शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

राजा रवि वर्मा (1848-1906)

             राजा रवि वर्मा (1848-1906)



             राजा रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल 1848 को केरल के किलीमान्नूर नामक गाँव में हुआ था। यह गाँव त्रिवेन्द्रम् (केरल ) से 24 मील दूर उत्तर दिशा में है। जिस राज परिवार मे रवि वर्मा का जन्म हुआ, उसका त्रावणकोर रियासत से रक्त का संबंध था। राजा रवि वर्मा के चित्रकार चाचा श्री राज वर्मा "व्यक्ति - चित्र" (पोट्रेट) के सफल कलाकार थे। वे 14 साल की उम्र में राजा रवि वर्मा को त्रिवेन्द्रम् के राजमहल में ले गये, जहों रहकर वे चित्रकारी करने और सीखने लगे। 1868 में त्रिवेन्द्रम् के महाराजा ने एक अंग्रेज चित्रकार "थियो डोर जेनसन" को अपने यहाँ आमत्रित किया। वह चित्रकार अपने साथ तैल रंग (ऑयल- कलर) लाया था। राजा रवि वर्मा ने भी तैल रगों में ही काम करना शुरू किया। राजा रवि वर्मा का विवाह 1868 ईo में त्रावनकोर की रानी लक्ष्मीबाई की बहन से सम्पन्न हुआ। राजा रवि वर्मा को पहला पुरस्कार मद्रास के अग्रेज गवर्नर द्वारा आयोजित चित्रप्रदर्शनी में 'स्वर्ण पदक' के रूप में मिला। यही कलाकृति उसी वर्ष विएना में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में भेजी गयी जहाँ उसे एक पदक तथा योग्यता प्रमाण-पत्र प्राप्त हुआ। मद्रास में आयोजित 1874 की कला प्रदर्शनी में दूसरी बार तथा 1876 में उन्हें तीसरी बार प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। वर्ल्ड-कोलंबियन कमीशन के तत्वावधान में शिकागो की एक अतर्राष्ट्रीयप्रदर्शनी में उनको डिप्लोमा के अलावा दो पदक भी प्रदान किये गये। उन्होंने ब्रिटिश प्रशासको (मद्रास के गवर्नर ड्यूक ऑफ बकिंघम, लार्ड ऐम्टहिल ) तथा राज परिवार के कई सदस्यो के व्यक्ति चित्र बनाये। 1880 ई . में पूना में आयोजित प्रदर्शनी में उनका काम सराहा गया। 

राजा रवि वर्मा के चित्रों के अंकन का तरीका बहुत हद तक विदेशी था- अंग्रेजो जैसा। परन्तु चित्र के विषय भारतीय रहे। उनके बनाये देवी-देवता, शकुन्तता-दुष्यन्त, राम-कृष्ण आदि के चित्र कुछ विदेशी से लगते हैं। एक ओर रवि वर्मा को प्रर्याप्त ख्याति मिली है, तो दूसरी ओर समीक्षकों द्वारा उलाहना। हैवेल ने उन पर "अत्यन्त कल्पनाप्रवण भारतीय काव्य तथा रूपक-कथाओं को चित्रित करते समय काव्यात्मक गुणों के पीड़ाजनक अभाव होने" का आरोप लगाया है। सुप्रसिद्ध कला आलोचक आनन्द कुमार स्वामी ने लिखा है "राजा रवि वर्मा के चित्रों में कल्पना का अभाव है। फिर भी रवि वर्मा के चित्रों का अपना महत्व है।" 

राजा रवि वर्मा ने बड़े आकार के चित्र कैनवास पर तैल रंगों से बनाये है। उन्होंने किसी न किसी पौराणिक कथा से सम्बन्धित चित्र नाटक के दृश्य की भाँती ऐसे बनाया है, जिनमें पात्र रंग-विरंगे कपड़े पहन कर बैठे हो, खड़े हो अथवा चल-दौड़ रहे हो। उनके सत्यवादी हरिश्चन्द्र, शकुन्तला, श्रीकष्ण और बलराम, रावण और जटायु जैसे चित्र जब भी हम देखते है तो इनकी कथाएँ हमें याद आने लगती है। राजा रवि वर्मा के चित्रों के रंग गहरे चटकीले और चमकदार है। राजा रवि वर्मा की मृत्यु 02 अक्टूबर 1906 को किलीमान्नूर में हुई। 

