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बुधवार, 12 मार्च 2025

हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें...



हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो, हम घनश्याम हो जायें।


मिले हम मथुरा, वृन्दावन के वनों में,

राधा-कृष्ण की तरह हमारी जोड़ी बेमिसाल हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


तप करो तुम पार्वती सी,

हम तुम्हारे लियें भोले-नाथ हो जायें।


स्वर्ग बने हमारा ये प्यारा कैलाश,

खुशियों की पूरी सौगात हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


अयोध्या सी पावन नगरी हो हमारी,

राम-सीता की तरह हम महान हो जायें।


लव-कुश की भांति संताने हो हमारी,

जग में ऊंचा हमारा नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं...


गंगा सा पावन मन रहे तुम्हारा,

भागीरथी जैसे मेरे कार्य हो जायें।


ना तुम रूठो मुझसे ना मैं तुम से रुठू,

जीवन पर्यंत यही कर्म हमारे नाम हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ कुंभ सी तो हम प्रयागराज हो जायें।


स्नान करके इस पावन जलधारा में,

जीवन पर्यंत एक दूसरे के एकाकार हो जायें।


हमारे इंतजार पर कुछ यूं विराम लग जायें,

जो तुम आओ राधा सी तो हम घनश्याम हो जायें।


विश्वजीत कुमार ✍🏻



रविवार, 15 सितंबर 2024

ऐ शेखपुरा मेरी जान💗 हो तुम। Aye Sheikhpura meri jaan💗 ho tum.



 शेखपुरा मेरी जान💗 हो तुम।


मेरे गांव का वह कच्चा मकान हो तुम।

जहां खेल-कूद कर हम बड़े हुए,

उस बचपन से लेकर जवानी तक की पहचान हो तुम।


  शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


कभी किसी की खौफ की कहानी,

तो वही राजो सिंह की कल्पना का आकार हो तुम।


 शेखपुरा मेरी जान हो तुम। 


गणेश होटल की कभी ना भूलने वाली समोसा हो,

तो वही निताई चौक के पास मिलने वाली तीखे गोलगप्पे का स्वाद हो तुम।


बंगाली चाय की सौंधी-सी महक हो।

चांदनी चौक के मोमो की दुकान पर लगी, 

भीड़ की चहक हो तुम।

खुद के चार्ट को एक दूसरे से बेहतर बताने वाली कटरा चौक की वह दुकान हो तुम।


ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम। 


गिरीहिंदा पहाड़ पर स्थित, 

बाबा कामेश्वर नाथ का धाम हो तुम। 

बुधौली का वो कभी ना हटने वाला जाम हो तुम।


गिरीहिंदा माता के मंदिर में बजने वाला, 

वह रिमझिम-सी आवाज हो तुम।

वही श्यामा सरोवर पार्क में, 

टहलते लोगों के पैरों की पदचाप हो तुम।

अनुमंडल ग्राउंड में खेलते खिलाड़ियों की संतुष्टि भरी थकान हो तुम।


ऐ शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


गिरीहिंदा बस स्टैंड पर आती-जाती बसों में, 

बैठी सवारियों का ब्यौरा हो तुम।

हॉस्पिटल रोड में घुसते ही एंबुलेंस की आवाज हो तुम।

पुलिस लाइन में खड़े उस सिपाही की वर्दी की गर्मी हो तुम।

नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए, 

पढ़ते एवं पढ़ाते छात्रों का मेला हो तुम।


  शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


सब्जी मंडी में बिकती भाजियों का बाजार हो तुम। 

तो वहीं बैठ कर भीख मांगती, 

उस बुड्ढी मां के सर का छत हो तुम। 

लेबर चौक के पास बैठे कार्य की तलाश में, 

उन मजदूरों की आस हो तुम।


  शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


दशहरा में घूमने आए लोगों का बलखाता रेला हो तुम।

शेखपुरा स्टेशन से गुजरती वह धर-धराती सी ट्रेन हो तुम।

तो वही पास सड़क से निकलता हुआ कोई राहगीर हो तुम।

 टाटी नदी का बहता कल-कल पानी हो तो

वही अरघवटी छठ घाट पर आई व्रतियों की आस्था की कहानी हो तुम।


  शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


बड़ी दुर्गा जी के पास वह बड़ा वाला दुर्गा पंडाल हो तुम।

कच्ची रोड पर कोचिंग पढ़ने आए छात्रों के सपनों की सुनहरी मुस्कान हो तुम।

ए टू जेड मैथ क्लासेस की सेवा प्रणायता की, 

दर्शनाथ हो तुम।


  शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


स्कूल से छुटे बच्चों की मौजूद किलकारी हो तुम। 

दल्लू मोड़ में बेफिक्र घूमते मस्त मौलो की, 

सीटी बजाती टिटकारी हो तुम।

हुसैनाबाद से आती वह अजान हो 

शिव मंदिर बंगाली पर की शंखनाद हो तुम। 


....और क्या बताएं कहां-कहां और क्या-क्या हो तुम।


बस इतना जान लो इस शहर में बसने वाले हर एक वाशिंदे के नस-नस में हो और सबके चेहरे की वह मीठी मुस्कान 😊 हो तुम। 


किसी और का तो पता नहीं लेकिन

  शेखपुरा मेरी जान हो तुम।


   शेखपुरा मेरी तो जान हो तुम।

   शेखपुरा मेरी तो जान हो तुम।


विश्वजीत कुमार ✍🏻

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

तुम थी या था कोई ख़्वाब!!!



तुम थी या था कोई ख़्वाब,

बस इतना बता दो....

ओ मेरे सपनो के हमराज।

तुम थी या था कोई ख़्वाब


छठ की छुट्टियां थी,

घर जाने को मैं बस में था सवार।

सफर में तुम बन कर आये

मेरे लिये एक दर्शनाथ।


वो सफेदी की लालिमा लिये

चेहरे पर थी एक मुस्कान 😊

पता नहीं तूने मेरे ही दाएं बैठना क्यों चुना,

शायद बाएं बैठने का मन में हो ख़्याल।


छठ के गीतों से पूरा बस था गुलज़ार,

मेरे मन में तो एक ही गीत चल रहे थे।

किसी तरह तुम्हारा,

नाम पता कर लूं मैं ज्ञात।


उसकी ख़ामोशी को देखकर

समझ गया मैं यह बात।

विश्वजीत यूं दिल फ़ेंक ना बन,

करने दे उसे सफर में थोड़ा विश्राम।


यदि वो बनी होगी तेरे लिये,

एक दिन आयेगी जरूर तेरे पास।

अभी कविता तक ही रहने दो,

उसके बारे में मत सोचो बारम्बार।


तुम थी या था कोई ख़्वाब

बस इतना बता दो

ओ मेरे सपनो के हमराज

तुम थी या था कोई ख़्वाब।


विश्वजीत कुमार ✍️

सोमवार, 4 सितंबर 2023

शिक्षक दिवस👨🏼‍🏫 (Happy Teachers Day)

 


#शिक्षक_दिवस 👨🏼‍🏫 हमेशा से मेरे लिए ख़ास लम्हों में से एक रहा है। विद्यालय में पढ़ते वक्त शिक्षक दिवस के उपलक्ष में ₹1 का एक टिकट विद्यालय की तरफ से मिलता था,  जिसे पॉकेट पर लगाकर एक सप्ताह तक स्कूल जाते थे। विद्यालय एवं महाविद्यालय की पढ़ाई समाप्ति के बाद जब करियर चुनने की बारी आई तो मेरा पहला चयन शिक्षक बनना ही रहा। 2017 से लेकर 2022 तक जीवन में विभिन्न उतार-चढ़ाव आए लेकिन मैंने कभी भी शिक्षा एवं शिक्षण के कार्य को नहीं छोड़ा।


