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मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

वाल्मीकि रामायण भाग - 44 (Valmiki Ramayana Part - 44)



सीता जी से विदा लेकर हनुमान जी उत्तर दिशा की ओर बढ़े। लेकिन कुछ दूर जाने पर उन्होंने विचार किया कि सीता जी का पता तो मैंने लगा लिया, किन्तु शत्रु की शक्ति का पता लगाना भी आवश्यक है। मुझे इस बात का भी पता लगा लेना चाहिए कि रावण की सैन्य-शक्ति कितनी है, युद्ध में हमारी सेनाएँ जब लड़ेंगी, तो कौन किस पर भारी पड़ेगा और लंका को जीतने का क्या उपाय है? यह सोचते हुए हनुमान जी क्रोध से भर गए। विशाल रूप धारण करके वहाँ के बड़े-बड़े वृक्षों को वे उखाड़कर फेंकने लगे। उन्होंने उस पूरे उपवन को उजाड़ डाला। यह देखकर वहाँ के पक्षी भय से कोलाहल करने लगे और पशु आर्तनाद करते हुए भागे। इस कोलाहल को सुनकर लंका के नागरिक भी घबरा गए। उपवन की सुरक्षा में नियुक्त राक्षसियों की नींद भी इस उत्पात के कारण टूट गई। तब उन्होंने देखा कि एक विशालकाय वानर ने पूरे उपवन को उजाड़ दिया है। यह देखकर वे राक्षसियाँ सीता के पास जाकर पूछने लगीं, “सुन्दरी!!! यह विशाल वानर कौन है? कहाँ से आया है? क्यों आया है? यह तुमसे क्या बातचीत कर रहा था? तुम डरो मत। हमें सब बताओ।”
तब सीता ने उनसे कहा, “मैं तो इसे देखकर ही अत्यंत भयभीत हूँ। यह अवश्य ही कोई इच्छाधारी राक्षस होगा, किन्तु राक्षसों के बारे में मैं क्या जानूँ? वह तो तुम लोगों को ही पता होना चाहिए।” यह सुनकर वे राक्षसियाँ तुरंत ही रावण को सूचना देने के लिए बड़ी तेजी से भागीं। उन्होंने जाकर रावण से कहा, “राजन! भयंकर शरीर वाला एक वानर अशोकवाटिका में आ गया है। उसने सीता से कुछ बातचीत भी की है, किन्तु सीता हमें उस वानर के बारे में कुछ नहीं बताती। उसने पूरे उपवन को उजाड़ दिया, किन्तु जहाँ सीता रहती है, उस भाग को नष्ट नहीं किया। संभव है कि वह इन्द्र या कुबेर का दूत हो अथवा राम ने ही उसे सीता की खोज में भेजा हो।” यह सुनकर रावण क्रोध से जल उठा। उसने किंकर नाम वाले राक्षसों को तुरंत जाकर उस वानर को पकड़ लाने की आज्ञा दी। उसकी आज्ञा पाकर हजारों किंकर हाथों में कूट और मुद्गर लेकर बाहर निकले। उनकी दाढ़ें विशाल, पेट बड़ा और रूप भयानक था। उपवन के द्वार पर पहुँचते ही वे चारों ओर से हनुमान जी पर झपटे। तब हनुमान जी भी अपनी पूँछ को पृथ्वी पर पटकते हुए बड़े जोर से गर्जना करने लगे। उनकी उस गर्जना का स्वर पूरी लंका में गूँज उठा। क्रोध से गरजते हुए हनुमान जी ने कहा, “श्रीराम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव की जय हो! मैं पवनपुत्र हनुमान हूँ। सहस्त्रों रावण मिलकर भी मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं इस लंकापुरी को नष्ट कर डालूँगा।” हनुमान जी का परिचय सुनकर राक्षसों को अब कोई संदेह नहीं रह गया था कि यह राम का ही दूत है। वे सब राक्षस अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से हनुमान जी पर आक्रमण करने लगे। तब हनुमान जी ने भी वहीं द्वार के पास रखा हुआ एक लोहे का परिघ उठा लिया और उसे चारों ओर घुमाते हुए उन सबका संहार कर डाला। यह सूचना पाकर रावण का क्रोध और बढ़ गया। अब उसने प्रहस्त के पुत्र जम्बुमाली को भेजा।

उधर हनुमान जी ने सोचा कि ‘मैंने इस उपवन को तो उजाड़ दिया है, किन्तु इसके परिसर में ही बने इस प्रासाद को नहीं उजाड़ा है। अब मैं इसे भी नष्ट कर डालूँगा।’ ऐसा निश्चय करके वे उछलकर उस चैत्यप्रासाद पर चढ़ गए। वह राक्षसों के कुलदेवता का स्थान था। अब हनुमान जी उस प्रासाद को तोड़ने-फोड़ने लगे। यह देखकर वहाँ के सैकड़ों प्रहरी अनेक प्रकार के प्रास, खड्ग, फरसे, गदा, बाण आदि से हनुमान जी पर प्रहार करने लगे। तब हनुमान जी ने उसी प्रासाद के एक स्वर्णभूषित खंभे को उखाड़ लिया और उसे पकड़कर वे बड़े वेग से चारों ओर घुमाते हुए उन राक्षसों का संहार करने लगे। उस खंभे को इतने वेग से घुमाने के कारण उसमें से आग उत्पन्न हो गई, जिससे वह समूचा प्रासाद जलने लगा। तब तक रावण का भेजा हुआ जम्बुमाली भी गधे से जुते हुए रथ पर बैठकर वहाँ आ पहुँचा था। उसने प्रासाद के छज्जे पर खड़े हनुमान जी को देखते ही उन पर तीखे बाणों की वर्षा कर दी। उसने अर्धचन्द्र नामक बाण से उनके मुख पर, कर्णी नामक बाण से उनके मस्तक पर और दस नाराचों से उनकी दोनों भुजाओं पर गहरी चोट की। इससे हनुमान जी घायल हो गए और उनका मुँह रक्तरंजित हो गया। तब क्रोध में भरकर उन्होंने पास ही पड़ी एक चट्टान उठाई और पूरी शक्ति से उस राक्षस की ओर फेंकी। जम्बुमाली ने दस बाणों से उस चट्टान के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। तब हनुमान जी ने एक साल का वृक्ष उखाड़कर फेंका। उसने बाणों से उसे भी काट डाला। इस प्रकार उन दोनों के बीच बहुत देर तक युद्ध चलता रहा। अंततः हनुमान जी उसी परिघ को उठाकर इतने वेग से जम्बुमाली की ओर फेंका कि उसका पूरा शरीर चूर-चूर हो गया।

यह समाचार पाकर रावण क्रोध से उबल पड़ा। अब उसने अपने मंत्री के सात बलवान और पराक्रमी पुत्रों को हनुमान जी पर आक्रमण करने के लिए भेजा। वे एक बहुत बड़ी सेना लेकर महल से बाहर निकले। उनके विशाल रथ सोने की जाली से ढके हुए थे। उन पर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। उन्होंने भी हनुमान जी को देखते ही बाणों की वर्षा आरंभ कर दी।
तब हनुमान जी ने उन राक्षसों को भयभीत करने के लिए घोर गर्जना की और पूरे वेग से उन पर आक्रमण कर दिया। अनेकों राक्षसों को उन्होंने घूँसे और थप्पड़ से ही मार डाला। बहुतों को अपने पैरों से कुचल दिया और कुछ को अपने नखों से फाड़ डाला। कुछ राक्षसों को उन्होंने अपनी जाँघों में दबाकर मसल डाला, तो कुछ को छाती से दबाकर उनका कचूमर निकाल दिया। बहुत-से राक्षस तो उनकी गर्जना से ही घबराकर मर गए। जो शेष बचे, वे भय के कारण तुरंत ही वहाँ से भाग निकले। अब रावण के क्रोध की कोई सीमा न रही। वह भयभीत हो गया किन्तु उसने अपने भय को प्रकट नहीं होने दिया। अब उसने विरुपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण नामक अपने अपने पाँच सेनापतियों को युद्ध के लिए चुना। रावण ने उनसे कहा कि “इस प्राणी के अलौकिक पराक्रम को देखकर यह मुझे कोई वानर नहीं लग रहा है। मैंने वाली, सुग्रीव, जाम्बवान, नील, द्विविद आदि अनेकों वानर देखे हैं, किन्तु उनमें से किसी का तेज, पराक्रम, बल, बुद्धि, उत्साह ऐसा नहीं है, जैसा इसका है। संभव है कि इन्द्र अथवा नागों, यक्षों, गन्धर्वों, देवताओं, असुरों, महर्षियों ने मिलकर अपने तपोबल से इस प्राणी की रचना की हो। हमारी सेना ने अनेकों बार उन्हें परास्त किया है, अतः वे निश्चित ही हमारा अनिष्ट करना चाहते हैं। इसलिए तुम लोग बड़ी भारी सेना सावधान होकर जाओ और इस प्राणी को उचित दण्ड दो।” रावण की आज्ञा मानकर वे सब लोग उपवन में पहुँच गए। उनसे भी हनुमान जी का बहुत देर तक युद्ध चला, किन्तु अंततः वे सब भी अपने सेना सहित मारे गए। इसके बाद रावण ने अपने पुत्र अक्षकुमार को भेजा। हनुमान जी ने उसे भी यमलोक पहुँचा दिया।
अंततः रावण ने अपने सबसे पराक्रमी पुत्र मेघनाद को यह समझाकर भेजा कि, “इन्द्रजीत" तुम अपने साथ सेना लेकर मत जाना क्योंकि वे सब सेनाएँ हनुमान को देखते ही भाग जाती हैं अथवा उसके हाथों युद्ध में मारी जाती हैं। तुम वज्र भी मत ले जाओ क्योंकि हनुमान पर उसका भी कोई प्रभाव नहीं हुआ था। तुम चित्त को एकाग्र करके शत्रु की शक्ति का विचार करो और अपने धनुष से कुछ ऐसा पराक्रम दिखाओ, जिससे हमारा कार्य सिद्ध हो सके।” यह सुनकर मेघनाद ने रावण को प्रणाम किया और उत्साह में भरकर वह वाटिका की ओर बढ़ा। उसका रथ गरुड़ जैसी तीव्र गति वाला था और उसमें चार सिंह जुते हुए थे। उसने हनुमान जी पर अनेकों प्रकार के बाण और शस्त्रास्त्रों का प्रयोग किया, किन्तु वे सब विफल रहे। तब वह किसी भी प्रकार से उन्हें कैद करने का उपाय सोचने लगा और उन्हें बाँधने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र का संधान किया। मेघनाद नहीं जानता था कि हनुमान जी को ब्रह्माजी से यह वरदान मिला हुआ है कि ब्रह्मास्त्र भी उन्हें नहीं बाँध सकेगा। लेकिन हनुमान जी ने सोचा कि ‘ब्रह्मास्त्र से छूटना उचित नहीं है क्योंकि इससे ब्रह्माजी का अपमान होगा। इस प्रकार बँधे रहने का अभिनय करने से यह लाभ है कि ये राक्षस मुझे लेकर रावण के पास जाएगा और मुझे भी रावण से आमने-सामने बात करने का अवसर मिलेगा।” ऐसा सोचकर वे चुपचाप भूमि पर पड़े रहे। तब इन्द्रजीत के आदेश पर बहुत-से राक्षस वहाँ आए। उन्होंने बड़े-बड़े रस्सों से हनुमान जी को बाँध लिया। हनुमान जी भी चीखते और दाँतों को कटकटाते हुए इस प्रकार का अभिनय करने लगे, मानो उन्हें इससे बड़ा कष्ट हो रहा है। उन मूर्ख राक्षसों को यह ज्ञात नहीं था कि कोई और बन्धन बाँधने पर ब्रह्मास्त्र का बन्धन अपने आप ही छूट जाता है। लेकिन इन्द्रजीत इस बात को जानता था। वह समझ गया कि उसका ब्रह्मास्त्र अब विफल हो चुका है और केवल राक्षसों को भ्रमित करने के लिए ही हनुमान जी बंधे होने का अभिनय मात्र कर रहे हैं। इससे उसका सारा उत्साह नष्ट हो गया क्योंकि विजयी होकर भी वास्तव में वह परास्त हो गया था। अब वे सब राक्षस हनुमान जी को खींचते हुए और घूँसों से मारते हुए रावण के दरबार में ले आए। दरबार में पहुँचने पर हनुमान जी ने दुरात्मा रावण को देखा। उसकी आँखें लाल-लाल और डरावनी थीं। उसकी दाढ़ी बड़ी-बड़ी और होंठ लंबे-लंबे थे। उसका पूरा शरीर कोयले के समान काला था। उसने सोने का चमकीला एवं बहुमूल्य मुकुट पहना हुआ था। उसके शरीर पर सोने के अनेक आभूषण थे, जिनमें हीरे व कई अन्य मूल्यवान रत्न जड़े हुए थे। उसने हीरों का हार पहना हुआ था और उसके शरीर पर बहुमूल्य रेशमी वस्त्र थे। उसने लाल चन्दन लगाया हुआ था और अनेक प्रकार की विचित्र रचनाओं (गोदना/टैटू) से अपने अंगों को सजाया हुआ था। स्फटिक मणि से बने विशाल सिंहासन पर वह बैठा हुआ था। उसका सिंहासन अनेक प्रकार के रत्नों से सजा हुआ था और उस पर सुन्दर बिछौने बिछे हुए थे। वस्त्रों व आभूषणों से खूब सजी-धजी हुई अनेक युवतियाँ हाथों में चँवर लिए उसकी सेवा में सिंहासन के चारों ओर खड़ी थीं। दुर्धर, प्रहस्त, महापार्श्व और निकुम्भ, ये चार राक्षस मंत्री उसके पास ही बैठे हुए थे।
रावण ने भी हनुमान जी को देखा और अनेक प्रकार की आशंकाओं से वह भयभीत हो गया। उसने सोचा, ‘कहीं वानर के रूप में यह साक्षात नन्दी ही तो नहीं है? कहीं यह बाणासुर तो नहीं है?’, इस प्रकार के अनेक विचार घबराहट के कारण रावण के मन में आने लगे। फिर भी अपने भय को छिपाते हुए उसने क्रोध से आँखें लाल करके अपने मंत्री प्रहस्त से कहा, “अमात्य! इस दुष्ट से पूछो कि यह कहाँ से आया है और क्यों आया है? प्रमदावन को उजाड़ने और राक्षसों को मारने के पीछे इसका क्या उद्देश्य था?” तब प्रहस्त ने हनुमान जी से कहा, “वानर! तुम घबराओ मत। धैर्य रखो। तुम्हें इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण या विष्णु आदि जिसने भी भेजा है, यह तुम हमें ठीक-ठीक बता दो, तो हम तुम्हें जीवित छोड़ देंगे, अन्यथा तुम्हारा बचना असंभव है।” तब हनुमान ने उत्तर दिया, “मैं इन्द्र, यम, कुबेर या वरुण का दूत नहीं हूँ और न भगवान विष्णु ने मुझे भेजा है। मैं श्रीराम का दूत हूँ तथा राक्षस रावण से मिलने के उद्देश्य से ही मैंने उस वाटिका को उजाड़ा है। तुम्हारे राक्षस स्वयं ही मेरे पास युद्ध की इच्छा लेकर आए थे। मैंने केवल अपनी रक्षा के लिए उनका सामना किया। ब्रह्माजी के वरदान के कारण कोई भी मुझे अस्त्र या पाश में बाँध नहीं सकता। तुम्हारे राक्षस समझते हैं कि उन्होंने मुझे बाँध रखा है, जबकि रावण को देखने के लिए मैंने स्वयं ही बँधना स्वीकार किया।” फिर रावण से कहा, “मैं प्रभु श्रीराम का दूत बनकर आया हूँ, अतः मेरी बात तुम ध्यान से सुनो। वानरराज सुग्रीव तुम्हारे भाई हैं, इस नाते उन्होंने तुम्हारा कुशल-समाचार पूछा है। उन्होंने तुम्हारे लिए सन्देश भिजवाया है कि ‘दूसरे की स्त्री को बलपूर्वक अपने घर में रोके रहना अनुचित और अधर्म है। ऐसे कार्यों से सदा अनर्थ ही होता है। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। बाली का पराक्रम तो तुम जानते ही हो। ऐसे पराक्रमी को भी श्रीराम ने एक ही बाण में मार गिराया था। जनस्थान के तुम्हारे सभी राक्षसों को भी उन्होंने अकेले ही यमलोक पहुँचा दिया था। फिर तुम्हें मारना उनके लिए कौन-सी कठिन बात है? अतः तुम अपने विनाश को आमंत्रण मत दो। सीता जी को ससम्मान श्रीराम के पास वापस भेज दो।’”
हनुमान जी बातें सुनकर दुर्बुद्धि रावण क्रोध से तमतमा उठा। उसने सेवकों को आज्ञा दी, “इस दुष्ट वानर का वध कर डालो।” लेकिन विभीषण को यह बात अनुचित लगी। उसने कहा, “राक्षसराज! क्रोध को त्यागकर मेरी बात सुनिए। श्रेष्ठ राजा कभी भी दूत का वध नहीं करते हैं। आप इसे कोई और दण्ड दीजिए।” तब रावण बोला, “विभीषण! पापियों का वध करना पाप नहीं है। इस वानर ने वाटिका को उजाड़कर और हमारे राक्षसों का वध करके पाप ही किया था। अतः मैं भी इसका वध करूँगा।” तब विभीषण ने पुनः कहा, “लंकेश्वर! ज्ञानियों का कथन है कि दूत का कभी भी वध नहीं किया जा सकता। किसी अंग को विकृत कर देना, कोड़े से पिटवाना, सिर मुंडवा देना, शरीर पर कोई चिह्न दाग देना आदि दण्ड उसे दिए जा सकते हैं, किन्तु किसी भी कारण से दूत को मारा नहीं जा सकता। अतः आप भी ऐसा न करें।” “दूत तो पराधीन होता है। वह केवल अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करता है। दूत का वध करने से आपकी कीर्ति ही कलंकित होगी। अतः इसे मारने में कोई लाभ नहीं है। प्राणदण्ड तो उन्हें मिलना चाहिए, जिन्होंने इसे भेजा है। उचित यही होगा कि आप इसे वापस जाने दें ताकि यह लौटकर उन दोनों भाइयों को युद्ध के लिए उकसाए और हमारे राक्षसवीर उन्हें कैद करके आपके चरणों में ला पटकें। मेरी तो यह राय है कि उन दोनों राजकुमारों को पकड़वाने के लिए आप ही कुछ हितैषी, शूरवीर, सतर्क, गुणवान, पराक्रमी तथा अच्छा वेतन पाने वाले कुछ समर्पित राक्षसों को यहाँ से भेज दें।”

