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सोमवार, 30 मई 2022

संज्ञानात्मक विकास क्या होता हैं? Cognitive Development kya hota hai ?



 संज्ञानात्मक विकास 

(Cognitive Development)

 

    'संज्ञान' शब्द का अर्थ है- 'जानना' या 'समझना'। यह एक बौद्धिक प्रक्रिया है, इसमें विचारों के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। मनोवैज्ञानिक 'संज्ञान' का प्रयोग ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में करते हैं। 


     संज्ञानात्मक विकास शब्द का प्रयोग मानसिक विकास के व्यापक अर्थ में किया जाता है। इस में बुद्धि के अतिरिक्त सूचना का प्रत्यक्षीकरण (perception), पहचान (recognition), प्रत्याह्वान (remembering) और व्याख्या (explanation) आदि भी आते हैं। 


       विकिपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार, संज्ञान में मानव की विभिन्न मानसिक गतिविधियों का समन्यवीकरण (coordination) होता है। 'संज्ञानात्मक मनोविज्ञान' शब्द का प्रयोग गुस्ताव नाइसर (Gustav Neisser) ने सन् 1967 ई० में किया था। संज्ञानात्मक विकास इस बात पर बल देता है कि मनुष्य किस प्रकार तथ्यों को ग्रहण करता है और किस प्रकार से उसका उत्तर भी देता है। संज्ञान उस मानसिक प्रक्रिया को सम्बोधित करता है, जिसमें चिन्तन, स्मरण, अधिगम और भाषा के प्रयोग का समावेश होता है। जब हम शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते है तो इसका अर्थ है कि हम तथ्यों और अवधारणाओं की समझ पर बल देते हैं।


       यदि हम विभिन्न अवधारणाओं के मध्य के सम्बन्धों को समझ लेते हैं तो हमारी संज्ञानात्मक समझ में वृद्धि होती है। संज्ञानात्मक सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति किस प्रकार सोचता है, किस प्रकार महसूस करता है और किस प्रकार व्यवहार करता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अपने अन्दर ज्ञान के सभी रूपों यथा स्मृति चिन्तन, प्रेरणा और प्रत्यक्षण को शामिल करती है।


        जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया में मुख्यतः दो बातों को महत्वपूर्ण माना है :-


1. संगठन और 2. अनुकूलन। 


     संगठन से तात्पर्य बुद्धि में विभिन्न क्रियाएँ जैसे प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, चिंतन एवं तर्क सभी संगठित होकर करती है। एक बालक वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों के संबंध में उसकी विभिन्न मानसिक क्रियाएँ पृथक पृथक कार्य नहीं करती है बल्कि एक साथ संगठित होकर कार्य करती है। वातावरण के साथ समायोजन करना संगठन का ही परिणाम है। संगठन व्यक्ति एवं वातावरण के संबंध को आंतरिक रूप से प्रभावित करता है। अनुकूलन बाह्य रूप से प्रभावित करता है।


       पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार अवस्थाओं में विभाजित किया है:-

1. संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensory Motor) : जन्म के 2 वर्ष 

2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational) : 2 से 7 वर्ष 

3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational) : 7 से 11 वर्ष 

4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational) : 11 से 18 वर्ष।

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

Content (सामग्री) हिन्दी एवं English Notes.


        Content का शुद्ध हिंदी होता है- सामग्री। इसका प्रयोग हम सूचना और मनोरंजन के लिए करते हैं जो किसी माध्यम के द्वारा हमारे पास पहुंचता है। यदि वह माध्यम इंटरनेट हो तो उसे हम E-Content कहेंगे। यदि वही माध्यम बदलकर किताब या समाचार पत्र हो जाये तो तब हम उसे Paper Content, Audio या Video के रूप में हो तो उसे Audio/Video Content कहते हैं।


Types of Content (सामग्री के प्रकार)


     सामान्यतः हम Content को 03 (तीन) भागों में बांट कर अध्ययन करते हैं-

(1) Text Content (पाठ सामग्री)- वैसा Content जिसमें सिर्फ शब्द प्राप्त होते हैं उन्हें Text Content कहते हैं।

जैसे:- Blogs Articles Webpage, Website, इत्यादि।


(2)Audio Content (ऑडियो/ध्वनि सामग्री):- वैसा Content जिसको केवल आवाज के रूप में सुना जा सकता हैं, ध्वनि सामग्री कहलाता है।

जैसे:- Radio, Telephone, इत्यादि।


(3) Visual Content (दृश्य सामग्री):- वैसी सामग्री जिसमें सूचनाएं दृश्य रूप में हो जैसे:- तस्वीर, वीडियो, इत्यादि। उन्हें हम दृश्य सामग्री (Visual Content) कहते हैं।


Content Writing (सामग्री लेखन)


      Content का अर्थ होता है किसी भी विषय पर लिखा गया लेख या आर्टिकल। Writing का अर्थ हुआ- लिखना✍️ यानी हम कह सकते हैं कि किसी भी विषय पर लिखा गया लेख सामग्री लेखन (Content Writing) कहलाता है।

       वर्तमान समय में बहुत से ऐसे व्यक्ति या संस्थान है जिनके पास कंटेंट लिखने के लिए समय नहीं होता इसलिए वह दूसरों से Content write करवाते हैं। इस कार्य को हम Content writing कहते हैं।


Content Writer:- जो भी व्यक्ति लिखने का कार्य करता है उसे हम कंटेंट राइटर कहते हैं। यदि आप किसी संस्था या व्यक्ति के लिए content लिख रहे हैं तो आप Content Writer हुए।






      Contents means pure Hindi - Samagri.  We use it for 'information and entertainment' which reaches us through some medium.  If that medium is Internet, then we will call it E-Content.  If the same medium is changed to a book or a newspaper, then if we have it in the form of Paper Content, Audio or Video, then it is called Audio/Video Content.



 Types of Content



 Generally we study the content by dividing it into 03 (three) parts-


 (1) Text Content :- Content in which only words are received is called Text Content.


 Such as:- Blogs ArticlesWebpage, Website, etc.



(2) Audio Content (Audio/Sound Content):- The content which can be heard only in the form of voice is called sound content.


 Eg:- Radio, Telephone, etc.



(3) Visual Content:- Content that contains information in a visual form such as: - picture, video, etc.  We call them Visual Content.



 Content Writing



 Content means an article, written on any topic.  Writing  means- writing️ That is, we can say that an article written on any subject is called Content Writing.


 In the present time, there are many such individuals or institutions who do not have time to write content, so they get others to write content.  We call this work 'Content writing'.



 Content Writer:- Whoever does the work of writing, we are called Content Writer.  If you are writing content for any organization or person then you are a Content Writer.

गुरुवार, 10 मार्च 2022

E-Content (ई- सामग्री)


 E-Content (ई- सामग्री) 

          वर्तमान परिदृश्य में हमारे पास अध्ययन के लिए जो सामग्री उपलब्ध है, जैसे:- किताबें, पत्रिकाएं, समाचार-पत्र, इत्यादि। यह सभी अधिकतर पेपर पर उपलब्ध होते हैं। जिन्हें हम साधारण बोलचाल की भाषा में पेपर कंटेंट कह सकते हैं। इसके विपरीत यही सामग्रियां यदि हमारे पास डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध हो तो उन्हें हम E-Content (ई-सामग्री) कहते हैं। उदाहरण के लिए हम E-Book, E-Magazine, E-Newspaper को देख सकते हैं।


E-Content (ई-सामग्री) की उपयोगिता:- हमें E-Content में कुछ ऐसे विशिष्ट विशेषताएं उपलब्ध होती है जिससे इसका महत्व एवं उपयोगिता बहुत अधिक बढ़ जाता है। जिन्हें हम निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं-

  1. E-Content की विशेषता इसका अद्यतन (Updated) होना है। समान्यत: देखा जाता है कि बाजार में उपलब्ध पुस्तकें एक वर्ष या उससे पुरानी होती है। अद्यतन सामग्री का प्रायः उसमें अभाव दिखता है। वही E-Content को हम समय-समय पर अद्यतन प्रक्रिया के द्वारा उसमें जुड़ी जानकारियों को बढ़ा एवं घटा सकते हैं।                Definition of updated:- Made More Modern or up to Date. Eg:- An updated bathroom and Kitchen.
  2. E-Content की दूसरी विशेषता यह होती है कि इसमें हमें रंगीन चित्र, ऑडियो, वीडियो, ग्राफ, इत्यादि। का समावेशन आसानी से हो जाता है जो कि अध्ययन सामग्री को और जीवंत बना देता है। जबकि पेपर कंटेट में बहुत ही कम किताबे ऐसी होती है जिसमें रंगीन चित्र, चार्ट, इत्यादि का समावेश हो। दरअसल ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि इसकी वजह से किताबों के दाम में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है।

कुछ महत्वपूर्ण वेबसाइट एवं वेबपेज जिनकी मदद से आप ई-कंटेन को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।


Shala Darpan


Biswajeetk1


Wikipedia



E-Content


      In the present scenario, the material available with us for study, such as:- books, magazines, newspapers, etc.  All these are mostly available on paper.  Which we can call in simple colloquial language 'Paper Content'.  On the contrary, if these materials are available with us in digital or electronic form, then we call them E-Content.  For example we can see E-Book, E-Magazine, E-Newspaper.



Usability of E-Content:- Some such special features are available in us, E-Content, which increases its importance and usefulness a lot.  Which we try to understand through the following points-


(1) The specialty of e-content is its being updated.  It is generally seen that the books available in the market are one year old or more.  There is often a lack of updated content.  We can increase and decrease the information related to the same E-Content by the process of updating it from time to time.  


Definition of updated:- Made more modern or up to Date.  Eg:- An updated bathroom and kitchen.


(2) The second feature of E-Content is that in this we get color pictures, audio, video, graph, etc.  are easily incorporated which makes the study material more alive.  Whereas there are very few books in paper content in which color pictures, charts, etc. are included.  Actually this does not happen because due to this there is a huge increase in the price of books.



 Some Important Websites and Webpages With the help of which you can get e-content easily.


Shala Darpan


Biswajeetk1


Wikipedia




सोमवार, 15 नवंबर 2021

स्वतन्त्र भारत में भाषा-समस्या (Language Problem in Free India) S-1 D.El.Ed. 2nd Year B.S.E.B. Patna.

