मंगलवार, 30 नवंबर 2021

मेरी विस्मयकारी ट्रैन की यात्रा।

       ट्रेन की यात्रायें तो आप सभी ने बहुत की होंगी, मैंने भी की हैं लेकिन कुछ यात्रायें ऐसी होती है जो इंसान के लिए ज्यादा रोमांचक और विस्मयकारी हो जाती है। एक ऐसी ही यात्रा के बारे में हम आज के इस लेख में चर्चा करेंगे।

        DSSSB (दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड) की परीक्षा की तिथि आ गई थी उक्त परीक्षा 30 नवंबर को दिल्ली में आयोजित होने वाली थी इसके लिए मैंने अपनी सुविधानुसार सहरसा से न्यू दिल्ली जाने एवं आने का टिकट बनवा लिया था ताकि कही कोई परेशानी ना हो। लेकिन जब परेशानी लिखा होता है तो आप लाख प्रयत्न कर ले आपको उसे झेलना ही पड़ता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ परिस्थिति ऐसी बन गई कि मैं उस समय पटना में था और मैं सोच रहा था कि ट्रेन को यही से पकड़ लूंगा अच्छी बात यह थी कि वह ट्रेन हाजीपुर होकर जा रही थी। जैसा आप सोचते होंगे मैंने भी सोचा कि कोई बात नहीं बोर्डिंग चेंज कर लेंगे और हाजीपुर में बैठ जाएंगे। उक्त बातें सोच कर मैं निश्चिंत हो गया।

       ट्रेन पकड़ने से 02-04 दिन पहले सोचा कि अब बोर्डिंग चेंज कर लेता हूं लेकिन जैसे बोर्डिंग चेंज करने गया बार-बार मोबाइल पर यह संदेश प्रज्वल्लित हो रहा था।