रावण ने कुछ सोचकर विभीषण की बात मान ली। फिर उसने राक्षसों से कहा, “वानरों को अपनी पूँछ बड़ी प्यारी होती है। अतः इसकी पूँछ जला दो और इसे अपमानित करने के लिए नगर की सभी सड़कों व चौराहों पर घुमाओ। इस प्रकार अपमानित होकर जब यह पीड़ित और दीन अवस्था में अपने मित्रों एवं परिवार के बीच जाएगा, तो वहाँ भी सदा लज्जित होता रहेगा।” तब राक्षस हनुमान जी की पूँछ में पुराने सूती कपड़े लपेटने लगे। उस समय हनुमान जी ने अपने शरीर का आकार बहुत अधिक बढ़ा लिया। पूँछ में वस्त्र लपेटने के बाद राक्षसों ने उस पर तेल छिड़का और आग लगा दी। उन्होंने हनुमान जी को कसकर बाँध दिया। उनकी यह अवस्था देखकर सभी स्त्री-पुरुष, बालक और वृद्ध निशाचर बड़े प्रसन्न हुए। हनुमान जी ने सोचा कि ‘यह बन्धन तोड़ना व उछलकर भाग जाना मेरे लिए कोई कठिन नहीं है, किन्तु मुझे चुपचाप इसी प्रकार बंधे रहना चाहिए। ये राक्षस मुझे सारी लंका में घुमाएँगे और कल रात्रि में अन्धकार के कारण मैं लंका के जिन स्थानों को ठीक से नहीं देख पाया था, उन्हें अब देख सकूँगा। दिन के प्रकाश में मैं लंका के दुर्ग की रचना को भी ठीक से समझ सकूँगा।’ अपनी इस योजना के अनुसार हनुमान जी चुपचाप बंधे रहे और सब राक्षस बड़े हर्ष के साथ शंख व भेरी बजाते हुए उन्हें लंका में हर ओर घुमाने लगे। हनुमान जी भी चारों ओर देखते हुए पूरे ध्यान से लंका का निरीक्षण करने लगे। उन्होंने परकोटे से घिरे हुए अनेक भूभाग, सुन्दर चबूतरे, सड़कें, मकान, छोटी-बड़ी गालियाँ, अनेक विमान आदि सब-कुछ ध्यान से देख लिया। पूरी लंका को देख लेने के बाद उन्होंने सोचा कि ‘अब मुझे इस प्रकार बंधे रहने की आवश्यकता नहीं है’। तब एक ही झटके में उन्होंने अपना बन्धन तोड़ डाला और एक ही छलांग में वे लंका के नगरद्वार पर चढ़ गए। फिर वे लंका को देखते हुए सोचने लगे कि ‘मैंने समुद्र पार करके लंका में प्रवेश कर लिया, सीता जी को ढूँढ निकाला, रावण को भी देख लिया व सारी लंका का निरीक्षण भी कर लिया। अब और क्या किया जाए, जिससे इन राक्षसों का शोक और बढ़े?’ तब उन्होंने विचार किया कि ‘जिस प्रकार मैंने वाटिका का विनाश किया था, उसी प्रकार इस लंका के दुर्ग को भी नष्ट कर देना चाहिए। इन राक्षसों से स्वतः ही मेरी पूँछ में आग लगा दी है, उसी आग से मैं लंका दहन कर दूँगा।’

यह तय करके वे अब अपनी जलती हुई पूँछ के साथ लंका के एक घर से दूसरे घर पर कूदने लगे। उन्होंने प्रहस्त, महापार्श्व, वज्रदंष्ट्र, शुक, सारण, मेघनाद, रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, द्रंष्ट्र, रोमश, मत्त, ध्वजग्रीव, विद्युज्जिह्व, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, निकुम्भ, यज्ञशत्रु, ब्रह्मशत्रु आदि अनेक राक्षसों के घरों में जा-जाकर उनमें आग दी। यहाँ तक कि उन्होंने रावण के महल को भी जला दिया। केवल विभीषण के घर को उन्होंने सुरक्षित छोड़ दिया। लंका के सारे निशाचर इस भीषण अग्निकांड से भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। उनमें से कई राक्षस आग की चपेट में आ गए। बहुत-से किसी प्रकार आग बुझाने का प्रयास करने लगे। हनुमान जी ने देखा कि उस अग्नि में जल रहे घरों से हीरा, मूँगा, नीलम, मोती, सोने, चाँदी आदि अनेक धातु पिघल-पिघलकर बह रहे हैं। तेज हवा के कारण वह आग और भी तेजी से भड़क रही थी। इस प्रकार समस्त लंका नगरी को जलाकर हनुमान जी समुद्र के जल में अपनी पूँछ की आग बुझाई। समुद्र के किनारे पर खड़े होकर जलती हुई लंका को देखते समय हनुमान जी के मन में सहसा सीता जी का विचार आया। तब उन्हें अत्यधिक चिंता होने लगी और स्वयं से घृणा से करते हुए वे मन ही मन कहने लगे, ‘हाय! अपने क्रोध के कारण मैंने यह कैसा अनर्थ कर डाला। मैं कितना निर्लज्ज और पापी हूँ। सीता जी की रक्षा का विचार किये बिना ही मैंने सारी लंका में आग लगा दी और इस प्रकार अपने ही स्वामी का कार्य बिगाड़ दिया। इस जलती हुई लंका में अवश्य ही सीता जी भी जलकर नष्ट हो गई होंगी। ऐसा पाप करने के बाद अब मैं कैसे जीवित रहूँ? अब किस मुँह से मैं श्रीराम के सामने जाऊँ?’ यह सोचते-सोचते ही उनके मन में विचार आया कि इसकी पुष्टि किए बिना मुझे केवल आशंका को ही सत्य नहीं मान लेना चाहिए। अतः उन्होंने पुनः अशोक वाटिका में जाकर सीता जी को देखने का निश्चय किया। वहाँ पहुँचने पर उन्हें सीता जी पहले की ही भाँति अशोक-वृक्ष के नीचे बैठी हुई दिखाई दीं। उन्हें सकुशल देखकर हनुमान जी बड़े प्रसन्न हुए। सीता जी को प्रणाम करके उन्होंने जाने की आज्ञा ली। अशोक वाटिका से निकलकर हनुमान जी अरिष्टगिरि पर चढ़ गए। कोहरे से ढका हुआ वह पर्वत किसी ध्यानमग्न तपस्वी जैसा शांत दिखाई दे रहा था। हनुमान जी उसके शिखर पर पहुँचे और समुद्र को पार करने के लिए बड़े वेग से उन्होंने उत्तर दिशा की ओर छलांग लगा दी।

आगे अगले भाग मे...
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस

जय श्रीराम 🙏
पं रविकांत बैसान्दर✍️


गुरुवार, 29 अगस्त 2024

वाल्मीकि रामायण भाग - 43 (Valmiki Ramayana Part - 43)



सीता को अपने वश में करने का उन राक्षसियों को आदेश देकर रावण वहाँ से चला गया। उसके जाते ही सब भयंकर राक्षसियां सीता को घेरकर बैठ गईं। हरिजटा, विकटा, दुर्मुखी आदि राक्षसियाँ एक-एक करके अत्यंत कठोर वाणी में सीता से कहने लगीं, “नीच नारी!!! तू महान राक्षसराज रावण की पत्नी बनना क्यों अस्वीकार कर रही है? जिन्होंने सभी तैंतीस देवताओं (बारह आदित्य, ग्यारह रूद्र, आठ वसु और दो अश्विनी कुमार) तथा देवराज इन्द्र को भी परास्त कर दिया, जिनका पराक्रम सर्वश्रेष्ठ है, उन महाबली राजा रावण को तू क्यों अप्रसन्न कर रही है? राक्षसराज ने नागों, गन्धर्वों और दानवों को युद्ध-भूमि में अनेक बार परास्त किया है। वे महापराक्रमी रावण स्वयं तेरे पास पधारे थे। तूने उनका ऐसा अपमान क्यों किया? राजाधिराज रावण के भय से सूर्य और वायु भी काँपते हैं। वे सबकी इच्छा पूर्ण करने में समर्थ हैं। उनकी पत्नी बनना इस संसार का सबसे बड़ा सुख है। तू उनकी बात मान ले, अन्यथा अपने प्राण गँवाएगी।”