  'कोठारी कमीशन' के शब्दों में , "स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से हमारे देश ने जिन समस्याओं का सामना किया, उनमें भाषा की समस्या सबसे अधिक जटिल रही है और अब भी है।"

           स्वतन्त्र भारत में भाषा-समस्या की जटिलता के दो मुख्य कारण रहे हैं और अब भी हैं। पहला कारण यह है कि भारत, बहुभाषी देश है। सन् 1971 की जनगणना के अनुसार भारत में 1,652 मातृभाषाएँ (Mother Tongues) और 380 बोलियाँ (Dialects) हैं, जिनमें से केवल 15 को भारतीय संविधान में स्थान दिया गया है। दूसरा कारण यह है कि देश के शिक्षाविदों एवं राजनीतिज्ञों में किसी सामान्य भाषा के विषय में सदैव मत-विभिन्नता रही है; यथा-

1. महात्मा गाँधी के अनुसार, "जिस राष्ट्र के बच्चे अपनी मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा के द्वारा शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे स्वयं अपनी हत्या करते हैं।" 

2. रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, “हमारे विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी भाषा अपने सम्मानपूर्ण स्थान से अपदस्थ नहीं की जा सकती है।" 

3. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार , "राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी, देश की एकता से अधिक से अधिक से सहायक होगी।" 

4. राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार, 'केवल शिक्षा ही नहीं, वरन् प्रशासन में भी प्रान्तीय भाषाओं को अपना स्थान प्राप्त होना चाहिए।" 

5. जी. रामनाथन के अनुसार, "अहिन्दी क्षेत्रों के व्यक्ति, हिन्दी के प्रसार के सब प्रयासों का विरोध कर रहे हैं।" 

सरकार के द्वारा भाषा-समस्या के समाधान का प्रयास 

(Government Efforts To Solve Language Problem) 

       उपरिलिखित बाधाओं एवं विरोधी विचारों से हतोत्साहित न होकर, भारत सरकार ने भाषा-समस्या का समाधान करने के लिए समय-समय पर जो प्रयास किए हैं, उनका वर्णन अधोलिखित है- 

1. भारतीय संविधान (Constitution of India, 1950)- 15 अगस्त, 1947 को जब भारत ने स्वतन्त्रता प्राप्त की, तब उसके समक्ष अनेक समस्याएँ थीं। इनमें से एक समस्या भाषा की थी। सभी स्वतन्त्र राष्ट्रों की अपनी राजभाषा होती है। अतः स्वतन्त्र भारत की भी राजभाषा होनी आवश्यक थी। यह स्थान एवं सम्मान हिन्दी को प्रदान किया गया। 

       हिन्दी को यह प्रतिष्ठित स्थान अकस्मात् या संयोगवश प्राप्त नहीं हुआ। उसे यह स्थान प्राप्त करने का आधारभूत कारण था- अनेक महान् भारतीयों द्वारा हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के लिए अथक प्रयास किया जाना। इन भारतीयों में सर्वमहान् थे- लोकमान्य तिलक, स्वामी दयानन्द सरस्वती, सुभाषचन्द्र बोस, श्यामाप्रसाद मुकर्जी, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य और सर्वोपरि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी गाँधीजी ने 27 दिसम्बर, 1917 को कलकत्ता में अपने एक भाषण में कहा था- "सर्वप्रथम और सर्वमहान् सेवा जो हम कर सकते हैं, वह हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में राष्ट्रीय स्थान प्रदान करना है।" 

      उल्लिखित महान् भारतीयों के कार्यों और महात्मा गाँधी के विचारों से अनुप्राणित होकर, विधानसभा ने 1950 के भारतीय संविधान की धारा 343 को बिना किसी मत-विभिन्नता के स्वीकार किया। इस धारा में अंकित किया गया था। (i) संघ की भाषा, देवनागरी लिपि में हिन्दी होगी। (ii) संविधान के लागू होने के समय से 5 वर्ष तक संघ के सब राजकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जायेगा।

रविवार, 14 नवंबर 2021

विद्यालय के संगठनात्मक पक्ष, उद्देश्य एवं सिद्धांत. D.El.Ed. 2nd Year S-1 B.S.E.B. Patna.

विद्यालय के संगठनात्मक पक्ष


          विद्यालय के संगठनात्मक पक्ष के अंतर्गत भौतिक एवं मानवीय तत्वों का समावेश होता है। यदि किसी विद्यालय की नींव रखनी हो तो उसके लिए जगह ,वातावरण ,जल, भवन ,फर्नीचर ,शैक्षिक साज-सज्जा, शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों आदि की व्यवस्था करनी होती है। किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमें लक्ष्य को ध्यान में रखकर एक समग्र योजना बनानी पड़ती है तथा उस योजना को छोटे-छोटे पदों में विभक्त कर उसकी प्राप्ति के लिए हम लगातार परिश्रम करते हैं। अंत में , हम अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं। विद्यालय संगठन वह संरचना है जिसमें शिक्षक, छात्र, प्रधानाध्यापक , परीनिरीक्षक तथा अन्य व्यक्ति विद्यालय की क्रियाओं को चलाने के लिए मिलकर कार्य करते हैं एवं निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समस्त उपलब्ध भौतिक एवं मानवीय तत्वों की समुचित इंतजाम करना विद्यालय संगठन का ही कार्य होता है।

        विद्यालय संगठन के अंतर्गत न केवल उचित व्यवस्था ही आती है, बल्कि विभिन्न विद्यालय तत्वों के बीच समन्वय स्थापित करना भी इसमें समाहित है। निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हमें जो भी आवश्यक हो वह कदम विद्यालय के पक्ष में उठाना पड़ता है। जैसे शिक्षकों की कमी की समस्या को हल करना विद्यालय प्रबंधन की समस्या को हल करना विद्यालय का विभागीय समस्या को हल करना विद्यालय तथा समाज के बीच की दूरी को कम करना, विद्यालय प्रबंधन , छात्र एवं शिक्षक के बीच आने वाली सारी समस्याओं का समुचित एवं व्यवस्थित हल ढूंढना इत्यादि।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संगठन एक ऐस साधन है जो शैक्षिक लक्ष्य रूपी साध्य को साधने में हमें ना केवल मदद करता है बल्कि उचित मार्ग दर्शक की भूमिका का भी निर्वहन करता है। संगठन एक ऐसा यंत्र है जिसका विधिवत संचालन करके निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

अतः हम का सकते है कि विद्यालय संगठन बालकों को समाज के लिए अनुकूलित करता है एवं एक बेहतर समाज निर्माण में अपना सर्वोत्तम देने का प्रयास करता है। चूंकि विद्यालय भी समाज का एक छोटा रूप होता है एवं समाज में जो लोग रहते हैं वह भी विद्यालय से कहीं न कही किसी रूप में जुड़े होते हैं। अत:विद्यालय संगठन का दायित्व बढ़ जाता है क्योंकि उसे एक सभ्य समाज का सभ्य नागरिक जो तैयार करना होता है 

विद्यालय संगठन के उद्देश्य 

विद्यालय की स्थापना का मुख्य उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। इसलिए विद्यालय संगठन का उद्देश्य भी इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सक्रिय योग प्रदान करना होना चाहिए। विद्यालय संगठन का उद्देश्य बालकों को ऐसे अवसर प्रदान करना है , जिसमें उनकी समस्त जन्मजात शक्तियों का सामंजस्य पूर्ण विकास संभव हो सके एवं उनकी मूल प्रवृत्तियों का उपयोग तथा रुचियां का स्वास्थ्य प्रकाशन एवं परिष्करण हो सके । बालक के संपूर्ण व्यक्तित्व का संतुलित विकास करने की दृष्टि से विद्यालय संगठन का उद्देश्य - उसके शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक एवं सामाजिक गुणों का विकास करते हुए उसे एक इस योग्य बनाना है कि वह भावी जीवन में अपने दायित्वों का निर्वाह सफलतापूर्वक एवं सच्चाई के साथ कर सके।

अत: स्पष्ट है कि विद्यालय का संगठन बालक की विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए। समाज अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विद्यालय की स्थापना करता है विद्यालय मानव जाति की अनुपम उपलब्धियों को समझो कर रखता है तथा उन्हें भावी संतति को विरासत के रूप में प्रदान करता है। इस प्रकार विद्यालय संगठन का उद्देश्य बालकों को इस प्रकार से शिक्षित करना है कि वे समाज के आदर्शों मान्यताओं विश्वासों एवं मूल्यों की रक्षा कर सकें।

विद्यालय संगठन के सिद्धांत

1. बाल केंद्रित (Child Centred) 

विद्यालय का मुख्य उद्देश्य बालक का सर्वोन्मुखी विकास करना है। इस दृष्टि से संगठन बाल केंद्रित होना चाहिए। यह संगठन ऐसा हो जिसके द्वारा बालकों की विभिन्न योग्यताओं ,अभिरुचियो , शक्तियों, संवेगों एवं मूल- प्रवृत्तियों को स्वास्थ् दिशा में विकसित किया जा सके। संगठन द्वारा विद्यालय में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाना चाहिए जिसमें बालक शारीरिक, मानसिक , सामाजिक एवं चारित्रिक गुणों को सरलता से प्राप्त कर सके। विद्यालय की विभिन्न क्रियाओं को , उनके विकास की प्रकृति एवं गति ,उनकी व्यक्तिक विभिन्नताओ ,उनके पूर्व अनुभवो तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को दृष्टिगत रखकर व्यवस्थित की जानी चाहिए । ऐसा करके प्रत्येक बालक को अपना सर्वोत्तम विकास करने के लिए उपयुक्त सुविधाएं प्रदान की जा सकेगी ।

2. समाज केन्द्रित (Society Centred)- 

संगठन बाल केंद्रित होने के साथ-साथ समाज केंद्रित भी होना चाहिए, क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य बालकों को समाज का एक सक्रिय, उपयोगी एवं कुशल सदस्य बनाना है । संगठन से बालकों के विकास संबंधी क्रियाओं के आयोजन के साथ-साथ समाज की प्रगति हेतु उचित व्यवस्था का होना भी परम आवश्यक है । संगठन के द्वारा समाज में गत्यात्मक उद्देश्य को भी अभिव्यक्त किया जाना चाहिए ,जिसमें समाज भावी प्रगति की ओर अग्रसर हो सके। अत: विद्यालय संगठन बालक की विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भी समाज के आदर्शों, आकांक्षाओ,आवश्यकताओ, मूल्यों, संस्कृति आदि पर आधारित होना चाहिए।

3. लोकतंत्रीय सिद्धांत (Democratic Principle)- 

जनतंत्र की सफलता हमारे विद्यालयों पर ही निर्भर है। यह विद्यालय ही है जो जनतंत्र के स्तंभों अर्थात भावी नागरिकों का निर्माण करते हैं। बालकों में आदर्श नागरिकों की गुणों का विकास विद्यालय की व्यवस्था, क्रियाकलापों एवं परंपराओं के माध्यम से किया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि विद्यालय का संगठन लोकतंत्र के सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं के अनुसार हो।

4. लोच का सिद्धांत (Principle of Flexibility) -

मानव - प्रकृति एवं समाज तथा उसकी आवश्यकताएं परिवर्तनशील है जब विद्यालय का लक्ष्य बालक एवं समाज का उचित दिशा में विकास करना है तो उनकी बदलती हुई आवश्यकताओं के अनुकूल विद्यालय संगठन में समय-समय पर परिवर्तन होना भी नितांत आवश्यक है। अतः विद्यालय संगठन में लोच अथवा परिवर्तनशीलता का गुण होना चाहिए। यदि संगठन में दृढ़ता एवं एकरूपता आ गई तो यह बालक एवं स्थानीय समाज की मांगों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहेगा।

शनिवार, 13 नवंबर 2021

शिक्षा, विद्यालय तथा समुदाय से अपेक्षाएँ एवं समकालीन बदलाव तथा प्रभाव (Expectations of Education, Schools and Community and Contemporary Changes and Effects) D.El.Ed.2nd Year S-1 Unit-4 B.S.E.B. Patna.

