My skills and Characteristics are Painting, Fashion Photography, Heritage Photography, Logo Designing, Writing, Blogging and Getting things Done in Creative Way.
रविवार, 30 अगस्त 2020
“डायरी के पन्नों से”
शुक्रवार, 28 अगस्त 2020
भारतीय चित्रकला (Indian Painting)
- धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता:- विश्व की सभी कलाओं का जन्म धर्म के साथ ही हुआ है। कला के उद्भव में धर्म का बहुत बड़ा योगदान है। धर्म ने ही कला के माध्यम से अपनी धार्मिक मान्यताओं को जन-जन तक पहुंचाया है। भारतीय कला का स्वरूप भी मुख्यत: धर्म प्रधान ही है।
- अंत: प्रकृति से अंकन:- भारतीय चित्रकला में मनुष्य के स्वभाव या अंतः करण को गहराई तथा पूर्णता से दिखाने का महत्व हैं। अजंता की चित्रावलियों में जंगल, पर्वत, प्रकृति, सरोवर, रंगमहल तथा कथा के पात्र सभी को एक साथ एक ही दृश्य में दिखाया गया है। इसी प्रकार अजंता की गुफाओं में पद्मपाणि के चित्र में कुछ ही रेखाओं के द्वारा गौतम बुद्ध के विचार मुद्रा का जो अंकन हुआ है, वह दर्शनीय हैं।
- कल्पना (Imagination):- कल्पना, भारतीय चित्रकला की प्रमुख विशेषता हैं। वह उसके आधार पर ही पली-बढ़ी। अतः उसमें आदर्शवादीता का उचित स्थान है। ऐसे भी भारतीय कलाकारों का मन यर्थाथ की अपेक्षा कल्पना में अधिक रमा । कल्पना का सर्वश्रेष्ठ रूप ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में दिखाई देती है। उदाहरण स्वरूप:- बुद्ध की जन्म जन्मांतर की कथाएं कल्पना प्रस्तुत ही तो है।
- प्रतीकात्मकता (Symbolic) भारतीय कला की एक विशेषता उसकी प्रतीकात्मकता में निहित हैं। प्रतीक कला की भाषा होती है। सांकेतिक एवं कलात्मक दोनों प्रतीकों का सर्वाधिक महत्व है।
- आदर्शवादीता (Idealism):- भारतीय चित्रकार यथार्थ की अपेक्षा आदर्श में ही विचरण करते हैं। वह संसार में जैसा देखते हैं वैसा चित्रण न करके जैसा होना चाहिए वैसा चित्रण करते हैं।
- मुद्राएं, हाव-भाव (Expression):- भारतीय चित्रकला, मूर्तिकला एवं नृत्य कला में मुद्राओं को अत्यधिक महत्व दिया गया है। आकृति की रचना कलाकार ने यथार्थ की अपेक्षा भाव अथवा गुण के आधार पर ही की है।
- रेखा तथा रंग (Line and Colour):- भारतीय चित्रकला रेखा प्रधान हैं। उसमें गति है। रेखाओं द्वारा वाह्य सौंदर्य के साथ-साथ गंभीर भाव भी कलाकारो ने चित्रों में बड़ी ही कुशलता से दर्शाए हैं। आकृतियों में सपाट रंग का प्रयोग किया गया है।
- अलंकारिकता (Ornamentation):- भारतीय कला में अलंकरण का अत्यधिक महत्व है क्योंकि भारतीय कलाकारों ने सत्यम शिवम के साथ सुंदरम की भी कल्पना की है और इसीलिए सुंदर तथा आदर्श रूप के लिए वह अलंकरणो का अपनी चित्र रचना में प्रयोग करता है।
- कलाकारों के नाम (Artist Name):- प्राचीन काल के कलाकारों ने अपनी कृतियों में नाम अंकित नहीं किए हैं। किंतु राजस्थानी चित्र शैली में कहीं-कहीं कलाकार द्वारा चित्रित चित्र पर कलाकार का नाम अंकित किया हुआ मिलता है। मुगल शैली में तो चित्रों में कलाकार के नाम के साथ साथ-साथ चित्र में रंग किसने भरे हैं? रेखांकन किसने किया है? इत्यादि। तक लिखे हुए मिलते हैं।
- साहित्य पर आधारित (Based on Literature):- भारतीय चित्रकला साहित्य पर भी आश्रित रही। चित्रकारों ने काव्य में वर्णित साहित्य/कथा के अनुरूप ही चित्रों का निर्माण किया।