उनकी बातें सुनकर सीता ने उत्तर दिया, “मेरे पति के पास राज्य अथवा धन हो या न हो, किन्तु मैं केवल उन्हीं में अनुरक्त रहूँगी। तुम सब लोग भले ही मुझे खा जाओ, पर मैं तुम्हारी पापपूर्ण बात कभी नहीं मानूँगी। यह सुनकर उन राक्षसियों के क्रोध की सीमा नहीं रही। उनके हाथों में फरसे चमक रहे थे। अपने लंबे व चमकीले होठों को बार-बार चाटती हुईं वे सीता को डाँटने-डपटने और धमकाने लगीं। उन भयानक राक्षसियों के प्रलाप से घबराई हुईं सीता जी वहाँ से उठकर संयोग से उसी अशोक वृक्ष के नीचे आकर बैठ गईं, जिस वृक्ष पर हनुमान जी बैठे हुए थे। लेकिन राक्षसियों ने वहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। विनता, चण्डोदरी, विकटा, प्रघसा, अजामुखी आदि अनेक राक्षसियाँ वहाँ भी आकर सीता को समझाने लगीं कि ‘तुम रावण की बात मान लो। यह यौवन सदा नहीं टिकेगा, इसलिए रावण के साथ जीवन का आनंद लो’। उनमें से कुछ आपस में बातें कर रही थीं कि ‘इस सुन्दर स्त्री के एक-एक अंग को काटकर खाने में कितना आनंद आएगा’, तो कोई तय कर रही थी कि ‘इसका कौन-सा अंग किस राक्षसी को खाने के लिए दिया जाएगा’।

ऐसी भयावह बातें सुनकर सीता श्रीराम को याद करके फूट-फूटकर रोने लगीं। मन ही मन वे सोचने लगीं कि ‘इतनी अवधि बीत गई, पर मेरे पति श्रीराम अभी तक यहाँ आए क्यों नहीं? कहीं श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ने अहिंसा का व्रत लेकर अपने शस्त्रों को तो नहीं त्याग दिया? कहीं रावण ने छल से दोनों भाइयों को मरवा तो नहीं डाला?’, पर अगले ही क्षण उन्हें लगा कि यह असंभव है। श्रीराम मेरे लिए यहाँ अवश्य आएँगे। तब उन्होंने सब राक्षसियों से पुनः दोहराया, “राक्षसियों! तुम चाहे मेरे टुकड़े-टुकड़े करके आग में भूनकर खा जाओ या मुझे जलाकर भस्म कर दो, किन्तु मैं रावण के पास कभी नहीं जा सकती। मेरे पति ने जनस्थान में अकेले ही चौदह हजार राक्षसों को मार डाला। वे अवश्य ही रावण का वध करने में भी समर्थ हैं। फिर भी यदि श्रीराम यहाँ नहीं आए, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी, पर रावण की बात नहीं मानूँगी।” यह सुनकर उन सब राक्षसियों का क्रोध और बढ़ गया। वे सीता को डराने के लिए और अधिक कठोर बातें कहने लगीं। उसी बीच त्रिजटा नामक एक बूढ़ी राक्षसी वहाँ आई। वह अभी-अभी सोकर उठी थी। आते ही उसने उन राक्षसियों से कहा, “नीच निशाचरियों!!! आज मैंने राक्षसों के विनाश का संकेत देने वाला एक बड़ा भयंकर स्वप्न देखा है। अतः तुम लोग अब सीता के नहीं, अपने प्राण बचाने की चिंता करो। स्वप्न में मैंने हाथी-दाँत की बनी हुई एक सफेद पालकी देखी, जिसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे। सफेद फूलों की माला तथा सफेद वस्त्र धारण किए हुए श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई उस पर चढ़कर यहाँ पधारे। समुद्र से घिरे एक पर्वत के शिखर पर सीता बैठी हुई थी। उसने भी सफेद वस्त्र पहने हुए थे। फिर श्रीराम चार दाँतों वाले एक विशाल गजराज पर लक्ष्मण के साथ बैठकर पर्वत-शिखर पर सीता के पास आए। श्रीराम का हाथ पकड़कर सीता भी उस हाथी पर बैठ गई। फिर वह गजराज लंका के ऊपर आकर खड़ा हो गया। इसके बाद वे तीनों दिव्य पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर उत्तर दिशा की ओर चले गए। स्वप्न में मैंने रावण को भी देखा था। वह सिर मुंडवाकर तेल से नहाया हुआ था। उसने लाल वस्त्र और करवीर (कनेर) के फूलों की माला पहनी थी। मदिरा पीकर वह मतवाला हो गया था और ऐसी अवस्था में ही वह पुष्पक विमान से नीचे धरती पर गिर पड़ा।”

“रावण ने काले कपड़े पहन रखे थे और वह गधों से जुते हुए रथ पर बैठकर कहीं जा रहा था। उसके गले में लाल फूलों की माला थी और उसने लाल चन्दन लगाया हुआ था। वह तेल पी रहा था और पागलों की भाँति हँसता हुआ नाच रहा था। फिर वह गधे से नीचे गिर गया। वह भय से घबरा रहा था और निर्वस्त्र होकर गालियाँ बकता हुआ कहीं जाने लगा। थोड़ा आगे जाकर वह मल से भरे एक बड़े तालाब में जा गिरा। कीचड़ में लिपटी एक काले रंग की स्त्री रावण का गला बाँधकर उसे दक्षिण दिशा की ओर खींचकर ले जाने लगी। मैंने महाबली कुंभकर्ण को भी इसी अवस्था में देखा। रावण के सभी पुत्र भी वैसी ही अवस्था में थे। रावण सूअर पर, इन्द्रजीत सूँस (डॉल्फिन) पर और कुंभकर्ण ऊँट पर बैठकर दक्षिण दिशा को गए। केवल विभीषण ही प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सफेद वस्त्र, सफेद माला, सफेद चन्दन लगाकर वे एक सफेद छत्र के नीचे खड़े थे। उनके पास शंखध्वनि हो रही थी, नगाड़े बजाए जा रहे थे। नृत्य एवं गीत भी हो रहा था। अपने चार मंत्रियों के साथ विभीषण आकाश में एक चार दाँतों वाले विशाल गजराज पर बैठे हुए थे। यह रमणीय लंकापुरी अपने हाथी, घोड़ों, रथों सहित समुद्र में जा गिरी थी। मैंने देखा कि श्रीराम का दूत बनकर आए एक वेगवान वानर ने इसे जलाकर भस्म कर दिया था।” “राक्षसियों! ये सब स्वप्न-संकेत बड़े स्पष्ट हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि श्रीराम अवश्य ही यहाँ आकर सीता को प्राप्त करेंगे। अपनी प्रिय पत्नी को इस प्रकार डराने-धमकाने वाली राक्षसियों को वे कदापि क्षमा नहीं करेंगे। हमें सीता को डराना-धमकाना बंद करके उससे क्षमा माँगनी चाहिए और मीठी बातें कहकर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। देखो, उसकी बायीं आँख भी फड़फड़ा रही है, जो इस बात का सूचक है कि शीघ्र ही उसे कोई शुभ समाचार मिलने वाला है।”

ये सभी बातें हनुमान जी भी छिपकर सुन रहे थे। उन्होंने सोचा कि ‘मैंने सीता का पता तो लगा लिया है, किन्तु उनसे मिलकर श्रीराम का सन्देश उन्हें सुनाना भी आवश्यक है। यदि मैंने उन्हें सांत्वना न दी, तो वे दुःख में अवश्य ही यहाँ अपने प्राण त्याग देंगी और यदि मैं उनसे मिले बिना ही लौट गया, तो श्रीराम के पूछने पर सीता का क्या सन्देश सुनाऊँगा? अतः सीता से मिलना मेरे लिए अनिवार्य है। परन्तु इन राक्षसियों के सामने सीता से बात करना भी उचित नहीं है। अब इस कार्य को कैसे संपन्न किया जाए? मुझे इन राक्षसियों के बीच ही किसी प्रकार धीरे से अपनी बात सीता को सुनानी पड़ेगी। परन्तु यदि मैं संस्कृत भाषा में बोलूँगा, तो मुझे रावण समझकर सीता भयभीत हो जाएँगी। अतः अवश्य ही मुझे उस भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिसे अयोध्या के आस-पास रहने वाले सामान्य जन बोलते हैं। अन्यथा सीता भयभीत होकर चिल्लाने लगेंगी और उनकी आवाज सुनकर राक्षसियाँ भी यहाँ पहुँच जाएँगी। उनकी सूचना पर यदि बहुत-से विकराल राक्षसों ने आकर मुझे पकड़ लिया या मार डाला, तो श्रीराम का कार्य पूर्ण नहीं हो सकेगा। यदि उन्होंने मुझे घायल कर दिया, तो मैं महासागर को पार करके वापस नहीं जा पाऊँगा। अतः कुछ ऐसा करना चाहिए कि यह कार्य सफल हो जाए। तब बहुत सोचने पर उन्होंने निश्चित किया कि ‘मैं सीताजी को उनके प्रियतम श्रीराम का ही गुणगान सुनाऊँगा। मीठी वाणी में मैं श्रीराम का सन्देश भी सीता जी को गाकर ही सुनाऊँगा, जिससे उनका मन शांत हो जाए, भय दूर हो जाए और उनका संदेह भी मिट जाए। यह निश्चय करके हनुमान जी उस वृक्ष की शाखाओं में छिपे रहकर ही मधुर-वाणी में सीता को सुनाते हुए गाने लगे। उन्होंने गाते हुए कहा कि “महान दशरथ जी के पराक्रमी पुत्र श्रीराम अपने पिता का वचन पूरा करने के लिए सीता व लक्ष्मण के साथ वन में गए। वहाँ रावण ने छल से सीता का अपहरण कर लिया। तब सीता की खोज करते हुए मतंग-वन में पहुँचे श्रीराम की मित्रता सुग्रीव नामक वानर से हो गई। वाली का वध करके श्रीराम ने सुग्रीव को वानरों का राज्य दे दिया। तब सुग्रीव की आज्ञा से हजारों वानर सीता देवी का पता लगाने के लिए चारों दिशाओं में निकले। उनमें से मैं भी एक हूँ और सौ योजन समुद्र को लाँघकर यहाँ तक आया हूँ। मैंने जानकी जी को ढूँढ निकाला है और श्रीराम ने उनका जैसा वर्णन किया है, वैसा ही मैंने उन्हें पाया है।