         मेरे विभिन्न आदरणीय गुरुजनों एवं शुभचिंतकों के आशीर्वाद🙌 से आज ही के दिन 05/09/2022 को वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के सर्वोपरि शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (National Institute of Fashion Technology) में शिक्षण कार्य कराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। NIFT की मेरी इस एक साल की बेमिसाल यात्रा को शब्दों एवं चित्रों के माध्यम से बयां नहीं किया जा सकता लेकिन फिर भी मैं कुछ चित्रों के माध्यम से उसे एक कोलॉज के रूप में आप सभी के बीच साझा कर रहा हूं। उम्मीद है कि मेरी इस यात्रा एवं अनुभव को देखकर आपसभी भी गौरवान्वित महसूस करेंगे। 🙏🏻













 पुनः आप सभी आदरणीय गुरुजनों एवं शुभचिंतकों के चरणों में सादर प्रणाम 🙏🏻


#Happy_Teachers_Day

शनिवार, 27 मई 2023

पटना की पहली बारिश🌧️⛈️ और तुम्हारी याद 🥰

     गर्मी की वजह से हर कोई परेशान हो रहा था, कॉलेज की AC तो मानो तो रो-रो करके🥵 कह रही हो कि अब तो हमें बख्श दो। मेरे केबिन में 03 AC लगा हुआ है लेकिन इस बार गर्मी के अधिकता की वजह से दो ने काम करना बंद कर दिया था, फिलहाल एक से काम चल रहा था। वह AC भी बीच-बीच में साहिर का लिखा हुआ यह यह गाना गुनगुनाने लगता....


साथी हाथ बढ़ाना, साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना

साथी हाथ बढ़ाना


     Non Living Products भी हमसे अपनी बातें करते हैं लेकिन उसे बस एक कलाकार🧑🏻‍🎨 ही समझ सकता है। उसकी बातों पर ध्यान देते हुए बाकी उसके दो साथी को रिपेयर होने के लिए आवेदन कर दिया अब सरकारी कार्य है तो थोड़ा समय तो लगेगा।  आज यानी 26/05/2023 को सुबह से ही मेरी परीक्षा में ड्यूटी थी। रात के करीबन 09:00 बजे जब परीक्षा की समाप्ति हुई तब अपना बैग लेने के लिए अपने केबिन की तरफ गये। उस समय तक केबिन लॉक हो चुका था। एक बार इच्छा हुई की गार्ड साहब को बोलकर रूम खुलवा लें फिर सोचे कि उन्हें क्यों परेशान करें वैसे भी, कल तो आना ही है तो बैग को वही छोड़ हम कैंपस से बाहर निकल गए। उस समय रात के 09:30 हो रहा था और बाहर का नजारा बहुत ही सुहाना था हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। एक बार मन किया की ऑटो ले लेते हैं फिर लगा कि नहीं इस मौसम की पहली बारिश है इंजॉय करना चाहिए। लगता है मेरी इस सोच को प्रभु इंद्र ने भी सुन लिया और अचानक से बारिश की बूंदे तेज हो गई।  जैसे ही बारिश की बूंदे शरीर पर पड़ी अचानक से दिमाग में कई सारे ख्याल चलने लगे। एकदम से फ्लैशबैक में हम चले गए। आपके लिए कुछ यादों के वीडियो साझा कर रहे हैं 👇🏻👇🏻


Click here for find Video


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   वीडियो के अलावा और भी यादे है जो कि हमारे कॉलेज के टाइम के हैं, उस दिन भी यूं ही तेज बारिश हो रही थी और उसने मेरी पसंद की मैगी🍝 और चाय☕️ बनाई थी। उस मैगी और चाय की फोटो भले ही मेरे मोबाइल की गैलरी से मिट गई हो लेकिन इंस्टाग्राम की प्रोफाइल में आज भी पड़ी है  मन हो तो एक बार देख लेना।


Click here for Find फोटो


https://www.instagram.com/p/CGugW9jFEVG/?igshid=MzRlODBiNWFlZA==


    आज भी मेरी इच्छा हुई थी मैग्गी🍝 और चाय☕️ बनाकर उस पल को फिर से याद करू लेकिन तभी सामने दीवाल पर चिपके एक पोस्टर पर नजर पड़ गई और इच्छा को त्यागना पड़ा। पोस्टर था - N M Fitnes Gym का जिसमें मेरी फोटो के साथ हमारे Gym Trainer विराट जी की भी फोटो लगी है।



        इसमें मेरे पूरे दिन के खाने-पीने का ब्यौरा लिखा हुआ है जिसमें दूर-दूर तक मैग्गी और चाय का जिक्र नहीं है और साथ-ही-साथ नोट में यह भी लिखा हुआ है कि -


Don't Dring any sugary drinks.


Don't eat oily and spicy food.


     ....तो आपलोग ही बताओ की हम मैग्गी कैसे बनाते??? हमें रूम पर आते-आते बारिश भी कम हो चली थी लेकिन हम तो पूरा भींग गये थे। रात मे खैर, मैग्गी तो नहीं बनाए बस उसके द्वारा उस दिन बनाई मैग्गी और चाय की फोटो को निहार लिए और खाने में रूटिंग के अनुसार दो रोटी, हरी सब्जी, सलाद और लगभग 150 ml दूध ही लिये ।

बुधवार, 28 दिसंबर 2022

दर्द को मेरे रवानी चाहिए.... (The pain needs to go away from me....)


दर्द को मेरे रवानी चाहिए।

आँखों में रोने को बस पानी चाहिए।।


कर तो लें फिर से मुहब्बत💗 हम इक दफ़ा। 

मीरा जैसी इक दीवानी चाहिए ।।


शौक है जिनको जोखिम उठाने का।

हमें उनकी उल्फ़त भी आजमानी चाहिए।।


लाश स्वं की अब हमसे उठती नहीं। 

हमें ना ऐसी जिंदगानी चाहिए।।


....और वो कितनी खता मेरी सहें। 

अब तो हमको लाज आनी चाहिए ।।


दौलतें तो आती-जाती रहती हैं पर।

शान-ओ-शौकत तो हमे खानदानी चाहिए।।


नब्ज़ थम जाए उससे पहले 'विश्वजीत कुछ कर।

"जीस्त" को भी तो एक कहानी चाहिए।


विश्वजीत कुमार✍️


ग़ज़ल में प्रयुक्त कुछ शब्दों के अर्थ -


रवानी :- धारा-प्रवाह, बहाव।

उल्फ़त:- वह मनोवृत्ति जो किसी को बहुत अच्छा समझकर सदा उसके साथ या पास रहने की प्रेरणा देती है। 
जैसे:- प्रेम; प्यार; इश्क़; प्रीति। दोस्तों या मित्रों में होने वाला पारस्परिक संबंध मित्रता; दोस्ती; याराना।

लाज:- (स्त्रीलिग) लज्जा, शर्म।

ज़ीस्त ziist (زِیسْت) :-  (स्त्रीलिग) - जीवन, ज़िंदगी, जीवनयापन।

हमको महबूबा न उसकी कोई निशानी चाहिए।



हमको महबूबा न उसकी कोई निशानी चाहिए। 

और ना ही हमें ये जिंदगानी चाहिए ।।


उड़ गया कब का परिंदा रूह का। 

अब तो भीड़ भी लोगों की हटानी चाहिए ।।


बच सकें नस्लें फ़रेब-ए-इश्क से।

दास्तां मेरी सबको सुनानी चाहिए ।।


वो मुहब्बत में मेरी पड़ जाएगी। 

मेरी ग़ज़लें उसे यूँ न गुनगुनानी चाहिए ।।


दिल मेरा धड़के जो तुम पहलू में हो। 

महकने को तो रात-रानी चाहिए ।।


दिल दुखाते रहे हैं सभी मेरा यहां । 

उन्हें अब तो उसकी कीमत चुकानी चाहिए ।।


कब से मैं बैठा हूँ इंतजार में । 

अब तो उन्हें आना चाहिए ।।


विश्वजीत कुमार✍️

बुधवार, 24 अगस्त 2022

दूल्हा बिकाऊ है। The groom is for sale.



