बुधवार, 12 जनवरी 2022

मधुश्रावणी मधुबनी एवं तीज बिहार। Madhushravani Madhubani and Teej Bihar.

 


मधुश्रावणी 

             मधुश्रावणी बिहार राज्य में स्थित मिथिला के आस-पास के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला लोक पर्व है जो सावन माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी से आरम्भ होकर शुक्ल पक्ष की तृतीया को सम्पन्न होता है। मिथिला संस्कृति की यह एक अनूठी परम्परा और भक्ति का व्रत है, जिसका नवविवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। इस व्रत में जहाँ एक ओर नवविवाहित महिला अपनी ससुराल से आये सामान का उपयोग कर वहाँ की आर्थिक स्थिति तथा पहनावे की जानकारी लेती हैं, वहीं दूसरी ओर इस व्रत के दौरान कथा के माध्यम से उन्हें दाम्पत्य जीवन की शिक्षा दी जाती है।

तीज 

        तीज हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है जिसमें महिलाएँ वैवाहिक सम्बंधों को सुदृढ़ बनाने के लिए तथा परिवार के समग्र कल्याण के लिए निर्जला व्रत करती हैं। यह व्रत सर्वप्रथम माता पार्वती ने भगवान शिव (शंकर) के लिए रखा था। इसीलिए सौभाग्यवती महिलाएँ अपने सुहाग को अखण्ड बनाये रखने के लिए अथवा जो अविवाहित युवतियाँ हैं वे अपनी इच्छानुसार वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत रखती हैं।

पितृ पक्ष मेला गया, बिहार। Pitru Paksha Mela Gaya, Bihar.

 

       
        पितृ पक्ष मेला कृष्ण पक्ष की प्रथम तिथि से अमावस्या तक अर्थात् शारदीय नवरात्र से एक पखवाड़ा पूर्व पन्द्रह दिनों की अवधि के लिए इस मेले का आयोजन होता है, जिसे पितृ पक्ष के नाम से जाना जाता है। बंगाल में इसे महालया के नाम से भी जाना जाता है। इस मेले में देश-विदेश से आकर हिन्दू धर्मावलम्बी अपने पूर्वजों को स्मरण कर उनके मोक्ष हेतु श्राद्ध (पिण्डदान) करते हैं।
      
       ऐसी मान्यता है कि यहाँ पिण्डदान करने से दिवंगत आत्मा को स्वर्ग मिलता है। यह पिण्डदान फल्गु नदी के किनारे विष्णुपद मन्दिर में किया जाता है। वैसे तो गया में पिण्ड दान वर्ष भर होता है परन्तु पितृ पक्ष में किये गये पिण्ड दान का विशेष महत्व है।

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

बाबा ब्रह्मेश्वरनाथ का मेला बक्सर, बिहार। Baba Brahmeshwar Nath's Fair Buxar, Bihar.

     

          बाबा ब्रह्मेश्वरनाथ का मेला


          बिहार राज्य के बक्सर जिले में स्थित ब्रह्मपुर धाम के नाम से प्रसिद्ध बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ जी का मंदिर प्राचीनतम् मंदिरों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि, बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ जी का चर्चित तीर्थ स्थल भगवान शंकर के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। इस मंदिर का दरवाजा पश्चिम मुखी है जबकि अधिकतर शिवमंदिरों का दरवाजा पूरब में होता है। यह मंदिर वर्ष में दो बार खुलता है। यहाँ शिवरात्रि एवं वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को भव्य मेले का आयोजन होता है। यह मेला वृहद पशु मेला माना जाता है, जहाँ देश के विकसित नस्ल के पशुओं की खरीद-बिक्री वृत पैमाने पर की जाती है।

