शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

वाल्मीकि रामायण (भाग - 08) Valmiki Ramayana (Part - 08)



      जनक जी की बात सुनकर महर्षि विश्वामित्र बोले, “राजन्!!! आप श्रीराम को अपना वह धनुष दिखाइए।”
तब राजा जनक ने अपने मंत्रियों को आज्ञा दी, “चन्दन व मालाओं से सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ।” आज्ञा सुनकर वे मंत्री तुरंत ही नगर में गए।
वह धनुष आठ पहियों वाले लोहे के एक बहुत बड़े सन्दूक में रखा हुआ था। पाँच हजार सैनिक उसे खींचते हुए वहाँ तक लाए।
अब महाराज जनक ने कहा, “ब्रह्मन! यही वह श्रेष्ठ धनुष है जिसका जनकवंशी नरेशों से सदा पूजन किया है तथा समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर व महानाग भी जिसे चढ़ा नहीं सके हैं। फिर मनुष्यों में तो इतनी शक्ति ही कहाँ है?”

तब महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा, “वत्स राम! इस धनुष को देखो।”
श्रीराम ने उस सन्दूक को खोलकर वह धनुष देखा और फिर वे बोले, “अब मैं इस दिव्य धनुष का स्पर्श करता हूँ और फिर मैं इसे उठाने व इस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास करूँगा।”
महर्षि की आज्ञा पाकर श्रीराम ने उस धनुष को हाथ लगाया व बीच से उसे पकड़कर बड़ी सहजता से उठा लिया। इस समय हजारों मनुष्यों की दृष्टि उन्हीं पर टिकी हुई थी। अब श्रीराम ने इतनी सहजता से उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी, मानो वह कोई खिलौना हो। प्रत्यंचा चढ़ाकर उन्होंने उस धनुष को कान तक खींचा ही था कि अचानक ही वह धनुष बीच में ही टूट गया।
धनुष के टूटने पर बड़ी भारी आवाज हुई, जैसे कोई पर्वत फट पड़ा हो या कोई भूकंप आ गया हो। उस भयंकर आवाज को सुनकर बहुत सारे लोग अचेत हो गए।
थोड़ी देर में जब सब-कुछ शांत हो गया, तब राजा जनक ने हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्र से कहा, “भगवन्! आज मैंने दशरथ नन्दन श्रीराम का पराक्रम अपनी आँखों से देख लिया। महादेव जी के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना अत्यंत अद्भुत, अचिन्त्य व अतार्किक घटना है। मैंने सीता के विवाह के लिए जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य व सफल हो गई। अब मैं प्राणों से भी प्रिय अपनी पुत्री सीता का विवाह दशरथ नन्दन श्रीराम से करूँगा। सीता भी श्रीराम को पति के रूप में पाकर मेरे वंश की कीर्ति का और विस्तार करेगी। अब आप कृपया आज्ञा दें, ताकि मेरे मंत्री शीघ्रता से अयोध्या जाकर महाराज दशरथ को यह समाचार दे सकें कि श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ सकुशल मिथिला पहुँच गए हैं तथा श्रीराम का विवाह जनक नंदिनी सीता से होने जा रहा है, अतः महाराज दशरथ भी शीघ्रता से यहाँ आ जाएँ।”

विश्वामित्र जी ने ‘तथास्तु’ कहकर उनकी बात का समर्थन किया। तब जनक जी ने अपनी मंत्रियों को उचित निर्देश दिए और तुरंत अयोध्या जाकर दशरथ जी को मिथिला ले आने के लिए भेज दिया।

राजा जनक की आज्ञा मिलते ही उनके मंत्री व दूत अयोध्या के लिए निकले। रास्ते में तीन रात विश्राम करते हुए वे चौथे दिन अयोध्या पहुँचे और उन्होंने वृद्ध महाराज दशरथ के दर्शन करके उन्हें मिथिला नरेश का संदेश सुनाया। उसमें जनक जी ने कहलवाया था कि ‘मैंने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए जो प्रतिज्ञा की थी, उसे आपके पुत्र श्रीराम ने अपने पराक्रम से पूर्ण कर लिया है, अतः मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सीता का विवाह श्रीराम से करना चाहता हूँ। इसके लिए कृपया आप मुझे आज्ञा दें तथा अपने गुरु एवं पुरोहित के साथ आप भी शीघ्र यहाँ पधारें।’

यह सन्देश सुनकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने महर्षि वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्य मंत्रियों से कहा, “ऋषि विश्वामित्र के साथ राम व लक्ष्मण दोनों भाई विदेहपुरी में हैं। वहाँ राजा जनक ने राम के पराक्रम को प्रत्यक्ष देखा है, इसलिए वे अपनी पुत्री सीता का विवाह राम के साथ करना चाहते हैं। यदि आप लोगों की सहमति हो, तो हम सब लोग शीघ्र ही मिथिलापुरी को चलें।”

यह सुनकर सभी ने एक स्वर में इसके लिए सहमति दी।
प्रातःकाल राजा दशरथ ने सुमन्त्र से कहा, “आज हमारे सभी धनाध्यक्ष (खजांची) बहुत-सा धन लेकर विभिन्न प्रकार के रत्नों के साथ सबसे आगे चलेंगे। उनकी रक्षा के लिए हर प्रकार की सुव्यवस्था होनी चाहिए। सारी चतुरंगिणी सेना भी यहाँ से शीघ्र ही कूच करे। सुन्दर पालकियाँ व अच्छे-अच्छे घोड़े आदि वाहन भी तैयार होकर चलें। वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, मार्कण्डेय मुनि तथा कात्यायन, ये सभी ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलेंगे। मेरा भी रथ तैयार करो। इसमें विलंब नहीं होना चाहिए। राजा जनक के दूत मुझे शीघ्रता से चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।”

राजा की यह आज्ञा सुनते ही सेना तैयार हो गई और ऋषियों के साथ यात्रा करते हुए महाराज दशरथ मिथिला की ओर चले।
चार दिन का मार्ग तय करके वे सभी लोग मिथिला पहुँचे। वहाँ जनक जी ने उनका खूब स्वागत-सत्कार किया। राजा दशरथ को भी उनसे मिलकर बड़ा हर्ष हुआ। जनक जी बोले, “नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है! श्रीराम के पराक्रम से मेरा भी सौभाग्य जागा है और मेरे सभी विघ्न अब दूर हो गए हैं। रघुकुल के पुरुष बल और पराक्रम में सबसे श्रेष्ठ होते हैं। इस कुल के साथ संबंध जुड़ जाने से आज मेरे कुल का भी सम्मान बढ़ गया है। कल सबेरे इन सभी महर्षियों के साथ उपस्थित होकर मेरे यज्ञ की समाप्ति के बाद आप श्रीराम के विवाह का शुभ-कार्य संपन्न करें।”

