए तो मेरे लिए बाहर से ही फ़्रिज की जमी हुई किसी ब्रांडेड कंपनी की दही लेकर आये। शायद उन्हें लग रहा था कि इस गर्मी में दही की ठंडक जरूरी है। मेरे लिए यह समझाना मुश्किल लग रहा था कि मैं दही तो खाता नहीं हूं और दूसरी बात ठंडक की तो उससे रात भर परेशान होकर की आया हूं। मैंने उन्हें समझाया कि मैं दही नहीं खाता हूं तब वह कोल्ड ड्रिंक लेने जाने लगे मैंने उसके लिए भी उन्हें रोका और नॉर्मल पानी से ही काम चलाया।