(1)
नए मिज़ाज के शहरों में,
अब मेरा मन नहीं लगता।
जीं चाहता हैं पुराने वक़्तों का,
फिर से मैं सीवान हो जाऊँ।
My skills and Characteristics are Painting, Fashion Photography, Heritage Photography, Logo Designing, Writing, Blogging and Getting things Done in Creative Way.
(1)
नए मिज़ाज के शहरों में,
अब मेरा मन नहीं लगता।
जीं चाहता हैं पुराने वक़्तों का,
फिर से मैं सीवान हो जाऊँ।
एक ऐसी कविता, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है।
ख्वाहिश नहीं मुझे
मशहूर होने की,
आप मुझे पहचानते हो
बस इतना ही काफी है।
अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा जाना मुझे,
जिसकी जितनी जरूरत थी
उसने उतना ही पहचाना मुझे !!!
जिन्दगी का फलसफा भी
कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं और
साल गुजरते चले जा रहे हैं।
एक अजीब सी
'दौड़' है ये जिन्दगी,
जीत जाओ तो कई
अपने पीछे छूट जाते हैं और
हार जाओ तो
अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं।
बैठ जाता हूँ
मिट्टी पे अक्सर,
मुझे अपनी
औकात अच्छी लगती है।
मैंने समंदर से
सीखा है जीने का तरीका,
चुपचाप से बहना और
अपनी मौज में रहना।
ऐसा नहीं कि मुझमें
कोई ऐब नहीं है,
पर सच कहता हूँ
मुझमें कोई फरेब नहीं है।
जल जाते हैं मेरे अंदाज से
मेरे दुश्मन,
एक मुद्दत से मैंने
न तो मोहब्बत बदली
और न ही दोस्त बदले हैं।
एक घड़ी खरीदकर
हाथ में क्या बाँध ली,
वक्त पीछे ही
पड़ गया मेरे !!!
सोचा था घर बनाकर
बैठूँगा सुकून से,
पर घर की जरूरतों ने
मुसाफिर बना डाला मुझे ।
सुकून की बात मत कर,
बचपन वाला इतवार अब नहीं आता।
जीवन की भागदौड़ में
क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?
हँसती-खेलती जिन्दगी भी
आम हो जाती है।
एक सबेरा था
जब हँसकर उठते थे हम,
और आज कई बार बिना मुस्कुराए
ही शाम हो जाती है।
कितने दूर निकल गए,
रिश्तों को निभाते-निभाते।
खुद को खो दिया हमने
अपनों को पाते-पाते।
लोग कहते हैं
हम मुस्कुराते बहुत हैं,
और हम थक गए
दर्द छुपाते-छुपाते।
खुश हूँ और सबको
खुश रखता हूँ,
लापरवाह हूँ ख़ुद के लिए
मगर सबकी परवाह करता हूँ।
मालूम है
कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी
कुछ अनमोल लोगों से
रिश्ते रखता हूँ।
🙏🌹🌹🙏
मुझे याद है भारतीय रेल के जनरल बोगी की वो तमाम यात्राएं जिसमे थोड़ी सी जगह बनाने के लिए, वहां बैठे लोगों से हमेशा हेल्दी ग्रुप डिस्कशन करना पड़ता था, उनको इंप्रेस करना पड़ता था, इतना इंप्रेस तो आज तक किसी लड़की को नहीं किये जितना कि कई बार सिर्फ थोड़ी-सी जगह के लिए वहां बैठे लोगों से कर लिये थे। यदि उसमे से थोड़ा भी इंप्रेस किसी ख़ूबसूरत बला👩🦰 को किए रहते तो आज तक शायद सिंगल नही रहते। ख़ैर!!! आपने विषय पर लौटते हैं। हम चर्चा कर रहे थे जनरल बोगी में सीट लेने की, कई बार तो सीट पर बैठे लोगों को भैया, चाचा, सर🙏 सब बोलकर रिश्ता बनाना पड़ता था, तब जाकर लोग कबूल करते थे और थोड़ी सी जगह मिलती थी बैठने की। हालांकि, उस थोड़ी सी जगह को देखकर मेरी तशरीफ भी घबरा जाती थी क्योंकि ट्रेन जब थोड़ी सी भी हिलती थी तो अक्सर मेरी तशरीफ फिसल कर सीट से नीचे उतर जाती थी ।
जेनरल बोगी की इन तमाम यात्राओं में एक दिन गुस्से में हम एक खतरनाक UP/बिहारी मजदूर से भयंकर झगड़ा हो गया, वो भी जगह बनाने को लेकर। वो जो मजदूर था ना वो मुंबई से लौट रहा था, कमाकर। मुझे तो एक बार ऐसा लगा की उसने अपनी पूरी कमाई के पैसा से बहुत सारा सामान खरीद लिया था और वो सब वहीं सीट के नीचे ऊपर लोड कर दिया था। जब उससे मेरी सीट को लेकर बहस हो रही थी तब उसने मेरी ओर गौर से देखा और उसे यकीन हो गया कि हम फुल फ्रस्टेट बेरोजगार हैं।
हम बस इतना बोले कि भाई साहब, सामान का लगेज बुकिंग करवाना चाहिए ना!!! यहां क्यों भर दिए हो। आने-जाने एवं बैठने में परेशानी हो रही है। मेरा इतना बोलते ही वह और भड़क😠 गया और बोला -
"तोर पैसा से खरीदे हैं का रे.....??? कि एतना समझा रहा है हमको!!! बहुते बैठ के, अफसर बने के शौक है न, तो रिजर्वेशन कराके स्लीपर में काहें नहीं जाता है रे....