यह सुनकर दशरथ जी ने भी प्रसन्नता से इसकी सहमति दे दी।
उसी समय विश्वामित्र जी के साथ राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों का भी वहाँ आगमन हुआ और उन्होंने आदरपूर्वक अपने पिताजी के चरण छुए। सभी ने अत्यंत आनन्द से वह रात्रि व्यतीत की।
अगले दिन प्रातःकाल अपना यज्ञ पूरा करने के बाद जनक जी ने अपने पुरोहित शतानन्द जी से कहा, “ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी एवं पराक्रमी भाई कुशध्वज इस समय इक्षुमती नदी के किनारे बसी सांकाश्या नगरी में निवास करते हैं। उसके चारों ओर के परकोटों की रक्षा के लिए बड़े-बड़े यंत्र लगाए गए हैं। वह नगरी पुष्पक विमान के समान विस्तृत एवं स्वर्गलोक के समान सुन्दर है। इस शुभ अवसर पर मैं अपने भाई को भी यहाँ देखना चाहता हूँ। मेरे साथ वह भी श्रीराम व सीता के विवाह का यह मंगल समारोह देखेंगे।”
राजा की यह आज्ञा तुरंत ही उनके श्रेष्ठ दूतों तक पहुँचाई गई और तेज घोड़ों पर सवार होकर उनके दूत तुरंत ही कुशध्वज जी को बुलाने के लिए निकल पड़े। जनक जी का सन्देश मिलते ही राजा कुशध्वज भी उनकी आज्ञानुसार मिथिला में आ गए।

अब राजा जनक ने अपने मंत्री सुदाम को महाराज दशरथ के खेमे में यह सन्देश देकर भेजा कि ‘मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहित सहित आपका दर्शन करना चाहते हैं।’ यह सन्देश मिलते ही राजा दशरथ भी अपने मंत्रियों व ऋषियों के साथ वहाँ आ पहुँचे।
अब विवाह की बातचीत आरंभ हुई।
सबसे पहले राजा दशरथ के अनुरोध पर महर्षि वसिष्ठ ने सभा को श्रीराम की वंश परंपरा की जानकारी दी और अंत में उन्होंने राजा जनक से कहा, “इस महान इक्ष्वाकु वंश में जन्मे श्रीराम व लक्ष्मण के लिए मैं आपकी दो कन्याओं का वरण करता हूँ। ये दोनों भाई आपकी कन्यायों के योग्य हैं व आपकी कन्याएँ इनके योग्य हैं। अतः आप इस संबंध को स्वीकार करें।”
ये वचन सुनकर अब राजा जनक बोले, “महर्षि! कन्यादान करने से पहले अपने कुल का भी पूरा परिचय देना उचित है, अतः कृपया आप भी हमारे कुल के बारे में सुनें।” ऐसा कहकर उन्होंने भी अपनी कुल परंपरा की जानकारी दी। अंत में उन्होंने कहा, “मैं अपनी प्रथम पुत्री सीता का विवाह श्रीराम से और दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से करवाने की सहमति दे रहा हूँ। मैं इस बात को तीन बार दोहराता हूँ क्योंकि इसमें अब कोई संशय नहीं है।”
इसके बाद राजा जनक ने महाराज दशरथ से कहा, “राजन्! अब आप श्रीराम और लक्ष्मण के मंगल के लिए इनसे गोदान करवाइए और नान्दीमुख श्राद्ध का कार्य भी संपन्न कीजिए। उसके बाद विवाह का कार्य आरंभ कीजिएगा। आज मघा नक्षत्र है। आज से तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वैवाहिक कार्य कीजिएगा। आज श्रीराम व लक्ष्मण के अभ्युदय के लिए गो, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि का दान करवाना चाहिए क्योंकि वह अत्यंत शुभ होता है।”
अब यह सब बातें सुनकर महर्षि विश्वामित्र राजा जनक से बोले, “ये दोनों ही कुल अतिश्रेष्ठ हैं और उनके बीच होने जा रहा यह विवाह संबंध भी रूप-वैभव सहित सभी दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ है। मैं इस विषय में कुछ और भी कहना चाहता हूँ। आपके छोटे भाई राजा कुशध्वज भी यहाँ बैठे हैं। उनकी भी दो कन्याएँ हैं, जो अनुपम सुन्दरी हैं। मैं महाराज दशरथ के दो अन्य पुत्रों भरत व शत्रुघ्न के साथ उन कन्याओं के विवाह का प्रस्ताव करता हूँ।”
महर्षि वसिष्ठ ने भी इस उत्तम विचार का अनुमोदन किया। महाराज दशरथ, राजा जनक, राजा कुशध्वज व अन्य सभी उपस्थित जनों ने भी इसके लिए सहमति दी। तब राजा जनक ने कहा, “आप जैसा कहते हैं, वैसा ही हो। कल पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र है व उसके अगले दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है। उसमें वैवाहिक कार्य करना बहुत उत्तम माना गया है।”
यह बात सुनकर राजा दशरथ ने उत्तर दिया, “मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयों ने हम सबका भली-भांति सत्कार किया है। आपका कल्याण हो। अब हम अपने विश्राम-स्थल पर जाना चाहते हैं। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुख का श्राद्ध कार्य संपन्न करूँगा।”
इस प्रकार जनक जी से आज्ञा लेकर राजा दशरथ, महर्षि वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि सभी को साथ लेकर अपने आवास पर चले गए। वहाँ पहुँचकर अपराह्न काल में उन्होंने आभ्युदयिक श्राद्ध संपन्न किया व प्रातःकाल गोदान किया। अपने एक-एक पुत्र की मंगलकामना से उन्होंने एक-एक लाख गाएँ ब्राह्मणों को दान कीं। उन सब गायों के सींग सोने से मढ़े हुए थे। उन सबके साथ बछड़े व काँसे के दुग्ध्पात्र भी थे। इस प्रकार विवाह से पूर्व के सभी आवश्यक कार्य संपन्न हुए।
उसी दिन अचानक भरत के मामा केकय के राजकुमार युधाजित भी वहाँ आ पहुँचे।