        शिक्षा एक पीढ़ी द्वारा अर्जित अनुभव, ज्ञान, कौशल दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम है। शिक्षा सतत् रूप से चलने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के स्वाभाविक और सामंजस्यपूर्ण विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। व्यक्ति की वैयक्तिक का पूर्ण विकास करती है। उसे आस-पास के वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने में मदद प्रदान करती है और सफल जीवन एवं सभ्य नागरिक के कर्त्तव्यों एवं दायित्वों के लिए तैयार करती है। साथ ही उसके व्यवहार विचार और दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन करती है जो देश, समाज एवं विश्व के लिए हितकर होता है। संक्षेप में, शिक्षा बालकों में अन्तर्निहित शक्तियों के प्रस्फुटन एवं विकसित होने में सहायता करती है। शिक्षा से समाज की निम्नलिखित अपेक्षाएँ हैं-

        एक व्यक्ति के रूप में शिक्षा से हमारी यह अपेक्षा होती है कि वह बालक के सर्वांगीण विकास में सहायक हो, व्यक्ति शिक्षित होकर अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हो सके, बालकों की जन्मजात प्रवृत्तियों का समायोजित विकास हो और व्यक्ति स्वयं अपनी जीविका कमाने हेतु तैयार हो सके । शिक्षा से यह अपेक्षा की जाती है कि इसके द्वारा व्यक्ति का नैतिक विकास एवं उत्तरदायित्व की भावना का विकास हो, व्यक्ति को आत्मनिर्भर एवं आत्मविश्वासी बनाकर उसके उत्तम चरित्र का निर्माण करना, व्यक्ति में व्यावसायिक कुशलता का विकास करना, व्यक्ति के अन्दर यह क्षमता विकसित करना कि वह या तो वातावरण के अनुसार स्वयं को अनुकूलित कर ले या वातावरण को स्वयं के अनुसार परिवर्तित कर दे।

         नई पीढ़ी को समाज की संस्कृति का ज्ञान कराना, समाज की शिक्षा से अपेक्षा है। बालकों को सामाजिक नियमों से परिचित कराकर उसका समाजीकरण करना, सामाजिक समस्याओं को दूर करने की भावना उत्पन् करना, समाज के अनेक विश्वासों तथा धर्मों के विषय में उदार दृष्टिकोण का निर्माण करना, समाज के प्रति निष्ठा की भावना का विकास करना। राष्ट्र को शिक्षा से अपेक्षा होती है कि शिक्षा कुशल और निष्ठावान नागरिकों का निर्माण करे, व्यक्तियों में नेतृत्व के गुणों का विकास करना, युवा व्यावसायिक रूप से दक्ष हों, कुशल कार्यकर्ताओं का निर्माण करना, शिक्षित व्यक्ति राष्ट्र की आय में बढ़ोत्तरी करे, व्यक्तियों में राष्ट्रीय एवं भावात्मक एकता का विकास हो, नागरिकों में कर्तव्यों और अधिकारों को समझ विकसित हो तथा वे उन्हें निभाने हेतु तत्पर हो

       अंतर्राष्ट्रीय समुदाय शिक्षा से यह अपेक्षा करता है कि वह व्यक्तियों में मानवीय गुणों/मूल्यों का विकास करें, व्यक्तियों में शांति की भावना विकसित करें जिससे कि वह जहाँ भी रहे वहाँ पर शांति की संस्कृति का निर्माण कर सके, व्यक्तियों में विश्व बंधुत्व की भावना/सह अस्तित्व की भावना का विकास हो, व्यक्तियों में पर्यावरण सम्बन्धी जागरूकता हो तथा वे पर्यावरण मैत्री व्यवहार करें।

       वास्तव में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो न केवल देश के आदर्शों एवं मान्यताओं के अनुकूल हो बल्कि परिवर्तित एवं विकसित परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुकूल भी हो। क्योंकि शिक्षा का कार्य केवल संस्कृति या समाज का रक्षण ही नहीं है। शिक्षा यदि रूढ़िवादी और स्थिर होने से बचना चाहती है तो उसे समाज के संगठनों और संस्थाओं के कार्यों और गतिविधियों की पूरक एवं समाज और संस्कृति के विकास में सहायक भी होना चाहिए। शिक्षा से अपेक्षाओं को निचोड़ रूप में देखा जाए तो इस सम्बन्ध में अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग 21वीं शताब्दी की रिपोर्ट जो 1996 में प्रकाशित हुई, उसमें शिक्षा के चार स्तम्भ माने गए हैं- 

1. जानने के लिए सीखना 

        वास्तव में ज्ञान शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण भाग है हमारे चारों ओर के परिवेश में बहुत सी वस्तुएँ हैं, जिनको जानना आवश्यक है। इस सबकी जानकारी मनुष्य को सन्तुष्टि भी प्रदान करता है। ज्ञान प्राप्ति एक प्रकार के आन्तरिक आनन्द को जन्म देती है। यही नहीं, यह ज्ञान ही है जो मानव सभ्यता के विकास का आधार है। परन्तु प्रश्न यह उठता है कि सीखा कैसे जाए? शिक्षा का यह स्तम्भ 'Learning to Know' इसी बात से सम्बन्ध रखता है। रिपोर्ट में इसके लिए निम्नलिखित बातों पर बल दिया है- 

(1) व्यक्ति में निरीक्षण शक्ति का विकास किया जाए। 

(2) व्यक्ति में एकाग्रता विकसित की जाए। ध्यान की एकाग्रता के बिना ज्ञानार्जन असम्भव है। 

(3) स्मरण-शक्ति का विकास किया जाए। इसके लिए पुराने चले आ रहे परम्परागत तरीकों को अपनाया जा सकता है। 

(4) चिन्तन और तर्क-शक्ति दोनों का विकास किया जाए। तर्क आगमन व निगमन दोनों प्रकार का हो सकता है। लेकिन कब किस तरह के तर्क द्वारा ज्ञान प्राप्त करना है, इनका निर्धारण विषय-वस्तु की प्रकृति के अनुसार किया जाना चाहिए।

       जब व्यक्ति में इन योग्यताओं का विकास हो जाता है तो वह यह सीख जाता है कि कैसे सीखा जाए? आयोग ने शिक्षा के इस स्तम्भ में विज्ञान शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध करवाने पर भी बल दिया है, क्योंकि इससे व्यक्ति की उपर्युक्त क्षमताओं के विकास में भी सहायता मिलती है। 

2. करने के लिए सीखना 

       शिक्षा के पहले स्तम्भ का सम्बन्ध यदि 'ज्ञान' के साथ है तो इस स्तम्भ का 'क्रिया' के साथ यह व्यक्ति में अनेक कौशलों से जुड़ा है। रिपोर्ट में इस स्तम्भ के अन्तर्गत निम्नलिखित बिन्दुओं पर बल दिया गया है- 

(i) शिक्षा द्वारा व्यक्ति में ऐसे कौशलों का विकास किया जाए, जिससे वह निश्चित भविष्य Certain Future के लिए तैयार हो सके।

(ii) शिक्षा व्यक्ति में ऐसी योग्यता विकसित करे, जिससे वह सैद्धान्तिक और व्यावहारिक ज्ञान में समन्वय कर सके।

(iii) शिक्षा उसे सृजनात्मक बनाए। 

(iv) यह उसमें समस्या समाधान, निर्णय लेने एवं नवीनतम सामूहिक कौशलों का विकास करे। 

(v) यह उसमें ऐसी क्षमता का विकास करे, जिससे वह चाहे कहीं नौकरी कर रहा हो या किसी व्यवसाय से जुड़ा हो, किये जाने वाले कार्य को अधिक दक्षता के साथ कर सके।

(vi) शिक्षा द्वारा उसमें सामाजिक कौशलों का विकास भी किया जाए। 

         इस तरह यह स्तम्भ विद्यार्थियों में श्रम के प्रति निष्ठा पैदा करने, प्रत्येक कार्य को दक्षता के साथ करने, उसे अनिश्चित भविष्य में सफलतापूर्वक कार्य करने में सक्षम बनाने और उसमें वैयक्तिक व सामाजिक कौशलों का विकास करने के साथ सम्बन्ध रखता है। 

3. साथ रहने के लिए सीखना 

       शिक्षा के इस स्तम्भ के अन्तर्गत आयोग ने यह चर्चा की है कि इस सदी में व्यक्तियों में हिंसक एवं आत्मघाती प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं और सूचना और संचार माध्यम इस प्रकार की घटनाओं को समाज के समक्ष बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। इससे आपसी संघर्ष बढ़े हैं। शिक्षा का यह स्तम्भ इसी विषय से सम्बन्ध रखता है कि कैसे लोगों को मिल-जुलकर साथ रहना सिखाया जाए? इस सन्दर्भ में रिपोर्ट में निम्न बिन्दुओं पर बल दिया गया है-

(i) आजीवन शिक्षा के अन्तर्गत समान परियोजनाओं में लोगों की संलिप्तता को बढ़ाया जाए। इससे परस्पर झगड़ों को रोकने में सहायता मिलेगी। 

(ii) विद्यार्थियों को मानवीय विविधताओं की जानकारी देने के साथ-साथ उन बातों की भी जानकारी दी जाए जो सबमें समान रूप से पाई जाती हैं। उन्हें यह भी समझाया जाए कि हम सभी इस तरह किसी न किसी रूप में एक-दूसरे पर निर्भर हैं। 

(iii) विद्यार्थियों को मानव भूगोल, विदेशी भाषाओं व साहित्य की शिक्षा दी जाए। 

(iv) विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाए कि वे विश्व को दूसरों के नजरिए से देखें। इससे परस्पर सद्भावना को बढ़ावा मिलेगा। 

(v) विद्यार्थियों को परस्पर बातचीत और परिचर्चा के लिए उपयुक्त मंच उपलब्ध करवाया जाए। 

(vi) उनमें यह बोध उत्पन्न किया जाए कि विभिन्न क्षेत्रों में अधिकतम सफलता प्राप्त करने हेतु मिल-जुलकर काम करना आवश्यक है। 

(vii) विद्यार्थियों को प्रारम्भ से ही खेल-कूद तथा सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। 

(viii) शिक्षा संस्थाओं में अध्यापक एवं विद्यार्थी सभी मिलकर समान परियोजनाओं पर कार्य करें।

       इस तरह ये विभिन्न गतिविधियाँ विद्यार्थियों को साथ मिलकर रहना सिखाएगी जो कि वर्तमान शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। 

4. अस्तित्व के लिए सीखना

         1972 में प्रस्तुत अन्तर्राष्ट्रीय आयोग की प्रस्तावना में कहा गया है कि तकनीकी विकास के कारण विश्व में मानवता की भावना लुप्त हो जाएगी। यदि प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताओं का पूर्ण विकास होता है तो इस खतरे से बचा जा सकता है। अतः आयोग के अनुसार शिक्षा को चाहिए कि वह व्यक्ति को अपने अस्तित्व हेतु प्रशिक्षण दे।

दूसरे शब्दों में, उसके व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करे। इस सन्दर्भ में आयोग ने निम्नलिखित बातों पर जोर दिया है- 

(i) शिक्षा का आधारभूत सिद्धान्त यह है कि यह व्यक्ति का पूर्ण विकास करे। दूसरे शब्दों में, उसका शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक, सौन्दर्य-बोधात्मक और आध्यात्मिक विकास करे ताकि वह एक पूर्ण मानव बन सके। 

(ii) शिक्षा व्यक्ति में स्वतन्त्र एवं आलोचनात्मक तरीके से चिन्तन करने तथा अपने निर्णय स्वयं लेने की योग्यता का विकास करे। 

(iii) शिक्षा उसे इस रूप में तैयार करे कि वह एक व्यक्ति, एक परिवार व समाज के सदस्य, एक भविष्य के सृजनशील स्वप्न द्रष्टा एवं नवीन तकनीकों के जन्मदाता के रूप में अपने व्यक्तित्व को विकसित कर सके। 

(iv) शिक्षा उसे अपनी समस्याओं का स्वयं समाधान करने एवं अपनी जिम्मेदारियों का स्वयं निर्वाह करने के योग्य बनाए। 

(v) शिक्षा यह भी सुनिश्चित करे कि प्रत्येक व्यक्ति विचारों, भावनाओं, कल्पना एवं निर्णय के सन्दर्भ में स्वतन्त्र हो और अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास कर सके। 

उपरोक्त चारों स्तम्भ ही आधुनिक समय में शिक्षा से मूलभूत अपेक्षाएँ हैं। 

        किसी भी राष्ट्र की प्रगति में विद्यालय का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। विद्यालय को सामाजिक परिवर्तन का आधार व पुनर्निर्माण के अभिकर्ता के रूप में देखा जाता है। पहले विद्यालयों में बच्चों पर ज्ञान थोपा जाता था। वे शिक्षा को जन्मधुट्टी की भाँति रट कर पी जाते थे परंतु आज माहौल बदल गया है। बच्चों की जिज्ञासा, मौलिकता एवं सृजनात्मकता को महत्त्व दिया जा रहा है जिससे बच्चे ज्ञान का सृजन स्वयं कर रहे हैं। विद्यालय बच्चों की स्वतन्त्रता का हनन करने का स्थल न हो बल्कि उसका वातावरण इस प्रकार निर्मित हो कि बच्चे स्वयं खिंचे चले आयें। उन्मुक्त पक्षी की तरह बच्चे स्वतन्त्र विचरण करें। विद्यालय की हर गतिविधि में उनके सीखने एवं ज्ञान को अर्जित करने की जगह हो विद्यालय से समाज की अधिक अपेक्षाएँ होती है वह विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों में मानवीय मूल्यों की झलक देखना चाहता है और उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाना चाहता है। 