चला हैं, यहां अंग्रेजी झाड़ने। हमको अनपढ़ समझा है का रे़...."
वो और चार्ज होने लगा और उसको देखकर बाकी उसके साथी मजदूर भी जोश में आने लगे, इसलिए माहौल अनुकूल ना देखते हुए हम जल्दी से आगे बढ़ गए।
आपको लग रहा होगा कि बात आई गई हो गई लेकिन सच बताएं, वो स्लीपर वाली बात हमको लग गई, बेरोजगार जो थे। बेरोजगारों को कोई भी बात उतनी ही जल्दी खराब लगती है जितनी जल्दी नई बहू को सास की बात।
उसके बाद हम भी निर्णय कर लिए कि अब और बेइज्जती नहीं करवाएंगे, जाएंगे अब हम भी स्लीपर से ही और वो भी बकायदे रिजर्वेशन कराके। जब टिकट काउंटर पर टिकट लेने गए तब वहां बैठे रेलवे के कर्मचारी ने फॉर्म दिया। नाम था उसका - रिजर्वेशन फॉर्म। परीक्षा का फॉर्म तो हमेशा भरते थे पर उस दिन टिकट कटने वाला एक फॉर्म भरे, मजा आ गया देखकर। बढ़िया सुंदर राइटिंग बना-बना कर फॉर्म भरके जमा किए। टिकट काटने वाले कर्मचारी ने कंप्यूटर में पता नहीं क्या-क्या टाइप किया और मेरी ओर देख कर कुछ बोले- उनके द्वारा बोले गए पहले दो चार शब्द तो हम समझ नहीं पाए बस इतना समझे कि वह पूछ रहे हैं टिकट काट दे ? मैंने जैसे सुना - टिकट काट दे ? मुझे लगा कि जब फार्म भरकर उनको दे ही दिये हैं तब पूछ क्यों रहे हैं ? मैंने पूछा - सीट है ना!!! , क्योंकि मैंने सुना था कि कई बार रिजर्वेशन में सीट नहीं मिलता हैं। तब वो बोले कि सीट तो मिल जाए लेकिन..... उनकी बात पूरी होती उससे पहले ही हम चहकते हुए बोलो - टिकट काट दीजिये। एक बार वो मेरी तरफ़ घुर कर देखे और टिकट प्रिंट होने के लिए दे दिया। आखिरकार टिकट करवा ही लिए थे, स्लीपर का। टिकट बढ़िया प्रिंट हुआ, कागज़ पर। खच-खच करने वाले प्रिंटर से। और जब हम उसको देखे, तो उसपर लिखा हुआ था, RAC 26 । इतना तो पढ़े थे ही हम। समझ गए कि स्लीपर में एक्चुअली रैक जैसा बना रहता है, उसी में आदमी सब सोता है, उसी को RAC (रैक) कह रहा है और हमारा छब्बीस नंबर का रैक है ।
अगले दिन सुबह 06 बजे ट्रेन थी मेरी। रिज़र्वेशन करा लेने से टेंशन हो गया था क्योंकि हम जो जूता पहन कर जाते थे, वो कई दिनो से अपने सोल से जुदा होने लगा था, इसलिए एक मोची से सिलवा दिए थे। सही में देखने में अच्छा नहीं लग रहा था। कहीं स्लीपर बोगी में बड़े बड़े लोग आएंगे वो हमको गरीब टाइप ना समझें इसलिए हम जल्दी से बढ़िया कंपनी का एकदम नया चमड़ा टाइप वाला स्लीपर 600 रुपया में, बार्गेनिंग कराके ले लिए, एक पास के दुकान से। स्लीपर में रेडियम💎 लगा था जो रात में चमकता था ।
रिजर्वेशन कराए थे तो ससुरा रात भर नींद😴 भी नहीं आई। ऐसा लग रहा था कि कहीं सोए ना रह जाएं और ट्रेन निकल जाए, कहीं अलार्म धोखा ना दे दे। पर फिर भी, आंखें भले ही लाल😳 हो गईं थी मेरी नहीं सोने से, पर उत्साह दस गुना था हो भी क्यों ना!!! रिजर्वेशन जो था स्लीपर में।
सुबह होते ही पहुंच गए स्टेशन, मस्त नहा-धोकर, नया शर्ट-पैंट और स्लीपर पहनकर। ट्रेन आई तो घुस गए हम सामने वाली बोगी में और 26 नंबर के सीट पर आ गए। उसपर एक लड़की सो रही थी। हुलिया ऐसा बना हुआ था उसका जैसे बारात में दम भर नाचने के बाद सीधे आकर सो गई हो। अलग टाइप का खर्राटा भी ले रही थी।