       दूल्हा बिकाऊ है नाटक आज के परिदृश्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है जिसमें हम यह दिखाने का प्रयत्न करेंगे कि कैसे दहेज के नाम पर हम अपने बेटों को बाजार में बेच रहे हैं। यदि लड़की पक्ष वाले उसे एक वस्तु समझ कर घर ले जाने की चेष्टा करने लगे तब क्या होगा ??? कुछ इसी ताने-बाने पर केंद्रित है हमारा आज का नाटक तो चलिए शुरू करते हैं।


पहला दृश्य


      बाजार पूरी तरह से सजा हुआ है और कई सारे लोग छोटी-छोटी टोकड़ियों में सब्जी बेच रहे हैं। एक सब्जी वाली से दूसरी सब्जी वाली में प्रतियोगिता चल रही है। जैसे कोई कह रहा है आलू ₹5 किलो ₹5 किलो तो दूसरी कह रही है आलू ₹5 में सवा किलो ठीक उसी प्रकार कहीं दूर हमें कोबी के भाव पता चल रहे हैं तो कहीं हरी मिर्च सब्जी के साथ फ्री दी जा रही है। उसी परिदृश्य में पूरा बाजार सजा हुआ है और लोग खरीदारी कर रहे हैं तभी अचानक एक सूट-बूट पहना हुआ व्यक्ति वहां आ आता है और सभी को एकदम से धमकाते हुए कहता है -


सूट-बूट पहना व्यक्ति - आरे!!! ओ..... मुनियां, रानुवां, विनोदवा हटाओ आपन-आपन टोकरी सब यहां से.....


मुनियां - का हुआ साहेब ? काहे हमनी के इहां से हटा रहे हैं।


सूट-बूट पहना व्यक्ति - तोहनी के नईखे मालूम का !!! आज इहां पर एगो बाज़ार लागी।


रानुवां - कौन सा बाजार साहेब ?


सूट-बूट पहना व्यक्ति - दूल्हा बाजार!!! गरूम मार्केट!!!


दुसरा दृश्य

     दूल्हा बाजार पूरी तरह से सज चुका है सामने कुर्सी पर कुछ दूल्हे टाइप लड़के बैठे हैं। सभी के गले में एक तख्ती है जिसपर उनका पद एवं उनका मूल्य लिखा हुआ है। 

जैसे :- प्राइवेट मास्टर - 05 लाख, रेलवे ग्रुप डी - 08 लाख, सरकारी मास्टर - 10 लाख, इंजीनियर - 15 लाख, डॉक्टर - 20 लाख।

      

       सूट-बूट पहना व्यक्ति सभी लोगों को संबोधित करते हुए कहता है - इस मेले में पधारे हुए सभी भाइयों एवं उनकी प्यारी बहनों को मैं खर-पतवार सिंह सभी का इस दूल्हा बाजार जिसे अंग्रेजी में गरूम मार्केट कहते हैं में हार्दिक स्वागत🙏 करता हूं। जैसा कि आप सभी देख रहे हैं इस बाज़ार का सबसे मुख्य आकर्षण हमारे पास है तो चलिए हम इनका परिचय कराने से पूर्व एक कुछ पंक्तियां कहना चाहता हूं।


दूल्हों का बाजार लगा है आके दाम लगाओ, 

करो खर्च खज़ाना इनपे अपने मन का पाओ। 

खर्च हुआ बचपन से अबतक खाता-बही पड़ी है, 

देखो उसको जोड़-जाड़ के ज़ेबा दाम लगाओ ।। 


     इतना बोल कर वह सबसे पहले माइक उस प्राइवेट मास्टर के पास ले जाता है जो एकदम किनारे बैठा होता है।


      प्राइवेट मास्टर जिसकी कीमत 05 लाख रुपये हैं अपनी तख़्ती को ठीक करते हुए उठता है और बोलता है - नमस्कार🙏 मेरा नाम बहादुर महतो है और मैं प्राइवेट मास्टर हूं। इतना बोल वह अपना माइक अपने बगल में बैठे दूल्हे को दे देता है वह माइक लेकर बोलता है कि मैं रेलवे में जॉब करता हूं मेरा नाम खुराफात यादव हैं। इसके बाद माइक सरकारी मास्टर जी के पास आती हैं। वह माइक लेते ही सबसे पहले बोलते हैं आप सभी उपस्थित महात्माओं को चरण स्पर्श मेरा नाम सुरेश कुशवाहा है और मैं सरकारी शिक्षक हूँ। माइक जब इंजीनियर साहेब के पास जाती है तो सबसे पहले वो उसको लेकर दो-चार बार देखते हैं जैसे कि मानो कुछ उसमें कमी निकाल रहे हो। फिर थोड़ी धीमी आवाज में बोलते हैं हमें लग रहा है कि कुछ आवाज में गड़बड़ी है। थोड़ा इसका आवाज़ बढ़ाओ जी। फिर बोलते हैं मैं इंजीनियर हूं और मेरा नाम विनोद हैं जोकि आजकल सब कुछ देख रहा है। अंत में माइक डॉक्टर साहब के पास आती है वो अपना परिचय कुछ यूं देते हैं -

इस दुनिया मे पता नही चलता है, 
किसी का करैक्टर,

आज भी लोगो के लिए, 
दुसरे खुदा है डॉक्टर।

    नमस्कार, प्रणाम, सलाम मेरा नाम है डॉक्टर मशहूर खान।

       जब सभी का परिचय हो जाता है तो एक बार फिर वही सूट-बूट पहना व्यक्ति माइक लेता है और सभी को आमंत्रित करते हुए कहता है कि - आप सभी अपने-अपने आसान से उठिये और एक बार आकर इन दूल्हे को देखिए।

    लोगो के आने से पूर्व 02 लोग मंच पर आते है और सूट-बूट पहने व्यकित से माइक ले लेते हैं औऱ कहना शुरू करते हैं- हम हैं लड़के के पापा जी हमारे तरफ से प्रस्तुत है कुछ शायरी -

लड़का कौवा जैसा तो क्या लड़की होगी गोरी, 

चाहे जितना जोर लगा लो रकम न होगी थोड़ी । 

मामूली ये बात नहीं है इसको जन्म दिया है, 

पाल-पोश के बड़ा किया है नहीं किया है चोरी ।। 

      उसकी शायरी पूरी होती उससे पूर्व दूसरा व्यक्ति माइक लेता है और कहना शुरू करता है -