       समाज द्वारा अपनी भावी पीढ़ी को शिक्षित करने हेतु शिक्षा संस्थाओं/विद्यालयों की स्थापना की जाती है। कुछ संस्थाएँ सरकार द्वारा स्थापित की जाती हैं। कुछ विभिन्न संगठनों, संस्थाओं तथा व्यक्तियों द्वारा स्थापित की जाती हैं। विद्यालय की समुदाय से सबसे बड़ी अपेक्षा यह होती है कि वे अपने बच्चों का विद्यालय में दाखिला करवाएँ एवं उनको नियमित रूप से विद्यालय भेजें। शिक्षक अभिभावक बैठकों में अनिवार्य रूप से शामिल होकर अपने बच्चों की शैक्षिक प्रगति को जानकर आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन करें। बाल मेला, विज्ञान मेला तथा गणित मेला आदि अनेक कार्यक्रमों में सहभागिता करें। विद्यालय के वार्षिक समारोह एवं वार्षिक खेलकूद कार्यक्रम में शामिल होकर अपने बालक-बालिकाओं को उत्सावर्द्धन करें। विद्यालय से सम्बन्धित सभी समितियों में शामिल विभिन्न समुदाय के लोगों से यह अपेक्षा होती है कि वह इन समितियों में निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय साझेदारी करते हुए जिम्मेदारियों का निर्वहन सही ढंग से करें। विशेष रूप से माता समिति से जुड़ी महिलाओं को जिम्मेदारी है कि वह भी सक्रिय रूप से विद्यालय जीवन में अपना सहयोग करें। शिक्षा समिति से सम्बन्धित लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह गुणवत्तापूर्ण पौष्टिक भोजन बालक-बालिकाओं हेतु बनवाएँ। 

       इस बात से आप सहमत होंगे कि शिक्षा से अपेक्षाएँ समय के साथ बदलती रही हैं। समाज ने सदैव अपनी वर्तमान आवश्यकताओं/माँगों एवं जीवन दर्शन के आधार पर शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित किए हैं। प्राचीन काल के वैदिक समाज ने गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ऐसे लोगों को तैयार करने की जिम्मेदारी शिक्षा को सौंपी थी जिनमें धार्मिकता का समावेश हो। उस समय धर्म पर अत्यधिक बल था। व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थाओं का अभाव था।

सोमवार, 8 नवंबर 2021

भारतीय शिक्षा में समुदाय की भूमिका (Role of Community in Indian Education) S-1 D.El.Ed. 2nd Year Unit-4. B.S.E.B. Patna.

       शिक्षा पर भारतीय समुदाय का प्रभाव अप्रत्यक्ष है। इस लेख में हम शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर इस प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं:- 

(1) शिक्षा की सार्वभौमिक माँग (Universal Demand for Education)- हुमायूँ कबीर के अनुसार, भारत में शिक्षा की सार्वभौमिक माँग की गयी है। कुछ देशों ने विद्यालयों में बालक की उपस्थिति अनिवार्य मानी है। भारत में ऐसी आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अभी तक इस बात पर बल दिया गया था कि जो बच्चे पढ़ना चाहते हों, उनके लिए स्कूल हों। 

(2) प्रारम्भिक व पूर्व-प्रारम्भिक शिक्षा का विकास (Development of Primary and Pre-Primary Education)- प्रारम्भिक और पूर्व-प्रारम्भिक शिक्षा के विकास में समुदाय का बहुत हाथ रहा है। यद्यपि प्रारम्भिक शिक्षा का दायित्व सरकार पर है, फिर भी इसके विकास में गैर-सरकारी संस्थाओं ने बहुत काम किया है। सरकार इस काम का पूरा भार धीरे-धीरे अपने ऊपर लेती जा रही है। पर पूर्व-प्रारम्भिक शिक्षा का भार और विकास अभी तक गैर-सरकारी हाथों में ही है।

(3) माध्यमिक शिक्षा का विकास (Development of Secondary Education) माध्यमिक शिक्षा के विकास में समुदाय का प्रभाव बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। यह कहना उचित ही होगा कि देश में जितने भी मिडिल और सेकण्डरी स्कूल कार्य कर रहे हैं, उनमें से अधिकांश की स्थापना और संचालन का श्रेय समुदाय को है। इस प्रकार, माध्यमिक शिक्षा के विकास में समुदाय का प्रभाव शक्तिशाली रहा है। 

(4) उच्च शिक्षा का विकास (Development of Higher Education)- उच्च शिक्षा के विकास में भारतीय समुदाय ने पर्याप्त योगदान दिया है। यद्यपि अंग्रेजों के समय में विश्वविद्यालयों की स्थापना सरकार द्वारा की जाती थी, उच्च शिक्षा, विशेष स्थानों और समुदायों की आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं करती थी। अतः इसकी ओर उनता का ध्यान न जाना स्वाभाविक ही था। परन्तु महाविद्यालयों की स्थापना में जनता का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अधिकांश महाविद्यालय समुदायों द्वारा ही स्थापित किये गये हैं। 

विद्यालय व समुदाय का सम्बन्ध 

(Relationship Between School and Community) 

       विद्यालय तथा समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये दोनों अपनी-अपनी उन्नति एवं स्थायित्व के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं। विद्यालय एक सामाजिक संस्था है। समाज स्वयं को जीवित रखने के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करता है जिनके द्वारा समाज के विचारों, मान्यताओं, आदर्शों, क्रियाकलापों, मानदण्डों तथा परम्पराओं को आने वाली सन्तति को प्रदान किया जा सके। विद्यालय, समुदाय के जीवन एवं उसकी प्रगति पर बहुत प्रभाव डालता है। विद्यालय अपने विचारों एवं कार्यों द्वारा समुदाय का पथ प्रदर्शन करके उसे प्रगति की ओर ले जाता है। समुदाय विद्यालय को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का प्राथमिक ज्ञान प्रदान करता है। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे को सहायता प्रदान करते रहते हैं। इन दोनों की घनिष्ठता को स्पष्ट करते हुए हुमायूँ कबीर ने लिखा है– "विद्यालय, समुदाय के जीवन का प्रतिबिम्ब है और उसे ऐसा होना ही चाहिए। अतः भारत में सार्वजनिक विद्यालयों को भारतीय जीवन के ढाँचे के अधिक निकट लाया जाना चाहिए।"

बालक की शिक्षा में समुदाय का महत्त्व (Importance of Community in Child's Education) D.El.Ed.2nd Year S-1 Unit - 4. B.S.E.B. Patna.

      विद्यालय या परिवार के समान समुदाय भी व्यक्ति के व्यवहार में इस प्रकार रूपान्तर करता है, जिससे वह समूह के कार्यों में सक्रिय भाग ले सके, जिसका कि वह सदस्य है। हम प्रायः सुनते हैं कि बालक वैसा ही बनता है, जैसा कि समुदाय के बड़े लोग उसको बनाते हैं। सत्य है कि समुदाय बालक के व्यक्तित्व के विकास पर बहुत प्रभाव डालता है। वास्तव में, समुदाय बालक की शिक्षा को प्रारम्भ से ही प्रभावित करता है। बालक का विकास न केवल घर के संकुचित वातावरण में, वरन् समुदाय के विस्तृत वातावरण में ही होता है। समुदाय अप्रत्यक्ष, किन्तु प्रभावपूर्ण ढंग से बालक की आदतों, विचारों और स्वभाव को मोड़ता है। उनकी संस्कृति, रहन-सहन, बोलचाल आदि अनेक बातों पर उसके समुदाय की छाप होती है। समुदाय का वातावरण बालक की अनुसरण की जन्मजात प्रवृत्ति पर विशेष प्रभाव डालता है। वह उन व्यक्तियों के ढ़ंगों का अनुसरण करता है, जिनको वह देखता है, उदाहरणार्थ- यदि वह संगीतज्ञों के साथ रहता है, तो उनकी संगीत-कुशलता से प्रभावित होता है और उसमें संगीत के लिए रुचि उत्पन्न होती है। 

        बच्चे अपने समुदाय के ढंग को अपनाते हैं। इसलिए उनकी बोल-चाल, दृष्टिकोण और व्यवहार में अन्तर होता है। अतः यह कहना अनुचित न होगा कि परिवार और विद्यालय के समान समुदाय भी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण साधन है। विलियम ईगर (William E. Yeager) का कथन है- "क्योंकि मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसने वर्षों के अनुभव से सीख लिया है कि व्यक्तिगत और सामूहिक क्रियाओं का विकास समुदाय द्वारा ही सर्वोत्तम रूप से किया जा सकता है।" 

बालक पर समुदाय के शैक्षिक प्रभाव 

(Educative Influences of Community in Child) 

1. सामाजिक प्रभाव (Social Influence)- बालक पर समुदाय का सीधा सामाजिक प्रभाव पड़ता है। समुदाय ही उसकी सभ्यता और सामाजिक प्रगति का मुख्य आधार है। बालक अनौपचारिक रूप से देखता है कि सभी व्यक्ति अपने समुदाय की उन्नति के लिए कार्य करते हैं और यदि उनमें से कुछ ऐसा नहीं करते हैं, तो समुदाय की प्रगति रुक जाती है। समुदाय में समय-समय पर मेले, उत्सव, सामाजिक सम्मेलन, धार्मिक कार्य आदि होते हैं। बालक इनमें भाग लेकर सामाजिक जीवन और सामाजिक सेवा का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करता है। समुदाय में रहकर ही बालक अधिकार और स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ समझता है। यह जान जाता है कि अधिकारों के साथ कर्त्तव्य और स्वतन्त्रता के साथ अनुशासन आवश्यक है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि समुदाय, व्यक्ति में नागरिक गुणों का विकास करता है और सेवा, त्याग और सहयोग की भावनाएँ उत्पन्न करता है। 

2. राजनीतिक प्रभाव (Political Influence)- समुदाय का राजनीतिक प्रभाव बालक के राजनीतिक विचारों को निश्चित रूप देता है, उदाहरणार्थ- अमरीका के निवासी लोकतन्त्रीय विचारों और आदशों का समर्थन करते हैं और रूस के लोग साम्यवादी विचारों और सिद्धान्तों को पसन्द करते हैं। दोनों देशों के निवासी एक-दूसरे के घोर विरोधी हैं।

       एक-दूसरे प्रकार के राजनीतिक प्रभाव के बारे में क्रो व क्रो (Crow and Crow) ने लिखा है- “समुदाय की राजनीतिक विचारधारा उस सीमा तक प्रतिविम्बित होती है, जहाँ तक उसके सदस्यों को शैक्षिक अवसर प्रदान किये जाते हैं और उसके राजनीतिक नेता नागरिकों की शैक्षिक प्रगति के लिए उत्तरदायित्व ग्रहण करते हैं।" 

3. आर्थिक प्रभाव (Economic Influence)- समुदाय का आर्थिक प्रभाव उद्योगों और व्यवसायों में दिखाई देता है। बालक अपने समुदाय के व्यक्तियों को विभिन्न व्यवसायों में लगा हुआ देखता है। फलतः उनमें से किसी में उसकी रुचि उत्पन्न होती है और वह उसे सीखने के लिए उत्सुक हो जाता है। कभी-कभी वह अपने माता-पिता या सम्बन्धियों को उनके व्यवसाय में सहायता कर देता है। आज भी ग्रामीण समुदाय में यह बात देखी जाती है। वहाँ बालक कृषि, बढ़ईगीरी या समुदाय के लिए और कोई हितकर कार्य करता है। यदि वह कोई ऐसा व्यवसाय करता है, जो समुदाय नहीं चाहता है, तो उसे समुदाय से निकाल दिया जाता है। वह उसका सदस्य फिर तभी हो पाता है जब वह उस व्यवसाय को छोड़ देता है और समुदाय द्वारा दिये गये दण्ड को स्वीकार करता है। आज भी भारतीय समाज में यह बात पायी जाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समुदाय बालक को व्यवसाय के चुनने में प्रभावित करता है। 

4. सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural Influence)- प्रत्येक समुदाय की अपनी संस्कृति होती है। यह अपने सदस्यों पर उसको छाप लगाने और उनको उससे पूर्ण रूप से परिचित कराने का प्रयास करता है। बालक अपने से बड़े लोगों को अपनी संस्कृति का सम्मान और संरक्षण करते हुए देखता है अतः वह स्वयं भी वैसा ही करने लगता है। हम व्यक्तियों की भाषा पर समुदाय के प्रभाव को अच्छी तरह जानते हैं। बालक समुदाय में अनजाने ही बोलचाल, भाषा और शब्दावली का ज्ञान प्राप्त करता है। यही कारण है कि एक समुदाय के लोग, दूसरे समुदाय के व्यक्तियों से बोलचाल, भाषा और उच्चारण में भिन्न होते हैं। आप इस अन्तर को ग्रामीण और शहरी समुदाय के बच्चों में सरलतापूर्वक देख सकते हैं। 

      जब बालक समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक उत्सवों को देखता है, तब वह उनका अनुसरण करने का प्रयत्न करता है। फलतः उसमें अपने समुदाय की संस्कृति और धर्म के लिए एक विशेष प्रकार की भावना का विकास होता है। अतः जब बालक पहली बार विद्यालय में आता है। तब उसमें भाषा, धर्म और नैतिकता को कुछ विशेषताएँ उसकी संस्कृति को बताती हैं। 

5. साम्प्रदायिक प्रभाव (Cultural Influence)- समुदाय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव का शैक्षिक महत्त्व तो है ही, पर समुदाय का शैक्षिक प्रभाव भी कम महत्त्व नहीं रखता है। यह प्रभाव समुदाय के विद्यालयों द्वारा डाला जाता है। बहुत से समुदाय अपनी शिक्षा संस्थाएँ स्थापित करते हैं। इन संस्थाओं के अपने स्वयं के लक्ष्य और उद्देश्य होते हैं। वे इनके अनुसार बालकों को अपने समुदार्थों की सेवा और कल्याण के लिए प्रशिक्षित करते हैं। 

        परन्तु सम्प्रदायिक स्कूल (Communal School) बड़ा घातक प्रभाव डालते हैं। वे बालकों में संकुचित दृष्टिकोण और संकीर्ण साम्प्रदायिक भावना उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार के विभिन्न समुदायों में एक-दूसरे के लिए घृणा का बीज बोते हैं। अतः साम्प्रदायिक स्कूल देश के लिए अभिशाप हैं। 

        इस प्रकार हम देखते हैं कि बालक के व्यक्तित्व पर समुदाय का शैक्षिक प्रभाव बहुत ही शक्तिशाली होता है। जब यह प्रभाव ठीक प्रकार का होगा, तभी बच्चों के दृष्टिकोण ठीक होंगे, अन्यथा नहीं।

समुदाय का अर्थ व परिभाषा (Meaning and Definition of Community) S-1 D.El.Ed. 2nd Year B.S.E.B. Patna.

  समुदाय का अर्थ 

(Meaning of Community)  

        समुदाय का अंग्रेजी रूपान्तर "Community" दो शब्दों से मिलकर बना है- 'Com' और 'Munis' यहां 'Com' का अर्थ है- “Together" अर्थात् "एक साथ" और 'Munis' का अर्थ है- "To serve" अर्थात् "सेवा करना" । इस प्रकार, 'Community' शब्द का अर्थ है- 'To serve together' अर्थात् 'मिलकर सेवा करना' । दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं 'समुदाय' व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है, जो मिलकर एक साथ रहते हैं और एक-दूसरे की सेवा-सहायता करते हुए अपने अधिकारों का उपयोग करते हैं। 

      समुदाय, मनुष्यों का 'स्थायी और स्थानीय' समूह है जिसके अनेक प्रकार के और समान हित होते हैं। जहाँ कहीं भी व्यक्तियों का एक समूह सामान्य जीवन में भाग लेता है, वहीं हम उसे 'समुदाय' कहते हैं। जहाँ कहीं भी व्यक्ति निवास करते हैं, वहीं वे कुछ सामान्य विशेषताओं को विकसित करते हैं। उनके ढंग, व्यवहार, परम्पराएँ, बोलने की विधि, इत्यादि। एक से हो जाते हैं। ये सभी बातें सामान्य जीवन की प्रभावपूर्ण प्रतीत होते हैं। 

      वास्तव में, 'समुदाय' अति विस्तृत और व्यापक शब्द है और इसमें विभिन्न प्रकार के सामाजिक समूहों का समावेश हो जाता है। उदाहरणार्थ- परिवार, धार्मिक संघ, जाति, उपजाति, पड़ौस, नगर एवं राष्ट्र समुदाय के विभिन्न रूप हैं। 

      सभ्यता की प्रगति और उसके फलस्वरूप संसार के लोगों की एक-दूसरे पर अधिक निर्भरता हो जाने के कारण समुदाय की धारणा विस्तृत हो गयी है। धीरे-धीरे अतीत के छोटे और आत्म निर्भर ग्रामीण समुदाय का स्थान विश्व समुदाय लेता जा रहा है। इस बड़े समुदाय के लोग समान आदर्शों, रुचियों और आवागमन तथा सन्देश के तेज साधनों के कारण अधिक पास आते जा रहे हैं। 

      अब भी हम अपने नगर या कस्बे को अपना स्थानीय समुदाय कहते हैं। पर हमारे सम्बन्ध अपने देश और विदेश के लोगों से भी होते हैं। फलस्वरूप, हम राज्य समुदाय, राष्ट्रीय समुदाय और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के भी सदस्य होते  यह क्षेत्र या घेरा सदस्य होते हैं। इस प्रकार समुदाय में एक वर्ग मील से कम का क्षेत्र भी हो सकता है या उसका घेरा विश्व भी हो सकता है। यह क्षेत्र या घेरा इस बात पर निर्भर करता है कि इसके सदस्यों में आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक समानताएं हो।

समुदाय की परिभाषा 

(Definition of Community)

       हम यहां लेख में समुदाय के अर्थ को और भी अधिक स्पष्ट करने के लिए कुछ परिभाषाएँ नीचे दे रहे हैं- 

1. गिंसबर्ग के अनुसार, "समुदाय सामान्य जीवन व्यतीत करने वाले सामाजिक प्राणियों का एक समूह समझा जाता है, जिसमें सब प्रकार के असीमित, विविध और जटिल सम्बन्ध होते हैं जो सामान्य जीवन के फलस्वरूप होते हैं या जो उसका निर्माण करते हैं।" 

"By community is to be understood a group of social beings living a common life including all the infinity variety and complexity of relations which result from common life or  constitute it." 

-Ginsberg 

2. मेकाइवर के अनुसार, “जब कभी एक छोटे या बड़े समूह के सदस्य इस प्रकार रहते हैं कि वे इस अथवा उस विशिष्ट उद्देश्य में भाग नहीं लेते हैं, वरन् जीवन की समस्त भौतिक दशाओं में भाग लेते हैं, तब हम ऐसे  समूह को समुदाय कहते हैं।" 

"Whenever the members of any group , small or large live together , in such a way that they share , not this or that particular interest , but the basic conditions of a common life, we call the group a community."

-Maclver 

        समुदाय के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए समाज एवं समुदाय के अन्तर को नीचे स्पष्ट किया जा रहा है। प्रायः इन दोनों शब्दों को समानार्थी रूप में प्रयुक्त किया जाता है। समाज वह संगठन है जिसमें लोग एक साथ मिल-जुलकर रहते हैं। समुदाय शब्द का भी इसी अर्थ में प्रयोग किया जाता है। परन्तु इन दोनों में अन्तर है। 

समाज तथा समुदाय में अन्तर 

(Difference between Society and Community) 

       समाज तथा समुदाय में अन्तर को निम्न तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-


समाज 
  1. समाज एक भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों का समूह है। 
  2. समाज एक प्रकार का समुदाय (समुदाय का एक अंश) है जिसके सदस्य सामाजिक रूप से अपनी जीवन शैली के प्रति सचेत होते हैं और वे सामान्य उद्देश्यों तथा मूल्यों के अनुकूल एकीकृत होते हैं। 
  3. बच्चे समाज के सदस्य तब तक नहीं कहे जाते हैं जब तक वे समाज की जीवन-शैली के प्रति सचेत नहीं हो जाते हैं। इस प्रकार बच्चे समाज के सम्भावित (Potential) सदस्य हैं, न कि पूर्ण सदस्य। अत: बच्चों को असामाजिक समुदाय (Non Social Community) कहा जा सकता है, न कि समाज विरोधी समुदाय।

समुदाय 

  1. समुदाय भी भौगोलिक क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों का एक समूह है। 
  2. समुदाय में व्यक्ति वयस्क तथा बच्चे, सामाजिक एवं असामाजिक निश्चित भूभाग में निवास करते हैं जो एक जीवन-शैली के अनुसार जीवन-यापन करते हैं। परन्तु वे सभी अपने संगठन या अभिप्राय के प्रति सचेत नहीं होते हैं। 
  3. बच्चे समुदाय के सदस्य होते हैं।


सामाजिक परिवर्तन का अर्थ व परिभाषा (Meaning and Definition of Social Change) S-1 Unit-2 D.El.Ed.2nd Year B.S.E.B. Patna.

          समाज की रचना मनुष्य ने की है। समाज का आधार मनुष्य की अन्तःक्रियाएँ (Interactions) हैं। ये अन्तःक्रियाएँ सदैव परिवर्तित होती रहती हैं। इसी कारण हमारा समाज भी परिवर्तित होता रहता है। हम सभी इस सामाजिक परिवर्तन को अनुभव करते हैं। इतना अवश्य है कि कुछ समाज शीघ्रता से परिवर्तित होते हैं और कुछ धीरे-धीरे। परिवर्तन के आधार पर कुछ समाजशास्त्री समाज को दो भागों में विभाजित करते हैं-

  1. स्थायी समाज (Static Society) 
  2. गत्यात्मक समाज (Dynamic Society) 
वे आदिम समाजों को "स्थायी समाज" और आधुनिक समाजों को "गत्यात्मक समाज" मानते हैं। परन्तु इससे यह समझ लेना कि स्थायी समाजों में परिवर्तन नहीं होता, उपयुक्त नहीं है। परिवर्तन प्रत्येक समाज में होता है। परिवर्तन प्रकृति का निश्चित नियम है। परिवर्तन स्थायी समाजों में भी होता है, परन्तु धीरे-धीरे हाँ, इतना अवश्य है कि यह परिवर्तन इतना धीरे-धीरे होता है कि हमको इसका आभास नहीं हो पाता है। 

          सामाजिक परिवर्तन समाज की एक सहज क्रिया है। कुछ समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन के लिए कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो परिवर्तन के ढंग को व्यक्त करते हैं। इन शब्दों की विवेचना निम्न प्रकार है- 

(अ) प्रक्रिया (Process)- प्रक्रिया सतत् होती रहती है और इसका सम्बन्ध उन शक्तियों से होता है जो व्यक्ति और समूह के सम्बन्धों को प्रभावित करती है। इस प्रकार सामाजिक प्रक्रिया का उस परिवर्तन से घनिष्ठ सम्बन्ध है जो सामाजिक संरचना में निरन्तर होता रहता है। समंजन, समीकरण, सहयोग, स्पद्ध, विघटन आदि की प्रक्रियाएँ इस प्रकार के परिवर्तन के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। 

(ब) विकास (Evolution)- यह एक ऐसा परिवर्तन है जो प्रगतिशील होता है। इसमें निरन्तरता तथा आगे बढ़ने की शक्ति होती है। दूसरे शब्दों में, विकास का प्रयोग ऐसे परिवर्तन के लिए किया जाता है जो निरन्तर अग्रगामी हो।