     जब मैंने google बाबा से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने कुछ ये जवाब दिया।👇
    इसका अर्थ एवं मतलब जानने के लिए कई लोगों से बात की यहां तक कि मेरे एक मित्र जो कि रेलवे में कार्य करते हैं उनसे भी मदद मांगी ताकि कम-से-कम मेरा बोर्डिंग चेंज हो जाए उन्होंने भरसक प्रयास किया लेकिन वो सफल नहीं रहे। मुझे ऐसा लग रहा था की सहरसा जाकर ही ट्रेन पकड़ना होगा। यदि मैं हाजीपुर से ट्रेन पकड़ता तो, तब तक यात्रा टिकट परीक्षक महोदय यानी कि Travelling Ticket Examiner (T.T.E.) मुझे अनुपस्थित जान कर मेरा टिकट किसी और को दे चुके होते। खैर, जैसे हर बीमारी का इलाज होता है वैसे ही हर समस्या का समाधान होता है। मैंने भी इस समस्या का समाधान ढूंढ़ निकाला। वो समाधान ऐसे था कि पाटलिपुत्र से एक ट्रेन सहरसा जा रही थी मैं उस ट्रैन में बैठ हाजीपुर होते हुए सहरसा जाता और फिर अपनी ट्रेन में सहरसा से बैठ हाजीपुर होते हुए दिल्ली प्रस्थान करता। यह समाधान तो बहुत आसान लग रहा था लेकिन इसमें समस्या यह थी कि जब तक मैं सहरसा पहुंचता तब तक वह ट्रेन सहरसा से निकल चुकी होती। अब मैं वैसा विकल्प ढूढ़ने लगा जब दोनों ट्रैन एक दूसरे को कुछ समय के लिए अंतराल पर मिले और वैसा संयोग मुझे बेगूसराय में मिला क्योंकि वो ट्रेन और मेरी ट्रेन के बीच लगभग 02 घंटे का फ़ासला था। उसके उपरांत मैंने पाटलिपुत्र से बेगूसराय तक का सफर तय किया। बेगूसराय में 02 घंटे इंतजार करना बहुत मुश्किल लग रहा था  इसलिए थोड़ा स्टेशन के बाहर घूमने का मन बनायें।
       मैं पहली बार बेगूसराय स्टेशन पर आया था शायद इसी वजह से स्टेशन के बाहर का नजारा मेरे लिए अद्भुत एवं नया था वहां मुझे कुछ विशेष खाद्य पदार्थ मिले जो कि स्वाद एवं सेहत के दृष्टिकोण से काफी अच्छे थे। उसे मैंने अपनी आगे की यात्रा के लिए खरीद कर बैग में रख लिया ताकि यहां से सफर अच्छे से बीत सकें।
       मेरी जो दिल्ली की यात्रा सहरसा से शुरू होने वाली थी अब वह बेगूसराय से शुरू हो रही थी। मेरे पास बहुत ज्यादा सामान तो नहीं था लेकिन साथ में बैग के साथ एक पेंटिंग थी जिसे बहुत ही सावधानी पूर्वक लेकर जाना था। मैंने उसे अपनी सीट के किनारे खड़ी करके ले जा रहा था ताकि वह अच्छे से जा सकें। अगले दिन मेरी परीक्षा थी तो सोचा कि कुछ किताबें देख लेता हूँ और कला की जो बुक अपने साथ लेकर जा रहा था उसे निकाल कर देखने लगा। मेरी सीट Reservation against Cancellation. (RAC) थी मेरे सीट के ऊपर एक दिल्ली का लड़का यात्रा कर रहा था पता नहीं उसे क्या सूझी वह अपनी सीट के ऊपर से एकदम झांकते हुए बोला- भैया आप शिक्षक का एग्जाम देने जा रहे हैं क्या? 
मैं उसकी भविष्यवाणी से चौक गया। मैंने उसकी ओर देखा और कहा- हां 
उसके बाद उसने एक-एक करके कई प्रश्न पूछने शुरू कर दिए जैसे- शिक्षक कैसे बनते हैं? वेतन कितना मिलता है? बनने के लिए योग्यता क्या होनी चाहिए? इत्यादि।
मुझे यहां उपनिषद की याद आने लगी। जिसका अर्थ होता है- ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु के समीप बैठना। और मैंने अपने पहले कई लेखो में यह बता चुका हूं कि मैं किसी को चेला (शिष्य) बनाता ही नहीं हूं मैं सबको गुरु ही बनाता हूं ताकी मैं सब से ज्ञान प्राप्त कर संकु। जब गुरु पास बैठा हो तो ज्ञान और भी सार्थक हो जाता है। उसे मैंने अपनी सीट पर बैठाया और मेरी सीट पर जो RAC वाले अंकल थे मैंने उसे उसकी सीट पर भेज दिया और उसके बाद उससे लंबी वार्तालाप हुई। इस दरम्यान मुझे पता चला कि वो 11वीं कक्षा का छात्र और दिल्ली में रहता है ऐसे है बिहार का। बात-चीत के दरम्यान मैंने उसे अपने सोशल मीडिया के कार्य जैसे- यूट्यूब पर वीडियो बनाना, Blogs लिखना, इत्यादि। कार्यो के बारे में बताया जिससे वो काफी प्रभावित होता हुआ दिख रहा था।
       पिछले कुछ दिनों से मेरी ट्रेन की यात्रायें बढ़ गई थी और मेरे साथ ऐसा पहली बार हो रहा था कि यात्रा के दरम्यान कोई ना कोई वस्तु मेरी ट्रेन में छुट जा रही थी। शायद इसी वजह से इस यात्रा में मैं ज्यादा सतर्क था और कोशिश कर रहा था कि कम-से-कम मेरी यह यात्रा अच्छे से बीते। दिल्ली पहुंचने से पूर्व ही मैंने अपनी बैग सीट पर रख ली और एक-एक करके सभी सामानो को उसमे रख लिया ताकि पुरानी घटनाएं मेरे साथ परावर्तित ना हो। तय समय पर ट्रेन मुझे दिल्ली छोड़ दी। उसके उपरांत रात में सोने से पूर्व मैंने सोचा कि कल तो मेरी परीक्षा है इसलिए एक बार कला की किताब देख लेता हूं जब बैग खोला तो उसमें से किताब नदारद थी। पुनः अपने आप को उस ट्रेन में ले गया जिससे यात्रा की थी और पता करने की कोशिश की, कि गलती कहां हुई तो स्मरण आया कि किताब पढ़ने के उपरांत मैंने उसे सीट पर रख दिया था और सीट के साइड से वो किताब सीट के नीचे गिर गया थी और मैंने अपना बैग सीट के नीचे से पहले ही निकाल लिया था जिस वजह से ट्रेन से उतरने के दरम्यान सीट के नीचे देखा ही नहीं बल्कि सीट के ऊपर रखे बैग को लेकर ट्रैन से नीचे उतर आए और कला की किताब ट्रैन में ही रह गई।😥