        राजा रवि वर्मा के चित्र श्री चित्रालय गैलरी (त्रिवेन्द्रम् ), बडौदा के लक्ष्मी विलास महल, मैसूर के राजमहल, उदयपुर के राजमहल सालारजंग म्यूजियम (हैदराबाद) तथा राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (जयपुर हाउस, नई दिल्ली) में है। 

 सागर का गर्व-मर्दन करते हुए राम (चित्रशाला, मैसूर) 

इस कृति में राम लंका पर आक्रमण करने के विचार से सागर पार करना चाहते थे, परन्तु पुल बनाने का प्रयत्न उमड़ते सागर के कारण विफल हो रहा था। सेतु बनाने के प्रयास में सहयोग न करने पर राम सागर के देवता वरुण के प्रति कुद्ध प्रतिक्रिया व्यक्त करते है। वरुण देवता तथा उनके अनुचर क्रुद्ध राम को शांत करने के लिए आगे की ओर लपकते हुए चित्रित है। 

श्री कृष्ण और बलराम (चित्रशाला मैसूर)

 चित्र में श्रीकृष्ण ने दुरात्मा राजा कंस का वध अपने भाई बलराम की सहायता से किया तथा अपने माता-पिता को बंदीगृह से मुक्त कराया।  

महिला फल लिये हुये (राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, नई दिल्ली)

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गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

हल्दी नहीं है!!! मिलावट है।

 हल्दी नहीं है!!! मिलावट है।


      आज के लेख का शीर्षक थोड़ा अलग है और क्यों है? इसके लिए तो आपको पूरा लेख पढ़ना होगा। तो चलिए अपने व्यस्त समय में से 05 मिनट मेरे लेख को पढ़ने में दीजिए और अपना कीमती सुझाव जरूर प्रदान कीजिएगा। 

        मेरे बहुत सारे शौकों और कार्यों में एक कुकिंग (Cooking) भी है। ऐसे तो कम लेकिन लॉकडाउन एवं कोरोना की बंदी में यह कार्य कुछ ज्यादा शुरू हो जाता है। आज सुबह अपनी पसंदीदा आलू-दम (सब्जी) चावल, रोटी, इत्यादि बनाए थे। सब्जी तो बहुत स्वादिष्ट बना था लेकिन हल्दी की उपस्थिति थोड़ी कम थी। जिस वजह से उसका रंग उतना नहीं आया था जितना आना चाहिए। जिंदगी का भी कुछ यही नियम है। जब तक जीवन में रंग नहीं आते तब तक वह कितना भी स्वादिष्ट क्यों ना हो दूसरों के लिए रंगहीन ही होती है।




आज दिनभर ऑनलाइन कक्षाओं में  व्यस्त रहें और शाम में नोट्स बनाने में। क्योंकि मेरा मानना है कि ऑनलाइन क्लास के बाद प्रशिक्षुओं को नोट्स भी प्रदान करना चाहिए। यही सब कार्य में समय का पता ही नहीं चला और शाम के 06:00 बज गए। अचानक से ध्यान आया कि हल्दी तो है नहीं! उसे लेने के लिए निकले। सोंचे की यहां से लगभग 02 किलोमीटर दूर सामस चलते हैं। वहां हरी सब्जी के साथ हल्दी भी मिल जाएगा। 