- सामान्य पात्र (Common Character):- भारतीय कला में सामान्य पात्र विधान परंपरागत रूप में विकसित हुआ है जबकि पाश्चात्य कला में व्यक्ति विशिष्ट का महत्व है।
बुधवार, 26 अगस्त 2020
आधुनिक कला शैली {Modern Art}
आधुनिक कला शैली B.Ed.1st Year. EPC-2 Unit-2. Munger University, Munger. Video Link:- https://www.youtube.com/watch?v=d3UzasnWncI
पुराने या आज-कल से पहले की शैलियों की पुनरावृति से भिन्न, विशेष पद्धति द्वारा बनाई गई कला शैली आधुनिक कला शैली कहलाती है। अभी की आधुनिक शैली भविष्य में एक शैली बन जाएगी और उस समय की विशिष्ट पद्धति आधुनिक कला शैली के नाम से पुकारी जाएगी। अजंता की कला शैली उसके निर्माण काल में आधुनिक कला शैली के रूप में ही थी। परंतु आज वह हमारे सामने अजंता शैली के नाम से विख्यात है।
घटनाओं के तंतुजाल (Plexus) को कथावस्तु कहते हैं। (घटित घटनाओं का नाटकीय रूप में अंकन कथा कहलाता है) कथावस्तु या कथानक कहानी का मुख्य ढांचा होता है पहले की कला का आधार कहानी ही होता था परन्तु आजकल की कला का संबंध आंतरिक भावों की सूक्ष्म अभिव्यंजना अधिक होती है। आधुनिक कला को देखकर कभी कभी कुछ लोगों को कुछ समझ में नहीं आता हैं। इसका कारण स्पष्ट है कि व्यक्ति कलाकार के मन के भावों को समझ नहीं पा रहा होता है लेकिन जैसे ही कोई दर्शक चित्रकार के मनोभाव को समझते हुए चित्र देखना शुरु करता है उसकी सारी भ्रांतियां दूर हो जाती है और वह चित्र में छुपे हुए रहस्य को समझ सकता है।
भारत में आधुनिक कला की शुरुआत
विशुद्ध भारतीय जीवन-दर्शन को साकार करने का सर्वप्रथम प्रयाश बंगाल स्कूल के चित्रकार अवनींद्र नाथ ठाकुर के द्वारा किया गया। अवनींद्र नाथ ठाकुर ने भारतीय कला क्षेत्र में नवीन विचारधारा को जन्म दिया। उन्होंने कहा है कि एक भारतीय कलाकार को पाश्चात्य कला की मृगतृष्णा एवं अंधानुकरण के पीछे दौड़ना निरर्थक है। अपनी परंपरागत कला अजंता, एलोरा, राजपूत, मुगल तथा पहाड़ी लघु चित्र शैली को आदर्श मानकर एवं उनका अध्ययन करके समकालीन विषयों का चित्रण करना चाहिए। जिससे उनकी कला में स्वाभाविकता के साथ भारतीय जीवन दर्शन की सत्य अनुभूति प्रकट हो सकती है। हॉवेल के विचारों से प्रेरणा पाकर अवनीन्द्रनाथ ने परंपरागत नियमों, रेखाओं की लयात्मकता, रंगों की मोहकता तथा उनकी विभिन्न शैलियों की प्रमुख विशेषताओं का गहन अध्ययन किया। 1902 ई० में जापानी कलाकार हिसिदा ताइकान कलकता आये। इन्हीं की प्रेरणा से अवनींद्र नाथ ने चीन एवं जापानी आधार की Wash(प्रक्षालन)/धोना पद्धति की कोमल रंग संगती को अपनाया। भारतीय एवं जापानी शैलियों के सम्मिश्रण से एक नवीन कला शैली विकसित हुई जिसे हम "बंगाल शैली" या "पुनरुत्थान शैली" या फिर "आधुनिक कला शैली" कहते हैं।
B.Ed. 1st Year (2019-21) Exam Date Announced. Tilka Manjhi Bhagalpur University (T.M.B.U)
B.Ed.2nd Year (2018-20) Exam Date Announced. Tilka Manjhi Bhagalpur University (T.M.B.U)
सोमवार, 24 अगस्त 2020
चित्र संयोजन के सिद्धांत (Principles of picture combination)
https://www.youtube.com/watch?v=9MByTSuicxk&t=2s
जब एक कलाकार चित्र के तत्व रेखा, रूप, रंग, तान, पोत एवं अंतराल को सुनियोजित एवं कलात्मक रूप में प्रयोग करके अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति चित्र रूप में करता है तो वह संयोजन कहलाता है।
चित्र संयोजन के छह (06) सिद्धांत होते हैं -