आगे अगले भाग मे....
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड। गीताप्रेस


जय श्रीराम🙏
पं रविकांत बैसान्दर✍️

गुरुवार, 13 जुलाई 2023

वाल्मीकि रामायण (भाग - 07) Valmiki Ramayana (Part - 07)



        श्रीराम व लक्ष्मण को साथ ले महर्षि विश्वामित्र ने उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया। मुनिवर के साथ जाने वाले ब्रह्मवादी महर्षियों की सौ गाड़ियाँ भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

         बहुत दूर तक का मार्ग तय कर लेने के बाद सूर्यास्त के समय उन सबने शोणभद्र (सोन नदी) के तट पर पड़ाव डाला। सूर्यास्त के बाद सभी ने स्नान करके अग्निहोत्र का कार्य पूर्ण किया। उसके बाद राम-लक्ष्मण सहित वे सभी ऋषि-मुनि महर्षि विश्वामित्र जी के सामने बैठ गए।

      तब महर्षि विश्वामित्र ने यह कथा सुनाई - “पूर्वकाल में कुश नामक एक महातपस्वी राजा थे। विदर्भ देश की राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उनके चार तेजस्वी पुत्र हुए: कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस तथा वसु। राजा कुश ने अपने इन सत्यवादी एवं धर्मनिष्ठ पुत्रों से कहा, “पुत्रों! प्रजा का पालन करो, इससे तुम्हें धर्म का पूरा फल प्राप्त होगा।”

अपने पिता की बात सुनकर उन चारों पुत्रों ने अपने लिए अलग-अलग नगरों का निर्माण करवाया। कुशाम्ब ने कौशाम्बी नामक नगर बसाया, कुशनाभ ने महोदय नामक नगर का निर्माण करवाया, असूर्तरजस ने धर्मारण्य तथा वसु ने गिरिव्रज नगर की स्थापना की। यही गिरिव्रज नामक राजधानी वसुमती के नाम से प्रसिद्ध हुई है और उसके चारों ओर ये पाँच पर्वत सुशोभित हैं। यह रमणीय नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई इस मगध देश में आई है, इसलिए यहाँ इसे ‘सुमागधि’ भी कहा जाता है। इसके दोनों ओर बहुत उपजाऊ खेत हैं।

राजा कुशनाभ ने घृताची नामक अप्सरा के गर्भ से सौ कन्याओं को जन्म दिया था। युवावस्था में एक बार वायुदेव के कोप से वे कन्याएँ वातरोग के कारण कुबड़ी हो गईं। इस कुब्जता के कारण उनका सारा सौन्दर्य नष्ट हो गया व उनकी दशा अत्यंत दयनीय हो गई। तब महर्षि चूली के पुत्र राजा ब्रह्मदत्त ने उनका यह रोग दूर किया और राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त से ही उन सब कन्याओं का विवाह करवा दिया।

विवाह के बाद सभी सौ कन्याओं के चले जाने से राजा कुशनाभ संतानहीन हो गए। अतः उन्होंने पुत्रप्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ से उनके यहाँ गाधि नामक पुत्र का जन्म हुआ। वही राजा गाधि मेरे पिता थे। कुश के कुल में जन्म लेने के कारण मैं कौशिक कहलाता हूँ।

मेरी एक बड़ी बहन भी थी, जिसका नाम सत्यवती था। उसका विवाह ऋचीक मुनि से हुआ था। अपने पति का अनुसरण करने वाली मेरी बहन सशरीर स्वर्गलोक को चली गई। उसी के नाम से महानदी कौशिकी इस भूतल पर प्रवाहित होती है।

अपनी बहन सत्यवती से मेरा बहुत स्नेह था। अतः उसी का स्मरण करके मैं हिमालय के तट पर कौशिकी नदी के तट पर सुख से निवास करता हूँ। यज्ञ संबंधी नियम की सिद्धि के लिए ही मैं उस स्थान को छोड़कर यहाँ सिद्धाश्रम (बक्सर) आया था। अब तुम्हारे तेज से मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गई है।

हे नरश्रेष्ठ! अब आधी रात बीत गई है, अतः तुम अब विश्राम करो। अधिक जागरण के कारण हमारी यात्रा में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए।” यह सुनकर सभी ने उन्हें प्रणाम किया और शयन के लिए चले गए।

अगले दिन सुबह सभी लोग वहाँ से आगे बढ़े। दोपहर होते-होते उन सभी ने गंगा जी के तट पर पहुँचकर उस पुण्यसलिला भागीरथी का दर्शन किया। उन सबने वहीं अपना डेरा डाला और फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं व पितरों का तर्पण किया। इसके बाद अग्निहोत्र करके अमृत जैसे स्वादिष्ट हविष्य का भोजन किया।

भोजन के उपरांत वे सभी लोग पुनः विश्वामित्र जी को चारों ओर से घेरकर बैठ गए। तब श्रीराम ने विश्वामित्र जी से पूछा, “भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गों से प्रवाहित होने वाली यह गंगाजी किस प्रकार तीनों लोकों में घूमकर अंततः समुद्र में जा मिलती हैं।” यह सुनकर महर्षि ने उन्हें गंगाजी की उत्पत्ति की कथा बताई।

वह कथा समाप्त होते-होते दिन भी बीत गया था। तब विश्वामित्र जी बोले, “श्रीराम! महाराजा इक्ष्वाकु के ही वंशज राजा सुमति यहाँ निकट ही विशाला नगरी में शासन करते हैं। आज की रात्रि हम लोग वहीं व्यतीत करेंगे और फिर कल प्रातःकाल यहाँ से चलकर मिथिला में राजा जनक का दर्शन करेंगे।
राजा सुमति की राजधानी विशाला नगरी में रात्रि व्यतीत करने के बाद अगले दिन प्रातःकाल वे लोग मिथिला की ओर बढ़े। मिथिला में पहुँचने पर जनकपुरी की सुन्दर शोभा देखते ही सबकी थकान दूर हो गई।

मिथिला के उपवन में एक पुराना आश्रम था, जो अत्यंत रमणीय होकर भी सुनसान दिखाई दे रहा था। उसे देखकर श्रीराम ने मुनिवर विश्वामित्र जी से पूछा, “भगवन्!!! यह कौन-सा स्थान है? देखने में तो यह आश्रम जैसा लगता है, किंतु यहाँ एक भी मुनि दिखाई नहीं दे रहे हैं। इसका क्या कारण है?”