        ऐसी मान्यता हैं की इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान ब्रह्मा ने किया था। वैसे नाम से भी काफी हद तक ये मालूम भी चल रहा है की ब्रह्मपुर का मतलब ब्रह्मा की नगरी। ऐसा कहा जाता है की एक बार मुस्लिम शासक गजनवी इस मंदीर को तोड़ने के लिया आया। यहाँ लोगो ने उसे ऐसा करने से मना किया और चेतावनी दी की अगर ऐसा करोगे तो भगवान शिव की तीसरी आँख खुल सकती है और वो तुम्हे नाश कर देंगे क्यों की ये मंदिर कोई व्यक्ति विशेष द्वारा निर्मित नहीं है बल्कि इस मंदिर का शिव लिंग ज़मीन से खुद निकला है और ऐसा चमत्कार है की ये हमेशा बढ़ते रहता है। इस पर गजनवी ने कहा की मुझे ऐसे भगवांन पर विश्वास नहीं है अगर वो सच में दुनिया में है तो रात भर में मंदिर का द्वार पूरब से पश्चिम की तरफ हो जाये (जैसा की हरेक शिव मंदिर का द्वार पूरब की तरफ ही होता है ) फिर मैं भी मान लूँगा और फिर कभी हम लोग दुबारा नहीं लौटेंगे।
         ऐसा कहा जाता है अगले सुबह में जब गजनवी मंदिर तोड़ने आया तो देखा की इस मंदिर का द्वार पूरब से पश्चिम में हो गया था और गजनवी देख के हद्प्रद रह गया था। आज भी इस मंदिर का द्वार पश्चिम की तरफ ही है और प्रमाण है की इस मंदिर के शिव लिंग का आकार समय-समय पर बड़ा ही होते जा रहा है। इस मंदिर को लोग बड़ा ही पवित्र मानते है और अलग जगह के लोग अपनी मनोकामना पूर्ण करने हेतु जरुर आते है। यहाँ पर लोग आस्था के साथ अपनी शादी भी करवाते है।


How to reach Brahmpur Dham :👇

Nearest railway station : Raghunath pur (which is only 4 k.m from shivalaya )
Nearst highway : NH 84 which goes through Brahmpur.
Pin code – 802112

राजगीर महोत्सव एवं मलमास मेला। Rajgir Festival and Malmas Fair.

राजगीर महोत्सव 

       प्राकृतिक धरोहरों एवं दृश्यों को अपने आँचल में समेटे तथा नैसर्गिक खूबसूरती का प्रतीक राजगीर न सिर्फ भारत वर्ष में बल्कि वैश्विक पर्यटन के मानचित्र पर भी प्रमुखता से प्रतिष्ठित है। यह नगरी भारतवर्ष के उन मनोरम पर्यटक स्थलियों में से एक है, जहाँ हर दिन बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते हैं। इन्हीं पर्यटकों को आकर्षित करने एवं राजगीर की प्राकृतिक धरोहरों तथा विरासतों से वैश्विक जन-मानस को रू-ब-रू कराने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष राजगीर महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

         राजगीर महोत्सव ऐतिहासिकता एवं वैज्ञानिकता, परंपरा एवं आधुनिकता तथा ग्राम्य एवं नगरीय सामाजिक जीवन की संस्कृतियों का अद्भुत संगम हैं। यह महोत्सव अनेकता में एकता का संदेश देता है। जहाँ एक तरफ इस तरह के आयोजनों से देश एवं राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर पर्यटन उद्योग का विकास होने से लोगों के लिए रोजगार के नये-नये अवसर भी उत्पन्न होते हैं। 

          पूर्व में राजगीर महोत्सव तीन दिवसीय आयोजन हुआ करता था, परन्तु इसकी महत्ता एवं लोकप्रियता को देखते हुए इसे बहु दिवसीय (17 दिन) कर दिया गया है। पर्यटन विकास निगम एवं भारतीय नृत्य कला मन्दिर के सौजन्य से होने वाले इस महोत्सव का नाम राजगीर नृत्य महोत्सव रखा गया। वर्ष 1989 में इसका नाम राजगिरी नृत्य महोत्सव कर दिया गया। कुछ अपरिहार्य कारणों से वर्ष 1989 से वर्ष 1994 तक इस महोत्सव का आयोजन नहीं हो सका, परन्तु वर्ष 1995 से इस महोत्सव को पुनः प्रारंभ कर दिया गया।

मलमास मेला 

      हिन्दू पंचांग के अनुसार, 32 माह एवं 16 दिन के पश्चात् अर्थात् प्रत्येक तीसरे वर्ष एक मास अधिक होता है, जिसे अधिमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। इस मास में राजगीर बैकुण्ठ धाम बन जाता है । इस दौरान 33 करोड़ देवी-देवता राजगीर में निवास करते हैं। मलमास के दौरान मांगलिक कार्य वर्जित होते है। इस मास में भगवान शिव और विष्णु की अराधना फलदायी मानी जाती है।

रविवार, 9 जनवरी 2022

मंदार महोत्सव भागलपुर प्रमंडल के बांका जिला, बिहार। Mandar Festival Bhagalpur Division's Banka District, Bihar.