उम्मीद बाँध के छोटपन से इसको मन से पाला, 

यहाँ तक पहुँचाने में इसको निकल गया मेरा दीवाला। 

इसके लालन - पालन में न की है कोई कटौती, 

जो भी उसने हमसे माँगा कभी न उसको टाला ॥ 

       तब तक स्टेज पर कई सारे लोगों का आगमन होता है और वो सभी दूल्हे को देखने लगते हैं कोई उनकी कान को निहारता हैं तो कोई नाक को देखता है। कोई-कोई तो सर पर कितने बाल बच्चे उसकी गणना करता है। कुछ लोग तो बस उनके तख़्ती को पढ़कर और मूल्य को देखकर आगे निकल जाते है इस तरह पूरा दिन निकल जाता है और किसी को कोई खरीद नहीं पाता।


तीसरा दृश्य


      कल की तरह आज भी दूल्हा बाजार सज चुका है लेकिन कल की तरह आज भीड़ दिखाई नहीं दे रही है। हमें मंच पर वही कल वाले दूल्हे कुछ उदास दिखाई दे रहे है। तभी मंच पर एक औरत अपनी बच्ची को लेकर एक भारी-भरकम बैग के साथ आती है और क्रमवार सभी दूल्हों का मुआवना करती है। जैसे ही वह प्राइवेट मास्टर के पास जाती है तभी उसकी बेटी बोल उठती है मम्मी-मम्मी हमें इसे नही खरीदना। प्राइवेट नौकरी का कुछ भरोसा नहीं होता है कब बाहर निकाल दे। उसके बाद वह दूसरे दूल्हे की तरफ बढ़ी। उसे देखते ही नाक भौ सिकुड़ते हुए बोली - हम्म!!!  ग्रुप-D नहीं चलेगा। सरकारी मास्टर और इंजीनियर का तो बस तख़्ती देख कर के आगे निकल गई लेकिन उससे कदम डॉक्टर के पास जाकर रुक गए। एकदम से चहकते हुए बोली - मम्मी मम्मी सबसे ज्यादा अच्छा तो ये हैं। डॉक्टर का क्या है एकदम बिंदास जिन्दगी हैं। वैसे भी एक बार इन्वेस्टमेंट है फिर लाइफ टाइम रिटर्निंग इससे ज्यादा कहीं नहीं मिल सकता। अरे इसके तो बुढ़े हो जाने पर भी पैसे मिलते रहेंगे। हाथ से भले ही कुछ लिख ना पाए लेकिन दवा दुकान वाले उसपर भी दवा दे देंगे। अभी कल की ही तो बात है शर्मा जी एक कागज पर यह चेक कर रहे थे कि कलम सही से काम कर रहा है या नहीं और गलती से वही कागज मरीज लेकर चला गया और जानती हो दवा दुकान वालों ने यह सोच कर उसको दवा भी दे दिया कि डॉक्टर साहब भेजे हैं तो कोई दवा का ही नाम होगा। अरे!!! मम्मी इसके द्वारा लिखे दवा में भी कमीशन मिलेगा। इतना ज्यादा फायदा और किसी दूल्हे में नहीं। तुम अभी खरीद लो इसे क्या पता कल को इसके फायदे को देखकर इसका मुल्य और बढ़ जाये।


            उसके उपरांत वो सूट-बूट पहने व्यक्ति को बुलाती है और रुपये से भरा बैग देकर कहती है अब यह डॉक्टर मेरा हुआ और उसका हाथ पकड़ कर अपने घर को लेकर चलना शुरू ही करती है तभी मंच पर एक छोटी लड़की का आगमन होता हैं और वह दौड़कर उस डॉक्टर का दूसरा हाथ पकड़ लेती है क्योंकि पहला हाथ उस लड़की ने पकड़ रखा था जो कि उसे खरीद कर ले जा रही थी।

अरे!!! रुको । रुको । मेरे भैया को कहां लेकर जा रही हो ??


      मैंने इसे पूरे 20 लाख में खरीद लिया है अब यह मेरा हुआ हम इसे जहां चाहे वहां लेकर जाएं। फिर वह सामने दर्शकों की ओर मुड़कर प्रश्न पूछने के अंदाज में कहती है। अच्छा आप लोग बताइए यदि कोई बाजार से आप वस्तु खरीदते हैं तो क्या आप उसे अपने घर लेकर जाते हैं ना ?

दर्शक - हां

तो फिर इसे हम लेकर क्यों नहीं जा सकते हैं जबकि हमने इसे 20 लाख में खरीदा है।

      डॉक्टर जिसका एक हाथ उस लड़की ने पकड़ रखा था जिसे उसने खरीदा था और दूसरा हाथ उसकी छोटी बहन ने पकड़ रखा था। दोनों में खींचातानी होने लगती है। तभी डॉक्टर झटके से अपना हाथ दोनों से छुड़ाता है और एकदम गुस्से में बोलता है - 

चुप रहो तुम दोनों

        मैं कोई वस्तु नहीं जिसे कि तुम बेचो और तुम खरीद लो। आज से हम इस दूल्हा बाजार का विरोध करते हैं और दहेज प्रथा का भी विरोध करते हैं।

       उसकी बातें सुनकर पीछे खड़े चार दूल्हे भी खड़े हो जाते हैं और अपने गले से तख़्ती निकालते हुए जमीन पर पटकते हुए कहते हैं की हम सभी भी इस दहेज कुप्रथा का विरोध करते हैं और प्रण लेते हैं कि ना दहेज लेंगे ना कहे किसी को देने देंगे।

     तभी वह सूट-बूट पहना व्यक्ति जोर से ताली बजाता और हंसता हुआ सभी के सामने आता है बोलता है कि तुम पांचों के कहने से क्या होगा ? यह समाज तो निरंतर दहेज लेता और देता आ रहा है और देता रहेगा। तभी सरकारी मास्टर आगे बढ़ता और कहता है महोदय आप सही कह रहे हैं लेकिन यदि शुरुआत की जाए तो उसे पूरा भी किया जा सकता है हमारे समाज में सती प्रथा जैसी कुप्रथा थी और बाल विवाह भी। हमने उसे खत्म किया या नहीं। ठीक उसी प्रकार से यदि हम प्रयास करें तो इस दहेज कुप्रथा को भी समाप्त कर सकते हैं बस हमें जागरूक होने की जरूरत है। यहां पर उपस्थित हम सभी गणमान्य लोगों से निवेदन करते हैं कि कृपया अपनी जगह पर खड़े हो जाए और हमारे साथ एक प्रण लें।




आज हम सभी प्रण लेते हैं कि 
अपने बेटे और बेटियों की शादी में 
ना दहेज लेंगे ना दहेज देंगे 
और समाज में यदि कहीं ऐसा कार्य 
किया जा रहा है तो उसे रोकने का 
हर संभव प्रयास करेंगे।

हम यह भी प्रण लेते हैं कि 
यदि समाज में किसी के द्वारा 
दहेज लिया जा रहा है तो 
उसका सामाजिक बहिष्कार भी करेंगे।

धन्यवाद🙏


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

स्लीपर (Sleeper) बोगी में स्लीपर (Slipper) ले गया चोर !