तब महर्षि बोले, “रघुनन्दन! पूर्वकाल में यह स्थान महात्मा गौतम का आश्रम था। वे अपनी पत्नी अहल्या के साथ रहकर यहाँ तपस्या करते थे। उस समय यह आश्रम बड़ा ही दिव्य प्रतीत होता था।

एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रम में नहीं थे, तो उनका वेश बनाकर इन्द्र वहाँ आए और अहल्या से समागम की इच्छा प्रकट की। अहल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था, पर उसे कौतुहल हुआ कि ‘स्वयं देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं और इस कारण उसने समागम का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।'

रति के पश्चात उसने इन्द्र से कहा, “सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गई, किंतु अब आप शीघ्र ही यहाँ चले जाइये और महर्षि गौतम के कोप से हम दोनों की रक्षा कीजिये।”

तब इन्द्र ने भी हँसते हुए उत्तर दिया, “सुन्दरी! मैं भी आज संतुष्ट हो गया। मैं जैसा आया था, वैसा ही अब चला जाऊँगा।” यह कहकर इन्द्र कुटी से बाहर निकले और गौतम ऋषि के लौट आने की आशंका के कारण उतावली में वहाँ से भागे।

लेकिन तभी गौतम ऋषि ने उन्हें देख लिया। इन्द्र भय से थर्रा उठे और ऋषि के मन में भयंकर रोष छा गया। क्रोधित होकर उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया।
अपनी पत्नी अहल्या को भी शाप देते हुए उन्होंने कहा, “दुराचारिणी! तू भी अब उपवास करके अनेक वर्षों तक इस आश्रम में अकेली ही निवास करेगी। जब दशरथ कुमार राम इस घनघोर वन में पदार्पण करेंगे, तब उनका आतिथ्य सत्कार करने से तेरे लोभ-मोह आदि दूर होंगे और तब तू पुनः लौटकर मेरे पास आ सकेगी।” ऐसा कहकर महातपस्वी गौतम इस आश्रम को छोड़कर हिमालय में चले गए और वहीं तपस्या करने लगे।

महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम महर्षि गौतम के आश्रम पर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्या का उद्धार करो।” यह वचन सुनकर श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र के पीछे-पीछे चलकर उस आश्रम में प्रवेश किया।

वहाँ उन्होंने देखा कि देवी अहल्या अपनी तपस्या से देदीप्यमान हो रही हैं। दोनों भाइयों ने वहाँ पहुँचकर उनके चरणों का स्पर्श किया। महर्षि गौतम के वचनों का स्मरण करके अहल्या ने ही भी दोनों भाइयों का आतिथ्य सत्कार किया। यह दृश्य देखकर देवता भी बहुत हर्षित हुए। गन्धर्वों और अप्सराओं ने उत्सव मनाया और आकाश से फूलों की वर्षा की। अपने शाप से मुक्त होकर देवी अहल्या पुनः गौतम ऋषि के पास लौट गई।

इसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण भी मुनि विश्वामित्र के साथ आगे बढ़े। गौतम ऋषि के आश्रम से ईशान कोण की ओर चलकर वे लोग मिथिलानरेश के यज्ञमंडप में पहुँचे। वहाँ उन्हें यज्ञ समारोह का बड़ा मनमोहक दृश्य दिखाई दिया। अनेक देशों से सहस्त्रों ब्राह्मण वहाँ जुटे हुए थे और वेदों का स्वाध्याय कर रहे थे। महर्षि विश्वामित्र ने भी एकांत स्थान देखकर वहाँ डेरा डाला।

महाराजा जनक को जैसे ही विश्वामित्र जी के आगमन का समाचार मिला, वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्द को साथ लेकर उनके स्वागत के लिए पहुँचे। उनका स्वागत-सत्कार करने के बाद जनक जी ने कहा, “महर्षि! यज्ञस्थल पर आपके चरण पड़ने से आज मैं धन्य हो गया। आपने यहाँ आकर मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की है। ऋत्विजों का कहना है कि मेरी यज्ञदीक्षा के बारह दिन अब शेष रह गए हैं। अतः कृपया आप यहीं रहकर बारह दिनों बाद यहाँ आने वाले देवताओं का दर्शन कीजिएगा।”

फिर उन्होंने आगे पूछा, “महामुनि! आपके साथ पधारे ये दोनों वीर राजकुमार कौन हैं? ये सुन्दर कमल पुष्पों के समान सुशोभित हैं, किंतु सिंह के समान प्रभावी दिखाई पड़ते हैं और हाथी के समान मन्दगति से चलते हैं। ये तलवार, तरकस और धनुष धारण किए हुए हैं तथा इनका मनोहर रूप तो देवताओं को भी लज्जित करता है। मैं आपसे इनका परिचय जानना चाहता हूँ।”

यह सुनकर विश्वामित्र जी ने दोनों भाइयों का परिचय दिया और अयोध्या से उन्हें लेकर चलने से अब तक का सारा वृत्तांत भी संक्षेप में सुनाया। इसके बाद महर्षि ने कहा, “राजन्! आपके यहाँ रखे धनुष के बारे में कुछ जानने की इच्छा से ये दोनों यहाँ तक आए हैं।”

यह सुनकर महातपस्वी शतानन्द जी रोमांचित हो उठे। वे गौतम ऋषि के बड़े पुत्र थे। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र से कहा, “मुनिवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीराम को उनका दर्शन कराया? क्या मेरी माता ने इनका आदर-सत्कार किया? क्या मेरी माता अंततः शापमुक्त होकर पिताजी से मिल पाईं?” ये सब प्रश्न सुनकर महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह कार्य पूर्ण हो गया है और देवी अहल्या अब गौतम ऋषि के पास वापस लौट गई हैं।

यह जानकर महातेजस्वी शतानन्द जी बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने श्रीराम से कहा, “नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। यह मेरा अहोभाग्य है कि आपने महर्षि के साथ यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाया। महर्षि विश्वामित्र की कान्ति असीम है। मैं आपको उनके बल व स्वरूप का यथार्थ वर्णन करता हूँ।” इसके बाद पुरोहित शतानन्द जी ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को महर्षि विश्वामित्र के जीवन की पूरी कथा सुनाई।

उनकी बात समाप्त होने पर विदेहराज जनक ने विश्वामित्र जी से कहा, “मुनिश्रेष्ठ! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्यास्त होने वाला है। अतः अब मुझे जाने की आज्ञा दें। मैं प्रातःकाल पुनः आपके दर्शन करने आऊँगा।” ऐसा कहकर वे वहाँ से विदा हुए। तत्पश्चात महर्षि विश्वामित्र भी राम-लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम-स्थल पर लौट आए।

अगले दिन प्रातःकाल राजा जनक ने महर्षि विश्वामित्र के साथ ही दोनों भाइयों को भी आमंत्रित किया। उनका स्वागत करके जनक जी ने पूछा, “हे महर्षि! आप मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ?”