- सहयोग (collaborate)
- सामंजस्य (consistence)
- संतुलन (Balance)
- प्रभाविता (Effectiveness)
- लय (Rhythm)
- परिप्रेक्ष्य (Perspective)
- सहयोग (collaborate):- सहयोग का अर्थ होता है कि चित्र संयोजन के विभिन्न तत्वों में एकता, समानता तथा एक प्रकार का संबंध जो समस्त संयोजन को एकता के सूत्र में बांधे रखता है, सहयोग कहलाता है। सहयोग का तात्पर्य चित्र में आकर्षण को बिखराव से बचाना है। चाहे वह कोई कल्पना चित्र हो अथवा व्यक्ति चित्र। नवीन आकार अथवा उचित रंग संयोजन के द्वारा चित्र को प्रभावी बनाया जा सकता है।
- सामंजस्य (consistence):- सामंजस्य कला सृजन का वह सिद्धांत है जिसके माध्यम से चित्र के सभी तत्व:- रेखा, रूप, वर्ण, तान, पोत एवं अंतराल को एक दूसरे के साथ प्रतीत हो तथा चित्र में निरर्थक विकर्षण तत्व न आने पाए।
- संतुलन (Balance):- संतुलन एक ऐसा सिद्धांत है जिसके माध्यम से चित्र के विरोधी तत्वों को व्यवस्थित किया जाता है। संतुलन के अंतर्गत चित्र में रेखा, रूप, वर्ण, इत्यादि। सभी को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि कोई भी तत्व अनावश्यक भारयुक्त प्रतीत ना हो। यदि ऐसा हुआ तो चित्र असंतुलित हो जाएगा।
- किस वस्तु पर प्रभाविता दी जाए:- सर्वप्रथम कलाकार को अपने मस्तिष्क में निश्चय कर लेना चाहिए कि वह जिस कलाकृति का निर्माण कर रहा हैं, उसमें किस आकृति को सबसे पहले दर्शक को दिखाना चाह रहा है।
- वस्तु पर किस प्रकार प्रभावित दी जाए:- इसके लिए निम्नलिखित नियम है:-
- वस्तुओं को समूहबद्ध करके
- विपरीत रंग योजना का प्रयोग करके
- सजावट का प्रयोग करके
- वस्तुओं के चारों ओर रिक्त स्थान छोड़ करके
- वस्तुओ पर कितनी प्रभाविता दी जाए:- जिस वस्तु पर हम प्रभाविता देना चाहते हैं उसे ही आकर्षक बनाने के प्रयत्न करने चाहिए। उदाहरण के लिए फूलदान में पुष्पों का संयोजन यदि करना हो तो हमे सादा फूलदान प्रयोग करना चाहिए।
- वस्तुओं में प्रभावित कहां दी जाए:- इस नियम के अंतगर्त यह देखा जाता है कि हम कोई भी कलाकृति का निर्माण धरातल के किस भाग में करते हैं। यदि समतल स्थान पर कोई वस्तु को सजानी है तो उसे मध्य में सजाना चाहिए।
- रेखीय परिपेक्ष्य
- वातावरणीय परिपेक्ष्य
- रेखीय परिपेक्ष्य:- रेखीय परिपेक्ष्य के आवश्यक अंग निम्नवत हैं:-
- चित्र तल
- स्थिर बिंदु
- दृष्टि बिंदु
- दृष्टि पथ
- अदृश्य बिंदु
- क्षितिज रेखा
- वातावरणीय परिपेक्ष्य:- हमारे आंखों के सामने दिखाई देने वाले दृश्य पर वायुमंडल काफी प्रभाव पड़ता है। वायुमंडल में धूल आदि के कण होने के कारण दूर की वस्तुओं के रंग धुंधले भी हो जाते हैं और उनके रंग भी परिवर्तित हो जाते हैं। जैसे:- शीतल वातावरण में प्रत्येक वस्तु दूर जाकर नीले रंग से प्रभावित हो जाती है उसी प्रकार वर्षा ऋतु में दूर की वस्तुओं का रंग मटमैला प्रतीत होता है। तेज वर्षा में दूर की गहराई अथवा अंतराल धूमिल श्वेत हो जाते हैं। यह प्रभाव पेंसिल चित्र तथा एकरंगे एवं बहुरंगे सभी चित्रों में दिखाया जा सकता है। वातावरण का प्रभाव वस्तुओं के रंगों पर भी दिखाई पड़ता है।
- Collaboration
- Consistence
- Balance
- Effectiveness
- Rhythm
- Perspective
- By grouping objects
- By using a contrasting color scheme
- By using embellishments/Decoration
- By leaving space around objects
रविवार, 23 अगस्त 2020
टिकुली कला
उच्च शिक्षा संस्थान में अपनाई जाने वाली शिक्षण विधियां