मेरी यह ट्रेन की यात्रा शुरुआत से लेकर अंत तक सुखद नही रही।

रविवार, 28 नवंबर 2021

कर्मफल


        एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी बीनने गया तो उसने एक अद्भुत बात देखी की एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी-खुशी अपने आप को घसीट कर चल रही थी। यह कैसे ज़िंदा रहती होगी जबकि यह किसी शिकार को पकड़ना तो दुर उसके नजदीक भी नहीं जा सकती है। किसान उक्त बातें सोच रहा था तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दांतो में एक शिकार दबाए उसी की तरफ आ रहा है। शेर को देखते ही सभी जानवर भागने लगे, वह किसान भी पेड़ पर चढ़ गया। उसने देखा कि शेर उस लोमड़ी के पास आया। उसे खाने की जगह, प्यार से शिकार का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया।

दूसरे दिन भी उसने देखा कि शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को खाना देकर चला गया। किसान ने इस अद्भुत लीला के लिए भगवान को मन में नमन🙏 किया। उसे अहसास हो गया कि भगवान जिसे पैदा करते है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं।

यह जानकर वह भी एक निर्जन स्थान पर चला गया और वहां पर चुपचाप बैठ कर भोजन का रास्ता देखने लगा। कई दिन गुज़र गए लेकिन कोई नहीं आया। वह मरणासन्न होकर वापस लौटने ही वाला था कि तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन-पानी कराया। तब वह किसान उनके चरणों में गिरकर रोने लगा और रोते-रोते वह लोमड़ी की बात बताते हुए बोला- महाराज, भगवान ने तो उस अपंग लोमड़ी पर दया दिखाई पर मैं तो मरते मरते बचा। ऐसा क्यों हुआ कि भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी हो गए ?

महात्मा उस किसान के सर पर हाथ फिराकर मुस्कुराकर बोले- तुम इतने नासमझ हो गए कि तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा इसीलिए तुम्हें इस तरह की मुसीबत उठानी पड़ी। तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह मदद करने वाला बनते देखना चाहते थे, निरीह लोमड़ी की तरह नहीं।

हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजों को जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं। चुनाव हमें करना है की हमे शेर बनना है या लोमड़ी।


जो प्राप्त है वही पर्याप्त है।


महाभारत की कथा से।

 


      बात उस समय की है जब पांडव अपना 13 वर्ष का वनवास समाप्त कर चुके थे, अब उन्हें एक साल अज्ञातवास में रहना था। श्रीकृष्ण की सलाह पर वह सभी राजा विराट के दरबार में पहुंचे और एक-एक करके अपनी विद्या का प्रदर्शन कर उनके यहां कार्य करने लगे।

युधिष्ठिर कंक बन गये।  

       धर्मराज युधिष्ठिर ने विराट के दरबार में पहुँचकर कहा- “हे राजन! मैं व्याघ्रपाद गोत्र में उत्पन्न हुआ हूँ तथा मेरा नाम 'कंक' है। मैं द्यूत विद्या में निपुण हूँ। आपके पास आपकी सेवा करने की कामना लेकर उपस्थित हुआ हूँ।”


द्यूत यानी कि "जुआ" वह खेल जिसमें धर्मराज अपना सर्वस्व हार बैठे थे। कंक बन कर वही खेल वह राजा विराट को सिखाने लगे। 


जिस बाहुबली के लिये रसोइये दिन-रात भोजन परोसते रहते थे वह भीम बल्लभ का भेष धारण कर स्वयं रसोइया बन गये। 


नकुल और सहदेव पशुओं की देखरेख करने लगे। 


दासियों सी घिरी रहने वाली महारानी द्रौपदी स्वयं एक दासी सैरंध्री बन गयी। 


       और वह धनुर्धर। उस युग का सबसे आकर्षक युवक वह महाबली योद्धा। वह द्रोण का सबसे प्रिय शिष्य। वह पुरूष जिसके धनुष की प्रत्यंचा पर बाण चढ़ते ही युद्ध का निर्णय हो जाता था। 


वह अर्जुन पौरुष का प्रतीक अर्जुन। नायकों का महानायक अर्जुन एक नपुंसक बन गया। 


एक नपुंसक ? 