तब विश्वामित्र जी बोले, “महाराज! राजा दशरथ के ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं। आपके यहाँ जो श्रेष्ठ धनुष रखा है, ये उसे देखने की इच्छा रखते हैं। आप कृपया वह धनुष इन्हें दिखा दीजिए। इससे उनकी इच्छा पूर्ण हो जाएगी और उस धनुष के दर्शन से संतुष्ट होकर ये दोनों अपनी राजधानी को लौट जाएँगे।”

यह सुनकर जनक जी ने कहा, “भगवन्! मैं आपको उस धनुष का वृत्तांत सुनाता हूँ और उसे यहाँ किस प्रयोजन से रखा गया है, वह भी बताता हूँ। एक बार भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने उन्हें यह धनुष अर्पित किया था। उनसे यह मेरे पूर्वज महाराज देवरात को प्राप्त हुआ और तब से यह धरोहर के रूप में रखा हुआ है।

एक दिन यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय मैं खेत में चल रहा था। उसी समय हल के अग्रभाग से जोती गई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हल के द्वारा खींची गई रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई मेरी वह कन्या धीरे-धीरे बढ़कर सयानी हो गई। मैंने यह निश्चय किया है कि जो भी वीर अपने पराक्रम से इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं अपनी पुत्री सीता का विवाह करूँगा।
आज तक कई राजाओं ने आकर सीता का हाथ माँगा है, किंतु उनमें से कोई भी इस धनुष को हिला भी नहीं पाया है। आपकी आज्ञानुसार मैं वह धनुष श्रीराम व लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा। यदि दशरथ कुमार श्रीराम उस धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा दें, तो मैं अपनी कन्या सीता का हाथ इनके हाथों में दे दूँगा।”

यह सुनकर महर्षि विश्वामित्र बोले, “राजन्! आप श्रीराम को अपना वह धनुष दिखाइए।”

तब जनक के अपने मंत्रियों को आज्ञा दी, “चन्दन व मालाओं से सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ।”

आगे अगले भाग में…

स्रोत: वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड। गीताप्रेस


जय श्रीराम🙏
पं रविकांत बैसान्दर✍️

मंगलवार, 11 जुलाई 2023

वाल्मीकि रामायण (भाग - 6) Valmiki Ramayana (Part - 6)



उन तीनों ने वह रात्रि ताटका वन में व्यतीत की।

           अगले दिन प्रातःकाल महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा, "महायशस्वी राजकुमार! ताटका वध के कारण मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। आज मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ तुम्हें सब प्रकार के अस्त्र देने वाला हूँ। इनके प्रभाव से तुम सदा ही अपने शत्रुओं पर विजय पाओगे, चाहे वे देवता, असुर, गन्धर्व या नाग ही क्यों न हों।"

"आज मैं तुमको दिव्य एवं महान दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र तथा अति भयंकर ऐन्द्रचक्र दूंगा। मैं तुम्हें इन्द्र का वज्रास्त्र, शिव का श्रेष्ठ त्रिशूल व ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर नाम अस्त्र भी दूंगा। साथ ही तुम्हें ऐषीकास्त्र व ब्रह्मास्त्र भी प्रदान करूंगा। इसके अलावा मोदकी व शिखरी नामक दो उज्ज्वल गदाएं तथा धर्मपाश, कलपाश व वरुणपाश नामक उत्तम अस्त्र भी मैं दूंगा।"

"अग्नि के प्रिय आग्नेयास्त्र का नाम शिखरास्त्र है। वह भी मैं तुम्हें देने वाला हूं। इसके साथ ही अस्त्रों में प्रधान वायव्यास्त्र भी मैं तुम्हें दे रहा हूं। सूखी व गीली अशनी तथा पिनाक एवं नारायणास्त्र, हयशिरा अस्त्र, क्रौञ्च अस्त्र एवं दो शक्तियां भी तुम्हें मैं देता हूं। विद्याधारों का महान नन्दन अस्त्र तथा उत्तम खड्ग भी मैं तुम्हें अर्पित करता हूं। गन्धर्वों के प्रिय मानवास्त्र व सम्मोहनास्त्र, कामदेव का प्रिय मादन अस्त्र, पिशाचों का प्रिय मोहनास्त्र, तथा प्रस्वापन, प्रशमन तथा सौम्य अस्त्र भी मैं तुम्हें दे रहा हूं।"

"राक्षसों के वध में उपयोगी होने वाले कंकाल, घोर मूसल, कपाल तथा किंकिणी आदि सब अस्त्र भी मुझसे ग्रहण करो। तापस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य व मायामय उत्तम अस्त्र भी मैं तुम्हें देता हूं। सूर्यदेव का तेजोप्रभास्त्र भी मुझसे लो। यह शत्रु के तेज को नष्ट कर देता है। सोमदेव का शिशिरास्त्र, विश्वकर्मा का दारूणास्त्र, भगदेवता का भयंकर अस्त्र व मनु का शीतेषु अस्त्र भी ग्रहण करो।"


ऐसा कहकर मुनि विश्वामित्र पूर्वाभिमुख होकर बैठ गए और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने श्रीरामचन्द्र जी को उन सब अस्त्रों का उपदेश दिया। इसके बाद श्रीराम ने प्रसन्नाचित्त होकर विश्वामित्र जी को प्रणाम किया व मुनि ने उन्हें प्रत्येक अस्त्र को चलाने की विधि बताई।

फिर विश्वामित्र जी बोले, "रघुकुलनन्दन श्रीराम! अब तुम इन अस्त्रों को भी ग्रहण करो - सत्यवान, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्रांगमुख, अवांगमुख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवक्त्र, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, यौगन्धर, विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्किल, विरुच, सर्चिमाली, धृतिमाली, वृत्तिमान्, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण।"