       मुझे याद है भारतीय रेल के जनरल बोगी की वो तमाम यात्राएं जिसमे थोड़ी सी जगह बनाने के लिए, वहां बैठे लोगों से हमेशा हेल्दी ग्रुप डिस्कशन करना पड़ता था, उनको इंप्रेस करना पड़ता था, इतना इंप्रेस तो आज तक किसी लड़की को नहीं किये जितना कि कई बार सिर्फ थोड़ी-सी जगह के लिए वहां बैठे लोगों से कर लिये थे। यदि उसमे से थोड़ा भी इंप्रेस किसी ख़ूबसूरत बला👩‍🦰 को किए रहते तो आज तक शायद सिंगल नही रहते। ख़ैर!!! आपने विषय पर लौटते हैं। हम चर्चा कर रहे थे जनरल बोगी में सीट लेने की, कई बार तो सीट पर बैठे लोगों को भैया, चाचा, सर🙏 सब बोलकर रिश्ता बनाना पड़ता था, तब जाकर लोग कबूल करते थे और थोड़ी सी जगह मिलती थी बैठने की। हालांकि, उस थोड़ी सी जगह को देखकर मेरी तशरीफ भी घबरा जाती थी क्योंकि ट्रेन जब थोड़ी सी भी हिलती थी तो अक्सर मेरी तशरीफ फिसल कर सीट से नीचे उतर जाती थी ।


        जेनरल बोगी की इन तमाम यात्राओं में एक दिन गुस्से में हम एक खतरनाक UP/बिहारी मजदूर से भयंकर झगड़ा हो गया, वो भी जगह बनाने को लेकर। वो जो मजदूर था ना वो मुंबई से लौट रहा था, कमाकर। मुझे तो एक बार ऐसा लगा की उसने अपनी पूरी कमाई के पैसा से बहुत सारा सामान खरीद लिया था और वो सब वहीं सीट के नीचे ऊपर लोड कर दिया था। जब उससे मेरी सीट को लेकर बहस हो रही थी तब उसने मेरी ओर गौर से देखा और उसे यकीन हो गया कि हम फुल फ्रस्टेट बेरोजगार हैं। 


       हम बस इतना बोले कि भाई साहब, सामान का लगेज बुकिंग करवाना चाहिए ना!!! यहां क्यों भर दिए हो। आने-जाने एवं बैठने में परेशानी हो रही है। मेरा इतना बोलते ही वह और भड़क😠 गया और बोला -

      "तोर पैसा से खरीदे हैं का रे.....??? कि एतना समझा रहा है हमको!!! बहुते बैठ के, अफसर बने के शौक है न, तो रिजर्वेशन कराके स्लीपर में काहें नहीं जाता है रे.... 

चला हैं, यहां अंग्रेजी झाड़ने। हमको अनपढ़ समझा है का रे़...."


      वो और चार्ज होने लगा और उसको देखकर बाकी उसके साथी मजदूर भी जोश में आने लगे, इसलिए माहौल अनुकूल ना देखते हुए हम जल्दी से आगे बढ़ गए। 


        आपको लग रहा होगा कि बात आई गई हो गई लेकिन सच बताएं, वो स्लीपर वाली बात हमको लग गई, बेरोजगार जो थे। बेरोजगारों को कोई भी बात उतनी ही जल्दी खराब लगती है जितनी जल्दी नई बहू को सास की बात।


      उसके बाद हम भी निर्णय कर लिए कि अब और बेइज्जती नहीं करवाएंगे, जाएंगे अब हम भी स्लीपर से ही और वो भी बकायदे रिजर्वेशन कराके। जब टिकट काउंटर पर टिकट लेने गए तब वहां बैठे रेलवे के कर्मचारी ने फॉर्म दिया। नाम था उसका - रिजर्वेशन फॉर्म। परीक्षा का फॉर्म तो हमेशा भरते थे पर उस दिन टिकट कटने वाला एक फॉर्म भरे, मजा आ गया देखकर। बढ़िया सुंदर राइटिंग बना-बना कर फॉर्म भरके जमा किए। टिकट काटने वाले कर्मचारी ने कंप्यूटर में पता नहीं क्या-क्या टाइप किया और मेरी ओर देख कर कुछ बोले- उनके द्वारा बोले गए पहले दो चार शब्द तो हम समझ नहीं पाए बस इतना समझे कि वह पूछ रहे हैं टिकट काट दे ? मैंने जैसे सुना - टिकट काट दे ? मुझे लगा कि जब फार्म भरकर उनको दे ही दिये हैं तब पूछ क्यों रहे हैं ? मैंने पूछा - सीट है ना!!! , क्योंकि मैंने सुना था कि कई बार रिजर्वेशन में सीट नहीं मिलता हैं। तब वो बोले कि सीट तो मिल जाए लेकिन..... उनकी बात पूरी होती उससे पहले ही हम चहकते हुए बोलो - टिकट काट दीजिये। एक बार वो मेरी तरफ़ घुर कर देखे और टिकट प्रिंट होने के लिए दे दिया। आखिरकार टिकट करवा ही लिए थे, स्लीपर का। टिकट बढ़िया प्रिंट हुआ, कागज़ पर। खच-खच करने वाले प्रिंटर से। और जब हम उसको देखे, तो उसपर लिखा हुआ था, RAC 26 । इतना तो पढ़े थे ही हम। समझ गए कि स्लीपर में एक्चुअली रैक जैसा बना रहता है, उसी में आदमी सब सोता है, उसी को RAC (रैक) कह रहा है और हमारा छब्बीस नंबर का रैक है ।


     अगले दिन सुबह 06 बजे ट्रेन थी मेरी। रिज़र्वेशन करा लेने से टेंशन हो गया था क्योंकि हम जो जूता पहन कर जाते थे, वो कई दिनो से अपने सोल से जुदा होने लगा था, इसलिए एक मोची से सिलवा दिए थे। सही में देखने में अच्छा नहीं लग रहा था। कहीं स्लीपर बोगी में बड़े बड़े लोग आएंगे वो हमको गरीब टाइप ना समझें इसलिए हम जल्दी से बढ़िया कंपनी का एकदम नया चमड़ा टाइप वाला स्लीपर 600 रुपया में, बार्गेनिंग कराके ले लिए, एक पास के दुकान से। स्लीपर में रेडियम💎 लगा था जो रात में चमकता था ।


    रिजर्वेशन कराए थे तो ससुरा रात भर नींद😴 भी नहीं आई। ऐसा लग रहा था कि कहीं सोए ना रह जाएं और ट्रेन निकल जाए, कहीं अलार्म धोखा ना दे दे। पर फिर भी, आंखें भले ही लाल😳 हो गईं थी मेरी नहीं सोने से, पर उत्साह दस गुना था हो भी क्यों ना!!! रिजर्वेशन जो था स्लीपर में।


      सुबह होते ही पहुंच गए स्टेशन, मस्त नहा-धोकर, नया शर्ट-पैंट और स्लीपर पहनकर। ट्रेन आई तो घुस गए हम सामने वाली बोगी में और 26 नंबर के सीट पर आ गए। उसपर एक लड़की सो रही थी। हुलिया ऐसा बना हुआ था उसका जैसे बारात में दम भर नाचने के बाद सीधे आकर सो गई हो। अलग टाइप का खर्राटा भी ले रही थी।


      15 मिनट छोड़ दिए कि जाने दो, लड़की है। सो लेगी थोड़ा देर, फिर उठा देंगे। विवेकानंद से सीखे थे कि लड़की औरत का इज्जत करना चाहिए, इसलिए किए। थोड़ी देर बार उसको उठाए तो नींद में कह रही है कि "कौन हो, जाओ यहां से, ये मेरी सीट है, क्यों डिस्टर्ब कर रहे हो और सो गई "। 


     हम उसको बताए कि मेरी है ये सीट, मैने रिजर्वेशन कराया है। तभी एक ठो लौंडा जो उसकी हवा से उड़ती हुई जुल्फों को देखकर बहुत देर से आशिकी फ़िल्म का गाना "बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए" गाते हुए टाइम पास कर रहा था। हम को देखते हुए बोला कि - 


