गीत-गजल कइसे लिखब ? अब हम तोहरा बिना।
आपन मन के हालात कइसे व्यक्त करब? अब तोहरा बिना।
छोड़ के जात समय तु त तनको ना सोचलू...
गुनगुनाइब अब कईसे, अब तोहरा बिना।
बचपन के ऊ किस्सा, आ ऊ मस्ती के दिन,
सब याद आवत रहीs, अब तोहरा बिना।
काश!!! तु बस एक बेर देखे खातिर पीछे मुड़ गइल रहतीं...
ओही याद पर हम हम जी लेती, तोहरा बिना।
तू कहत रहलू कि तू हमेशा हमरा साथे में रहबु।
बतावऽ, अब हम कईसे रही तोहरा बिना।
चाँद भी अब हमरा से पूछेला...
"तू अकेले छत पर का कर रहल बाड़s, अब ओकरा बिना?
नदीयां उजाड़ हो गईल, बगइचा बिरान हो गईल,
फूलवो में भी अब सुगंध नइखे अब तोहरा बिना।!
यदि हम चहती त तहरा के रोक लेती,
लेकिन उ देह के हम करती भी का, तोहरा आत्मा के बिना ?
गीत-गजल कइसे लिखब ? अब हम तोहरा बिना।
आपन मन के हालात कइसे व्यक्त करब? अब तोहरा बिना।
छोड़ के जात समय तु त तनको ना सोचलू...
गुनगुनाइब अब कईसे, अब तोहरा बिना।
विश्वजीत कुमार✍️