इतना कहकर हनुमान जी चुप हो गए।

ये बातें सुनकर सीता को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने अपने सिर को ऊपर उठाकर वृक्ष की ओर देखा। वहाँ उन्हें पवनपुत्र हनुमान जी बैठे हुए दिखाई दिए। सीता जी ने देखा कि श्वेत वस्त्र पहना हुआ एक वानर वृक्ष की शाखा के बीच छिपा हुआ बैठा है। उसका रंग कुछ-कुछ पीला था और उसकी आँखों में तपे हुए सोने जैसी चमक थी। इस प्रकार सहसा प्रकट हुए उस वानर को देखकर वे भयभीत हो उठीं और ‘हा राम! हा लक्ष्मण!’ कहकर दुःख से विलाप करने लगीं। उतने में ही वह वानर वृक्ष से नीचे उतरा और बड़ी विनम्रता से आकर उनके पास बैठ गया। उस विशाल और टेढ़े मुख वाले वानर को इतने निकट देखकर वे और भी व्यथित हो गईं। तभी हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणी में कहा, “देवी! आप कौन हैं? किस शोक में हैं? रावण जिन्हें जनस्थान से बलपूर्वक उठा लाया था, क्या आप वही सीताजी हैं?” तब सीताजी ने उत्तर दिया, “कपिवर! मैं महाराज दशरथ की पुत्रवधू, विदेहराज जनक की पुत्री और परम बुद्धिमान श्रीराम की पत्नी हूँ। मेरा नाम सीता है। विवाह के बाद बारह वर्षों तक मैं सुख से अयोध्या में रही। फिर तेरहवें वर्ष में जब श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी, तब दशरथ जी की भार्या कैकेयी ने अपने पति से वरदान माँगा कि श्रीराम को वन में भेज दिया जाए और भरत को राज्य मिले। तब श्रीराम के साथ मैं स्वयं भी वन में चली आई और उनके भाई लक्ष्मण ने भी उनका अनुसरण किया। वहाँ दण्डकारण्य में दुरात्मा रावण ने छल से मेरा अपहरण कर लिया था। उसने मेरे लिए एक वर्ष की अवधि निर्धारित की है, जिसमें से अब केवल दो मास शेष बचे हैं। उसके बाद मुझे अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा।” यह सुनकर हनुमान जी ने कहा, “देवी! मैं श्रीराम का ही दूत हूँ और आपके लिए उनका सन्देश लेकर आया हूँ। वे सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल-क्षेम पूछा है। महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी आपके चरणों में प्रणाम कहलाया है।” इन शब्दों से सीता को अत्यंत हर्ष हुआ और उन्हें प्रसन्न देखकर हनुमान जी को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। तब हनुमान जी उनके थोड़ा और निकट चले गए। लेकिन इससे सीता को शंका हो गई कि ‘कहीं यह रावण ही तो नहीं है, जो रूप बदलकर आ गया है। जनस्थान में भी वह संन्यासी का रूप धारण करके आया था।’ यह सोचकर वे पुनः दुःख से कातर होकर भूमि पर बैठ गईं। भयभीत होकर उन्होंने हनुमान जी की ओर देखे बिना ही कहा, “तुम यदि रावण हो और इस प्रकार रूप बदलकर मुझे कष्ट दे रहे हो, तो यह अच्छी बात नहीं है। वैसे मेरी यह शंका झूठी भी हो सकती है क्योंकि तुम्हें देखने पर मुझे प्रसन्नता भी हुई थी। तुम यदि सचमुच ही श्रीराम के दूत हो, तो श्रीराम और लक्ष्मण के कुछ चिह्न मुझे बताओ। उनकी आकृति का वर्णन करके मेरा संशय दूर करो। मुझे बताओ कि उनसे तुम्हारा संपर्क कहाँ हुआ तथा वानरों व मनुष्यों का यह मेल कैसे हुआ?” तब हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, “देवी! मैंने जिन चिह्नों को देखा है, वह मैं आपको बताता हूँ। श्रीराम के नेत्र विशाल और सुन्दर हैं, मुख चन्द्रमा के समान मनोहर है। उनके कंधे मोटे-मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और गला शंख के समान है। गले की हँसली मांस से ढकी हुई है और नेत्रों में कुछ लालिमा है। उनका स्वर गंभीर है। उनके मस्तक में तीन भँवरें हैं। पैरों के अँगूठे के नीचे तथा ललाट में चार-चार रेखाएँ हैं। वे चार हाथ ऊँचे हैं। उनके भाई लक्ष्मण भी श्रीराम के ही समान हैं। दोनों भाइयों में केवल इतना ही अंतर है कि लक्ष्मण के शरीर का रंग गोरा और श्रीराम का रंग श्याम है। वानरों के राजा सुग्रीव श्रीराम के मित्र हैं। उनके ही आदेश पर मैं श्रीराम का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। मैं सुग्रीव का मंत्री हूँ और मेरा नाम हनुमान है। जब वे दोनों भाई आपको खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत के निकट आए, तब सुग्रीव ने उनका परिचय पाने के लिए मुझे भेजा था। तभी मेरा उन दोनों से संपर्क हुआ था। श्रीराम ने अपने पराक्रम से बाली को मारकर सुग्रीव को वानरों का राज्य दिलवाया। उसी से हम वानरों और मनुष्यों का यह मेल हुआ है। आपने अपहरण के बाद आकाश-मार्ग से लाए जाते समय वानरों को देखकर जो आभूषण फेंके, वे भूमि पर गिरकर बिखर गए थे। तब मैं ही उन्हें बटोरकर लाया था। जब वे हमने श्रीराम को दिखाए, तो उन्होंने तुरंत ही उन्हें पहचान लिया और आपका स्मरण करके वे दुःख से व्याकुल हो गए। फिर आपकी खोज में सुग्रीव ने वानरों को चारों दिशाओं में भेजा। बहुत दिनों तक विंध्याचल में खोजकर हम हार गए और दुःख से पीड़ित होकर समुद्रतट पर विलाप करने लगे। तब जटायु के भाई सम्पाती ने हमें बताया कि आप समुद्र के इस पार लंका में हैं। इसी कारण मैं सौ योजन के समुद्र को लाँघकर कल रात में ही लंका आया हूँ। मैं सत्य कह रहा हूँ। आप मेरी बात पर विश्वास कीजिए।”

इस प्रकार हनुमान जी ने सीता को बहुत-सी बातें बताईं और फिर श्रीराम की अंगूठी उन्हें दिखाई। उसे देखकर सीता जी का संदेह दूर हो गया और उन्हें विश्वास हो गया कि ये श्रीराम के ही दूत हैं, कोई मायावी राक्षस नहीं। तब सीताजी बोलीं, “कपिश्रेष्ठ! तुम निश्चित ही कोई असाधारण वानर हो क्योंकि तुम्हारे मन में रावण जैसे दुष्ट राक्षस का भी कोई भय नहीं है। स्वयं श्रीराम ने तुम्हें भेजा है, अतः तुम अवश्य ही इस योग्य हो कि मैं तुम पर विश्वास करूँ क्योंकि वे कभी किसी ऐसे पुरुष को नहीं भेजेंगे, जिसके पराक्रम तथा शील की उन्होंने परीक्षा न कर ली हो। तुम मुझे बताओ कि श्रीराम जी कैसे हैं? क्या वे मेरे लिए शोक संतप्त हैं? कहीं वे मुझे भूल तो नहीं गए? क्या वे मुझे इस संकट से उबारेंगे? वे अभी तक यहाँ आए क्यों नहीं हैं? यह सुनकर हनुमान जी ने कहा - देवी!!! श्रीराम को अभी यह पता ही नहीं है कि आप लंका में हैं। अब यहाँ से लौटकर मैं उन्हें यह जानकारी दूँगा और तब वे शीघ्र ही वानर-भालुओं की विशाल सेना साथ लेकर निकलेंगे तथा महासागर पर सेतु बाँधकर लंका में पहुँच जाएँगे। फिर वे राक्षसों का संहार कर देंगे और आप पुनः उनके पास पहुँच जाएँगी। तब सीता बोलीं - हनुमान!!! तुम उनसे जाकर कहना कि वे शीघ्रता करें। केवल एक वर्ष पूरा होने तक ही मेरा जीवन शेष है। अब उसमें केवल दो माह का ही समय बचा है। रावण के भाई विभीषण ने उसे बहुत बार समझाया है, किन्तु वह मुझे लौटाने की बात नहीं मानता। विभीषण की ज्येष्ठ पुत्री (बड़ी बेटी) का नाम कला है। उसकी माता ने एक बार उसे मेरे पास भेजा था। उसी ने मुझे ये सारी बातें बताई हैं। अविन्ध्य नामक एक और श्रेष्ठ राक्षस है, जो बड़ा बुद्धिमान, विद्वान तथा रावण का सम्मान पात्र है। उसने भी रावण को समझाया था किन्तु रावण किसी की बात नहीं मानता।

यह सुनकर हनुमान जी बोले, “देवी! आप धैर्य रखिये। श्रीराम शीघ्र ही यहाँ आएँगे अथवा आप आज्ञा दें, तो मैं आपको अभी अपनी पीठ पर बिठाकर यहाँ से ले जाऊँगा और आज ही श्रीराम के पास पहुँचा दूँगा। मैं जिस प्रकार यहाँ आया था, उसी प्रकार आकाशमार्ग से आपको ले जाऊँगा। तब सीता बोलीं, “कपिवर! तुम्हारे साथ जाना मेरे लिए उचित नहीं है क्योंकि तुम्हारा वेग वायु के समान तीव्र है। उस वेग के कारण आकाशमार्ग से जाते समय मैं नीचे समुद्र में गिर सकती हूँ। तुम जब यहाँ से मुझे लेकर निकलोगे, तो तुम्हारे साथ स्त्री को देखकर राक्षसों को अवश्य ही संशय होगा। तब तुम मेरी रक्षा और उनसे युद्ध एक साथ कैसे करोगे? यदि तुमने वह कर भी लिया, तब भी श्रीराम का अपयश होगा क्योंकि लोग कहेंगे कि वे स्वयं अपनी स्त्री की रक्षा के लिए कुछ भी न कर सके। एक और कारण यह भी है कि रावण ने तो बलपूर्वक मुझे स्पर्श किया था, किन्तु स्वेच्छा से मैं श्रीराम के सिवा किसी पुरुष को स्पर्श नहीं करना चाहती। अतः यही सर्वथा योग्य है कि श्रीराम यहाँ आकर रावण का वध करें और मुझे अपने साथ ले जाएँ।

यह सुनकर हनुमान जी ने कहा - देवी! महासागर को पार करके लंका में प्रवेश करना सेना के लिए बहुत कठिन है। इसी कारण तथा आपको आज ही श्रीराम से मिलवा देने के विचार से ही मैंने आपको पीठ पर ले जाने का प्रस्ताव दिया था। अब आपकी आज्ञानुसार मैं वापस लौटकर उन्हें आपका सन्देश सुनाऊँगा, किन्तु आप अपनी कोई पहचान ही मुझे दे दीजिए, जिससे उन्हें विश्वास हो जाए कि मैं सचमुच आप ही से मिला था। तब सीता ने ऐसे दो-तीन निजी प्रसंग बताए, जो केवल उन्हें और श्रीराम को ही ज्ञात थे। साथ ही उन्होंने कपड़े में बँधी हुई सुन्दर चूड़ामणि भी हनुमान जी को दी। फिर सीताजी उनसे बोलीं - हनुमान!!! अब तुम शीघ्र यहाँ से लौटकर श्रीराम को मेरा समाचार बताओ एवं मेरा दुःख दूर करो। इस पापी रावण ने मुझे यहाँ कैद कर रखा है व प्रतिदिन राक्षसियों द्वारा मुझे बहुत पीड़ा दी जाती है। यह पापी निशाचर बड़ा क्रूर है। मेरे प्रति कलुषित दृष्टि रखता है। फिर भी केवल श्रीराम से मिलने की आस में ही मैं किसी प्रकार जीवित हूँ। तुम श्रीराम से कहना कि वे शीघ्रता करें और यहाँ आकर मुझे ले जाएँ। उन्होंने तो मेरे लिए एक साधारण-से कौए पर भी ब्रह्मास्त्र चला दिया था, फिर वे इस नीच रावण द्वारा मेरा अपमान होने पर भी मौन क्यों हैं? अब मैं इन कष्टों को सहते हुए अधिक काल तक यहाँ जीवित नहीं रह सकती। यह सुनकर हनुमान जी ने पुनः उन्हें सांत्वना दी और उनसे विदा लेकर उत्तर-दिशा की ओर प्रस्थान किया।

आगे अगले भाग में…
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस

(नोट: वाल्मीकि रामायण में इन सब घटनाओं को बहुत विस्तार से बताया गया है। मैं केवल सारांश ही लिख रहा हूँ। मैं जो कुछ लिख रहा हूँ, वह वाल्मीकि रामायण में दिया हुआ है। जिन्हें आशंका या आपत्ति है, वे कृपया मूल ग्रन्थ को स्वयं पढ़ें।)

जय श्रीराम 🙏
रविकांत बैसान्दर✍️

सोमवार, 5 अगस्त 2024

वाल्मीकि रामायण भाग - 42 (Valmiki Ramayana Part - 42)


रावण के महल में हर ओर खोजने पर भी जब सीता नहीं दिखाई दीं, तो हनुमान जी बहुत चिंतित हो गए। उनके मन में विचार आया कि ‘अवश्य ही सीता अब जीवित नहीं हैं। इस दुराचारी राक्षस ने उन्हें मारा डाला होगा। यहाँ की सभी राक्षस-दासियाँ अत्यंत भीषण एवं विकराल हैं। भयभीत सीता ने उन्हें देखकर प्राण त्याग दिए होंगे। सीता को न खोज पाने के कारण मेरा यहाँ तक आना ही विफल हो गया। सुग्रीव ने हमें लौटने के लिए जो अवधि बताई थी, वह भी बीत चुकी है। अतः अब वहाँ जाने का मार्ग भी बंद हो गया है। अब वानर मुझसे पूछेंगे कि मैंने लंका जाकर क्या किया, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?’ ऐसा सोचते हुए वे निराश होने लगे किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने फिर विचार किया कि ‘हताश न होकर उत्साह को सदा बनाए रखना ही सफलता का आधार है। अतः मुझे इस प्रकार निराश नहीं होना चाहिए। अब तक मैंने आपानशाला, पुष्पगृह, चित्रशाला, क्रीड़ागृह, पुष्पक विमान आदि में सीता को खोज लिया। अब अन्य स्थानों में भी मुझे खोज करनी चाहिए।’ यह निश्चय करके हनुमान जी नये उत्साह से आगे बढ़े। अब उन्होंने तहखानों में, परकोटे के भीतर की गलियों में, वृक्षों के नीचे बनी वेदियों में और यहाँ तक कि गड्ढों और पोखरों में भी खोजा। रावण के अन्तःपुर का ऐसा कोई स्थान नहीं बचा, जहाँ हनुमान जी ने सीता को न खोजा हो। फिर भी सीता उन्हें कहीं नहीं मिलीं।