"ढेर अंग्रेजी बोल रहा है तुम। लड़की देख के यहां नाटक कर रहा है, आए हो यहां तुम लौंडियाबाजी करने।" 


      हम भी जोश में आ गए और उसको अपना टिकट दिखाए तो हंस के कहता है अनपढ़े हैं का रे, RAC टिकट में सुत के जाएगा। हमको समझ में नही आ रहा था कि वह कहना क्या चाहता हैं ??? उससे हम बहस कर ही रहे थे कि तभी टीटी  महोदय आ गये मैंने उनको बताया कि मेरी सीट पर लड़की सो रही है और जब कहां तो ये भाई साहब हमसे झगड़ रहे हैं। तब टीटी ने मेरा टिकट लिया और अपने पास स्थित एक बड़े से लिस्ट में मिलान किया और कहां - भाई साहब, कौन कॉलेज में पढ़ते हैं ? S-12 में 07 नंबर का सीट है आपका। सीधे जाइए ये S-2 है। हम चल तो दिए पर अभी भी समझ में नहीं आ रहा था की रेलवे पागल है क्या, जब सीट नंबर अलग है तो हमको 26 नंबर काहे लिख के दिया।


      खैर!!! कई डब्बों को पर करते हुए और लोगों से पूछते हुए अपने सीट पर आ गए। वहां साला अलग ही गांजा हो रखा था। सेम सीट नंबर का उसका भी टिकट था जो मेरे सीट पर बैठा था। हम सोचे कि साला ऊ मजदूरवा के फेर में आज दर-दर का ठोकर खा रहे हैं। मन कर रहा था कि मिल जाता ससुरा तो उसका नरेटी दबा देते। 


       एक घंटा तक बैठ नहीं पाए थे आराम से, और नींद भी आ रही थी और उपर से मेरे सीट पर तीन लोग बैठा हुआ था। अभी सोच ही रहे थे कि वहां बैठा एक आदमी मुस्कुराकर बोला कि - 


"अरे, काहे परेशान हो रहे हैं जी, आइए बैठिए, सबको चलना है एडजस्ट करके चला जाए"। 


     मानना पड़ेगा उस आदमी को। मेरे ही सीट पर हमको एडजस्ट कर दिया। सीट पर बैठे-बैठे उसने मुझे समझाया की RAC का मतलब क्या होता है। आप भी पढ़िए उसी की जुबानी।

"RAC यानी कि एक दुल्हन जिसका दो दूल्हा होता है, दोनो दूल्हा अपनी दुल्हन पर अधिकार दिखाने का कोशिश करता है पर दुल्हन अंत तक उन दोनों में से किसी की नहीं होती"


       हम भी RAC की कहानी सुन हताश होकर चुप-चाप एडजस्ट हो गए और अब आने लगी हमको नींद, रात भर जो सोए नहीं थे। ऊपर की सीट में गिद्ध जैसा गर्दन निकाल कर बैठा था एक आदमी जो झांक रहा था तब से। हमसे कहता है कि नींद आ रही है का ? तो आइए सो जाइए थोड़ी देर ऊपर, हम नीचे बैठ जाते हैं। उस दयालु आदमी को दंडवत  प्रणाम🙏 करने का मन किया। 


     हम जल्दी से चप्पल खोल कर ऊपर जाकर सो गए। करीब दो घंटे बाद नींद खुली तो लोग कम हो गए थे। मैं नीचे उतरा, की चलो थोड़ा नजारा देखा जाए, चाय-वाय☕ पिया जाए। उतरने के बाद अपना नया वाला चप्पल खोजने लगे, दिख ही नहीं रहा था। तभी एक आदमी जो खिड़की के पास बैठकर झाल-मूढ़ी खा रहा था, पूछा कि - का खोज रहे हैं भाई जी ? हम बोले कि "यार, मेरा स्लीपर नहीं मिल रहा" ? पूछा की कैसा था। हम बताए कि "यार, नया था, रेडियम लगा था उसमे" । वो हंसकर बोला कि 

"भाई जी, गया 

मैंने कहां - गया, मतलब!! 

तब वह मुस्कुराते हुए बोला - गया, स्टेशन अभी क्रॉस हुआ है, आपका स्लीपर गया।


     स्लीपर (Sleeper) बोगी में सबसे पहले आपको स्लीपर (Slipper) का ध्यान रखना चाहिए, इसलिए देखिए, हम बैठे हैं नीचे, लेकिन स्लीपर है मेरा पंखा के ऊपर" । 


      हम ऊपर देख रहे थे उसका स्लीपर (Slipper) वो हमको देखकर मुस्कुरा😊 रहा था और हम सोच रहे थे कि मेरा जनरल बोगी ही अच्छा था। कहां फंस गए इस स्लीपर के चक्कर में.......



बुधवार, 20 जुलाई 2022

जानती हो🤔...पगली🥰

 


       ......बहुत छोटी-छोटी उम्मीदें है मेरी, तुमसे!!! जिनको पूरा तुम ही कर सकती हो, सिर्फ तुम। जैसे वो सिर्फ तुम का गाना हैं ना पहली-पहली बार मोहब्बत😍 की है, कुछ न समझ🤔 में आए मैं क्या करूं.... कॉलेज के समय से लेकर अभी तक यह गाना मेरा पसंदीदा रहा है और ना जाने कब तक रहेगा, यह भी नही पता। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है बहुत मुश्किल है तुम्हारे लिए, मेरी किसी भी ख्वाहिश को पूरा करना। मैं जब अपनी फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करूं तुम उसमे लव वाला रिएक्ट❤️ कर दो, भले ही कुछ न लिखो। मैं मान लूंगा कि आज भी तुम मुझे वैसे ही याद करती हो जैसे उस जमाने में पटना के इको पार्क में आकर किया करती थी।


      ......मगर ये कार्य भी तुमसे नही होता।😥 मैं बार-बार रिएक्शन में तुम्हे ढूंढता हूं परन्तु तुम नही मिलती... जबकि दूसरे के फोटो पर तुम्हारा रिएक्शन और प्रतिक्रिया देख, हर जगह तुम्हारी मौजूदगी देख, मुझे बस यही गीत याद आता है - मुझसे क्या भूल हुई, जो यह सजा हमको मिली... बहुत कुछ सोचकर मैं नाउम्मीद😟 हो जाता हूं।

         फिर, मुझे याद आता है वो पल जब हमारी किसी बात पर बहस🗣️ होती थी। मैं किसी बहस पर अपनी बात बोल रहा होता था और तुम वहां मौजूद होती थी, तो मैं चाहता था तुम भी मेरी तरफ से कुछ तो बोलो। मगर हमेशा से खाली हाथ मैं लौट जाता था क्योंकि तुम्हारी मौजूदगी या तो खामोश होती या मेरे ही विरुद्ध होती थी।   

      जब कभी मैं तुमसे नाराज होता था तो मुझे इंतजार रहता की तुम मुझे कॉल करो, मुझसे कुछ बात कहो। 

मगर, नही। 

        ......एक लम्बा वक्त बीत जाता तुम मुझे कोई कॉल नहीं करती मुझसे कुछ भी नही पूछती थी। मैं उस वक्त ज्यादा उदास हो जाता था, जब कभी तुम मेरे सामने गैर लोगो से नजदीकियां दिखा रही होती थी। तब मुझे लगता है मेरी उपस्थिति शायद निरर्थक है क्योंकि उनके सामने तुम सबसे ज्यादा मुझे इग्नोर कर रही होती थी, जबकि मैं तुम्हारे लिए ही तो वहां मौजूद रहता।