श्रीराम ने विनम्रतापूर्वक उन सब अस्त्रों को भी ग्रहण किया।


अब वे तीनों आगे की यात्रा पर बढ़े। चलते-चलते ही श्रीराम ने विश्वामित्र जी से पूछा, "प्रभु! सामने वाले पर्वत के पास जो घने वृक्षों से भरा स्थान दिखाई देता है, वह क्या है? मृगों के झुण्ड के कारण वह स्थान अत्यंत मनोहर प्रतीत हो रहा है। अतः उसके बारे में जानने की मेरी इच्छा है।"


यह सुनकर विश्वामित्र जी ने कहा, "भगवान विष्णु ने वहां बहुत बड़ी तपस्या की थी। वामन अवतार धारण करने से पहले यही उनका आश्रम था। महातपस्वी विष्णु को यहां सिद्धि प्राप्त हुई थी, इसलिए यह सिद्धाश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।"

"यहां अपनी तपस्या पूर्ण करने के उपरांत महर्षि कश्यप व उनकी पत्नी अदिति की विनती स्वीकार करके उन्होंने उनके पुत्र वामन के रूप में अवतार लिया व यज्ञ में विरोचनकुमार राजा बलि से तीन पग में तीन लोकों की भूमि वापस लेकर देवताओं की सहायता की।"


"उन्हीं भगवान वामन में भक्ति होने के कारण मैं इसी सिद्धाश्रम में निवास करता हूं और यहीं वे राक्षस आकर मेरे यज्ञ में विघ्न डालते हैं। अब हम वहां पहुंचने वाले हैं। यह आश्रम जैसा मेरा है, वैसा ही तुम्हारा भी है। यहीं रहकर तुम्हें उन दुराचारी राक्षसों का वध करना है।"


ऐसा कहकर बहुत प्रेम से मुनि ने उन दोनों भाइयों के हाथ पकड़ लिए और उन्हें अपने साथ लेकर आश्रम में प्रवेश किया।

अगले दिन प्रातःकाल दोनों भाइयों ने स्नानादि से शुद्ध होकर गायत्री मन्त्र का जाप किया व यज्ञ की दीक्षा लेकर अग्निहोत्र में बैठे महर्षि विश्वामित्र की चरण वंदना की। इसके बाद श्रीराम ने कहा, “भगवन्! हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि वे दो निशाचर किस-किस समय आपके यज्ञ पर आक्रमण करते हैं, ताकि हम उचित समय पर यज्ञ की रक्षा के लिए सावधान रहें।”


श्रीराम की यह बात सुनकर आश्रम के सभी मुनि बड़े प्रसन्न हुए, किंतु विश्वामित्र जी कुछ भी नहीं बोले। आश्रम के एक अन्य मुनि ने दोनों भाइयों से कहा, “मुनिवर विश्वामित्र जी अब यज्ञ की दीक्षा ले चुके हैं। अतः अब वे मौन रहेंगे। आप दोनों सावधान रहकर अगले छः दिनों तक लगातार यज्ञ की रक्षा करते रहें।”


यह बात सुनकर दोनों भाई अगले छः दिन-रातों तक लगातार विश्वामित्र जी के पास खड़े रहकर यज्ञ की रक्षा में डटे रहे। छठे दिन जब यज्ञ पूर्ण होने का समय आया, तो श्रीराम ने भाई लक्ष्मण से कहा, “सुमित्रानन्दन! अब अपने चित्त को एकाग्र करके सावधान हो जाओ।”


तभी अचानक यज्ञ के उपाध्याय, पुरोहित व अन्य ऋत्विजों से घिरी यज्ञ-वेदी सहसा प्रज्ज्वलित हो उठी। वेदी का इस प्रकार अचानक भभक उठना राक्षसों के आगमन का सूचक था। उधर दूसरी ओर विश्वामित्र जी व अन्य ऋत्विजों ने अपनी यज्ञ-वेदी पर आहवन की अग्नि प्रज्वलित की और शास्त्रीय विधि के अनुसार वेद मन्त्रों के उच्चारण के साथ यज्ञ का कार्य आगे बढ़ा।


उसी समय आकाश में भीषण कोलाहल सुनाई दिया। मारीच व सुबाहु दोनों राक्षस अपने अनुचरों के साथ यज्ञ पर आक्रमण करने आ पहुँचे थे। उन्होंने वहाँ रक्त की धारा बहाना आरंभ कर दिया। उस रक्त-प्रवाह से यज्ञ-वेदी के आस-पास की भूमि भीग गई।


यह देखते ही श्रीराम ने भाई लक्ष्मण से कहा, “लक्ष्मण! वह देखो मांसभक्षी राक्षस आ पहुँचे हैं। मैं शीतेषु नामक मानवास्त्र से अभी इन कायरों को छिन्न-भिन्न कर दूँगा।”


ऐसा कहकर श्रीराम ने उस तेजस्वी मानवास्त्र का संधान किया। अत्यंत रोष में भरकर उन्होंने पूरी शक्ति से उसे मारीच पर चला दिया। वह बाण सीधा जाकर मारीच की छाती में लगा और उस गहरे आघात के कारण वह सौ योजन दूर समुद्र के जल में जा गिरा।


इसके तुरंत बाद ही रघुनन्दन श्रीराम ने अपने हाथों की फुर्ती दिखाई और आग्नेयास्त्र का संधान करके उसे सुबाहु की छाती पर चला दिया। उस अस्त्र की चोट लगते ही वह राक्षस मरकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर महायशस्वी रघुवीर ने वायव्यास्त्र का उपयोग कर अन्य सब निशाचरों का भी संहार कर डाला। सभी मुनियों को यह देखकर परम आनन्द हुआ।

सफलतापूर्वक यज्ञ संपन्न हो जाने पर महर्षि विश्वामित्र ने प्रसन्न होकर कहा, “हे महायशस्वी राम! तुम्हें पाकर मैं कृतार्थ हो गया। तुमने गुरु की आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन किया है। इस सिद्धाश्रम का नाम तुमने सार्थक कर दिया।”


इसके बाद संध्योपासना करके दोनों भाइयों ने प्रसन्नतापूर्वक विश्राम किया।

अगले दिन प्रातः दोनों भाई पुनः विश्वामित्र जी के समक्ष पहुँचे और उनसे निवेदन किया, “मुनिवर! हम दोनों आपकी सेवा में उपस्थित हैं। कृपया आज्ञा दीजिए कि हम अब आपकी क्या सेवा करें?”