तब वे वहाँ से निकलकर परकोटे पर चढ़ गए और बड़े वेग से इधर-उधर टहलते हुए कुछ सोचने लगे। उनके मन में विचार आया कि ‘सम्पाती ने तो यही बताया था कि सीता जी रावण के महल में हैं, किन्तु यहाँ तो वे कहीं भी दिखाई नहीं दे रहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि जब रावण उनका अपहरण करके आकाशमार्ग से ला रहा था, तब वे रथ से नीचे गिर पड़ी हों या भीषण समुद्र को उतनी ऊँचाई से देखने पर भय के कारण उनके प्राण निकल गए हों अथवा क्रोधित रावण ने या उसकी पत्नियों में से किसी ने ईर्ष्या के कारण सीता जी को अपना आहार बना लिया हो?’ अब हनुमान जी को निश्चय हो गया कि अवश्य ही सीता जीवित नहीं हैं। तब उन्होंने सोचा कि ‘श्रीराम अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते हैं। उन्हें सीता की मृत्यु का समाचार नहीं देना चाहिए। उन्हें इससे अत्यंत दुःख होगा। लेकिन यदि न बताऊँ, तो भी उचित नहीं है। अब क्या किया जाए? अब तो मैं किष्किन्धा भी वापस नहीं जा सकता हूँ, ऐसे में क्या करूँ? अब या तो मैं वानप्रस्थी हो जाऊँगा अथवा जल-समाधि लेकर या अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दूँगा। लेकिन सीता का पता लगाये बिना मैं वापस नहीं लौटूँगा।’ यह सब सोचते-सोचते सहसा हनुमान जी ने सोचा कि ‘उधर एक बहुत बड़ी अशोक वाटिका है, जिसमें मैंने अभी तक सीता जी को खोजा ही नहीं। अब मुझे यहाँ भी ढूँढना चाहिए।’ यह सोचते ही हनुमान जी तुरंत खड़े हो गए और मन ही मन सभी देवताओं को नमस्कार करके अशोक वाटिका की ओर बढ़े और उसकी चारदीवारी पर चढ़ गए। वहाँ हनुमान जी को साल, अशोक, निम्ब, चम्पा, बहुवार, नागकेसर तथा आम आदि अनेक प्रकार के वृक्ष दिखाई दिए। कोयल आदि कई प्रकार के पक्षी वहाँ कलरव कर रहे थे। सीता की खोज करते हुए हनुमान जी एक से दूसरे वृक्ष पर जाने लगे। उन वृक्षों के हिलने से फूल झड़ने लगे और वहाँ की पूरी भूमि फूलों से आच्छादित हो गई। वाटिका में हनुमान जी को अनेक सरोवर दिखाई दिये, जिनमें कमल खिले हुए थे और चक्रवाक, पपीहा, हंस और सारस कलरव कर रहे थे। अनेक नदियाँ उन सरोवरों को जल से भरा रखती थीं। वहाँ हनुमान जी ने बादल के समान काला और ऊँचे शिखर वाला एक पर्वत भी देखा, जिसकी चोटियाँ बड़ी विचित्र थीं। उसमें पत्थर की अनेक गुफाएँ थीं। उस पर्वत से एक नदी भी गिरती हुई दिखाई दे रही थी। वहाँ शीतल जल से भरा हुआ एक कृत्रिम तालाब भी था, जिसमें श्रेष्ठ मणियों की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और उसमें रेत की जगह मोती भरे हुए थे। विश्वकर्मा के बनाए हुए बड़े-बड़े महल और कृत्रिम वन उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।

फिर हनुमान जी ने एक अशोक का वृक्ष देखा, जो चारों ओर से स्वर्ण की वेदिकाओं से घिरा हुआ था। वे लपक कर उस वृक्ष पर चढ़ गए और उन्होंने सोचा कि ‘दुःख से व्याकुल होकर इधर-उधर घूमती हुई सीता अवश्य ही मुझे यहाँ से दिखाई देंगी। यह प्रातःकाल की पूजा का समय है, अतः अवश्य ही जानकी जी यहाँ जलाशय के तट पर आएँगी।’ यह सोचकर हनुमान जी उस ऊँचे वृक्ष पर बैठे-बैठे आस-पास का निरीक्षण करने लगे। वहाँ से थोड़ी ही दूर पर उन्हें एक ऊँचा गोलाकार मंदिर दिखाई दिया, जिसमें एक हजार खंभे लगे हुए थे। वह कैलास पर्वत के समान सफेद रंग था और उसमें मूँगे की सीढ़ियां व सोने की वेदियाँ बनाई गई थीं। उस मंदिर को देखते-देखते उनकी दृष्टि एक सुन्दर स्त्री पर पड़ी, जो राक्षसियों से घिरी हुई थी। वह स्त्री अत्यंत दुर्बल और कातर दिखाई पड़ रही थी तथा बार-बार दुःख से सिसक रही थी। वह पीले रंग का रेशमी वस्त्र पहने हुए थी। अत्यंत शोक के कारण वह अत्यधिक क्षीण हो गई थी और दुःख के कारण उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी। उसे देखकर हनुमान जी ने अनुमान लगाया कि अवश्य यही सीता है। तब इस अनुमान की पुष्टि करने के लिए उन्होंने उस स्त्री को ध्यान से देखा। सीता ने जो आभूषण वानरों के बीच गिराये थे, उन्हें देख लेने के बाद श्रीराम ने बताया था कि अब सीता के शरीर पर कौन-से आभूषण बचे होंगे। हनुमान जी ने अब उसी बात की ओर ध्यान दिया। सुन्दर कुण्डल तथा कुत्ते के दाँतों जैसी आकृति वाले त्रिकर्ण नामक कर्णफूल उस स्त्री के कानों में सुशोभित थे। हाथों में मणि और मूँगे जड़े हुए कंगन थे। ये सब आभूषण ठीक वैसे ही थे, जैसा कि श्रीराम ने बताया था। यद्यपि बहुत दिनों से पहने होने के कारण वे कुछ काले पड़ गए थे किन्तु आकार-प्रकार से अभी भी वे पहचाने जा सकते थे। इन सब प्रमाणों को देखकर हनुमान जी को विश्वास हो गया कि सीता जी यही हैं। उनकी वह अवस्था देखकर हनुमान जी दुःख से व्यथित हो गए, परन्तु उन्हें इस बात से प्रसन्नता भी हुई कि अंततः उन्होंने सीता जी को ढूँढ निकाला है।

जब यह निश्चित हो गया कि वह स्त्री ही सीता है, तो हनुमान जी उससे मिलने के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा में वृक्ष पर ही छिपकर बैठे रहे। दिन बीत जाने पर जब चन्द्रमा का उदय हो गया, तब हनुमान जी ने सीता को देखने के लिए पुनः दृष्टि दौड़ाई। उन्हें दिखाई दिया कि सीता के आस-पास अनेक विकराल राक्षसियाँ बैठी हुइ है, उनमें से कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ी-मेढ़ी, कोई विकराल, तो कोई पीली आँखों और विकट मुँह वाली थीं। वे सब राक्षसियाँ अशोक-वृक्ष को चारों ओर से घेरकर उससे कुछ दूरी पर बैठी हुई थीं। सीताजी उसी वृक्ष के नीचे बैठी हुई थीं। उनके मुख पर दीनता छाई हुई थी। उनकी आँखें शोक में डूबी हुई थीं और उनका शरीर बहुत दुर्बल दिखाई दे रहा था। लगभग पूरी रात बीत गई, पर हनुमान जी को सीता जी के पास जाने के लिए उपयुक्त अवसर नहीं मिल पाया। अब केवल एक पहर की रात बाकी थी। लंका में जो राक्षस वेदों के छहों अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद और ज्योतिष) सहित संपूर्ण वेदों के विद्वान थे, उनके घरों से हनुमान जी को वेदपाठ की ध्वनि सुनाई देने लगी।उचित समय पर मंगलवाद्यों तथा सुखद शब्दों के द्वारा लंकापति रावण को जगाया गया। काम-विकारी होने के कारण उस दुष्ट निशाचर ने जागते ही सबसे पहले सीता का ही विचार किया। उसने अनेक प्रकार के आभूषण धारण किए, सब प्रकार की साज-सज्जा की और अशोक वाटिका में प्रवेश किया। उसकी लगभग एक सौ सुन्दर पत्नियाँ भी उसके पीछे-पीछे वहाँ गईं। उनमें से कुछ ने सोने के दीपक अपने हाथों में पकड़े हुए थी। रावण के आगे-आगे भी कुछ स्त्रियाँ प्रकाश के लिए मशाल लेकर चल रही थीं। उन सबके आने का स्वर सुनते ही हनुमान जी तुरंत पत्तों की आड़ में छिप गए। उन्होंने देखते ही पहचान लिया कि यही रावण है, क्योंकि पिछली रात उसी राक्षस को उन्होंने महल में सोया हुआ देखा था। जैसे ही सीता जी ने उस नीच को आते हुए देखा, तो वे भय के समान थर-थर काँपने लगीं। उस दुराचारी की दृष्टि से स्वयं को बचाने के लिए उन्होंने अपने अंगों को समेट लिया और श्रीराम का स्मरण करके अत्यंत दुःख से रोने लगीं। पापी रावण ने वहाँ पहुँचते ही अश्लील बातों से अपने मन के विकारों को प्रकट कर दिया। वह सीता को देखकर बोला, “सुन्दर अंगों वाली सीते! मुझे देखकर तुम अपने स्तनों को इस प्रकार क्यों छिपा रही हो? परायी स्त्रियों को बलपूर्वक उठा लाना या उनकी इच्छा के बिना भी उनका उपभोग करना राक्षसों की परंपरा ही है। इसमें कोई अधर्म नहीं है। अतः तुम भी मेरी बात मान लो और मेरी शैय्या पर चलो। तुम्हें यह सौंदर्य ऐसे मैले-कुचैले वस्त्र पहनने, भूमि पर सोने, उपवास करने और चिंतामग्न रहने के लिए नहीं मिला है। मुझे स्वीकार करके तुम सुन्दर पुष्पमालाओं, चंदन, अगरु, अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण, स्वादिष्ट भोजन, पेय, सुखद शय्या, नृत्य-गान, संगीत-वाद्य आदि का सुख भोगो। तुम पतिव्रता होने का संकल्प छोड़ो और मेरे इस राज्य की महारानी बन जाओ। मुझे पराजित करना असुरों व देवताओं के लिए भी असंभव है। फिर तुम्हारा पति तो एक तुच्छ मानव है। वह मुझसे युद्ध करने का विचार भी नहीं कर सकता। वैसे भी अपना राज्य और सम्मान गँवाकर वह वन-वन भटक रहा है। मुझे तो संदेह है कि अब वह जीवित भी है या नहीं। तुमको पाना तो दूर, वह तुमको अब कभी देख भी नहीं सकेगा।"

नीच रावण के ऐसे कलुषित विचार सुनकर सीता जी को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने दुःख के साथ कातर स्वर में कहा - पापी!!! तू परायी स्त्री में मन लगाना छोड़ दे और अपनी पत्नियों से ही प्रेम कर। परायी स्त्रियों के मोह में पड़ने वाला पुरुष सदा ही कष्ट पाता है, तेरे इस दुष्कृत्य के कारण सब राक्षसों का विनाश होगा और यह संपूर्ण लंकापुरी ही नष्ट हो जाएगी। जिस प्रकार सूर्य से उसकी किरणें अलग नहीं हो सकतीं, उसी प्रकार मैं भी श्रीराम से अलग नहीं हूँ। किसी भी ऐश्वर्य, धन अथवा सुख के लोभ से तू मुझे लुभा नहीं सकता। यदि तू जीवित रहना चाहता है, तो चुपचाप मुझे श्रीराम के पास वापस भेज दे और उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँग ले। युद्ध में श्रीराम और लक्ष्मण के सामने टिकना तेरे लिए असंभव है। ऐसे कठोर वचनों को सुनकर रावण क्रोधित हो गया। उसने कहा, “सीता! तू पांखडी और तिरस्कार के योग्य है। मेरे इस अपमान के लिए तुझे प्राण-दण्ड दिया जाना चाहिए, फिर भी केवल मेरे मोह के कारण ही तू अभी तक जीवित है। अब विचार करने के लिए तेरे पास केवल दो माह का समय शेष है। उसके बाद तुझे मेरी शैय्या पर आना ही होगा। यदि तूने मुझे प्रसन्न नहीं किया, तो मेरे भोजन के लिए रसोइये तेरे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे।”

यह सुनकर सीता ने तिरस्कार पूर्वक कहा, “नीच राक्षस! तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, फिर तूने श्रीराम को छल से दूर हटाकर उनकी स्त्री क्यों चुराई? यह सुनकर रावण क्रोध से जल उठा। उसकी आँखें अंगारों के समान लाल हो गईं। और फिर गर्जना के स्वर में वहाँ उपस्थित राक्षसियों से कहा, निशाचरियों! तुम सब किसी भी प्रकार यह प्रयास करो कि सीता जल्दी ही मेरे वश में आ जाए। रावण को इस प्रकार क्रोध से व्याकुल देखकर रानी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नामक सुन्दर राक्षसी ने आकर उसका आलिंगन कर लिया और बोली, “राक्षसराज! इस तुच्छ मानव-कन्या के कारण आप क्यों कष्ट उठा रहे हैं? आप महल में चलकर हमारे साथ प्रेम-क्रीड़ा कीजिए। इस दुष्टा के भाग्य में सुख नहीं लिखा है, तभी यह इस प्रकार यहाँ पड़ी कष्ट पा रही है। यह सुनकर रावण अट्टहास करता हुआ उनके साथ वहाँ से चला गया। जो राक्षस-कन्याएँ उसके साथ आई थीं, वे भी उसके पीछे-पीछे चली गईं।

आगे अगले भाग में…
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस

जय श्रीराम 🙏

पं रविकांत बैसान्दर✍️

गुरुवार, 1 अगस्त 2024

वाल्मीकि रामायण भाग - 41 (Valmiki Ramayana Part - 41)