उच्च शिक्षा संस्थान में अपनाई जाने वाली शिक्षण विधियां (Teaching Aptitude) Part-1 Video Link:- https://www.youtube.com/watch?v=zh5Y3gort60&t=368s
जिस तरीके से शिक्षक शिक्षार्थी को ज्ञान प्रदान करते है, उसे शिक्षण विधि कहते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में निम्नलिखित चार विधियों का उपयोग शिक्षण के लिए किया जाता है जो निम्नलिखित हैं :
- शिक्षक केंद्रित विधि (Teacher Centered Method)
- विद्यार्थी केंद्रित विधि ( Student Centered Method )
- ऑनलाइन विधि (Online Method)
- ऑफलाइन विधि (offline Method )
शिक्षक केंद्रित विधि (Teacher Centered Method)
• इसमें शिक्षक मुख्य होते हैं विद्यार्थी गौण होते है।
• यह वर्णनात्मक (Descriptive) प्रकार की होती है।
• इसमें केवल मौखिक संप्रेषण होता है।
• इसमें औपचारिकता की मात्रा अधिक होती है।
• इसमें विद्यार्थी केवल निष्क्रिय श्रोता होते हैं।
• शिक्षक सक्रिय रहता है इसमें विद्यार्थी के विचार, सृजनात्मकता आदि के लिए कोई स्थान नहीं होता हैं।
• इसमें केवल स्मृति स्तर व पुनः स्मरण पर ध्यान देते हुए विद्यार्थियों को ज्ञानात्मक स्तर का ज्ञान ही दिया जाता है।
शिक्षक केंद्रित विधि में निम्नलिखित विधियों को सम्मिलित किए जाते हैं :
- व्याख्यान विधि (Lecture Method)
- प्रदर्शन विधि (Demonstration Method)
- पाठ्यपुस्तक विधि (Textbook Method)
- ऐतिहासिक विधि (Historical Method )
जब शिक्षक विषय वस्तु की सुव्यवस्थित व क्रमबद्ध प्रस्तुति छात्रों के समक्ष मौखिक रूप से रखता है तो छात्र उसे सुनकर बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लेते हैं। इस विधि को व्याख्यान विधि (Lecture Method) कहा जाता है। व्याख्यान विधि प्राचीन भारतीय पद्धति है। इस विधि से प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को आश्रम में रखकर उच्च शिक्षा प्रदान किया करते थे। इस विधि में शिक्षक यह मानकर चलता है कि विद्यार्थी को सिखाई जा रही विषय वस्तु को विद्यार्थी समझने की योग्यता रखता है।
इस विधि के गुण
- यह उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी है।
- यह समय परिश्रम व धन की दृष्टि से कम खर्चीला है।
- इसके द्वारा एक समय में विद्यार्थियों के बड़े समूह को शिक्षण दिया जा सकता है।
- यह विद्यार्थी में तर्क शक्ति का विकास करता है।
- निम्न कक्षाओं के लिए अनुपयोगी।
- इसमे अध्येता निष्क्रिय श्रोता बने रहते है तथा यह विधि कर के सीखने के सिद्धांत की अवहेलना करता है।
- इसमे अधिक समय तक ध्यान केंद्रित करना पड़ता है किसी भी चीजों को समझने के लिए, जो सभी विद्याथी के लिए संभव नहीं होता है।
- इसमे सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है व्यवहारिक ज्ञान पर नहीं।
- यह मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित होता है।
- क्रिया आधारित विधि। (Action based method)
- कठिन तथ्यों को समझाने में आसानी।
- प्रत्येक स्तर पर उपयोगी
- कम खचीला विधि
- समय की बचत
- "करके सीखने" (Learn by doing) के सिद्धांत की अवहेलना।
- विद्यार्थी केवल रुचिकर प्रदर्शन में ही सक्रिय रहते हैं।
- इसमें शिक्षक ही सभी कार्य करते हैं अतः यह शिक्षक केंद्रित विधि है।
- इसमें व्यक्तिगत भिन्नता के सिद्धांत (Principle of individual variation) की अवहेलना की जाती है यहां सभी स्तर के विद्यार्थी एक गति से विकास करते हैं।