तब महर्षि बोले, “नरश्रेष्ठ!!! मिथिला के राजा जनक एक महान् धर्मयज्ञ आरंभ करने वाले हैं। उसमें तुम्हें भी हम सब लोगों के साथ चलना है। वहाँ एक बड़ा ही अद्भुत धनुष है, जिसे तुम्हें भी देखना चाहिए। मिथिलानरेश ने पहले कभी अपने किसी यज्ञ के फल के रूप में वह धनुष माँगा था, अतः सभी देवताओं ने भगवान् शंकर के साथ मिलकर वह धनुष उन्हें दिया है। राजा जनक के महल में वह धनुष किसी देवता की भांति प्रतिष्ठित है और अनेक प्रकार के धूप, दीप, अगर आदि सुगन्धित पदार्थों से उसकी पूजा होती है। वह धनुष इतना भारी है कि उसका कोई माप-तौल नहीं है।

वह अत्यंत प्रकाशमान व भयंकर है। मनुष्यों की तो बात ही क्या, देवता, गन्धर्व, असुर या राक्षस भी उसकी प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाते हैं। हमारे साथ यज्ञ में चलकर तुम मिथिलानरेश के उस धनुष को व उनके उस पवित्र यज्ञ को भी देख सकोगे।”

      इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने वनदेवताओं से जाने की आज्ञा ली। उन्होंने कहा, “मैं अपना यज्ञ पूर्ण करके अब इस सिद्धाश्रम से जा रहा हूँ। गंगा के उत्तर तट पर होता हुआ मैं हिमालय की उपत्यका में जाऊँगा। आप सबका कल्याण हो।”


ऐसा कहकर श्रीराम व लक्ष्मण को साथ ले महर्षि विश्वामित्र ने उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया। मुनिवर के साथ जाने वाले ब्रह्मवादी महर्षियों की सौ गाड़ियाँ भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

शेष अगले भाग मे...
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड। गीताप्रेस

जय श्रीराम✍️

पं. रविकांत बैसान्दर

Important Idioms and Phrases starting with letter "A" ("ए" अक्षर से शुरू होने वाले महत्वपूर्ण मुहावरे और वाक्यांश)


1. A Bee in one's bonnet

◾️किसी चीज़ के बारे में लगातार बात करते रहना


2. A bolt from the blue

◾️अचानक और अप्रत्याशित घटना


3. A close shave

◾️बाल - बाल बचना


4. A Cat and Dog life

◾️हमेशा झगड़ते रहने वाला जीवन


5. A chicken-hearted Person

◾️कायर व्यक्ति


6. A Dark Horse

◾️अप्रत्याशित विजेता


7. A cold shoulder

◾️उदासीनता का प्रदर्शन


8. A cog in the Machine

◾️कार्य के लिए आवश्यक लेकिन कम महत्व का


9. A close-fisted man

◾️पैसे देने या ख़र्च करने के लिए बहुत ही अनिच्छुक रहना


10. A chink in someone's armour

◾️किसी की कमजोरी

 

11. A hot potato

◾️एक विवादास्पद मुद्दा जो निपटने में कठिन है और बहुत ही असहमतियो से युक्त है


12. A good turn

◾️एक ऐसा कार्य जो किसी अन्य व्यक्ति से किसी तरह से लाभकारी है


13. A going concern

◾️लाभ कमाता हुआ व्यवसाय


14. A go-getter

◾️एक बेहद प्रेरित और महत्वाकांक्षी व्यक्ति


15. A fool's paradise

◾️हवाई महल


16. A feather in one's cap

◾️गर्व करने लायक उपलब्धि


17. A dime a dozen

◾️बहुत आम


18. A stone's throw of

◾️बहुत पास में


19. A sight for sore eyes

◾️आँख की ठण्डक


20. A red rag to a bull

◾️साँड़ को लाल कपड़ा दिखाने के समान


21. A queer fish

◾️सनकी व्यक्ति


22. A left-handed compliment

◾️प्रशंसा की आड़ में एक अपमान


23. A leap in the dark

◾️साहसिक कार्य


24. A jack of all trades

◾️कई अलग अलग क्षेत्रों में कुशल व्यक्ति


25. At the end of one's tether

◾️और ज्यादा कष्ट सहने में असमर्थ


26. A wild goose chase

◾️निरर्थक खोज


27. A taste of your own medicine

◾️जैसे को तैसा


28. A storm in a tea-cup

◾️बात का बतंगड़


29. A chip on your shoulder

◾️हर समय गुस्सा आना क्योंकि आपको लगता है कि आपके साथ गलत तरीके से व्यवहार किया गया है या आपको लगता है कि आप अन्य लोगों के समान उतना ही अच्छे नहीं हैं


30. A man of spirit

◾️साहसिक व्यक्ति


31. A man of straw

◾️एक कमजोर व्यक्ति


32. A man of parts

◾️कई अलग-अलग क्षेत्रों में महारथ वाला


33. A man of mettle

◾️दृढ़-संकल्प का व्यक्ति


34. A man of means

◾️अमीर आदमी


35. A man of letters

◾️साहित्यिक व्यक्ति


36. A man of his words

◾️अपनी बात का पक्का


37. A man in a million

◾️लाखो में एक

शबरी



         शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।


शबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी।


महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया "पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।"


अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा- कब आएंगे..?


महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे। महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया।


 आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए। ये उलट कैसे हुआ। गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ???


महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका।

महर्षि मतंग बोले- 

पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ।

अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ।

उनका कौशल्या से विवाह होगा। फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। 

फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा। फिर प्रतीक्षा..


फिर उनका विवाह कैकई से होगा। फिर प्रतीक्षा.. 


फिर वो जन्म लेंगे, फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा। फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा। तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे। तुम उन्हें कहना आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।


शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई।


वह फिर अधीर होकर पूछने लगी- "इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव???"


महर्षि मतंग बोले- "वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे। यह भावी निश्चित है। लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे "अवश्य"...!!!


जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे। इसलिए प्रतीक्षा करना। वे कभी भी आ सकते है। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है।"


शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी। वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। 


हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती।


कभी भी आ सकतें हैं.....


हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा। शबरी बूढ़ी हो गई। लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही।


      ....और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी।


गुरु का कथन सत्य हुआ, भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया।


ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो। एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे-


"कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..?"