उस युग में पौरुष को परिभाषित करने वाला अपना पौरुष त्याग कर होठों पर लाली लगा कर, आंखों में काजल लगा कर, एक नपुंसक  "बृह्नला" बन गया। 


         युधिष्ठिर राजा विराट का अपमान सहते रहे। पौरुष के प्रतीक अर्जुन एक नपुंसक सा व्यवहार करते रहे। नकुल और सहदेव पशुओं की देख रेख करते रहे। भीम रसोई में पकवान पकाते रहे और द्रौपदी एक दासी की तरह महारानी की सेवा करती रही। 


परिवार पर एक विपदा आयी तो धर्मराज अपने परिवार को बचाने हेतु कंक बन गया। पौरुष का प्रतीक एक नपुंसक बन गया। 


एक महाबली साधारण रसोईया बन गया। 


पांडवों के लिये वह अज्ञातवास नहीं था, अज्ञातवास का वह काल उनके लिये अपने परिवार के प्रति अपने समर्पण की पराकाष्ठा थी।


वह जिस रूप में रहे, जो अपमान सहते रहे, जिस कठिन दौर से गुज़रे, उसके पीछे उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। अज्ञातवास का वह काल परिस्थितियों को देखते हुये परिस्थितियों के अनुरूप ढल जाने का काल था। 


आज भी इस राष्ट्र में अज्ञातवास जी रहे ना जाने कितने महायोद्धा दिखाई देते हैं। कोई धन्ना सेठ की नौकरी करते हुये उससे बेवजह गाली खा रहा है क्योंकि उसे अपनी बिटिया की स्कूल की फीस भरनी है। 


बेटी के ब्याह के लिये पैसे इक्कठे करता बाप एक सेल्समैन बन कर दर दर धक्के खा कर सामान बेचता दिखाई देता है। 


        ऐसे-ऐसे उदाहरण गिनवाने लगूं तो शायद ऐसे असँख्य उदाहरणों से लेखों की शृंखला लिख दुं। ऐसे असँख्य पुरुषों के रोज़ के सँघर्ष की सत्यकथाओं से हर रोज़ पाठकों को रूबरू करवा दुं जो अपना सुख दुःख छोड़ कर अपने परिवार के अस्तिव की लड़ाई लड़ रहे हैं। 


यदि आपको रोज़मर्रा के जीवन में किसी संघर्षशील व्यक्ति से रूबरू होने का मौका मिले तो उनका आदर कीजिये। उनका सम्मान कीजिये। राह चलता गुब्बारे बेचने वाला आपकी गाड़ी के शीशे पर दस्तक इसलिये दे रहा है क्योंकि उस गुब्बारे के बदले में मिलने वाले चंद रुपयों में उसकी नन्ही सी बिटिया की रोटी छिपी है। फैक्ट्री के बाहर खड़ा गार्ड, होटल में रोटी परोसता वेटर, सेठ की गालियां खाता मुनीम, वास्तव में कंक, बल्लभ और बृह्नला हैं। 


वह अज्ञातवास जी रहे हैं।


परंतु वह अपमान के भागी नहीं हैं। वह प्रशंसा के पात्र हैं। यह उनकी हिम्मत है, उनकी ताकत है, उनका समर्पण है की विपरीत परिस्थितियों में भी वह डटे हुये हैं। 


वह कमजोर नहीं हैं। उनके हालात कमज़ोर हैं। उनका वक्त कमज़ोर है। 


याद रहे,


अज्ञातवास के बाद बृह्नला ने जब पुनः अर्जुन के रूप में आये तो कौरवों का नाश कर दिया। पुनः अपना यश अपनी कीर्ति सारे विश्व में फैला दी। 


वक्त बदलते वक्त नहीं लगता इसलिये जिसका वक्त खराब चल रहा हो, उसका उपहास और अनादर ना करें। 