      सामस विष्णु धाम के आगे सामस हनुमान मंदिर है। वहां पर प्रत्येक दिन की अपेक्षा कुछ ज्यादा भीड़ थी। हर कोई अपने आप में व्यस्त था। मालूम चला कि आज रामनवमी के उपलक्ष्य में वहां पूजा का आयोजन किया गया है। हनुमान मंदिर के ठीक सामने ही दो-तीन किराने की दुकान है जहां अक्सर हरी सब्जियां मिल जाती है, मैंने कई बार लाया भी है। लेकिन आज वहां वीरानी थी बस हरी मिर्च ही मिल पाई। पूरी सब्जियों की इज्जत तो वो अकेले बचा ली। नहीं तो मुझे यहां लिखना पड़ता कोई सब्जी नहीं मिला। खैर मैं जिस उद्देश्य से गया था उसको लेने के लिए दुकानदार की तरफ मुड़ा, वह आवश्यकता से अधिक व्यस्त था। इसकी वजह सामने तेज आवाज में बज रहा गीत एवं पूजा सामग्री के लिए इधर उधर दौड़ रहे लोग थे। मैंने वहां देखा कि सभी व्यक्ति खुलेआम कोरोना को चुनौती दे रहे थे और मुझे मास्क में देखकर उन्हें अचरज भी हो रहा था। तभी अचानक एक व्यक्ति मेरे पास दौड़ते हुए आया और बोला कि 
अरे पंडित जी!!! आप इतनी देर कर दिए, जल्दी चलिए। 
वहां पर सिर्फ मैं ही एक अनजान चेहरा था और वह भी मास्क में। मैंने उसकी गलतफहमी दूर की और पुनः दुकानदार से मुखातिब हुआ और बोला कि भैया हल्दी दे दीजिए। पहले तो उसने सुनकर अनसुना कर दिया। जब मैंने पुनः पूछा तो 03 बार वह मुझे घुरा और धीरे से लेकिन गुस्से में बोला-
 नहीं है। 
मैं इसका रहस्य समझ नहीं पाया और उसके दुकान से बाहर आ गया। चूंकि वहां एक दो दुकानें और थी उन सभी ने भी कुछ ऐसा ही बर्ताव किया मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिरकार एक साथ सभी दुकानों से हल्दी कैसे खत्म हो गया। मैं वहां से लौट आया सामस से आने के उपरांत रास्ते में तीन-चार दुकानें और मिली सभी का उत्तर एक समान था- 
हल्दी नहीं है। 
मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि मामला क्या है? 
मैंने भी निश्चय कर लिया था कि चाहे जो भी हो आज इस रहस्य को जानकर एवं हल्दी लेकर ही जाना है। यह सोच कर मैं कुतुबचक के गांव में प्रवेश कर गया। उस समय शाम के 07:00 बज चुके थे और बिहार सरकार के आदेशानुसार सभी दुकानें बंद होने लगी थी। यहां भी मुझे निराशा ही हाथ लगी। लेकिन कहां गया है ना कि जब आप निश्चय कर लेते हैं तो वह पूरा भी होता है। कुछ वही मेरे साथ भी हुआ कुतुबचक में एक व्यक्ति मिल गए जो कि मुझे व्यक्तिगत तौर पर जानते थे। वह बोले:- 
आरे सर!!! आप इधर इतनी रात को???
 हम बोले- हां कुछ लेना था, सभी दुकानें बंद हो रखी है। 
उन्होंने कहा- मेरा किराना का दुकान है, चलिए मैं आपको देता हूं। उनकी दुकान पर पहुंचकर जैसे ही मैंने कहां- 

हल्दी चाहिए। 

वह बोले- नहीं है। 

चूंकि मैं उनकी दुकान पर पहली बार गया था और खाली नही आना चाहता था इसीलिए मेरे सामने जो-जो वस्तुएं देखी जिसका मैं प्रयोग करता हूं, वह सब ले लिया। पैसे देते समय मैंने उनसे कहा- 

आज लगता है बिना हल्दी का ही सब्जी बनाना पड़ेगा। 

तब उसने कहा- सर आप सुबह आइयेगा, हम दे देंगे।

मैंने उससे कहा आपके पास तो है नहीं और आपके आसपास भी किसी दुकान के पास नहीं है। मैं पिछले 01 घंटे से तलाश कर रहा हूं तो फिर आप सुबह में कैसे मुझे दे देंगे।

तब वह थोड़ा गंभीर होते हुए बोले- सच में आपके पास हल्दी नहीं है!!! यानी इस समय लायक भी नहीं। 
 
मुझे हंसी और गुस्सा दोनों आया और बोले तो क्या हम आपको पागल (Crazy) दिख रहे हैं जो 01 घंटे से ढूंढ रहे हैं। 

तब वह नजरें बचाते हुए धीरे से बोले- कितना चाहिए? 