       हर बार मैं और दु:खी हो जाता हूं... जब कभी मुझे लगता है तुम मुझसे मेरे बारे में कुछ कहो,  तब तुम हमेशा पूछते हो उस वक्त किसी दूसरे के बारे में कि फलां इंसान कैसा है ? जबकि तुम्हे जानना चाहिए तुम मेरे लिए क्या हो। 

      अंत में मैं कहना चाहूंगा .....शायद तुम्हें ना पता हो लेकिन अब मैंने Dairy Milk Chocolate  खरीदना एवं खाना छोड़ दिया हैं। आज वो दुकानदार भी पूछ रहा था भैया कभी दो-दो फ्लेवर के Dairy Milk Chocolate खरीदने वाले आज चॉकलेट से इतनी दूरी क्यो बना लिये है ? और जानती हो मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। लेकिन फिर भी आज मैंने दो Chocolate खरीद तो ली है लेकिन इसे तुम्हारे बगैर खाने की इच्छा नहीं हो रही है।



        मुझे बहुत तिरस्कृत सा महसूस होता हैं....  तुम नही जानती हो मेरी तुमसे क्या उम्मीदें थी, हैं और रहेंगी। लेकिन, हां मैं जानता हूं तुम मेरी उम्मीदों का मूल कभी चुका नही सकोगी....


.....क्योंकि तुम्हारे भावों में शायद इतना सामर्थ्य नही है। अब तो बस इच्छा यही हैं कि तुमसे कह दूँ।


 पगली, अलविदा।


तुम्हारा विश्वजीत✍️

गुरुवार, 14 जुलाई 2022

फिल्म रिव्यू: रॉकेट्री, द नम्बि इफेक्ट ! Movie Review: Rocketry, The Nambi Effect!



      आज हम और डॉ० राजीव सर रॉकेट्री, द नम्बि इफेक्ट Movie Sushil Plaza Gold Prime (Dolby Digital) में देख ही आए।


        फिल्म तो देख कर आ गए अब बारी है आपके साथ चर्चा करे उसके रिव्यु की। तो चलिए शुरू करते हैं....... 

       आप सभी के मन में यह ख्याल आ रहा होगा की फ़िल्म कैसी है ? तो हम बस यही कहेंगे कितनी भी तारीफ़ करे इस फिल्म की फिर भी शायद वो कम ही होगी क्योंकि हम सभी भारतीयों को न्यूटन, आइंस्टीन, एडिसन, इत्यादि वैज्ञानिकों का नाम तो बखूबी याद रहता है लेकिन अपने देश के महान वैज्ञानिकों के बारे में बहुत ही कम जानकारी है। 


        भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation) ISRO की यदि बात की जाए तो जो नाम सबके सामने आता है वो है सर अब्दुल कलाम जी का और वो भी इसलिए क्योंकि वो हमारे देश के राष्ट्रपति भी थे। पर क्या हम सब सर विक्रम साराभाई को जानते हैं ? हो सकता है कि कुछ लोग बोलें - हां। पर जब पूछा जाएगा कि किस स्पेशल वर्क के लिए उन्हे जाना जाता है तो अधिकतर लोग चुप हो जाएंगे। वैसे ही, शायद ही आप डॉक्टर ऋतु कारीधाल श्रीवास्तव को जानते होंगे, शायद ही नंदिनी हरिनाथ को जानते होंगे, शायद ही आप सुब्बैया अरूणन को पहचानते होंगे। इस फिल्म के बनने से पहले शायद ही आप श्री नम्बी नारायणन को जानते होंगे !!!


         ......पर समय आ गया है कि हम सभी हिंदुस्तानी🇮🇳 खुद भी ऐसी फिल्में देखें और अपने बच्चों और दोस्तों को भी दिखाएं जिससे हमें मालूम चल सके कि हमारे देश के वैज्ञानिक कितने होनहार थे और हैं। किस तरह हमारे वैज्ञानिकों ने जिनके पास रिसोर्स की कमी थी पर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने स्वार्थ को किनारे कर अपने देश का सम्मान बढ़ाने के लिए, दिन-रात मेहनत किये और वो सबकुछ कर दिखाया जिसे हमारे देश को जरूरत थी। सलाम🙏 है अपने देश के सभी वैज्ञानिकों को।


       रॉकेट्री, द नम्बि इफेक्ट फिल्म नंबी नारायणन की जीवनी है जो ISRO में वैज्ञानिक थे और जिन्होंने विश्व प्रसिद्ध विकास इंजन का आविष्कार किया। अपने सैनिक अगर देशभक्त कहे जाते हैं तो हमारे वैज्ञानिक भी देशभक्ति में किसी से कम नहीं। नंबी नारायणन को अमेरिकन स्पेस एजेंसी (NASA) का ऑफर मिला था जो इसरो की सैलरी का करीब दस गुना था पर देश के बारे में सोचने वाले पैसों से कहां बिकते हैं। ऑफर ठुकराकर देश के लिए विभिन्न प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहने वाले नारायणन, अब्दुल कलाम और विक्रम साराभाई के चहेते थे।


        जब कोई सफल होते जाता है तो ईर्ष्या करने वाले भी बढ़ते जाते हैं। किसी की सफलता को खुश होकर एक्सेप्ट करना या सेलिब्रेट करना इंसानों के बस की बात कहां !!! सीक्रेट्स बेचने के एक फर्जी आरोप में नारायणन को गिरफ्तार कर लिया गया और बहुत प्रताड़ित किया गया। निर्दोष साबित होने में उन्हें 24 साल लग गए। नारायणन के ऊपर लगे देशद्रोह के आरोप ने इस प्रतिभावान वैज्ञानिक को तोड़ दिया और उनका पूरा परिवार बिखर गया। इस फर्जी आरोप के चलते हमारा स्पेस मिशन 12 वर्ष पिछड़ गया नहीं तो शायद उसी समय हम अमेरिका को टक्कर देते रहते।


      फिल्म में नारायणन सर का रोल माधवन ने बेहतरीन तरीके से निभाया है। इसके लिए उन्हें दस में दस 10/10 प्वाइंट मिलेंगे। सभी कलाकारों के काम की जितनी तारीफ करें उतनी कम। फिल्म में देशभक्ति है, परिवार है, प्यार है, विज्ञान है और हां छल है और फिर इमोशन है। कहानी सच है और एक्टिंग जोरदार है इसलिए बहुत से सीन आपको झकझोर देंगे, रोने पर मजबूर कर देंगे। यहां हम एक दृश्य का जिक्र करना चाहेंगे जिसमे नंबी नारायणन अपनी पत्नी को डॉक्टर से दिखा कर क्लिनिक से बाहर निकलते हैं तभी बारिश होने लगती है एक ऑटो में वो जैसे बैठते हैं उसके बाद उन्हें जबरदस्ती ऑटो से बाहर निकाल दिया जाता हैं क्योंकि उन पर देशद्रोह का मुकदमा लग गया था। इस दृश्य को बहुत ही बेहतरीन ढंग से फ़िल्माया गया हैं।


     वैसे, अभी तक मैने हमेशा देखा हैं कि अच्छे लोगों के साथ बहुत बुरा होता है इसलिए बहुत अच्छा तो कभी नहीं बनना चाहिए क्योंकि जब बुरा होता है तो कोई साथ नहीं देता है। फिल्म के एक दृश्य में CBI का अधिकारी उनसे पूछते है कि जब आप निर्दोष हैं तो आपके विभाग से अभी तक कोई मिलने क्यों नहीं आया ?