15 मिनट छोड़ दिए कि जाने दो, लड़की है। सो लेगी थोड़ा देर, फिर उठा देंगे। विवेकानंद से सीखे थे कि लड़की औरत का इज्जत करना चाहिए, इसलिए किए। थोड़ी देर बार उसको उठाए तो नींद में कह रही है कि "कौन हो, जाओ यहां से, ये मेरी सीट है, क्यों डिस्टर्ब कर रहे हो और सो गई "।
हम उसको बताए कि मेरी है ये सीट, मैने रिजर्वेशन कराया है। तभी एक ठो लौंडा जो उसकी हवा से उड़ती हुई जुल्फों को देखकर बहुत देर से आशिकी फ़िल्म का गाना "बस एक सनम चाहिए आशिकी के लिए" गाते हुए टाइम पास कर रहा था। हम को देखते हुए बोला कि -
"ढेर अंग्रेजी बोल रहा है तुम। लड़की देख के यहां नाटक कर रहा है, आए हो यहां तुम लौंडियाबाजी करने।"
हम भी जोश में आ गए और उसको अपना टिकट दिखाए तो हंस के कहता है अनपढ़े हैं का रे, RAC टिकट में सुत के जाएगा। हमको समझ में नही आ रहा था कि वह कहना क्या चाहता हैं ??? उससे हम बहस कर ही रहे थे कि तभी टीटी महोदय आ गये मैंने उनको बताया कि मेरी सीट पर लड़की सो रही है और जब कहां तो ये भाई साहब हमसे झगड़ रहे हैं। तब टीटी ने मेरा टिकट लिया और अपने पास स्थित एक बड़े से लिस्ट में मिलान किया और कहां - भाई साहब, कौन कॉलेज में पढ़ते हैं ? S-12 में 07 नंबर का सीट है आपका। सीधे जाइए ये S-2 है। हम चल तो दिए पर अभी भी समझ में नहीं आ रहा था की रेलवे पागल है क्या, जब सीट नंबर अलग है तो हमको 26 नंबर काहे लिख के दिया।
खैर!!! कई डब्बों को पर करते हुए और लोगों से पूछते हुए अपने सीट पर आ गए। वहां साला अलग ही गांजा हो रखा था। सेम सीट नंबर का उसका भी टिकट था जो मेरे सीट पर बैठा था। हम सोचे कि साला ऊ मजदूरवा के फेर में आज दर-दर का ठोकर खा रहे हैं। मन कर रहा था कि मिल जाता ससुरा तो उसका नरेटी दबा देते।
एक घंटा तक बैठ नहीं पाए थे आराम से, और नींद भी आ रही थी और उपर से मेरे सीट पर तीन लोग बैठा हुआ था। अभी सोच ही रहे थे कि वहां बैठा एक आदमी मुस्कुराकर बोला कि -
"अरे, काहे परेशान हो रहे हैं जी, आइए बैठिए, सबको चलना है एडजस्ट करके चला जाए"।
मानना पड़ेगा उस आदमी को। मेरे ही सीट पर हमको एडजस्ट कर दिया। सीट पर बैठे-बैठे उसने मुझे समझाया की RAC का मतलब क्या होता है। आप भी पढ़िए उसी की जुबानी।
"RAC यानी कि एक दुल्हन जिसका दो दूल्हा होता है, दोनो दूल्हा अपनी दुल्हन पर अधिकार दिखाने का कोशिश करता है पर दुल्हन अंत तक उन दोनों में से किसी की नहीं होती"
हम भी RAC की कहानी सुन हताश होकर चुप-चाप एडजस्ट हो गए और अब आने लगी हमको नींद, रात भर जो सोए नहीं थे। ऊपर की सीट में गिद्ध जैसा गर्दन निकाल कर बैठा था एक आदमी जो झांक रहा था तब से। हमसे कहता है कि नींद आ रही है का ? तो आइए सो जाइए थोड़ी देर ऊपर, हम नीचे बैठ जाते हैं। उस दयालु आदमी को दंडवत प्रणाम🙏 करने का मन किया।
हम जल्दी से चप्पल खोल कर ऊपर जाकर सो गए। करीब दो घंटे बाद नींद खुली तो लोग कम हो गए थे। मैं नीचे उतरा, की चलो थोड़ा नजारा देखा जाए, चाय-वाय☕ पिया जाए। उतरने के बाद अपना नया वाला चप्पल खोजने लगे, दिख ही नहीं रहा था। तभी एक आदमी जो खिड़की के पास बैठकर झाल-मूढ़ी खा रहा था, पूछा कि - का खोज रहे हैं भाई जी ? हम बोले कि "यार, मेरा स्लीपर नहीं मिल रहा" ? पूछा की कैसा था। हम बताए कि "यार, नया था, रेडियम लगा था उसमे" । वो हंसकर बोला कि
"भाई जी, गया
मैंने कहां - गया, मतलब!!