उनका सम्मान करें, उनका साथ दें। 


क्योंकि एक दिन अवश्य अज्ञातवास समाप्त होगा। समय का चक्र घूमेगा और बृह्नला का छद्म रूप त्याग कर धनुर्धर अर्जुन इतिहास में ऐसे अमर हो जायेंगे के पीढ़ियों तक बच्चों के नाम उनके नाम पर रखे जायेंगे। इतिहास बृह्नला को भूल जायेगा। इतिहास अर्जुन को याद रखेगा। 


हर सँघर्षशील व्यक्ति में बृह्नला को मत देखिये। कंक को मत देखिये। भल्लब को मत देखिये। हर सँघर्षशील व्यक्ति में धनुर्धर अर्जुन को देखिये। धर्मराज युधिष्ठिर और महाबली भीम को देखिये। 


क्योंकि एक दिन हर संघर्षशील व्यक्ति का अज्ञातवास खत्म होगा। 


यही नियति है। 

यही समय का चक्र है। 


यही महाभारत की सीख है। 


शनिवार, 27 नवंबर 2021

नवोदय की वो पहली चाय☕ (Navodaya ki wo pahli chai)

        जवाहर नवोदय विद्यालय सुखासन, मधेपुरा (बिहार) में अपना योगदान दिये हुए मुझे एक सप्ताह से ऊपर हो गया था। कमी तो किसी चीज की यहां नहीं थी बस एक ही चीज की तलब महसूस हो रही थी वह थी - चाय☕.

      कैलाश सर, जो को यहां पर गणित के शिक्षक के रूप में मेरे साथ ही योगदान दिए थे। उनके साथ एक दिन सिंहेश्वर धाम जाने एवं भगवान शिव के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कोरोना की गाइडलाइन की वजह से मंदिर का गर्भगृह तो बंद था लेकिन मंदिर के बाहर से ही श्रद्धालुओं के द्वारा पूजा-पाठ किया जा रहा था। मंदिर के बारे में विस्तृत विवरण नीचे दिए गए लिंक से आप पढ़ सकते हैं👇


https://biswajeetk1.blogspot.com/2021/09/blog-post_93.html


फिलहाल हम अपने विषय पर लौटते हैं....

         मंदिर से दर्शन के उपरांत आते समय अचानक से ध्यान आया कि चाय बनाने की सारी सामग्रियां खरीद लेते हैं। चाय के स्वाद में कही कोई कमी ना रह जायें इसलिए याद कर-करके एक-एक चीजें हम खरीद रहे थे। मेरा मानना है कि जिंदगी और चाय में टेस्ट हमेशा बना रहना चाहिए।  अमूमन लोग चाय बनाने के लिए दूध और चायपत्ती की परिकल्पना करते हैं लेकिन मेरी चाय की लिस्ट में सामग्री की सूची लंबी होती जा रही थी, जिसे देख- देखकर कैलाश सर भी आश्चर्यचकित हो रहे थे। अंतिम में मैंने जब 100 ग्राम इलायची की मांग की तो उनसे रहा नहीं गया और बीच मे बोल उठे!!! सर, इतनी इलाइची का क्या कीजिएगा?? ₹05 - ₹10 की ले लीजिए काफी हैं। मैंने उनकी बात को स्वीकार करते हुए 50 ग्राम इलायची ले ली। विद्यालय पहुंचने पर उन्होंने पूरे परिसर में यह बात फैला दी थी आर्ट सर तो चाय के लिए ₹250/- कि केवल इलायची लाये हैं। नवोदय विद्यालय में किसी भी शिक्षक को उसके नाम से कम उसके सब्जेक्ट से ज्यादा जाना जाता है। जैसे मैं आर्ट सब्जेक्ट पढ़ाता आता हूं तो आर्ट सर. कोई रसायन शास्त्र पढ़ाता है तो केमेस्टरी सर... इसकी शुरुआत किसने की इसके बारे में तो मुझे नहीं पता लेकिन सुनकर अच्छा लगता था।

      चाय पीने के लिए कप मैंने दो दिन पहले ही Flipkart से ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया था, जो कि एक-दो दिनों में पहुंचने वाला था। अब बस इंतजार था की कब कप आए और चाय की पार्टी की जायें।