 

मंदार महोत्सव 

        बिहार राज्य के भागलपुर प्रमण्डल एवं बांका जिले में स्थित मंदार पर्वत के समीप मकर संक्रांति के अवसर पर पाँच दिवसीय मंदार महोत्सव का आयोजन होता है। महाभारत की कथा में वर्णित है कि समुद्र मंथन के दौरान मंदार पर्वत को ही मथनी बनाया गया था। इसलिए इस पर्वत को देवताओं की जीत और दानवों के पराजय के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

      पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने मधु, कैटभ नामक राक्षसों को पराजित कर उसका वध किया और मधुसूदन कहलाये। मौत से पहले इन राक्षसो ने अपने संहारक भगवान विष्णु से यह वरदान लिया था कि प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के दिन वे उसे दर्शन देने मंदार आया करेंगे। उनकी इस इच्छा को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और कहा कि मैं प्रत्येक वर्ष मकर सक्रांति का अवसर पर यहां आया करूंगा। यही कारण है कि यहाँ प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें मधुसूदन भगवान की प्रतिमा को बौंसी स्थित मन्दिर से मंदार पर्वत तक की यात्रा करायी जाती है।

देव महोत्सव, औरंगाबाद बिहार। Dev Mahotsav, Aurangabad Bihar.

देव महोत्सव 

       बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले में स्थित देव नामक ग्राम में एक प्राचीन सूर्य मन्दिर है जो हिन्दु धर्मावलम्बियों के लिए आस्था का प्रसिद्ध केन्द्र है। विशेषतः छठ व्रत में आस्था रखने वाले मगधवासियों के लिए इस सूर्य मन्दिर का बहुत अधिक महत्व है।

        यह सूर्य मन्दिर एक बड़े जलकुण्ड के तट पर स्थित है, जिसमें स्थापित सूर्य मूर्ति तीन रूपों में दिखाई पड़ती है। यहाँ सूर्य की मूर्ति सात घोड़े वाले रथ पर सवार है। साथ ही पीछे सूर्य की अरूणाभ प्रस्फुटित हो रही है। वर्ष 2005 से छठ व्रत के मौके पर जिला प्रशासन की ओर से देव महोत्सव का आयोजन भी होता है। ऐसे महोत्सव राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित किये जाते हैं। इस महोत्सव में मगध क्षेत्र में हुए विकास तथा मगध की सांस्कृतिक परम्परा का बहुत सुन्दर प्रदर्शन होता है। इससे देव समारोह में शामिल होने वाले लोगों को मगध की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक मान्यताओं की जानकारी मिलती है। यहाँ कला एवं संस्कृति विभाग, पर्यटन विभाग, कृषि विभाग तथा सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग के स्टॉलों के साथ-साथ कलाकारों का उत्तम सांस्कृतिक प्रदर्शन भी किया जाता है।

शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

वाणावर महोत्सव जहानाबाद बिहार। Vanavar Festival Jehanabad Bihar.

 

वाणावर महोत्सव

        पर्यटन के मानचित्र पर यदि देखा जाये तो यह जहानाबाद जिले का गौरवशाली अतीत है। वाणावर को इतिहास में बराबर के नाम से भी जाना जाता है। 

     वाणावर पहाड़ी समूह प्राचीन मगध साम्राज्य के गौरवमयी विरासत का ही एक प्रतीक है, जिसके अन्तर्गत वाणावर एवं नागार्जुनी पहाड़ियाँ सम्मिलित हैं। वैसे तो इन पहाड़ी समूह में मूर्तिशिल्प, भित्तिचित्र एवं ललितकला के नायाब नमूने मिलते हैं परन्तु इस पहाड़ी समूह का सर्वप्रमुख आकर्षण यहाँ की गुफाएँ हैं। इसी गुफा के समीप सिद्धेश्वरनाथ मन्दिर के दक्षिण में पतालगंगा नामक जलाशय स्थित है। ग्रेनाइट की शैलों से निर्मित ये गुफाएँ लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व बनायी गयी थीं, जिनका अलंकरण एवं उच्च कोटि की पॉलिस इसके बिल्कुल नवीन होने का एहसास दिलाते हैं।


        सावन के महीने में यहाँ एक माह तक श्रावणी मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में लोग आते हैं। सर्दी में कड़ाके की ठंड के बीच भी तीन चार माह तक विदेशी पर्यटकों और बौद्ध उपासकों से वाणवर का यह पहाड़ी इलाका गुलजार रहता है। श्रीलंका, म्यांमार, अमेरिका, जापान, भूटान, सिक्किम, चीन, आदि। देशों से बौद्ध उपासक यहाँ आते हैं। 
       वाणावर महोत्सव के माध्यम से ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों को प्रसिद्धि मिली। प्रारम्भ में यह महोत्सव दो दिनों तक ही चला, लेकिन महीनों चले प्रचार-प्रसार का नतीजा रहा कि, बोधगया और राजगीर आने वाले पर्यटकों का ध्यान इस ओर गया। सही मायने में इसके बाद से ही विदेशी पर्यटकों के यहाँ आने का सिलसिला शुरू हुआ।