बाजारों में मोल बताकर,
हम भी बिकना सीख रहे हैं।
हमको भी कविता पढ़नी है,
कविता लिखना सीख रहे हैं।
सीख रहे हैं हम भी लिखना जीवन की परिभाषा को।
अंतर्मन की पीड़ाओं को, हारी थकी निराशा को।
सोच रहे हैं हम भी कल से खुद में कुछ परिवर्तन लाएं।
कोशिश है की सबके जैसे हम भी राग भैरवी गाएं।
साधक ! आओ करो आकलन
हम ,क्या, कितना सीख रहे हैं।
हमको भी कविता पढ़नी है
कविता लिखना सीख रहे हैं।
अब अंधों के कहने पर भी अभिनय मुझको दिखलाना है।
कुछ पैसों के लोभ में आकर बहरों के सम्मुख गाना है।
मुझे पता है मंच पे खुद को कब कितना विस्तार है करना।
दो अर्थों के गीत हैं पढ़ने नित्य नवल अभिसार है करना।
पहन कलावा, कड़ा, अंगूठी,
कवि सा दिखना सीख रहे हैं।
हमको भी कविता पढ़नी है,
कविता लिखना सीख रहे हैं।
ज्ञात है मुझको सत्य बोलकर खुद को दुष्ट नही करना है।
कविकुल के जो इन्द्रदेव हैं उनको रुष्ट नही करना है।
मंचो पर हैं रावण जितने उनको सदा, राम है कहना।
मन में लाख द्वेष हो सबसे किंतु सभी के साथ है रहना।
दादा, दादा कहकर हम भी,
चरण चूमना सीख रहे हैं।
हमको भी कविता पढ़नी है,
कविता लिखना सीख रहे हैं।
~Sameer Tiwari ❤️✍🏻
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