(स) प्रगति (Progress)- सामाजिक प्रगति ऐसे सामाजिक परिवर्तन की परिचायक है जो सामाजिक मूल्यों तथा आदशों की दृष्टि से समाज को आगे बढ़ाता है। यह गुणात्मक परिवर्तन को भी स्पष्ट करती है। 

(द) सुधार (Reform)- प्रत्येक समाज में ऐसी शक्तियाँ होती हैं जो नियोजित रूप से सामाजिक परिवर्तन का प्रयास करती हैं। अत: नियम बनाकर तथा उनका पालन करके समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास सुधार कहा जाता है।  

(य) क्रान्ति (Revolution)- सामाजिक सुधार एक ऐसा परिवर्तन है जो समाज की इच्छा के सहयोग से सम्भव होता है, परन्तु क्रान्ति दो विरोधी सामाजिक शक्तियों के संघर्ष के फलस्वरूप होती है। क्रान्ति द्वारा जो सामाजिक परिवर्तन लाया जाता है उसमें संघर्ष का होना आवश्यक है। बिना संघर्ष और शक्ति के सामाजिक क्रान्ति नहीं होती। क्रान्ति उस समय होती है, जब सामाजिक जीवन में स्थिरता का अभाव हो जाता है और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि सामाजिक जीवन का विधान निष्क्रिय हो जाता है। दूसरे शब्दों में, जब समाज अपने कार्य को उचित रूप से सम्पादित नहीं कर पाता, तब ऐसी शक्तियों का उदय होता है जो बलपूर्वक सामाजिक संरचना में अप्रत्याशित परिवर्तन लाती हैं। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन वह सामाजिक विस्फोट जो सामाजिक निरन्तरता को भंग कर देता है। 

        सामाजिक परिवर्तन में वे परिवर्तन निहित हैं जो समाज के संगठन या उसकी रचना तथा कार्यों में सम्बन्ध रखते हैं। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन में निम्नलिखित परिवर्तनों को स्थान प्राप्त होता है 

1. सामाजिक संरचना में परिवर्तन- समाज के विभिन्न अंग व्यवस्थित ढंग से अन्तः सम्बन्धित रहते हुए जिस ढाँचे या रूपरेखा की रचना करते हैं उसी को सामाजिक संरचना कहते हैं। टॉलकॉट पारसस (Talcott Parsons) के अनुसार, "सामाजिक संरचना परस्पर सम्बन्धित संस्थाओं, एजेन्सियों तथा सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समूह में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण किये गये पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमबद्धता को कहते हैं।" सामाजिक संरचना से सामाजिक स्वरूप का पता चलता है। यह बनावट हर समाज में एक-सी नहीं होती है। अतः इस बनावट में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। 

2. सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन।

3. सामाजिक जीवन के किसी पक्ष में कोई भी परिवर्तन। 

4. समाज के सदस्यों के जीवन में होने वाले परिवर्तन।  

     यहां हम सामाजिक परिवर्तन का अर्थ स्पष्ट करने के लिए कुछ परिभाषाएँ नीचे दे रहे हैं; यथा- 

1. किलपैट्रिक का विचार है कि सामाजिक परिवर्तन, पूर्ण या आंशिक और अच्छी या खराब किसी भी दिशा में हो सकता है। उनके मतानुसार, “परिवर्तन विचाराधीन बात का पूर्ण या आंशिक परिवर्तन है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि परिवर्तन अच्छी बात के लिए है या बुरी बात के लिए।" 

"Change implies alteration of the item under consideration either in part or in whole . but without implication as to whether the change is for better or for worse." 

-W. H. Kilpatric, 

Philosophy of Education, p. 161. 

2. डॉसन व गेटिस ने लिखा है- “सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन है, क्योंकि समस्त संस्कृति अपनी उत्पत्ति, अर्थ और प्रयोगों में सामाजिक है।" 

"Cultural change is social change , since all culture is social in its origin, meaning and usage." 

-Dawson and Gettys 

3. मैरिल व एलड्रेज ने व्यक्तियों के कार्यों और व्यवहार परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन माना है। उन्होंने लिखा है- “सामाजिक परिवर्तन का अर्थ यह है कि बहुत बड़ी संख्या में व्यक्ति ऐसे कार्य कर रहे हैं, जो कुछ समय पहले के उनके या उनके निकट पूर्वजों के कार्यों से भिन्न हैं। जब मानव-व्यवहार में परिवर्तन हो रहा होता है, तब यह इस बात का संकेत है कि सामाजिक परिवर्तन हो रहा है।"

"Social change means that large number of persons are engaged in activities that differ from those which they or their immediate forefathers engaged i some time before . tion that social change is occuring. " When human behaviour is in the process of modification, this only another way of indica 

-Merrill and Eldridge. 

4. मैकाइवर व पेज के अनुसार- "सामाजिक परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर विविध प्रकार के परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है, जैसे मानव निर्मित रहन सहन की दशा में परिवर्तन, मनुष्य के दृष्टिकोणों में परिवर्तन तथा ऐसे परिवर्तन जो मनुष्य के नियन्त्रण के परे हैं अर्थात् जो वस्तुओं की जैविक तथा भौतिक प्रकृति द्वारा किये जाते हैं।" 

"Social change is a process responsive to many types of changes, to change in the man - made conditions of living , to change in the attitudes of man and changes that go beyond human control to the biological and physical nature to things." 

-Maclver and Page 

5. स्पेन्सर के अनुसार– “सामाजिक परिवर्तन विकास है।"

"Social change is social evolution." 

-Spencer

6. बी. कुप्पूस्वामी के अनुसार “सामाजिक परिवर्तन सामाजिक संरचना तथा सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन है।"

"Social change is some change in social behaviour and in the social structure." 

-B. Kuppuswamy 

7. किंग्सले डेविस के अनुसार- “सामाजिक परिवर्तन उन विकल्पों से सम्बन्धित है जो सामाजिक संगठन में होते हैं अर्थात् समाज के ढाँचे तथा कार्यों में होने वाले परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाते हैं।" 

"Social change is only such alterations as occur in social organization, that is in the structure and functions of society" 

-Kingslay Davis

8. जोन्स के अनुसार- "सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है, जो सामाजिक प्रक्रिया, सामाजिक अन्तः क्रिया या सामाजिक संगठन के किसी अंग में विचलन या रूपान्तरण को वर्णित करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।" 

"Social change is a term used to describe variation in or modification of any aspect of social process, social interaction or social organization."

-Jones

 हैरी जॉनसन (Harry Johnson) सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत निम्नलिखित पाँच प्रकार के परिवर्तनों को मानते है-

(1) सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन (Change in Social Values) 

(2) संस्थागत परिवर्तन (Institutional Change) 

(3) सम्पत्ति तथा पुरस्कार की वितरण प्रणाली में परिवर्तन (Change in Distribution of Possessions and Rewards)  

(4) कार्यकर्ताओं में परिवर्तन (change in workers)

(5) कार्यकर्ताओं की योग्यताओं या अभिवृत्तियों में परिवर्तन (Change in Abilities or Attitudes of Personnel) 

गर्थ व मिल्स (Gerth and Mills) ने व्यक्ति के दो पक्ष जैविक तथा सामाजिक माने हैं। उनका मत है कि जैविक पक्ष से सामाजिक पक्ष प्रभावित होता है और सामाजिक पक्ष का निर्धारण सामाजिक मूल्यों द्वारा होता है। अतः जब सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन होता है, तब व्यक्ति की भूमिकाएँ (Roles) बदलती हैं जो सामाजिक सम्बन्धों एवं संरचना को प्रभावित करते हुए सामाजिक परिवर्तन लाते हैं। अन्य कुछ विद्वान् सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को अग्र प्रकार प्रस्तुत करते हैं-


 व्यक्ति के अनुभवों में परिवर्तन 

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व्यक्ति की अभिवृत्ति (Attitude) में परिवर्तन 

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व्यक्ति के विचार-प्रतिरूपों (Pattern) में परिवर्तन 

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सामाजिक अन्तक्रिया (Interaction) में परिवर्तन 

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सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन 

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सामाजिक संरचना में परिवर्तन 

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सामाजिक परिवर्तन 


सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति 

(Nature of Social Change) 

सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति के प्रमुख तत्त्व निम्न प्रकार हैं- 

1. सामाजिक परिवर्तन आवश्यक एवं अनिवार्य हैं। 

2. ये सार्वभौमिक (Universal) हैं। 

3. ये अमूर्त हैं। 

4. ये जटिल होते हैं।

वैश्वीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएं (Meaning of Globalization and Characteristics) S-1 Unit-2 D.El.Ed. 2nd Year B.S.E.B. Patna.

 वैश्वीकरण का अर्थ 

(Meaning of Globalization) 

         वैश्वीकरण का सामान्य रूप से अर्थ विश्व की सम्पूर्ण आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षिक गतिविधियों का ज्ञान सभी को होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, संसार में विकसित और विकासशील देशों द्वारा परस्पर मिलकर विकास के पथ पर अग्रसर होते हैं। किसी एक देश की प्रगति में बाधक तत्त्वों का निराकरण, किसी दूसरे देश के सहयोग के माध्यम से किया जाता है। यह वैश्वीकरण का प्रमुख ज्वलन्त उदाहरण है। 

वैश्वीकरण की कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं:- 

(1) जे. पी. श्रीनिवास के शब्दों में, "विश्व की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं का समाधान जब विश्व के एक वैचारिक मंच पर होता है, तब वैश्वीकरण का संकेत मिलता है।" 

(2) प्रो. टी. के. माधवन ने कहा है, "विश्व की अर्थव्यवस्था का विकास एवं सामाजिक विकास राज्य के नियन्त्रण की सीमितता के अन्तर्गत होता है, तब यह प्रक्रिया वैश्वीकरण कहलाती है।" 

(3) प्रो. के. मनस्वी के अनुसार, "उदारीकरण, आर्थिक विकास एवं निजीकरण के सामंजस्य की विश्वस्तरीय प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहते हैं।" 

        इस तरह यह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण मुख्य रूप से मानव के आर्थिक एवं सामाजिक कल्याण से सम्बन्धित प्रक्रियाओं से है जोकि उसके अनेक प्रकार के पक्षों से सम्बन्धित है। 

वैश्वीकरण की विशेषताएँ 

(Characteristics of Globalization) 

      वैश्वीकरण की अवधारणा एवं उद्देश्यों पर दृष्टिपात किया जाये तो निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं- 

(1) सदभावना पर आधारित (Based on Good Faith):- वैश्वीकरण में समत्व की भावना पायी जाती है, इसमें प्रत्येक मानवीय कार्य हेतु सद्भाव की अवस्था रहती है। शत्रुता भाव का अभाव इस व्यवस्था में पाया जाता है। 

(2) सहयोग पर आधारित (Based on Co-operation):- वैश्वीकरण की अवधारणा का अवलोकन करने पर पता चलता है कि वैश्वीकरण सहयोग की भावना पर आधारित है। इसमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक दूसरे देश की मदद पर विशेष बल दिया जाता है। भूकम्प, बाढ़, सुनामी, आदि दैवीय आपदा के समय अन्तर्राष्ट्रीय सहायता सहयोग पर ही आधारित है। 

(3) एक की समस्या सभी की समस्या (One's Problem of All's Problem):- किसी भी देश की समस्या को केवल उसी की समस्या न मानकर सभी देश उसे अपनी समस्या मानते हैं, जैसे:- भारत की आतंकवाद की समस्या को समस्त देशों द्वारा अन्ततः स्वीकार करना ही पड़ा है। 

(4) सूचना तकनीकी का विकास (Development of Information Technology):- आज संसार में सूचना प्रणाली का जो जाल फैला हुआ है यह वैश्वीकरण की मुख्य विशेषता है। आज घर बैठे ही सूचना देश के किसी कोने में भेज सकते हैं एवं वहाँ की सूचना अपने पास मँगा सकते हैं।

(5) विचारधाराओं का महत्त्व (Importance of Thinking):- विभिन्न प्रकार के राजनैतिक, सामाधि और आर्थिक आयोजनों में सभी के विचारों को एक मंच पर सुना जाता है और आवश्यकता के अनुसार भी प्रदान किया जाता है। 