तब वह मुस्कुराते हुए बोला - गया, स्टेशन अभी क्रॉस हुआ है, आपका स्लीपर गया।
स्लीपर (Sleeper) बोगी में सबसे पहले आपको स्लीपर (Slipper) का ध्यान रखना चाहिए, इसलिए देखिए, हम बैठे हैं नीचे, लेकिन स्लीपर है मेरा पंखा के ऊपर" ।
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हम ऊपर देख रहे थे उसका स्लीपर (Slipper) वो हमको देखकर मुस्कुरा😊 रहा था और हम सोच रहे थे कि मेरा जनरल बोगी ही अच्छा था। कहां फंस गए इस स्लीपर के चक्कर में.......
नटराज भगवान शिव का एक नाम है उस रूप में जिस में वह सबसे उत्तम नर्तक हैं। नटराज शिव का स्वरूप न सिर्फ उनके संपूर्ण काल एवं स्थान को ही दर्शाता है, अपितु यह भी बिना किसी संशय स्थापित करता है कि ब्रह्माण्ड में स्थित सारा जीवन, उनकी गति कंपन तथा ब्रह्माण्ड से परे शून्य की नि:शब्दता सभी कुछ एक शिव में ही निहित है। नटराज दो शब्दों के समावेश से बना है – नट (अर्थात कला) और राज। इस स्वरूप में शिव कालाओं के आधार हैं। शिव का तांडव नृत्य प्रसिद्ध है।
शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं। पहला उनके क्रोध का परिचायक, प्रलयकारी रौद्र तांडव तथा दूसरा आनंद प्रदान करने वाला आनंद तांडव। पर ज्यादातर लोग तांडव शब्द को शिव के क्रोध का पर्याय ही मानते हैं। रौद्र तांडव करने वाले शिव रुद्र कहे जाते हैं, आनंद तांडव करने वाले शिव नटराज। प्राचीन आचार्यों के मतानुसार शिव के आनन्द तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विलय हो जाता है। शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भांति मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्याएँ हैं।
नटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति के चार भुजाएँ हैं, उनके चारों ओर अग्नि के घेरें हैं। उनका एक पाँव से उन्होंने एक बौने(अकश्मा) को दबा रखा है, एवं दूसरा पाँव नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। उन्होंने अपने पहले दाहिने हाथ में (जो कि ऊपर की ओर उठा हुआ है) डमरु पकड़ा हुआ है। डमरू की आवाज सृजन का प्रतीक है। इस प्रकार यहाँ शिव की सृजनात्मक शक्ति का द्योतक है। ऊपर की ओर उठे हुए उनके दूसरे हाथ में अग्नि है। यहाँ अग्नि विनाश का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाथ से सृजन करतें हैं तथा दूसरे हाथ से विलय। उनका दूसरा दाहिना हाथ अभय (या आशीष) मुद्रा में उठा हुआ है जो कि हमें बुराईयों से रक्षा करता है।
इनका उठा हुआ पांव मोक्ष का द्योतक है। उनका दूसरा बाया हाथ उनके उठे हुए पांव की ओर इंगित करता है। इसका अर्थ यह है कि शिव मोक्ष के मार्ग का सुझाव करते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है। उनके पांव के नीचे कुचला हुआ बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है जो कि शिव द्वारा नष्ट किया जाता है। शिव अज्ञान का विनाश करते हैं। चारों ओर उठ रही आग की लपटें इस ब्रह्माण्ड की प्रतीक हैं। उनके शरीर पर से लहराते सर्प कुण्डलिनी शक्ति के द्योतक हैं।
राकेश गोस्वामी✍️
Reference :-
https://www.samajkaryshiksha.com/2022/04/meaning-and-process-of-program.html
https://www.netinbag.com/hi/business/what-is-program-management.html
https://www.techtarget.com/searchcustomerexperience/definition/implementation
https://www.techtarget.com/searchcustomerexperience/definition/implementation