समुद्र पार करके हनुमान जी लंका के त्रिकूट पर्वत पर उतरे और नगर में प्रवेश करने से पहले उसका अवलोकन करने लगे। वहाँ से उन्हें चीड़, कनेर, खजूर, चिरौंजी, नींबू, कुटज, केवड़े, पिप्पली, अशोक आदि अनेक प्रकार के वृक्ष दिखाई दिए, जिन पर बहुत-से पक्षी बैठे हुए थे। उन्होंने अनेक जलाशय भी देखे। लंका के चारों ओर सुरक्षा के लिए गहरी खाई खुदी हुई थी और हाथों में धनुष, शूल और पट्टिश लिए हुए भयंकर राक्षस निरंतर वहाँ पहरा देते थे। तब हनुमान जी विचार करने लगे कि ‘यदि वानर-सेना यहाँ तक आ भी जाए, तो भी सब व्यर्थ ही होगा क्योंकि लंका इतनी अधिक सुरक्षित है कि देवता भी उस पर विजय नहीं पा सकते। ऐसा लगता है कि इससे दुर्गम स्थान तो कोई है ही नहीं। परन्तु पहले मुझे यह पता लगाना चाहिए कि विदेह कुमारी सीता जीवित भी हैं या नहीं। उसके बाद मैं आगे की बातों पर विचार करूँगा।’ तब वे मन में सोचने लगे कि ‘भयभीत, अविवेकी अथवा स्वयं को अत्यधिक बुद्धिमान समझने वाले दूत के कारण ही कई बार राजा के काम बिगड़ जाते हैं। अतः मुझे कुछ ऐसा करना होगा, जिससे मुझे घबराहट या अविवेक न हो जाए और श्रीराम का काम न बिगड़े। अन्यथा समुद्र को पार करके इतनी दूर तक आना भी व्यर्थ हो जाएगा।’ इस नगरी में ऐसा कोई स्थान नहीं दिखाई देता, जहाँ राक्षसों से छिपकर जाना संभव हो। यहाँ तक कि मैं यदि राक्षस रूप में भी जाऊँ, तो भी उनकी दृष्टि से बचा नहीं जा सकता। तो फिर किस प्रकार यह कार्य किया जाए, जिससे एकांत में जानकी जी से भेंट भी हो जाए और श्रीराम का कार्य भी न बिगड़े? इस विषय में बहुत विचार करने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि ‘मैं इस रूप में लंका में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि राक्षस मुझे पहचान लेंगे। अतः यही उचित है कि मैं रात्रि के समय नगर में प्रवेश करूँ और ऐसा रूप बना लूँ, जिसे देख पाना कठिन हो। मैं अपने इसी रूप में छोटा-सा शरीर धारण करके लंका में प्रवेश करूँगा।’

ऐसा निश्चय करके वीर हनुमान जी सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे। सूर्यास्त हो जाने पर उन्होंने अपने शरीर को बहुत छोटा बना लिया। अब उनका आकार बिल्ली के बराबर हो गया था। प्रदोष-काल में अपने इस लघु-रूप में हनुमान जी फुर्ती से उछलकर उस रमणीय नगरी के परकोटे पर चढ़ गए। वहाँ से वे लंकापुरी का निरीक्षण करने लगे। लंका की चारदीवारी और प्रवेश-द्वार सोने के बने हुए थे। उन सब पर हीरे, मोती, नीलम आदि जड़े हुए थे। उन द्वारों का ऊपरी भाग चाँदी का बना होने के कारण श्वेत दिखाई देता था। प्रत्येक द्वार पर रमणीय सभा-भवन बने हुए थे, जिनकी सीढ़ियाँ नीलम की थीं और फर्श को भी मणियों से सजाया गया था। लंका नगरी में चौड़े-चौड़े विशाल राजमार्ग थे। उनके दोनों ओर प्रासादों की पंक्तियाँ दूर तक फैली हुई थीं। सुनहरे खंभों और सोने व मोतियों की जालियों से सजी वह नगरी बड़ी रमणीय दिखाई देती थी। उन्होंने अनेक ऊँचे-ऊँचे महलों को देखा, जिन्हें वन्दनवारों से सजाया गया था। यह सब देखते हुए हनुमान जी ने सीता की खोज के लिए अब लंका में प्रवेश किया।

हनुमान जी को देखते ही लंका नगरी स्वयं ही राक्षसी के रूप में उनके सामने आकर खड़ी हो गई। उसका मुँह बड़ा विकट था। बड़े जोर से गर्जना करते हुए उसने पूछा - वनचारी वानर!!! तू कौन है और यहाँ किस कार्य से आया है? अपने प्राण बचाना चाहता है, तो सब ठीक-ठीक बता दे। रावण की सेना इस नगरी की चारों ओर से सुरक्षा करती है। तेरा यहाँ प्रवेश करना असंभव है। यह सुनकर हनुमान जी बोले - क्रूर नारी!!! तेरे प्रश्नों का उत्तर मैं बाद में दूँगा। पहले तू यह तो बता कि मुझ पर इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँटने वाली तू कौन है?’ तब कुपित होकर लंका ने कहा, “वानर! मैं स्वयं लंका नगरी हूँ। मेरी अवहेलना करके यहाँ प्रवेश करना असंभव है। मैं रावण की सेविका हूँ और यहाँ की रक्षा करती हूँ। तब हनुमान जी बोले, “मैं तो केवल इस सुन्दर नगरी की अट्टालिकाओं, परकोटों, नगरद्वारों, वनों, उपवनों, उद्यानों आदि को देखने आया हूँ। इस नगरी को देखने के लिए मेरे मन में बड़ा कौतूहल है।” इस पर क्रोधित होकर लंका ने पुनः कठोर वाणी में कहा, “दुष्ट वानर!!! तू मुझे परास्त किए बिना इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता।” हनुमान जी ने उसे समझाया, “भद्रे! इस लंकापुरी को देखकर मैं चुपचाप लौट जाऊँगा। तू मुझे इसमें प्रवेश करने दे। लेकिन अचानक ही लंका ने भयंकर गर्जना करते हुए एक जोरदार थप्पड़ हनुमान जी को मार दिया। इससे क्रोधित होकर उन्होंने भीषण सिंहनाद किया और अपनी बायीं अंगुलियों को मोड़कर मुट्ठी बाँध ली। लंका स्त्री थी, इस कारण उन्होंने अपने क्रोध को बहुत नियंत्रण में रखा और उस पर केवल एक हल्का-सा ही प्रहार किया। लेकिन इतने भर से ही वह निशाचरी व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़ी और क्षमा माँगती हुई बोली, “कपिश्रेष्ठ! शास्त्रों में स्त्री को अवध्य बताया गया है, अतः आप मेरे प्राण मत लीजिए। आपने अपने पराक्रम से मुझे परास्त कर दिया है। मैं आपको एक सच्ची बात बताती हूँ। ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि ‘जब कोई वानर आकर अपने पराक्रम से तुझे परास्त कर दे, तो तू समझ जाना कि राक्षसों पर बड़ी भारी विपत्ति आ चुकी है।' अब आपको देखकर मैं समझ गई हूँ कि वह समय आ चुका है एवं सीता के कारण दुरात्मा रावण तथा समस्त राक्षसों का विनाश होने वाला है। अतः आप निर्बाध रूप से इस नगरी में प्रवेश कीजिए।

तब हनुमान जी ने निर्भय होकर लंकापुरी में इस प्रकार प्रवेश किया, मानो उन्होंने शत्रु के सिर पर ही अपना बायाँ पैर रख दिया हो। लंका में प्रवेश करके हनुमान जी राक्षसों के घरों को देखते हुए आगे बढ़े। उनमें से किसी का आकार कमल जैसा था, किसी पर स्वास्तिक के चिह्न बने हुए थे। वे सभी घर चारों ओर से सजे हुए थे। एक से दूसरे घरों में जाते समय उन्हें मनोहर गीत-संगीत और नर्तकियों की पायलों की झनकार सुनाई दी। अनेक निशाचरों को उन्होंने मन्त्र जपते हुए सुना और बहुत-से राक्षसों को स्वाध्याय में तत्पर भी देखा। नगर के मध्यभाग में कोई जटा बढ़ाया हुआ, कोई सिर मुंडाया हुआ, कोई मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किया हुआ, तो कोई बिल्कुल हीनिर्वस्त्र था। उन निशाचरों में से कोई बड़े कुरूप थे, तो कोई बहुत सुन्दर। किन्हीं के मुँह टेढ़े-मेढ़े थे। कोई बड़े विशाल थे, तो कोई बौने। किसी-किसी की एक ही आँख थी और कितनों के ही पेट बहुत बड़े-बड़े थे। कुछ अन्य घरों में उन्हें विवाहिता, धर्मपरायण स्त्रियाँ भी दिखीं, वहाँ से आगे बढ़ने पर उन्हें नगर की रक्षा के लिए नियुक्त एक लाख राक्षसों की रक्षक-सेना का विशाल भवन दिखाई दिया। वे सब सैनिक रावण के अंतःपुर की रक्षा के लिए नियुक्त थे। उस आरक्षा-भवन के आगे हनुमान जी को त्रिकूट पर्वत के एक शिखर पर बना रावण का महल दिखा। उसके चारों ओर सुरक्षा के लिए खाई बनी हुई थी, जिसमें अनेक कमल खिले हुए थे। उस महल का परकोटा बहुत ऊँचा था। महल में उसमें संगीत के स्वर गूँज रहे थे। घोड़ों की हिनहिनाहट भी सुनाई पड़ रही थी। थोड़ा निकट जाने पर हनुमान जी को आभूषणों की झनकार भी सुनाई दी। उन्हें अनेक प्रकार के रथ, पालकी, विमान, हाथी, अनेक पशु-पक्षी आदि भी दिखे। सहस्त्रों पराक्रमी राक्षस उस महल की रक्षा में नियुक्त थे। सबसे छिपकर आगे बढ़ते हुए हनुमान जी ने रावण के उस महल में प्रवेश किया। वह महल चाँदी के मढ़े हुए चित्रों, सोने से जड़े हुए दरवाजों और अद्भुत ड्योढ़ियों तथा सुन्दर द्वारों से युक्त था। हाथी पर चढ़े हुए अनेक महावत और कई शूरवीर वहाँ उपस्थित थे। अनेक रथवाहक अश्व भी उन्हें दिखाई दिए। वे रथ सिंह और बाघ की खाल से बने हुए कवचों से ढके हुए थे। उनमें हाथी-दाँत, सोने तथा चाँदी की प्रतिमाएँ रखी हुई थीं। उनमें लगी छोटी-छोटी घंटियाँ रथ के चलने पर बजने लगती थीं। ऐसे अनेक रथ निरंतर वहाँ आ-जा रहे थे।वहाँ शंख, भेरी और मृदंग का स्वर गूँज रहा था। उस राजभवन को प्रतिदिन सजाया जाता था और पर्वों के दिन वहाँ हवन किया जाता था। उस महल तथा वहाँ के बाग-बगीचों आदि को देखने के बाद हनुमान जी कूदकर प्रहस्त के घर में जा पहुँचे। वहाँ से निकलकर वे महापार्श्व के महल में गए थे। फिर उछलकर वे कुम्भकर्ण के भवन में और फिर वहाँ से विभीषण के महल में कूद गए। इसके बाद एक-एक करके उन्होंने महोदर, विरुपाक्ष, विद्युज्जिह्व, विद्युन्मालि, वज्रदंष्ट्र, शुक, सारण, इंद्रजीत, जम्बुमालि, सुमाली, रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, वज्रकाय, धूम्राक्ष, विद्युद्रूप, भीम, घन, विघन, शुकनाभ, चक्र, शठ, कपट, ह्रस्वकर्ण, द्रंष्ट्र, लोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, द्विजिह्न, हस्तिमुख, कराल, पिशाच और शोणिताक्ष आदि के महलों को भी देखा और उन सबके घरों व समृद्धि का निरीक्षण कर लिया। लेकिन सीता उन्हें कहीं भी दिखाई नहीं दी थी। इससे वे अत्यंत दुःखी और चिंतित हो गए। तब वे पुनः रावण के महल में लौटे। वहाँ उन्हें रावण के कक्ष की रक्षा करने वाली राक्षसियाँ दिखाई दीं, जिनकी आँखें बड़ी विकराल थी।