(6) तकनीकी शिक्षा का विकास (Development of Technical Education)- वैश्वीकरण क प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें तकनीकी शिक्षा का विकास तेज गति से होता है, क्योंकि एक देश को तकनीकों यन्त्रों के माध्यम से ही दूसरे देशों में पहुंचाया जा सकता है। एक देश दूसरे देशों की तकनीकी का आदान-प्रदान भी करते हैं। 

(7) मानवता का विकास (Development of Humanity)- वैश्वीकरण के अन्तर्गत मानवतावादी विचारधारा को अधिक महत्त्व दिया जाता है। मानव कल्याण हेतु कई अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को प्रभावशाली बनाया जा रहा है। यूनीसेफ को सशक्त बनाना इसी विशेषता को प्रदर्शित करता है।

(8) समस्या समाधान में एकता (Unity in Problem Solving)- समस्या चाहे किसी भी देश की हो उसके समाधान का दायित्व सभी देशों का होता है। रूस के विखण्डन के बाद की उत्पन्न स्थिति में अमेरिका, भारत जैसे देशों का सहयोग वैश्वीकरण की इस विशेषता को प्रदर्शित करता है।

वैश्वीकरण के प्रमुख प्रभाव

(Major Effects of Globelization) 

वैश्वीकरण के प्रभाव सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों होते हैं जो निम्नलिखित हैं:- 

(A) सकारात्मक प्रभाव- 

1. सूचना तकनीक की उन्नति से राज्य की कार्य क्षमता में वृद्धि 

2. आंतरिक प्रशासन प्रभावशाली 

3. आपसी सहयोग के कारण आतंकवाद पर अंकुश संभव 

(B) नकारात्मक प्रभाव 

1. कल्याणकारी राज्य का स्थान उदारवादी राज्य ने लिया। 

2. अहस्तक्षेप की नीति से राज्य के कार्य क्षेत्र में कमी। 

3. बहुराष्ट्रीय नियमों के कारण राज्य की विदेश नीति प्रभावित। 

4. बहुराष्ट्रीय नियमों के कारण राज्य की सीमाओं पर नियंत्रण प्रभावित। 

वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभाव:- 

(A) सकारात्मक प्रभाव 

1. अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं द्वारा आर्थिक नीतियों का निर्धारण 

2. आर्थिक प्रभाव बढ़ा 

3. खुलेपन के कारण गरीबी कम हुई 

4. समान व्यापारिक एवं श्रम नियमों से संतुलित आर्थिक विकास 

(B) नकारात्मक प्रभाव 

1. पूंजीवादी व्यवस्था से अमीरों की संख्या कम और गरीबों की संख्या अधिक हुई। 

2. सरकार ने गरीब व वंचित वर्गों के कल्याण कार्य व सुरक्षा कार्य कम किये। 

3. आर्थिक संस्थाओं ने गरीब देशों के हितों की अनदेखी की। 

4. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से कुटीर उद्योगों को नुकसान एवं बेरोजगारी बड़ी।

आर्थिक परिणाम- 

1. व्यापारिक प्रतिबन्धों की कमी- देशों द्वारा आयात वस्तु पर प्रतिबंध लगाते थे उसमें कमी होना एवं निवेशकों द्वारा दूसरे देशों में धन लगाकर अधिक मुनाफा प्राप्त करना। 

2. वीजा नीति- विकसित देश इस नीति द्वारा अपने राष्ट्र कर सीमाओं को अभेद्य बनाये रखते हैं ताकि दूसरे देश के नागरिक विकसित देशों में आकर नौकरी धन्धे न हथिया लें। 

3. सामाजिक सुरक्षा कवच- इस नीति द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर तबको पर दुष्प्रभाव को कम करने की कोशिश की जायेगी। 

वैश्वीकरण के सामाजिक प्रभाव-

(A) सकारात्मक (लाभ) प्रभाव- 

1. विदेशी संस्कृतियों के मेल से पसंदों का क्षेत्र बढ़ा।

2. वेशभूषा परिवर्तन 

3. मेल मिलाप से खाद्य व्यवस्था प्रभावित 

(B) नकारात्मक (हानि) प्रभाव- 

1. धनी देशों की संस्कृति गरीब देशों के समाज पर प्रभावी 

2. संस्कृति की मौलिकता समाप्त 

3. विकासशील देशों की संस्कृतियों का पश्चिमीकरण 

4. युवा पीढ़ी में तनाव।

रविवार, 7 नवंबर 2021

आधुनिकीकरण व सामाजिक परिवर्तन (Modernization and Social Change) S-1 Unit-2. D.El.Ed. 2nd Year B.S.E.B. Patna.

          विश्व के सभी समाजों में नयी परिस्थितियों व दशाओं के प्रति आग्रह रहा है लेकिन आधुनिकीकरण को प्रक्रिया उपरोक्त आग्रह से भिन्न प्रकार की है। इसके अंतर्गत औपनिवेशक राज्य, अल्पविकसित राज्य एवं समाज अपने से अधिक विकसित समाजों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक विशेषताओं को अपनाते हैं। सक्सेना (2014) ने आधुनिकीकरण व सामाजिक परिवर्तन को सम्बोधित करते हुए कहा कि कभी इसे परिवर्तन की प्रक्रिया तथा कभी इस इच्छित या आदर्श प्रकार के परिवर्तन के रूप में अर्थात् जो समाज का लक्ष्य होना चाहिए, उस ओर अग्रसर माना जाता है। वर्तमान भारतीय समाज के परिप्रेक्ष्य में यदि आधुनिकीकरण को देखा जाये तो उदारीकरण के पश्चात् भारत में तीव्र गति से सामाजिक परिवर्तन हुए हैं। भारतीय समाज में भेदभाव के आधार पर आधारित जातिगत संस्तरीकरण में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों के मध्य शिक्षा के माध्यम से तार्किक मूल्यों का समावेश हो रहा है। लोग परम्परागत मूल्यों से किनारा करते हुए देखें जा सकते हैं। वर्तमान भारत में परम्परागत मान्यताओं व रवायतों के खिलाफ नकारात्मकता की भावना देखने को मिलती है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्तियों समूहों और समाजों में विश्व के प्रति एक नवीन दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य का उदय हुआ है। ये नवीन परिप्रेक्ष्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उपलब्धियाँ से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं और इसके प्रसार ने परम्परागत समाजों की संरचना को प्रबल रूप से प्रभावित किया है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को तीव्रता मिली है एवं कल्याण व विकास जैसे क्षेत्रों में नवीन संभावनाएँ सामने आयी हैं। इस प्रक्रिया ने धर्म निरपेक्षीकरण, औद्योगीकरण और नगरीकरण को भी प्रोत्साहन दिया है और सुदृढ़ता प्रदान की है। समकालीन युग में तृतीय विश्व के विकासशील देश आधुनिकीकरण के प्रति प्रबल रूप में आकर्षित एवं प्रक्रिया से घनिष्ठ रूप से प्रभावित दिखाई दे रहे हैं। भारत को बहु-प्रजातीय, बहु-धार्मिक, बहु-सांस्कृतिक, बहु-भाषायी व बहु क्षेत्रीय परिस्थितियों, समूहों और वर्गों में आधुनिकीकरण के प्रति स्वीकृति व ग्रहणशीलता की प्रवृत्ति भी अलग-अलग रही है और यह प्रक्रिया समान रूप से समस्त क्षेत्रों को प्रभावित नहीं कर पायी है। 

         आज भी भारत की दो-तिहाई जनता गाँवों में निवास करती है जो परम्परावादी हैं और प्राचीन काल से चली आ रही परम्पराओं के पक्के अनुयायी हैं। लेकिन आधुनिकता से वे भी अछूते नहीं हैं। यातायात, रेल, संचार, मोटर, समाचार पत्र, शिक्षा, प्रशासन, सामुदायिक योजनाओं आदि ने आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया है। जिससे भौतिक ही नहीं, सांस्कृतिक परिवर्तन भी हुए हैं। वहीं नए मूल्य, सम्बन्ध व अपेक्षाएँ भी जन्म ले रही हैं। वास्तव में परम्परा व ग्राम व्यवस्था में एकरूपता व स्थिरता दिखाई देती है, परन्तु उसके विभिन्न आधारभूत सिद्धान्तों में बदलाव हुए हैं और वे नये रूप को ग्रहण कर रहे हैं, परिवार, जाति, स्थानिकता, धर्म आदि के संदर्भ में भी आधुनिकीकरण हो रहा है। परिवार में व्यक्तिवाद का उभार हो रहा है जो कि पहले सामूहिकता पर आधारित थे। वर्तमान में समूह में लिंग, आयु व सम्बन्ध के आधार पर अधिकार का निर्धारण न होकर योग्यता, अनुभव और ज्ञान के आधार पर होता है। जाति के भेद में व्यवसाय, संस्तरण, कर्मकाण्ड व पवित्रता की धारणा में अपेक्षित परिवर्तन हुए हैं। विवाह से सम्बन्धित नियमों की कठोरता अभी भी विद्यमान है। जाति सुधार आंदोलनों द्वारा विभिन्न जातियों के मेलजोल बढ़ रहे हैं। जजमानी प्रथा एवं व्यवसाय में परिवर्तन हुए हैं।

भारत में आधुनिकीकरण (Modernization in India) D.El.Ed.2nd Year S-1 Unit-2. B.S.E.B. Patna.

          रेडफील्ड ने भारत में सांस्कृतिक परिवर्तनों की प्रक्रिया को समझाने हेतु 'परम्परा' की अवधारणा का प्रयोग किया है। रेडफील्ड का मानना है कि प्रत्येक संस्कृति का निर्माण परम्पराओं से होता है, जिन्हें दो भागों में बाँटकर समझा जा सकता है:-

  1. वृहद् परम्परा 
  2. लघु परम्परा

          इन दोनों परम्पराओं में पहली श्रेणी की परम्परा को हम वृहद् परम्परा एवं दूसरी श्रेणी की परम्परा को लघु परम्परा कहते हैं। वास्तव में हमारे व्यवहारों के तरीकों को परम्परा कहा जाता है। समाज में प्रचलित विचार, रूढ़ियाँ, मूल्य, विश्वास, धर्म, रीति-रिवाज, आदतों आदि के संयुक्त रूप को ही मोटे तौर पर परम्परा कहा जा सकता है। 

जेम्स ड्रेवर (1976) ने परम्परा को कानून, प्रथा, कहानी और किंवदन्तियों के उस संग्रह को परम्परा कहा है जो मौलिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है। 

     इसी तरह जिन्सबर्ग (2011) ने भी उन समस्त विचारों, आदतों और प्रभावों के योग को परम्परा कहा हैं, जो व्यक्तियों के एक समुदाय से सम्बन्धित होता है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होता रहता है। 

योगेन्द्र सिंह (2014) ने किसी समाज की उस संचित विरासत को परम्परा कहा है, जो सामाजिक संगठन के सभी स्तरों पर छाई रहती है, जैसे:- मूल्य- व्यवस्था, सामाजिक संरचना तथा वैयक्तिक संरचना प्राचीन काल से ही भारत में संयुक्त परिवार की परम्परा विद्यमान थी, लेकिन वर्तमान समय में परिवार के सभी सदस्यों का साथ रहना सम्भव नहीं है। नौकरी, व्यापार एवं अन्य कारणों से पारिवारिक सदस्य अलग-अलग रहते हैं लेकिन भारतीय परिवारों में 'एकल परिवार' होने के बाद भी परम्परागत प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। यथा, एकल बच्चे को उसके दादा-दादी, चाची-चाचा, बुआ, फूफा, मामा-मामी व उनके बच्चों से लगातार सम्पर्क में रखना, उनके जन्मदिवस, त्यौहारों पर सभी का एकत्रित होकर छुट्टियों को प्रसन्नता से मनाना भारतीय परम्परा में पुत्र का परिवार में होना अति आवश्यक माना जाता था। पुत्र के अभाव में यज्ञ, तप, दान को भी व्यर्थ माना जाता था। साथ ही पिता का अंतिम संस्कार करने व श्राद्धकर्म करने का अधिकार भी पुत्रों को ही प्राप्त था। परन्तु आधुनिकता के प्रभाव ने इस परम्परागत सोच की चुनौती दे दी है। अब पुत्र एवं पुत्री में कोई भेद नहीं किया जाता, यद्यपि हर गाँव या समाज में समान आधुनिक दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता। अब छोटे परिवारों में या 02 बच्चे होते हैं। चाहे वह पुत्र हो या पुत्रियाँ अब तो लड़कियाँ पुरातन रूढ़ियों को तोड़कर पिता का अंतिम संस्कार व श्राद्धकर्म भी कर रही हैं। 