मुझे लगा की शायद वह अपने घर या कहीं से ला कर मुझे दे।
मैंने कहा कि फिलहाल 250 ग्राम ला दीजिए। 

मुझे इतना कहना था कि वो हल्दी का डब्बा निकाले जिसे वह छुपा कर रखे थे। जिसमें लगभग तीन या चार किलो हल्दी रखा हुआ था। उसमें से 250 ग्राम मुझे प्रदान किये। 

मैं उन्हें आश्चर्य से देखने लगा।

मुझे इस तरह आश्चर्य में देखकर वह बोले कि सर शाम में इधर कोई आपको हल्दी बोलिएगा तो नहीं देगा। यह हमारी परंपरा के खिलाफ है। वे लगातार बोले जा रहे थे और मैं सुन रहा था। वे आगे बोले यहां ऐसी मान्यता है कि हल्दी लक्ष्मी का रूप है और शाम में या रात में ऐसे किसी को लक्ष्मी नहीं देनी चाहिए। 

मैंने उनकी बातों को बीच में काटते हुए कहां- 

इसके बदले में तो मैं आपको पैसा  तो दूंगा ही वह भी तो लक्ष्मी है। लक्ष्मी से लक्ष्मी का आदान-प्रदान तो हो ही सकता है। 

इसका जवाब उनके पास नहीं था उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा-
यदि आपको रात में हल्दी चाहिए तो "मिलावट" बोलिएगा तब कोई दुकानदार देगा। 

अचानक से मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। रात में एक बार मेरी दादी ने कहां था जाओ दुकान और "दाली में का रंग लाओ" मैंने कहां- 

यह क्या होता है? तब उसने कहा था।-

रात में हल्दी बोलोगे तो वह नहीं देगा वह तो बचपन की बातें थी अब यह परंपरा मेरे यहां समाप्त हो गई है लेकिन यहां इसे पुनः देखकर एवं महसूस कर अच्छा लगा। 

आज भी इस "मिलावट" एवं "दाली में का रंग" का अर्थ एवं रहस्य जानने को हम प्रयाशरत हैं।





पृथ्वी दिवस पर मेरी रचना.

 


इस धरा को रंगीन बना के तो देखो, 
एक पेड़ तो तुम लगा के तो देखो। 
हजारों बादलों के झुंड आएंगे LIKE करने, 
एक बार यह नुस्ख़ा आजमां के तो देखो।
बिश्वजीत कुमार

Intranet (इंट्रानेट) क्या हैं?

 



      इंटरनेट (Internet) पूरे विश्व में फैले कंप्यूटरों का विशाल नेटवर्क है और इंट्रानेट (Intranet) एक कार्यालय में मौजूद कंप्यूटरो का नेटवर्क है। इंटरनेट के माध्यम से हम अपने कंप्यूटर के सामने बैठकर आगरा, कानपुर, पटना, इत्यादि। कहीं भी बैठे अपने किसी रिश्तेदार या मित्र को संदेश (Message) भेज सकते हैं। लेकिन जब आपको अपने कार्यालय में सामने बैठे सहयोगी से लेकर मुख्य कार्यकारी अधिकारी तक कोई संदेश भेजना हो तो तब हम इंट्रानेट (Intranet) का प्रयोग करते हैं। 

विकिपीडिया के अनुसार,

                                       Intranet कंप्यूटर का एक निजी नेटवर्क होता है इंटरनेट के द्वारा कोई भी संस्था अपनी सूचनाओं को अपने कर्मचारियों (Employees) के बीच सुरक्षित रूप से आदान-प्रदान कर सकती है। इंटरनेट विभिन्न संस्थाओं के बीच कंप्यूटर नेटवर्क है जबकि इंट्रानेट किसी संगठन के अंदर का कंप्यूटर नेटवर्क है।