       ....इंतजार ज्यादा लंबा नहीं चला और अगले ही दिन शाम में ही 01 दिन पहले Flipkart का कुरियर बॉय आ गया यानी मेरा इंतजार उससे भी नहीं देखा गया शायद! बस!!!, फिर क्या था, फटाफट चाय पार्टी की प्लानिंग बन गई। इवनिंग असेम्बली के बाद मैंने सुदर्शन सर (कंप्यूटर  सर), कैलाश सर (मैथ सर), चंदन सर (इंग्लिश सर), सफान सर (इकोनॉमिक्स सर) और सज्जाद सर को आमंत्रण दे दिया। सज्जाद सर को छोड़कर सभी लोग रूम पर आ गए थे। चाय बनाने के लिए जब मैं किचन में गया तो देखा कि पानी ही नहीं है और मैंने दिन में पानी भरा ही नहीं था। मैं सोच ही रहा था की क्या करूं तभी कंप्यूटर  सर मेरी मदद करने के लिए किचन में आये। जब उन्होंने देखा कि किचन में पानी नहीं है तो फटाफट वो अपने रूम पर गए और और एक बोतल पानी लेकर आए। सज्जाद सर भी आएंगे यह सोचकर मैंने 06 कप चाय बनने के लिए रख दिया। 

       चाय अच्छी बने यह सोचकर मैंने 03-04 चम्मच एक्स्ट्रा ही दूध डाल दिया। चूंकि मैं पाउडर वाले दूध से चाय बना रहा था। वो दूध इतना गाढ़ा हो गया कि चाय वाले बर्तन में ही नीचे एक मोटा लेयर बैठ गया और जलने भी लगा। दूध के जलने की महक पूरे किचन में फैल गई। दूध जलने की महक बगल के रूम में बैठे बाकी सर के पास पहुंचे उससे पूर्व ही मैंने दूध को दूसरे बर्तन में खाली करके फिर से दूध घोला और चाय बनाने की प्रक्रिया पूर्ण की। 

      आखिररकार!!! हमारी मेहनत रंग लाई और चाय बन गई। अब बस उसे कप में निकालना था। कप भी मैंने धो करके तैयार कर लिया। तब-तक कंप्यूटर सर पुनः किचन में आये और बोले कि - सर लेट हो रहा है? मैंने कहा - सर, चाय तैयार हैं बस छान कर ला रहे हैं। तब तक आप ये बिस्किट लेकर चलिए। सुदर्शन सर बिस्किट लेकर चले गए लेकिन मेरे सामने पुन: एक समस्या आ गई और वह यह थी कि चाय की सभी सामग्री खरीदते समय मैंने चाय छानने वाला उपकरण यानी चाय छन्नी खरीदा ही नहीं था। इस समस्या का त्वरित समाधान करना था। मैंने फटाफट एक सफेद सूती का गमछा लाया जिसे कुछ दिनों पूर्व ही खरीदा था उसे लेकर पहले पानी मे अच्छे से धोया फिर उससे चाय छानने का भरसक प्रयास करने लगा क्योंकि मैंने देखा था कि शादी-वगैरह में ऐसे ही सफेद धोती से लोग चाय छानते हैं लेकिन धोती का कपड़ा थोड़ा पतला होता है उससे चाय आसानी से निकल जाती है लेकिन गमछा थोड़ा मोटा था मेरे लाख प्रयत्न के बाद भी चाय गमछे से नहीं निकल पा रहा थी। 

       सफेद रंग का गमछा चाय के रंग से रंगीन हो गया लेकिन कप में चाय नही आया या थोड़ा-बहुत आया। फिर सुई की मदद से उस गमछे में छेद कर-कर के चाय को निकाला। इस प्रयास में चाय मेरे शरीर, कपड़ों एवं जमीन पर गिर गया।पुरी प्रक्रिया के पश्चात मेरे पास 05 कप चाय ही आया और जब मैंने आदमी को गिना तो मुझको लेकर 06 लोग हो रहे थे। फिर मैंने सोचा कि फिलहाल 05 को ही दे देंगे और स्वयं के बारे में विचार करेंगे लेकिन जैसे ही चाय लेकर गया तो देखा कि अभी तक सज्जाद सर नहीं आये थे यानी मुझको लेकर 05 लोग ही हो रहे थे यानी सब के बीच एक-एक कप बंट गया और नवोदय की वो पहली चाय की पार्टी सेलिब्रेट🎉 हो पाई। चाय पार्टी को और अधिक मजेदार मैंने बनाया और कुछ दिन बाद कंप्यूटर सर का जन्मदिन था मैंने उनके लिए एक तस्वीर बनाई थी जो कि उन्हें भेंट की। इस तरह से चाय पार्टी मेरे साथ-साथ कंप्यूटर सर (सुदर्शन सर) के लिए भी यादगार बन गई।