       मातृदेवी की पूजा सिन्धुकाल से ही भारतीय समाज में प्रचलित थी, जिसे वैदिक काल में माता, पृथ्वी, अदिति आदि नामों से जाना गया। पुराणकाल में इसे पार्वती, दुर्गा, काली, महिषमर्दिनी भवानी, आदि। नामों से विभूषित किया गया। वर्तमान में इन्हें अनेक नये नामों से (संतोषी माता, वैभव माता आदि) इस मातृदेवी की पूजा की जा रही है। इसी तरह व्रत-त्योहार आदि मनाने की पद्धति में बदलते समय के अनुरूप अनेक सुविधाजनक परिवर्तन हो गए हैं, लेकिन इनका प्रचलन बदस्तूर जारी है। यहीं नहीं शादी-विवाह अन्य अवसरों पर फिजूलखर्ची एवं शानोशौकत का प्रदर्शन करने वाले भारतीय आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र के लिए, निजी और सरकारी संस्थाओं के लिए या व्यक्तिगत रूप से भी असहाय लोगों की मदद के लिए तत्पर रहते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि हम आधुनिकता के इस दौर में भी पारम्परिक विचारों के ही पोषक हैं। वर्तमान हकीकत यही है कि हम सभी आधुनिक समय, विचारों, पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित हैं। फिर भी हमने अपनी परम्पराओं को उनके परिवर्तित स्वरूप में जीवित रखा है। भारतीय समाज में क्रियाशील परिवर्तन और निरंतरता की प्रवृत्तियों के संदर्भ में यदि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पर दृष्टि डाली जाए तो निश्चित ही यह स्पष्ट होगा कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से जहाँ आज भारतीय समाज परिवर्तन एवं प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है तथा इसके तहत इसने विशिष्ट उपलब्धियाँ भी प्राप्त की हैं किन्तु यह भी दृष्टव्य है कि आधुनिकीकरण की इस प्रक्रिया ने भले ही पूर्ण रूप से न सही किन्तु कुछ मात्रा में परम्परा व सामाजिक मूल्यों को परिवर्तित अवश्य किया है।

D.El.Ed.2nd Year S-1 इकाई -2 शिक्षा के समकालीन मुद्दे (CONTEMPORARY PROPOSITIONS OF EDUCATION)

 आधुनिकीकरण (Modernization) 

      आधुनिकता या आधुनिकीकरण के भाव इन शब्दों में ही समाहित हैं। हम जब आधुनिक शब्द का प्रयोग करते हैं तो कहीं- न-कहीं यह अनुभूति होती है कि हम पुरातन स्थिति से अलग किसी तथ्य या घटना की चर्चा कर रहे हैं इससे यह स्पष्ट होता है कि आधुनिकता को परम्परा से अलग हटकर नहीं देखा जा सकता है। आधुनिकता के सन्दर्भ में व्यक्ति या समाज की तीन स्थितियाँ हो सकती हैं- 

  1. परम्परागत 
  2. संक्रमणशील 
  3. आधुनिक 
    प्रो. श्यामाचरण दुबे जी ने लिखा है कि, "आधुनिकीकरण एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अथवा समाज परम्परागत अथवा अर्धपरम्परागत स्थिति से निकलकर इच्छुक तकनीकी को पाना चाहता है जो सामाजिक संरचना, मूल्य प्रेरणा, संवेग और प्रतिमान से सम्बन्धित है।" इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि आधुनिकीकरण परम्परागत स्थितियों और अर्धपरम्परागत या संक्रमण स्थितियों से सम्बन्धित अवधारणा है। यह सापेक्ष होती है अर्थात् कभी भी कोई व्यक्ति और समाज पूर्णतः आधुनिक या आधुनिकीकृत नहीं हो सकता है। 

      आधुनिकीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति और समाज को मानव जाति की नई-नई खोजों, विचारों और उपलब्धियों से परिचित कराया जाता है। इससे उनके दृष्टिकोण और जीवन शैली में परिवर्तन किया जाता है। आधुनिकीकरण का सम्बन्ध हमेशा वर्तमान से रहता है। इस युग में विज्ञान के क्षेत्र में बहुत अधिक खोजे और आविष्कार हुए हैं तभी से इस युग को विज्ञान के युग की संज्ञा से विभूषित किया गया है। जिससे आज मनुष्य का जीवन अन्धविश्वासों पर नहीं, वैज्ञानिक तकनीकी आविष्कारों पर निर्भर है। 


आधुनिकीकरण का अर्थ 

(Meaning of Modernization)


     आधुनिकीकरण क्या है? आधुनिकीकरण, जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, "आधुनिकता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है।" ऐतिहासिक दृष्टि से, आधुनिकीकरण उन सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्थाओं के प्रकारों की ओर परिवर्तन की प्रक्रिया है जो सत्रहवीं शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी तक पाश्चात्य यूरोप और उत्तरी अमेरिका में विकसित हुए और फिर वहाँ से अन्य यूरोपीय देशों में फैले हैं तथा उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में दक्षिण अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी महाद्वीपों में फैले हैं।" आधुनिकीकरण आधुनिक समाज की विशेषता है। आधुनिकीकरण की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं:- 

"आधुनिकीकरण की प्रक्रिया, परम्परागत या आधुनिकता पूर्व के समाज का आर्थिक रूप से विकसित, राजनीतिक रूप से स्थिर तथा तकनीकी दृष्टि से विकसित समाज में परिवर्तित होना है।" 

-मूर (1963)

"आधुनिकीकरण एक बहुआयामी प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत उन सभी क्षेत्रों के परिवर्तन आ जाते हैं जिनके द्वारा मनुष्य अपने समाज का संगठन करता है उसकी समस्त राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, धार्मिक तथा मनोवैज्ञानिक गतिविधियाँ हैं। 

- हेल्पन 

"रस्टो एवं वार्ड आधुनिकीकरण को एक व्यापक प्रक्रिया मानते हैं जिसके अन्तर्गत भौगोलिक एवं सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शिक्षा का प्रसार, प्रदत्त की अपेक्षा अर्जित स्तर का महत्त्व, जीवन के रहन-सहन के स्तर में वृद्धि और सम्बन्धित बातें शामिल हैं।" 

-रस्टो एवं वार्ड  

"आधुनिकीकरण एक ऐसी प्रक्रिया हैं जो व्यक्ति को अपने पारम्परिक रहन-सहन के तरीकों से एक अधिक जटिल, तकनीकी दृष्टि विकसित एवं तीव्रता से परिवर्तनशील जीवन पद्धति को चुनने के लिए बाध्य करती है।"  

-एबर्ट रोजर्स 

"आधुनिकीकरण एक मानसिकता है, न कि राजनीतिक या आर्थिक प्रणाली का एक प्रकार।" 

–राबर्ट बेल्लाह 

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि आधुनिकीकरण मुख्यतः एक स्वस्फूर्त प्रक्रिया है और इसे बाहर से थोपा नहीं जा सकता है।

सीखने की योजना क्या है ? What is Learning Plan ? Hindi & English Notes For B.Ed. and D.El.Ed. All University.


सीखने की योजना क्या है? सीखने की योजना बनाते समय सोच के कुछ बिंदुओं की सूची बनाएं।


         एक सीखने की योजना निर्देश और मूल्यांकन के लिए एक व्यापक, अनुकूलन योग्य, बहु-दिवसीय योजना है। दूसरे शब्दों में इसे हम यूं समझ सकते हैं, एक सीखने की योजना एक दस्तावेज (संभवतः एक इंटरैक्टिव या ऑनलाइन दस्तावेज़) है जिसका उपयोग सीखने की योजना बनाने के लिए किया जाता है, आमतौर पर एक विस्तारित अवधि में।

       आज के शिक्षकों को निर्देश में अंतर करने और इसे सीखने के परिणामों से जोड़ने की जरूरत है। सीखने की योजना छात्रों के पढ़ने, सुनने, बोलने और लिखने के कौशल का निर्माण करती है। इसमें भिन्नता के लिए कई अवसर शामिल हैं, जिनमें आवश्यक प्रश्न, रीडिंग और निर्देशक रणनीतियों और आकलन शामिल हैं। सभी पिछड़े डिजाइन के आधार पर एक ढांचे के भीतर व्यवस्थित सभी और अंग्रेजी भाषा के लिए सामान्य कोर राज्य मानकों को गठबंधन करते हैं।

सीखने की योजना बनाते समय सोच के कुछ बिंदु यहां दिए गए हैं:-

1. अधिगम योजना तैयार करते समय, शिक्षार्थियों के स्तर, उनकी भाषाई आवश्यकताओं और पाठ पढ़ाने के उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए।

2. सीखने की योजना के उद्देश्यों को अलग-अलग नहीं समझा जाना चाहिए। उन्हें प्रारंभिक स्तर की पाठ्यचर्या पुस्तक के आधार पर विकसित किया जाना चाहिए।

3. शिक्षण विधियों को चुनते समय कक्षा की स्थिति से संबंधित होने का प्रयास करें।

4. अभिनव टीएलएमएस बनाने का प्रयास करें जो अंग्रेजी पढ़ाने के दौरान वास्तव में एक शिक्षक का समर्थन कर सके।

5. विषयों को शिक्षार्थियों की वास्तविक जीवन स्थितियों और सार्थक गतिविधियों से संबंधित करें।

6. प्रारंभिक अवस्था में मातृभाषा को स्पष्ट रूप से आवश्यक बिंदुओं को समझने की अनुमति दी जा सकती है लेकिन बाद में इसका उपयोग कम से कम किया जाना चाहिए।

7. शिक्षार्थियों को प्रश्न पूछने और उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित करके उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करें।

8. शिक्षार्थियों की व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करें और ब्लैकबोर्ड का प्रभावी ढंग से उपयोग करें।

9. सरल और सही अंग्रेजी का प्रयोग करें।

10. फीडबैक और सुदृढीकरण के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करें।

What is a learning plan? List some points of concern while making a learning plan.


         A learning plan is a comprehensive, customizable, multi-day plan for instruction and assessment. In other words, A learning plan is a document (possibly an interactive or on-line document) that is used to plan learning. usually over an extended period of time. 

Today's teachers need to differentiate instruction and connect it to learning outcomes. The learning plan does that by building students' reading, listening, speaking and writing skills. It includes multiple opportunities for differentiation, including selecting essential questions, readings, and instructional strategies and assessments-all organized within a framework based on backward design and aligned to the Common Core State Standards for English Language. 

Here are some of the points of concern while making a learning plan - 

1. While preparing a learning plan, one must keep in mind the learners' level, their linguistic needs and the objectives of teaching the lesson. 

2. The Objectives of the learning plan must not be understood in isolation. They must be developed on the basis of the Curriculum Book of Elementary Level.

3. Try to relate to the classroom situation while choosing the teaching methods.

4. Try to create innovative TLMS which can really support a teacher whilę teaching English.

5. Relate the topics to real life situations of the learners and meaningful activities.

6. At the early stage mother tongue may be allowed to be used to understand clearly essential points but later on its use should be minimised.

7. Ensure maximum participation of learners by encouraging them to ask and answer questions.

8.Address the individual needs of learners and use the blackboard effectively.

9.Use simple and correct English.

10.Provide adequate space for feedback and reinforcement.