        इंटरनेट और इंट्रानेट दोनों का नाम काफी मिलता-जुलता है। मगर इनका प्रयोग अलग-अलग कार्यों के लिए किया जाता है। इंट्रानेट एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम होता है जिसका प्रयोग सूचना के आदान-प्रदान और नेटवर्क की सुरक्षा के लिए किया जाता है। इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल बड़े संस्थाओं द्वारा अपने कर्मचारियों के बीच इंटरनेट की तर्ज पर ही सूचना के आदान-प्रदान के लिए होता है इंट्रानेट एक निजी कंप्यूटर (Personal Computer) नेटवर्क की तरह कार्य करता है।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

Contemporary Artist (समकालीन कलाकार) बिनोद बिहारी मुखर्जी



Blindness is a New Feeling,
A New Experience,
A New State of Being.
 Binod Bihari Mukharji

            विनोद बिहारी मुखर्जी का जन्म 07 फरवरी 1904 को कोलकाता के "बेहाला" नगर में हुआ था। वे बाल्यकाल से ही नेत्र रोग से पीड़ित रहे किंतु अपने आत्मविश्वास से ही उन्होंने विद्या अध्ययन और कला उपासना पूर्ण की। विनोद बिहारी मुखर्जी ने चित्रकला के साथ-साथ भित्ति चित्रकला में भी ख्याति अर्जित की। उन्होंने शांति निकेतन के कला भवन, चीन भवन एवं हिंदी भवन में अनेकों भित्ति चित्र का निर्माण किया जो उनके जीवन के अनुभव एवं परिस्थितियों को दर्शाता है। चित्रकारी के साथ-साथ मुखर्जी ने अपने कला गुरु नंदलाल बोस एवं अन्य बंगाल शैली के कलाकारों पर लेख भी लिखें।
             सन 1957 ईस्वी में इनके नेत्रों की शल्य चिकित्सा हुई जिससे वे अपने नेत्रों की ज्योति खो बैठे। कला फिल्म निर्माता सत्यजीत राय ने उन पर वृत्तचित्र बनाया जिसे इनर आई (Inner Eye) शीर्षक दिया। विनोद बिहारी मुखर्जी ने लेखन के साथ-साथ कोलाज (Collage) पद्धति एवं काष्ठ में भी कार्य किया। उपरोक्त सभी बातों से यह प्रतीत होता है कि वे आधुनिक काल में हो रहे परिवर्तनों से लगातार प्रभावित होते रहे। जया अप्पास्वामी ने उन्हें "भारतीय कला से आधुनिक कला का सेतुबंध माना है।"
           विनोद बिहारी मुखर्जी ने अधिकतर जल रंग, तैल रंग एवं टेंपरा पद्धति में कार्य किया। इनके द्वारा निर्मित कलाकृतियां निम्न हैं:-  T Lover, सामान्य व्यक्ति, औरतें, बालक, वृद्ध, इत्यादि। इनकी मृत्यु 11 नवंबर 1980 को हुई।

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शनिवार, 17 अप्रैल 2021

सामाजिक नेटवर्किंग साइट (Social Network Site.), सामाजिक तंत्र व्यवस्था/जालक्रम

 



           सामाजिक नेटवर्किंग एक Online (ऑनलाइन) Service (सेवा), Platform (मंच,चबूतरा) होती है। जो लोगों के बीच सामाजिक नेटवर्किंग अथवा सामाजिक संबंधों को बनाने अथवा उनको परिलक्षित (Reflected, विचार करना, दर्शाना) करने पर केंद्रित होती है। अधिकांश सोशल नेटवर्किंग साइट वेब आधारित होते है और अपने प्रयोगकर्ता (User) को इंटरनेट का प्रयोग करते हुए एक दूसरे से संपर्क स्थापित करने का साधन प्रदान करते है।सोशल नेटवर्किंग साइट दोस्तों, परिवार के सदस्यों, सहपाठियों एवं ग्राहको, इत्यादि। के साथ जुड़ने का सबसे अच्छा माध्यम है।

सोशल नेटवर्किंग साइट के उदाहरण:-

Facebook, Instagram, Whats app, Telegram, etc. सोशल नेटवर्किंग साइट के उदाहरण है।

सोशल नेटवर्किंग साइट के लाभ:-

सोशल नेटवर्किंग साइट के माध्यम से हम अपने व्यवसाय/बिजनेस को बहुत आगे तक ले जा सकते हैं।