गुरुवार, 25 नवंबर 2021

हमारा संविधान

 


           आज ही के दिन हमारे देश भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ था। इसलिये वर्ष 2015 से प्रति वर्ष 26 नवम्बर को भारत में संविधान दिवस या विधि दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ० भीमराव आंबेडकर के 125वीं जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को पहली बार भारत सरकार द्वारा संविधान दिवस सम्पूर्ण भारत में मनाया गया तथा 26 नवम्बर 2015 से प्रत्येक वर्ष सम्पूर्ण भारत में संविधान दिवस मनाया जा रहा है। इससे पहले इसे हम राष्ट्रिय कानून दिवस के रूप में मनाते थे। संविधान सभा ने भारत के संविधान को 02 वर्ष 11 माह 18 दिन में 26 नवम्बर 1949 को पूरा कर राष्ट्र को समर्पित किया गया था। गणतंत्र भारत में 26 जनवरी 1950 से संविधान अमल में लाया गया।

      भारतीय संविधान की मूल प्रति को पद्म विभूषण से सम्मानित कला गुरू नन्दलाल बोस ने चित्रों से अलंकृत किया था। नन्दलाल बोस की मुलाकात प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के शान्ति निकेतन में हुई और वहीं नेहरू जी ने नन्दलाल बोस को आमंत्रण दिया कि वे भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रकारी से सजाएं। 

         संविधान की मूल प्रति को प्रेम बिहारी रायजादा ने इटैलिक स्टाइल कैलिग्राफी में खूबसूरती से हाथ से लिखा था। 251 पृष्ठ के इस पांडुलिपि के हर पन्नों पर चित्र बनाना सम्भव नहीं था। अत: नन्दलाल बोस ने संविधान के प्रत्येक भाग की शुरुआत में 8"-13" इंच के चित्र बनाए। नन्दलाल बोस ने व्यौहार राममनोहर सिन्हा और अपने अन्य छात्रों के सहयोग से कुल 22 चित्र बनाए और इतनी ही किनारियों से सजाया। अजन्ता और बाघ से प्रेरित इन चित्रों को बनाने में चार साल लगे और उन्हें इसके लिए उन्हें ₹21,000 पारिश्रमिक दिया गया था। धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र भारत के संविधान की मूल प्रति में शान्ति का उपदेश देते भगवान बुद्ध भी हैं और वैदिक यज्ञ करते ऋषि की यज्ञशाला भी, काल की छाती पर पैर रखकर नृत्य करते नटराज, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण और स्वर्ग से देव नदी गंगा का धरती पर अवतरण भी, हिन्दू धर्म के प्रतीक शतदल कमल भी संविधान की मूल प्रति पर चित्रित है। ये सब किसी धर्म विशेष नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की विकास यात्रा को दर्शाने वाले चित्र है। 

        संविधान के पहले पन्ने पर भारत के राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तम्भ की लाट का चित्र है, जिसे उनके प्रिय शिष्यों में से एक दीनानाथ भार्गव ने बनाया था। हड़प्पा की खुदाई से मिले घोड़े, शेर, हाथी और सांड़ की चित्रों को लेकर सुनहरी किनारी से भारतीय संविधान की प्रस्तावना को सजाया गया है। संविधान में मुगल बादशाह अकबर अपने दरबार में बड़े शान से बैठे हुए दिख रहे हैं, सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह भी वहां मौजूद हैं, मैसूर के सुल्तान टीपू और 1857 की वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के चित्र भी संविधान की मूल प्रति पर उकेरे गए हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता को चित्रों मे समेटे संविधान की मूल प्रति संसद के पुस्तकालय में हीलियम से भरे डिब्बों में सुरक्षित रखी है।