- प्रदर्शन से पूर्व तैयारी ना होने से या उपकरण खराब हो जाने से शिक्षण कार्य प्रभावित होता है।
- विद्यार्थी में स्वाध्याय (Self-study) का विकास होता है।
- समय, श्रम व धन (Time, labor and money) की बचत होती है।
- विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति का विकास होता है तथा वे सक्रिय रहते हैं।
- यह मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक (Psychologist and Scientist) दोनों के दृष्टिकोण से उचित नहीं मानी जाती हैं।
- विद्यार्थी में रटने की प्रवृति पनपती है।
- व्यक्तिगत भिन्नता (Individual variation) के सिद्धांत की अवहेलना होती है सभी विद्यार्थी एक ही पाठ्य पुस्तक का अध्ययन करते हैं।
- पाठ्यपुस्तक एक उद्देश्य प्राप्ति का साधन (Resources) होता है लेकिन इस विधि में शिक्षक उसे साध्य (Practicable) मान लेते हैं।
- इस विधि में केवल सैद्धांतिक ज्ञान दिया जाता है व्यवहारिक और प्रयोगात्मक नहीं।
- इसमें बालक को शिक्षण का केंद्र माना जाता हैं।
- इसमें बालक की आवश्यकता, रुचि, स्तर, सृजनात्मकता आदि का ध्यान रखा जाता हैं।
- इसमें बालकों को सक्रिय रखा जाता है तथा उसे स्वतंत्र पूर्वक सीखने दिया जाता है।
- इसमें शिक्षक की भूमिका अधिगम परिस्थिति को उत्पन्न करने वाले तथा मार्गदर्शक (Guide) की होती है।
- करके सीखने (Learn by doing) के सिद्धांत पर यह समस्त विधियां आधारित होती हैं।
- हयूरिस्टिक विधि (Heuristic Method)
- प्रोजेक्ट विधि (Project Method)
- प्रश्न उत्तर/प्रश्नोत्तर विधि (Question Answer Method)
- अधिन्यास विधि (Assignment Method)
- समस्या समाधान विधि (Problem Solving Method)
- खेल विधि (Game Method )
- प्रयोगशाला विधि (Laboratory Method)
- आगमन निगमन विधि ( Inductive & Deductive Method
- परिस्थिति उत्पन्न करना।
- प्रोजेक्ट का चुनाव और उसके उद्देश्य को स्पष्ट करना।
- कार्यक्रम बनाना।
- योजना अनुसार कार्य करना।
- कार्य का मूल्यांकन करना।
- सारे कार्यों का लेखा-जोखा रखना।
- विद्यार्थी से भलीभांति प्रश्न पूछना।
- पूछे हुए प्रश्न के विद्यार्थी को उचित जवाब देना।
- विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करना।
- विद्यार्थी के द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों का संतोषजनक जवाब देना।
“डायरी के पन्नों से”
नमस्कार 🙏आप सभी का हमारे Blog पर स्वागत है। आज आप सभी के बीच प्रस्तुत हैं “डायरी के पन्नों से” का तीसरा अंश। इस श्रृंखला को पढ़कर आप मेरे और मेरे कार्य क्षेत्र को और भी बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। जैसा की आप सभी को ज्ञात है कि मैं अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं। प्रत्येक रविवार को उसी आत्मकथा के छोटे-छोटे अंश को मैं आप सभी के बीच प्रस्तुत करूंगा और मुझे आपकी प्रतिक्रिया (Comment) का इंतजार रहेगा ताकि मैं इसे और बेहतर तरीके से आप सभी के बीच प्रस्तुत करता रहूं।
तो चलिए प्रस्तुत है, “डायरी के पन्नों से” का तीसरा अंश
कला एवं शिल्प महाविद्यालय में प्रवेश परीक्षा देने के उपरांत मेरा नामांकन हो गया। महाविद्यालय के प्रांगण में ही बॉयज हॉस्टल था। मैंने इच्छा जताई हॉस्टल में रहने के लिए, लेकिन चिंटू भैया जिनके चलते मेरा आर्ट कॉलेज में नामांकन हुआ था उन्होंने मना कर दिया।






















