मंगलवार, 5 नवंबर 2019

गोधूलि बेला (Duskiness)

गोधूली बेला के आगोश में खोया...

Pic.- ii

गोधूली बेला के आगोश में खोया,
वह एक परिन्दा था।
ना मालूम उसे उस का सुरलोक,
इस वसुन्धरा में कहाँ खोया था। 

अगम की इस छांव में बैठा,
दरिया के किनारों पर।
वर्णों के इस खेल से अन्जान उसे तो बस,
एक शबीह का सहारा था।

गोधूली बेला के आगोश में खोया.....

 -विश्वजीत कुमार✍️

कविता में प्रयुक्त कुछ शब्दों का अर्थ मैं यहां  बता देता हूं।

गोधूलि बेला:-  शाम का समय
सुरलोक:- स्वर्ग
वसुंधरा:- धरती, पृथ्वी
अगम:- पेड़, वृक्ष
दरिया:- नदी
वर्ण:- रंग
शबीह:- यह एक उर्दू शब्द है इसका अर्थ होता है, व्यक्ति चित्र (Portrait).

   इस कविता का निर्माण मैंने पहले Pic.- i पर की थी जो कि इस post में संलग्न है। लेकिन इस Pic.- ii को देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि यह कविता बस इसी  के लिए  ही निर्मित हुई हो।  
कविता का  शीर्षक है:- गोधूलि बेला के आगोश में खोया....
पढ़ कर अपना सुझाव जरुर दीजियेगा 🙏

Pic.- i

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

इस दिवाली एक अपील🙏🏻


इस कविता को लिखने का कार्य सुधाकर सिंह के द्वारा किया गया है ।  Edit, Modified and Photography Assistant Professor विश्वजीत कुमार के द्वारा संपन्न हुआ है।







LOGO Design

Smart City Patna LOGO Design.

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

जिंदगी में वह मुकाम चाहिए !!!


पहली बार मैंने कोई कविता अपने स्वयं 👨‍🎨 के परिदृश्य में लिखी है। इस कविता को लिखने का विचार इस फोटोग्राफ को देखने के बाद मेरे ज़ेहन में आया।


जिन्दगी में वह मुकाम चाहिए।


जिन्दगी में वह मुकाम चाहिए !!!

जब प्रत्येक कैमरा एक आकृती,
'क्लिक' करने को बेताब हो।
उसे भी ना हो खबर,
और मेरा ये मुकाम हो।

जिन्दगी में वह मुकाम...........

यूँ ही फिरदौसी सी हो मेरी कहानीयाँ,
मेरा भी एक शाहनामा तैयार हो।
भले ही तुम गजनवी बन जाओ,
मुझे तो बस शाहनामा का चित्र ही रहने दो।

जिन्दगी में वह मुकाम...........

हर एक कारवाँ मेरे साथ शुरू हो,
समाप्ती की भी कोई उम्मिद नहीं हो।
यूँ ही बढ़ते रहे प्रगती के राहो पर,
असफलताओ का कही नामोनिशान न हो।

जिन्दगी में वह मुकाम..........

मेरे हर एक कार्यों की हो लम्बी फेहरिस्त,
कला की दुनिया से बेखबर मेरा एक अलग जहाँ हो।
जिस में हो सिर्फ तुम-ही-तुम,
ना कोई दूसरा हमारे पास हो।

जिन्दगी में वह मुकाम.....