The HOPE Experiment by साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर


       1950 के दशक में हावर्ड यूनिवर्सिटी के विख्यात साइंटिस्ट कर्ट रिचट्टर ने चूहों पर एक अजीबोगरीब शोध किया था। कर्ट ने एक जार को पानी से भर दिया और उसमें एक जीवित चूहे को डाल दिया। पानी से भरे जार में गिरते ही चूहा हड़बड़ाने लगा औऱ

जार से बाहर निकलने के लिए लगातार ज़ोर लगाने लगा। चंद मिनट फड़फड़ाने के पश्चात चूहे ने जार से बाहर निकलने का अपना प्रयास छोड़ दिया और वह उस जार में डूबकर मर गया। 


कर्ट ने फ़िर अपने शोध में थोड़ा सा बदलाव किया।


उन्होंने एक दूसरे चूहे को पानी से भरे जार में पुनः डाला। चूहा जार से बाहर आने के लिये ज़ोर लगाने लगा। जिस समय चूहे ने ज़ोर लगाना बन्द कर दिया और वह डूबने को था......ठीक उसी समय कर्ड ने उस चूहे को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। 


कर्ट ने चूहे को उसी क्षण जार से बाहर निकाल लिया जब वह डूबने की कगार पर था। 


चूहे को बाहर निकाल कर कर्ट ने उसे सहलाया...... कुछ समय तक उसे जार से दूर रखा और फिर एकदम से उसे पुनः जार में फेंक दिया। पानी से भरे जार में दोबारा फेंके गये चूहे ने फिर जार से बाहर निकलने की अपनी जद्दोजेहद शुरू कर दी। लेकिन पानी में पुनः फेंके जाने के पश्चात उस चूहे में कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिले जिन्हें देख कर स्वयं कर्ट भी बहुत हैरान रह गये। 


कर्ट सोच रहे थे कि चूहा बमुश्किल 15-20 मिनट तक संघर्ष करेगा और फिर उसकी शारीरिक क्षमता जवाब दे देगी और वह जार में डूब जायेगा। 


लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 


चूहा जार में तैरता रहा। अपनी जीवन बचाने के लिये लगातार सँघर्ष करता रहा। 


60 घँटे.......


जी हाँ..... 60 घँटे तक चूहा पानी के जार में अपने जीवन को बचाने के लिये सँघर्ष करता रहा। 


कर्ट यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये। 


जो चूहा महज़ 15 मिनट में परिस्थितियों के समक्ष हथियार डाल चुका था........वही चूहा 60 घंटों तक कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था और हार मानने को तैयार नहीं था। 


कर्ट ने अपने इस शोध को एक नाम दिया और वह नाम था-


"The HOPE Experiment"


Hope........यानि की आशा। 


कर्ट ने शोध का निष्कर्ष बताते हुये कहा कि जब चूहे को पहली बार जार में फेंका गया तो वह डूबने की कगार पर पहुंच गया उसी समय उसे मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया गया। उसे नवजीवन प्रदान किया गया। उस समय चूहे के मन मस्तिष्क में "आशा" का संचार हो गया। उसे महसूस हुआ कि एक हाथ है जो विकटतम परिस्थिति से उसे निकाल सकता है। 


जब पुनः उसे जार में फेंका गया तो चूहा 60 घँटे तक सँघर्ष करता रहा.......

वजह था- वह हाथ!!! वह आशा!!! वह उम्मीद!!!


इसलिए हमेशा,


उम्मीद बनाये रखिये, सँघर्षरत रहिये, 


सांसे टूटने मत दीजिये, मन को हारने मत दीजिये।

रविवार, 21 नवंबर 2021

Major Dhyan Chand Khel Ratna Award 2021

 


Name of the Sportsperson       Discipline

Neeraj Chopra                             Athletics

Ravi Kumar                                 Wrestling

Lovlina Borgohain.                    Boxing

Sreejesh P.R                                 Hockey

Avani Lekhara                            Para Shooting

Sumit Antil                                  Para Athletics

Pramod Bhagat                          Para Badminton 

Krishna Nagar                           Para Badminton 

Manish Narwal                         Para Shooting

Mithali Raj                                 Cricket

Sunil Chhetri                             Football

Manpreet Singh                        Hockey