सोशल नेटवर्किंग साइट के माध्यम से हम अपने आपको हमेशा व्यस्त (Busy) रख सकते हैं।

सोशल नेटवर्किंग साइट के माध्यम से हम अपनी आवाज को हर किसी को सुना सकते हैं और एक मुहिम भी चला सकते हैं।

For Example:- #MeToo आंदोलन
यह महिलाओं पर होने वाले यौन उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार के खिलाफ आंदोलन है, जिसमें महिलाएं #MeToo हैशटैग के साथ अपनी कहानियां बता रही हैं। वे बता रही हैं कि उनकी ज़िंदगी में कब किसी प्रभावशाली या उनके करीबी शख्स ने उनका यौन उत्पीड़न किया। 


सोशल नेटवर्किंग साइट के नुकसान:-

सोशल नेटवर्किंग साइट हमें मानसिक एवं भावनात्मक (Mental & Emotional) रूप से परेशान कर सकता है।

सोशल नेटवर्किंग साइट का प्रयोग करना एक प्रकार की लत (Addiction) है आप/हम इसके आदी होते चले जाते हैं जो कि हमारे लिए बहुत ही घातक सिद्ध हो सकता है।

सोशल नेटवर्किंग साइट पर समय बिताना आज सभी के जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। हम इसको बहुत ज्यादा अहमियत देने लगते हैं जिस वजह से जीवन की महत्वपूर्ण चीजों को भूल जाते हैं जो कि हमारे जीवन के लिए सही नहीं है।

अधिकतर बार देखा गया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट से डाटा (Data) की चोरी कर ली जाती है और उनका प्रयोग गलत कार्यों के लिए किया जाता है।


"आम के टिकोले"


        प्रतिदिन की तरह आज भी हम सुबह 05:00 बजे उठ गए लेकिन जैसे पता चला कि आज तो रविवार है पुनः 01 घंटे के लिए सो गए 06:00 बजे आंख खुली। पहली नज़र खिड़की से बाहर गई, सूरज की किरणे कब का मुझे जगा कर चली गई थी। मेरे खिड़की के सामने एक आम का पेड़ है। आज यूं ही दिख गया कि बहुत सारे टिकोले गिरे पड़े हैं, कुछ तो सुख भी चुके थे। उन टिकोलो को देखकर अपनी बचपन की याद आ गई कि कैसे यदि रात में 02:00 बजे भी तेज हवाएं चलने लगे तो सबसे पहले टॉर्च लेकर हम आम के पेड़ के पास जाते ताकी टिकोलो को चुनकर ला सके और आज यहां पड़े-पड़े सूख रहे हैं।


         मैंने फटाफट आम के पेड़ के पास जाकर उन्हें चुनना शुरू कर दिया। टिकोले चुनते-चुनते बचपन की यादों के कई सारे शब्द बनते गए और एक कविता का निर्माण हो गया आप भी पढ़िए


"आम के टिकोले"


आम के टिकोले चुनते हैं,
चलो आज बचपन की सैर करते हैं।
जहां होती थी खूब शैतानियां,
एक आम गिरने पर दश हाथ जाते थे उसको उठाने।
अब तो बगीचे में पड़े-पड़े टिकोले सूख जा रहे हैं।
शायद अपनी बेबसी वो बयां कर रहे हैं।

बचपन की बातें थी निराली,
होती थी मस्ती और थोड़ी मनमानी।
शायद हम बड़े हो गए हैं,
टिकोले चुनने अब छोड़ चुके हैं।

आज उसी बचपन को फिर से,
जवां करना है।
बगीचे में जा टिकोले को ला,
उसके स्वाद में खो जाना है।

जीवन का बस यही नूर है,
खुश वही है जिसका दिल बचपन में मशगूल है।
आज उसी बचपन को,
फिर से निभाने जाते हैं।
हां चलो
आम के टिकोले लाते हैं।
चलो आज!!!
बचपन की सैर करते हैं
हां चलो!!!
आम के टिकोलो चुनते हैं।
आम के टिकोले चुनते हैं।

विश्वजीत कुमार