वहाँ हनुमान जी को रावण का पुष्पक विमान भी दिखाई दिया। वह विमान विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी के लिए बनाया था। बड़ी तपस्या करके कुबेर ने ब्रह्माजी से वरदान में उसे पाया था। फिर कुबेर को परास्त करके रावण ने वह विमान छीन लिया। वह अनेक रत्नों से सजा हुआ था और अत्यंत सुन्दर दिखाई देता था। उसका आधार सोने और मणियों के पर्वत जैसा बनाया गया था। उस विमान को देखकर हनुमान जी को बड़ा ही विस्मय हुआ। हनुमान जी उस दिव्य पुष्पक विमान पर चढ़ गए। उसमें सोने और स्फटिक के झरोखे और खिड़कियाँ लगी हुई थीं। सुन्दर मणियों की वेदियाँ रची गई थीं। उसका फर्श अनेक प्रकार के मूँगों, मणियों, मोतियों आदि से जड़ा हुआ था। उसमें अनेक प्रकार के पेय और खाद्यपदार्थ रखे हुए थे। विमान को देखने के बाद हनुमान जी ने रावण के भवन में प्रवेश किया। वहाँ भी हनुमान जी को रंग-बिरंगे वस्त्र पहनी हुईं तथा आभूषणों व पुष्पों से सजी हुई अनेक सुन्दर स्त्रियाँ दिखाई दीं। उनमें से कुछ मधुपान के मद (शराब का नशा) तथा कुछ निद्रा के कारण सो गई थीं। उन भवन में इधर-उधर देखते समय हनुमान जी को एक सुन्दर पलंग दिखाई दिया, जिस पर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। हाथी-दाँत और सोने आदि से उसे सजाया गया था। उसके एक भाग में चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र था, जो सुन्दर मालाओं से सुशोभित था। उसके चारों ओर बहुत-सी स्त्रियाँ खड़ी होकर हाथों में चँवर लेकर हवा कर रही थीं। वहाँ कक्ष बहुत अच्छी सुंगध से व्याप्त था। उस पलंग पर हनुमान जी ने दुष्ट रावण को सोया हुआ देखा। उसका पूरा शरीर भयंकर काला था। उसके अंगों में लाल चन्दन लगा हुआ था। अत्यधिक मदिरा पीने के कारण उसकी आँखें भी लाल-लाल थीं। उनके कानों में कुण्डल झिलमिला रहे थे और उसके वस्त्र सुनहरे रंग के थे। कुछ दूरी पर छिपकर हनुमान जी ध्यान से उसका निरीक्षण करने लगे। उसकी दोनों भुजाएँ बहुत बड़ी-बड़ी थीं। उसके शरीर पर युद्धों के घाव के अनेक चिह्न थे। उसकी अंगुलियाँ और हथेलियाँ बहुत बलिष्ठ थीं। सुन्दर युवतियाँ धीरे-धीरे उसके हाथों को दबा रही थीं। उसके कुण्डलों से उसका मुख प्रकाशित हो रहा था उसकी छाती पर लाल चन्दन लगा हुआ था और उसने गले में हार पहना हुआ था। उसकी कमर के निचे भाग एक ढीले-ढाले रेशमी वस्त्र से ढका हुआ था और उसने पीले रंग की बहुमूल्य रेशमी चादर ओढ़ रखी थी। उसके आस-पास ही हनुमान जी को उसकी अनेक पत्नियाँ भी सोई हुई दिखाई दीं। उन सबसे अलग एकांत में बिछे हुए एक पलंग पर सोयी हुई एक सुन्दर युवती हनुमान जी को दिखाई दी। वह गोरे रंग की थी और उसका रूप बड़ा मनोहर था। वह रावण के अन्तःपुर की स्वामिनी थी। उसका नाम मंदोदरी था, लेकिन उसे देखकर हनुमान जी को लगा कि अवश्य यही सीता है। ऐसा सोचकर वे कुछ क्षणों के लिए अत्यंत हर्षित हो गए। लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि सीता जी तो इस समय अपने पति श्रीराम से बिछड़ी हुई हैं। ऐसी दशा में वे न तो श्रृंगार कर सकती हैं, न आभूषण धारण कर सकती हैं और मदिरापान तो किसी भी प्रकार नहीं कर सकती हैं। यह असंभव है कि वे अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के निकट भी जाएँ। अतः अवश्य ही ये सीता नहीं, कोई और ही है। उन सब स्त्रियों को देखते-देखते हनुमान जी के मन में सहसा यह विचार आया कि ‘गहन निद्रा में सोयी हुई परायी स्त्रियों को इस प्रकार देखना उचित नहीं है। यह तो अधर्म है। उन्हीं स्त्रियों के बीच मुझे उन सबका अपहरण करने वाले दुष्टात्मा रावण को भी देखना पड़ा। ऐसे पापी को तो देखना भी अशुभ है।’ लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि ‘मैंने केवल सीता जी को ढूँढने की विवशता में ही इन सब स्त्रियों को देखा था। स्त्री को खोजने के लिए स्त्रियों के बीच ही देखना आवश्यक था, उसे वन की हरिणियों में नहीं खोजा जा सकता था। किसी भी स्त्री की ओर देखते समय मेरे मन में कोई विकार भी नहीं आया है। मेरा मन शुद्ध है, अतः इस कार्य में मुझसे कोई पाप नहीं हुआ है।

यह सब सोचते हुए हनुमान जी उस भवन से बाहर निकलकर रावण के भोजनालय में पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े बर्तनों में दही और नमक मिलाकर हिरण, भैंसे, सूअर, मुर्गे, गेंडे, साही आदि का माँस रखा हुआ था। अनेक प्रकार के पक्षी, खरगोश, बकरे, भैंसे, मछली, भेड़ें आदि के माँस भी राँध-पकाकर रखे हुए थे। वहाँ कई प्रकार की चटनी, खटाई आदि भी रखी हुई थी। वहाँ के मदिरालय में राग और खाण्डव (अंगूर और अनार के रस में मिश्री और शहद मिलाकर बनने वाली शराब), शर्करासव (चीनी से बनने वाली शराब), माध्वीक (शहद से बनने वाली शराब), पुष्पासव (महुए के पुष्प से बनने वाली शराब) आदि कई प्रकार की मदिरा भी रखी हुई थी। लंका में अनेक स्थानों पर और उस महल में हर जगह खोजने पर भी जब सीता कहीं नहीं मिली, तो अब हनुमान जी अत्यंत चिंता में पड़ गए।

आगे अगले भाग में…
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस

जय श्रीराम 🙏

पं रविकांत बैसान्दर ✍️

मंगलवार, 30 जुलाई 2024

वाल्मीकि रामायण भाग - 40 (Valmiki Ramayana Part - 40)


समुद्र तट पर दुःखी बैठे उन वानरों को रोता देख उस गिद्ध ने अपने आप से ही कहा, “जिस प्रकार पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार मनुष्य को अपने किये का फल मिलता है, उसी प्रकार बहुत समय के बाद आज मुझे यह भोजन अपने आप ही मिल गया है। इन वानरों में से जो-जो मरता जाएगा, मैं उसे खाता जाऊँगा।” उस गिद्ध की बात सुनकर अंगद को बड़ा दुःख हुआ और वह हनुमान जी से बोला - हम लोगों ने न श्रीराम का कार्य पूर्ण किया और न हम अपने राजा सुग्रीव की आज्ञा का ही पालन कर पाए। ऊपर से अब हम पर यह नई विपत्ति आ पड़ी है। हम सबने सुना है कि गिद्धराज जटायु ने किस प्रकार अपने मित्र राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम का कार्य करते हुए सीता की रक्षा में प्राण दिए। अब हमें भी उसी प्रकार जीवन का मोह छोड़कर अपने प्राण त्याग देने चाहिए। अंगद के मुँह से जटायु का नाम सुनकर वह गिद्ध चौंक उठा। उसने ऊँचे स्वर में पूछा यह कौन है, जो मेरे प्राणों से भी प्रिय भाई जटायु के वध की बात करके मेरे हृदय को कँपा रहा है? आज बहुत दिनों के बाद मुझे अपने प्यारे भाई का नाम सुनने को मिला। मुझे बताओ जटायु का युद्ध किससे हुआ था ?

वानरों!!! मेरे पंख सूर्य की किरणों से जल गए हैं। मैं उड़ नहीं सकता। तुम लोग मुझे नीचे उतार दो। मैं अपने भाई की मृत्यु का वृत्तांत सुनना चाहता हूँ। यह सुनकर वे वानर आशंकित हो गए कि यह गिद्ध कहीं हमें खा तो नहीं जाएगा। फिर उन्होंने सोचा कि ‘हम तो स्वयं ही अपने प्राण त्यागने का विचार कर रहे थे। यह हमें खा जाए तो अच्छा ही होगा।’ ऐसा सोचकर उन्होंने उसे नीचे उतार लिया। फिर अंगद ने अपना परिचय देकर उसे श्रीराम के वनवास, सीता के अपहरण तथा रावण से युद्ध में जटायु के वध का वृत्तांत सुनाया और उसे बताया कि अपने राजा सुग्रीव की आज्ञा से हम लोग सीता को खोज में निकले हैं। यह सुनकर उस गिद्ध की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा - वानरों! मेरा नाम सम्पाती है। जटायु मेरा छोटा भाई था। बहुत समय पहले हम दोनों भाइयों में एक बार यह शर्त लगी थी कि सूर्यास्त होने से पहले हम दोनों उड़कर सूर्य तक पहुँच जाएँगे। यह तय करके हम आकाश में जा पहुँचे। आकाश की ऊँचाई से देखने पर पृथ्वी के बड़े-बड़े नगर भी रथ के पहियों जैसे छोटे दिखाई देते थे, बड़े-बड़े पर्वत सरोवर में खड़े हाथियों जैसे दिखते थे और जंगल के विशाल वृक्ष हरी घास के तिनकों जैसे दिखाई पड़ते थे। जब हम सूर्य के मार्ग पर पहुँचे, तब तक हम दोनों को बड़ी थकावट लगने लगी और शरीर से बहुत पसीना बहने लगा। शीघ्र ही हमें मूर्च्छा होने लगी। सूर्य की चमक के कारण हमारे नेत्र भी कुछ देख नहीं पा रहे थे और न हम दिशा का अनुमान लगा पाते थे। सूर्य के तेज से मेरा भाई जटायु शिथिल होने लगा और मुझे बताए बिना ही वह धरती की ओर उतरने लगा। तब उसकी रक्षा के लिए मैंने अपने पंखों से उसे ढँक लिया। लेकिन इससे मेरे दोनों पंख जल गए और मैं मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। छः रातें बीतने पर मुझे होश आया, तब धीरे-धीरे अनुमान लगाकर मैंने जाना कि मैं समुद्र के तट पर विंध्य पर्वत के पास गिरा हूँ। वायु के पथ का विचार करके मुझे लगता है कि मेरा भाई जटायु संभवतः जनस्थान में उतरा था। उस घटना के बाद मैं उससे कभी नहीं मिल पाया और आज तुमसे मुझे उसकी मृत्यु का दुःखद समाचार प्राप्त हुआ है। अब मैं बूढ़ा हो चुका हूँ, इसलिए अपने भाई की हत्या का बदला नहीं ले सकता। इसी कारण इतनी दुःखद बात को सुनकर भी चुपचाप सह रहा हूँ। तुम लोग मुझे समुद्र के किनारे पर ले चलो। मैं अपने भाई को जलांजलि देना चाहता हूँ।

तब वानर उसे समुद्र के निकट ले गए और सम्पाती ने अपने भाई को जलांजलि देकर समुद्र में स्नान किया। इसके बाद सब वानर पुनः उसे पर्वत पर ले गए और फिर उसके चारों ओर घेरा बनाकर बैठ गए। तब अंगद ने कहा - गिद्धराज!!! यदि आप उस नीच रावण के निवास का पता जानते हैं, तो हमें बताइये। तब सम्पाती ने कहा - वानरों!!! जब से मैं वृद्ध हो गया, तभी से मेरा पुत्र सुपार्श्व ही आहार देकर मेरा भरण-पोषण करता है। एक दिन उसने मुझे बताया था कि उसने दुष्ट रावण को एक सुन्दर युवती का हरण करके ले जाता हुआ देखा था। वह घबराई हुई स्त्री ‘हा राम! हा लक्ष्मण!’ की रट लगा रही थी और अपने गहने फेंकती जा रही थी। तुम्हारे मुँह से राम का नाम सुनकर अब मुझे लगता है कि वह स्त्री अवश्य सीता ही रही होगी। वह दुरात्मा रावण महर्षि विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है। यहाँ से चार सौ कोस की दूरी पर समुद्र में एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्मा ने रमणीय लंकापुरी का निर्माण किया है। उसके दरवाजे और महल सोने के बने हुए हैं और उनके भीतर चबूतरे भी सोने के ही हैं। उस नगरी की चारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्य की भाँति चमकती है। रावण वहीं निवास करता है। गिद्ध होने के कारण मैं बहुत दूर तक का देख सकता हूँ। इसी कारण मुझे यहीं से लंका नगरी भी दिखाई देती है। मैंने देखा है कि पीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई सीता वहाँ रावण अंतःपुर में नजरबंद हैं। बहुत सारी राक्षसियाँ उनकी पहरेदारी करती हैं। लंका नगरी चारों ओर से समुद्र से घिरी हुई है। उसके दक्षिणी तट पर पहुँचने पर तुम रावण को देख सकोगे। अब तुम किसी प्रकार इस समुद्र को पार करने का उपाय सोचो। तुम लोगों की सहायता करके मैं भी रावण से अपने भाई के वध का बदला लेना चाहता हूँ। सीता का पता चल जाने से वानरों को बड़ी प्रसन्नता हुई और सम्पाती से विदा लेकर वे लोग दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े और उन्होंने दक्षिण समुद्र (हिन्द महासागर) के तट पर पहुँचकर डेरा डाला। अब समुद्र को देखकर वे लोग चिंतित हुए कि इसे कैसे पार किया जाए। तब अंगद ने सब वानरों से पूछा - सज्जनों!!! तुम लोगों में से जो भी इस समुद्र को पार सकता है, वही अब सुग्रीव के आदेश को पूर्ण करने में हमारा सहायक हो सकता है। अतः मुझे बताओ कि तुम में से कौन कितनी दूर तक जा सकता है। यह सुनकर सभी वानर अपनी-अपनी शक्ति का परिचय देने लगे। गज ने एक छलांग में दस योजन, गवाक्ष ने बीस, शरभ ने तीस योजन, ऋषभ ने चालीस योजन, गन्धमादन ने पचास, मैन्द ने साठ, द्विविद ने सत्तर योजन, सुषेण ने अस्सी तथा सबसे बूढ़े ऋक्षराज जाम्बवान ने नब्बे योजन तक जा सकने की बात कही। सबकी बात सुनकर अंगद ने कहा कि “मैं इस महासागर की सौ योजन की दूरी को अवश्य ही पार कर सकता हूँ, किन्तु उधर से वापस लौटने के लिए भी मुझमें उतनी शक्ति बचेगी या नहीं, यह मैं निश्चित नहीं कह सकता। इस पर वृद्ध जाम्बवान ने उत्तर दिया, “राजकुमार! तुम्हारी शक्ति पर हमें कोई संदेह नहीं है, किन्तु तुम हमारे नेता हो, अतः तुम्हें भेजना हमारे लिए उचित नहीं है। यदि नेता पर ही कोई विपत्ति आ गई, तो यह पूरा समूह बिखर जाएगा, अतः तुम्हें नहीं भेजा जा सकता।