     ये फिल्म सभी हिंदुस्तानियों को देखनी चाहिए और हो सके तो सिनेमा हॉल में। ना इसमें हिंसा है, ना इसमें अश्लीलता है, ना इसमें धर्म युद्ध है और ना ही जातिवाद है, बस देशभक्ति है। 


     इसलिए, इस फिल्म को बढ़ाइए। ऐसी फिल्में खूब बननी चाहिए ताकि हम सब अपने देश और वैज्ञानिकों और उनके संघर्ष और देशहित में किए गए काम को जान सकें।


       ....तो सोचना क्या है, फ़िल्म देख कर आइए और हां Review कैसा लगा कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा। जय हिंद 🇮🇳 


विश्वजीत कुमार✍️

शनिवार, 9 जुलाई 2022

भारतीय रेल के AC Class की यात्रा।

        भारतीय रेल की जनरल और स्लीपर क्लास में यात्राएं मैंने बहुत की थी आज यूंही मन में ख़्याल आया कि चलो थोड़ा सा AC Class कि भी यात्रा करके देखते हैं। हमेशा ऑनलाइन टिकट लेने की आदत के बावजूद उस दिन पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन गये और टिकट बुकिंग का फॉर्म लिया। राइटिंग तो अच्छी नहीं है फिर भी फार्म को भरकर के काउंटर पर जमा किया। हमे भारतीय रेलवे यह सुविधा देता है कि एक ही फार्म से आप वापसी का भी टिकट करा सकते हैं। मैंने सोचा कि बस AC के सफर का अहसास ही तो करना है आने का मैंने उसी ट्रेन में स्लीपर क्लास (SL) के लिए फॉर्म भर दिया। टिकट काटने वाले महोदय ने यह देखा कि जब जाने का AC Class का है तो आने का भी AC ही होगा। उन्होंने फॉर्म को अच्छे से देखे बिना दोनों टिकट AC में ही Book कर दिया और मुझसे बोले कि 2700 हुआ। मेरा माथा ठनका की रेलवे ने इतना किराया कब से बढ़ा दिया। जब टिकट को देखा तो पता चला दोनों टिकट AC का हुआ है। फिर मैंने बड़े ही विनम्रता से कहां - सर, मैंने रिटर्निंग का स्लीपर के लिए लिखा था। एक बार तो वह मुझे खा जाने वाली नजरो से घुरे और बिना कुछ बोले फॉर्म को गौर से देखने लगे। फर्म में स्पष्ट कैपिटल लेटर में SL लिखा हुआ था। वह बिना कुछ बोले टिकट को कैंसिल किये और मुझे रिटर्निंग के लिए स्लीपर का टिकट दे दिए। मेरा टिकट जाने का तो कंफर्म लेकिन आने का RAC - 90 था। जो उम्मीद थी कि संभवत कंफर्म हो जाएगा क्योंकि ट्रेन मगध थी।


          तय समय से हम रेलवे स्टेशन आ गए। बाहर जितनी ज्यादा गर्मी थी अंदर उतनी ही ठंडक थी। ट्रेन कब खुली, कब चली, कब स्टेशन पर रुकी इसका अहसास नहीं हो रहा था। सभी लोग अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे। कोई मोबाइल की शतरंगी दुनिया में खोया था तो कोई अपने-आप मे व्यवस्त था। किसी को किसी से मतलब नहीं थी मुझे तो अपने स्लीपर और जनरल क्लास की याद आने लगी जिसमें सभी लोग कितने मिलजुल कर यात्रा करते हैं खासकर दो औरतें यदि साथ मिल गई तो ससुराल से लेकर नईहर तक और घर से लेकर बथान तक का बखान हो जाता है। पटना से ट्रेन को खुले हुए लगभग 02 घंटे से ऊपर हो गया था। धीरे-धीरे सभी लोग अपने-अपने बैग से कंबल और चादर निकालने लगे क्योंकि रेलवे ने कोरोना के बाद से यह सुविधा देना बंद कर दिया था। मुझे तो इसका अहसास नही था और वैसे भी इतनी भीषण गर्मी में कम्बल का एक और luggage कौन बढ़ाये इसलिए मैंने कम्बल और चादर लिया नहीं था और शायद यह मेरी सबसे बड़ी गलती साबित हुई।😓

            AC Class में बैठने के साथ ही अपने आप अमीरी वाली वाले फीलिंग आने लगती हैं। इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने ₹15 वाली पानी की बोतल ₹30 में और ₹100 वाली खाने की थाली ₹200 में लिया। यहां तक तो सब ठीक-ठाक रहा। खाना खाकर जब रात में सोये तब आधी रात को अचानक से नींद खुल गई ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे किसी ने बर्फ के टुकड़ों पर लिटा दिया हो। आस-पास नजर दौड़ाई तो देखा कि सभी लोग कम्बल में लिपटे मस्ती से सो रहे हैं। समय देखा तो ठीक 12:00 बज रहा था यानी आधी रात पूरी बितानी थी लेकिन यहां तो एक मिनट बिताना मुश्किल लग रहा था। अपने सीट से उतर AC Class से बाहर निकले। बाहर निकलते ही गर्म हवा के लपटों ने चेहरे को एकदम से झुलझा🥵 दिया। वापस पुनः अपने स्थान पर आ गए। यहां पर तो शीतलता-ही-शीतलता🥶 थी। मेरे साथ समस्या यह हो रही थी कि अंदर आते तो ठंडक और बाहर निकलते तो प्रचण्ड गर्मी। पूरी रात यूं ही AC Class से बाहर आते एवं जाते ही बीती। मुझे परेशान देख मेरे एक बुजुर्ग सहयात्री ने सहानुभूति जताते हुए कहा - बेटा आपको कम्बल लेकर आनी चाहिए थी ना!!! अब उन्हें कौन समझाए कि हम तो अहसास के चक्कर में  AC Class में टिकट करा लिए थे जो की अब महंगा पड़ रहा था। हम तो बस यही सोच रहे थे कि ट्रैन कब दिल्ली पहुंचे ताकी मुझे गर्मी में इस ठंडक से छुटकारा मिले। ट्रैन तो अपने समय से ही दिल्ली पहुंची और जिस अहसास के लिए मैंने टिकट बुक कराया था वह अहसास दरवाजे पर खड़े होकर महसूस किया क्योंकि यहां पर AC की ठंडी हवा और बाहर की गर्म हवा मिलकर माहौल को खुशनुमा बना रहे थे।

           दिल्ली ससमय पहुंच गए फिर मेट्रो से अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचे। रूम पर जिनके यहां जाना था वो नही थे। उनके एक दोस्त ने स्वागत-सत्कार किया। जब वह 02-03 घंटे के उपरांत रूम पर आए तो मेरे लिए बाहर से ही फ़्रिज की जमी हुई किसी ब्रांडेड कंपनी की दही लेकर आये। शायद उन्हें लग रहा था कि इस गर्मी में दही की ठंडक जरूरी है। मेरे लिए यह समझाना मुश्किल लग रहा था कि मैं दही तो खाता नहीं हूं और दूसरी बात ठंडक की तो उससे रात भर परेशान होकर की आया हूं। मैंने उन्हें समझाया कि मैं दही नहीं खाता हूं तब वह कोल्ड ड्रिंक लेने जाने लगे मैंने उसके लिए भी उन्हें रोका और नॉर्मल पानी से ही काम चलाया।