तब अंगद ने कहा - यदि मैं भी नहीं जाऊँगा तथा कोई अन्य वानर भी नहीं जा सकता, तो हम सुग्रीव की आज्ञा कभी पूरी नहीं कर पाएँगे। फिर तो हमें यहीं प्राण त्यागने पड़ेंगे। हम सब लोगों में आप ही सबसे अनुभवी हैं। अतः अब आप ही विचार करें कि यह कार्य कैसे पूर्ण किया जाए। यह सुनकर जाम्बवान बोले - वीर अगंद!!! तुम इसकी चिंता न करो। केवल एक ही ऐसा वीर है, जो इस कार्य को सिद्ध कर सकता है। ऐसा कहते हुए उन्होंने हनुमान जी की ओर देखा। उन्हें किसी बात का भय नहीं था और वे दूर एकांत में आनंद से बैठे हुए थे। तब जाम्बवान ने हनुमान जी के पास जाकर कहा - हनुमान!!! तुम वानरों में सबसे वीर हो और शास्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ हो। तुम पराक्रम में सुग्रीव के समान और बल में श्रीराम के समान हो। तुम गरुड़ के समान शक्तिशाली व तीव्रगामी भी हो। तुम्हारे बल, बुद्धि, तेज और धैर्य की किसी से तुलना नहीं हो सकती। फिर तुम एकान्त में यहाँ चुपचाप क्यों बैठे हो ? तुम तो इतने शक्तिशाली हो कि बचपन में एक बार तुमने उगते हुए सूर्य को फल समझकर आकाश की ओर छलांग लगा दी थी और अंतरिक्ष में तुम सूर्य के पास पहुँच गए। तब इन्द्र ने कुपित होकर तुम पर व्रज से प्रहार कर दिया था। तब उसकी चोट से तुम्हारी हनु (ठोड़ी) का बायाँ भाग खण्डित हो गया। उसी कारण तुम्हारा नाम हनुमान पड़ा। तुम पर हुए प्रहार को देखकर पवन देव को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने तीनों लोकों में वायु के प्रवाह को रोक दिया। इससे चारों ओर खलबली मच गई। तब समस्त लोकपालों के अनुरोध पर ब्रह्मा जी ने यह वर दिया कि तुम युद्ध में किसी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारे जा सकोगे। तुम वज्र के प्रभाव से भी पीड़ित नहीं हुए थे। यह देखकर इन्द्र ने तुम्हें वरदान दिया कि मृत्यु भी तुम्हारी इच्छा के अधीन रहेगी। पराक्रमी वीर!!! तुम्हारी गति और शक्ति सब प्राणियों से बढ़कर है। तुम अपने बल को पहचानो। यह सारी वानरसेना तुम्हारा पराक्रम देखना चाहती है। जिस प्रकार भगवान विष्णु ने वामन रूप में आकर तीनों लोकों को नापने के लिए पग बढ़ाए थे, उसी प्रकार अब तुम भी इस समुद्र को लांघने के लिए आगे बढ़ो।

यह सुनकर हनुमान जी को अपनी शक्ति का विश्वास हो गया और उन्होंने वानरों की ओर देखकर अपना विराट रूप प्रकट किया। हनुमान जी का आकार सहसा बढ़ने लगा। यह देखकर वानरों में हर्ष व्याप्त हो गया और वे उनकी स्तुति करते हुए जोर-जोर से गर्जना करने लगे। हनुमान जी का वह विशाल रूप बड़ा ही बलवान दिखाई पड़ता था। जिस प्रकार पर्वत की कन्दरा में कोई सिंह अंगड़ाई लेता है, उसी प्रकार अंगड़ाई लेते हुए वे भी अपने शरीर का आकार बढ़ाते गए। फिर हनुमान जी ने हाथ जोड़कर वहाँ उपस्थित वानरों से कहा - वानरों!!! मैं वायुदेवता का औरस पुत्र हूँ और उन्हीं के समान मुझमें भी समस्त ग्रह-नक्षत्रों तक को लाँघ जाने की शक्ति है, अब मुझे विश्वास हो गया है कि मैं लंका में जाकर अवश्य ही विदेहकुमारी का दर्शन करूँगा। अतः अब तुम लोग शोक को त्याग दो और आनंद मनाओ।वानरों!!! जब मैं यहाँ से छलाँग मारूँगा, तब संसार में कोई भी मेरे वेग को संभाल नहीं सकेगा। इस विशाल महेन्द्र पर्वत के शिखर ही मेरे वेग को संभाल सकते हैं, अतः मैं वहीं से छलाँग लगाऊँगा। ऐसा कहकर हनुमान जी महेन्द्र पर्वत की ओर आगे बढ़े और अपने चित्त को एकाग्र करके उन्होंने लंका का स्मरण करते हुए मन ही मन अपनी योजना का विचार किया।

यहाँ से सुन्दरकाण्ड आरंभ हो रहा है।


समुद्र पार करने हेतु सौ योजन की छलांग लगाने के लिए हनुमान जी महेन्द्र पर्वत के ऊँचे शिखर पर चढ़ गए। उनके विशाल आकार के कारण वह पर्वत उनके चरणों से दबकर कुचला जाने लगा। उसकी शिलाएँ इधर-उधर बिखरने लगीं व उनके बीच से नए झरने फूटने लगे। बड़े-बड़े सर्प घबराकर अपने बिलों में छिप गए, वृक्ष झोंके खाकर हिलने लगे, पशु-पक्षी भयभीत हो गए। लेकिन हनुमान जी ने किसी पर ध्यान नहीं दिया। उनका ध्यान केवल अपना लक्ष्य पूरा करने की योजना में लगा हुआ था। अपने मन को एकाग्र करके वे केवल लंका के बारे में ही सोच रहे थे। श्रीराम के कार्य को पूर्ण करने का निश्चय करके हनुमान जी ने बड़े वेग से ऊपर की ओर छलाँग मारी। उस झटके से पूरा पर्वत हिल गया और उसके वृक्ष उखड़कर हवा में इधर-उधर बिखर गए। विशालकाय हनुमान जी का शरीर समुद्र से ऊपर था और उनकी परछाई जल में डूबी हुई दिखाई दे रही थी। समुद्र के जिस भाग की ओर वे बढ़ते थे, वहाँ ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगती थीं। उनके वेग से समुद्र का जल बहुत ऊपर तक उठने लगा। इसके कारण समुद्र के भीतर रहने वाले मगर, मछलियाँ, कछुए भी साफ-साफ दिखाई देने लगे। आकाश में जाते हनुमान जी गरुड़ के समान दिखाई दे रहे थे। उनकी छाया दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी थी। वे बार-बार बादलों में घुसते और निकलते जा रहे थे। समुद्र में स्थित मैनाक पर्वत उन्हें देखकर ऊपर उठने लगा। तब हनुमान जी ने सोचा कि ‘मेरे मार्ग में यह विघ्न खड़ा हो रहा है। अतः उन्होंने एक धक्के से उस पर्वत के शिखर को नीचे गिरा दिया। तब उस पर्वत ने ही मनुष्य रूप में उनसे हाथ जोड़कर कहां - पवनपुत्र!!! मुझे समुद्र ने ही आपकी सेवा के लिए नियुक्त किया है। आप कुछ देर तक मेरे शिखर पर विश्राम कर लीजिए, फिर आगे बढ़ियेगा। तब हनुमान जी बोले, “मैनाक! मुझे तुमसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई, किन्तु मैंने मार्ग में कहीं न ठहरने का संकल्प लिया है। यह दिन बीता जा रहा है तथा मुझे अपना महत्वपूर्ण कार्य शीघ्र पूरा करना है। अतः मैं यहाँ नहीं ठहर सकता। ऐसा कहकर उन्होंने उस पर्वत को हाथों से स्पर्श किया और पुनः आकाश की ओर बढ़ने लगे। पर्वत और समुद्र दोनों ने बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया।

थोड़ा आगे बढ़ते ही मार्ग में विकराल सुरसा राक्षसी से उनका सामना हुआ। उसका रूप बड़ा विकट, बेडौल और भयावह था। वह हनुमान जी से बोली - अब तुम मेरा भक्ष्य बनोगे। मेरे मुँह में चले आओ। तब हनुमान जी ने कहा - देवी! दुष्ट रावण ने दशरथ के पुत्र श्रीराम की पत्नी सीता का हरण कर लिया है। मैं श्रीराम का दूत बनकर सीता के पास जा रहा हूँ। मुझे यह कार्य पूर्ण कर लेने दो, फिर मैं स्वयं तुम्हारे मुँह में चला आऊँगा। यह सुनकर सुरसा बोली - मुझे ब्रह्माजी से यह वरदान मिला है कि कोई मुझे लाँघकर आगे नहीं जा सकता। अतः तुम्हें मेरे मुँह में प्रवेश करना ही पड़ेगा। यह सुनकर हनुमान जी कुपित हो गए। उन्होंने सुरसा से कहा, “ठीक है, तुम अपना मुँह इतना बड़ा बना लो, जिसमें मैं समा सकूँ। तब सुरसा ने अपना मुँह दस योजन विस्तृत बना लिया। हनुमान जी ने भी अपना आकार उतना ही और बड़ा कर लिया। फिर उसने अपना मुँह बीस योजन बढ़ाया, तो हनुमान जी ने अपने शरीर को तीस योजना का बना लिया। इस प्रकार चालीस, पचास करते-करते सुरसा के मुख का विस्तार सौ योजन का हो गया। तब बुद्धिमान हनुमान जी ने तुरंत ही अपने शरीर को संकुचित कर लिया और वे अँगूठे के बराबर छोटे हो गए। फिर सुरसा के मुँह में प्रवेश करके अगले ही क्षण वे बाहर भी निकल आए। उन्होंने सुरसा से कहा, “दक्षकुमारी! मैंने तुम्हारे मुँह में प्रवेश करके वरदान को सत्य कर दिया। अब मुझे आगे बढ़ने का मार्ग दो।” यह सुनकर राक्षसी सुरसा अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुई। उसने हनुमान जी से कहा, “कपिश्रेष्ठ! मुझे देवताओं ने तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए भेजा था। अब तुम निश्चिन्त होकर आगे बढ़ो व श्रीराम के कार्य को सिद्ध करो।” अब पुनः एक बार हनुमान जी बादलों के बीच आकाश-मार्ग से आगे बढ़ने लगे। तब इच्छानुसार रूप धारण कर सकने वाली सिंहिका राक्षसी की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्हें देखकर वह सोचने लगी, “आज बहुत समय के बाद ऐसा विशालकाय जीव मेरे वश में आया है। इसे खाने के बाद कई दिनों के लिए मेरी भूख मिट जाएगी।” ऐसा सोचते हुए उसने हनुमान जी की छाया पकड़ ली। तब हनुमान जी ने सोचा, “अहो!!! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया। मेरा पराक्रम क्षीण हो रहा है।” यह सोचते हुए उन्होंने अगल-बगल में और ऊपर-नीचे दृष्टि डाली। तभी उन्हें समुद्र के ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय जीव दिखाई दिया। उस विकराल मुख वाली राक्षसी को देखकर उन्होंने सोचा, “वानरराज सुग्रीव ने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीव की चर्चा की थी, निःसंदेह यह वही है।” यह सोचकर उन्होंने अपने शरीर को बढ़ाना आरंभ किया। उनका आकार बढ़ता देख सिंहिका ने भी अपना मुँह और फैला लिया। मेघों की घटा के समान गर्जना करती हुई वह हनुमान जी की ओर दौड़ी। महाकपि हनुमान जी ने उसके मर्मस्थानों को लक्ष्य बनाया। फिर अपने शरीर को छोटा करके वे उसके विकराल मुख में घुस गए और उसके हृदय को नष्ट करके बड़े वेग से ऊपर उछलकर बाहर भी निकल आए। अपने प्राण गँवाकर वह विकराल राक्षसी समुद्र के जल में गिर पड़ी।

इन सब विघ्नों को पार करके आगे बढ़ते हुए हनुमान जी अंततः समुद्र के दूसरे किनारे के पास तक पहुँच गए। वहाँ उन्हें वृक्षों से हरा-भरा लंका का द्वीप दिखाई दिया। उसे देखकर उन्होंने विचार किया, “मेरे इस विशाल शरीर एवं तीव्र वेग से राक्षसों का ध्यान मेरी ओर आकर्षित हो जाएगा और कौतूहलवश वे मेरा भेद जानने को उत्सुक हो जाएँगे। अतः मुझे अपना आकार छोटा कर लेना चाहिए।” ऐसा सोचकर उन्होंने अपने विशाल शरीर को पुनः छोटा कर लिया और वे अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए। तब वे केवड़े, नारियल आदि के वृक्षों से भरे त्रिकूट पर्वत पर उतर गए और अमरावती के समान सुन्दर दिखाई देने वाली लंकापुरी को ध्यान से देखने लगे।

आगे अगले भाग में…
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस
जय श्रीराम 🙏
पं रविकांत बैसान्दर✍️