राम मुस्कुराए- "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..?"


"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा।


राम ने कहा- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है।”


"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।


”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न...  उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...!” (वानरी भाव)


पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। "मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी .....और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...।" (मार्जारी भाव)


राम मुस्कुराकर😊 रह गए!!


भीलनी ने पुनः कहा- "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं!" तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..?”


राम गम्भीर हुए और कहा - भ्रम में न पड़ो मां!!! “राम क्या रावण का वध करने आया है..?”


रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है।


राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था।”


"जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।"


राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि "शासन/प्रशासन और सत्ता" जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है (अंत्योदय)


राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!


माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं।


राम ने फिर कहा -


राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए।”


"राम राजमहल से निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।”


"राम निकला है, ताकि “भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है।”


"राम आया है, ताकि “भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए।”


और


"राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है।”


शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा-  "बेर खाओगे राम..?”


राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!"


शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये।


राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- 

"बेर मीठे हैं न प्रभु..?” 


"यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां!!! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है।”


सबरी मुस्कुराईं, बोली -  "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"


मर्यादा - पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन🙏🙏

वाल्मीकि रामायण (भाग - 5) Valmiki Ramayana (Part - 5)




           दशरथ जी ने श्रीराम को प्रसन्नतापूर्वक महर्षि विश्वामित्र को सौंप दिया। आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे श्रीराम व उनके पीछे सुमित्रानंदन लक्ष्मण चल पड़े।
उन दोनों भाइयों के हाथों में धनुष थे और उन्होंने पीठ पर तरकश बांध रखे थे। दोनों भाई वस्त्रों व आभूषणों से अलंकृत थे। हाथों की अंगुलियों में उन्होंने गोहटी के चमड़े के दस्ताने पहने हुए थे। उनकी कमर में तलवारें लटक रही थीं।

अयोध्या से डेढ़ योजन दूर जाकर सरयू नदी के दक्षिणी तट पर महर्षि विश्वामित्र ने स्नेहपूर्ण वाणी में श्रीराम से कहा, "वत्स राम! अब तुम सरयू के जल से आचमन करो। इस आवश्यक कार्य में विलंब नहीं होना चाहिए।"
इसके बाद वे बोले, "अब तुम बला और अतिबला नामक इन मंत्रों को ग्रहण करो। इनके प्रभाव से तुम्हें कभी थकावट का अनुभव नहीं होगा, कोई रोग, ज्वर या कष्ट नहीं होगा। तुम्हारा रूप कभी विकृत नहीं होगा। सोते समय या असावधानी के क्षण में भी कोई राक्षस तुम पर आक्रमण नहीं कर पाएगा और इस पूरी पृथ्वी पर कोई तुमसे समानता नहीं कर पाएगा। इन विद्याओं को जान लेने से तुम्हें भूख-प्यास का कष्ट भी नहीं होगा। चातुर्य, ज्ञान व बुद्धि में भी कोई तुम्हारे समान नहीं हो सकेगा। मैंने तपस्या के बल से इन विद्याओं को प्राप्त किया है और मैं अब ये तुम्हें देना चाहता हूं क्योंकि केवल तुम ही इनके योग्य हो।"

       इसके बाद वे लोग रात्रि में वहीं सरयू तट पर रुके। उन दोनों श्रेष्ठ राजकुमारों ने तिनकों व पत्तों के उस बिछौने पर भी सुखपूर्वक शयन किया।
भोर होने पर महर्षि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को जगाया। नित्यकर्म के बाद दोनों भाइयों ने प्रतिदिन किए जाने वाले धार्मिक कार्य पूर्ण किए और आकर महर्षि को प्रणाम किया। इसके बाद वे तीनों आगे बढ़े।
मार्ग में उन्होंने गंगा व सरयू नदी के संगम स्थल पर पवित्र गंगा नदी का दर्शन किया। उस संगम के पास ही शुद्ध अंतःकरण वाले महर्षियों का आश्रम था।
उस स्थान के बारे में महर्षि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को बताया, "पूर्वकाल में शिवजी इस आश्रम में तपस्या करते थे। एक दिन वे समाधि से उठकर कहीं जा रहे थे। विद्वान लोग जिसे काम कहते हैं, वह उस समय तक सशरीर विचरता था। शिवजी को देखकर उस दुर्बुद्धि ने उन पर आक्रमण कर दिया। क्रोधित होकर शिवजी ने उसे रोष भरी दृष्टि से देखा। इससे उसके सारे अंग जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गए और तभी से वह 'अनंग' कहलाया। इस क्षेत्र में उसका अंग नष्ट हुआ था, अतः उसके बाद से यह अंगदेश कहलाया।"

      उस पवित्र आश्रम को देखकर राम लक्ष्मण दोनों भाई बहुत प्रसन्न हुए। तीनों ने उस आश्रम में रहने वाले मुनियों के साथ वहीं रात्रि में विश्राम किया।
अगले दिन प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर वे तीनों गंगा नदी के तट पर आए। उसी आश्रम में निवास करने वाले मुनियों ने उनके लिए एक सुन्दर नौका का पहले ही प्रबंध कर रखा था। नदी पार करने के लिए वे तीनों उस नाव में बैठ गए।
जब वह नाव नदी के मध्यभाग में पहुंची, तो श्रीराम को जल के टकराने की बड़ी भारी आवाज सुनाई देने लगी। तब उन्होंने महर्षि से पूछा, "मुनिवर! जल में यह भारी आवाज कैसी है?"
तब विश्वामित्र जी ने कहा, "प्रिय राम! अयोध्या के निकट से बहने वाली सरयू नदी यहां गंगा जी में मिल रही है। वह मानसरोवर से निकलती है, इसीलिए उसका सरयू नामकरण हुआ है। उन दो नदियों का जल यहां आपस में टकरा रहा है। उसी कारण यह भारी आवाज सुनाई दे रही है।" यह सुनकर उन भाइयों ने दोनों नदियों को प्रणाम किया।

       गंगा के दक्षिणी किनारे पर उतरकर दोनों भाई महर्षि विश्वामित्र के पीछे-पीछे चल पड़े। वहां अपने सामने उन्हें एक घना वन दिखाई दिया। उसमें मनुष्यों के आवागमन का कोई चिह्न नहीं था। भयंकर बोली बोलने वाले पक्षी व हिंसक जंतु उस वन में कोलाहल कर रहे थे। नाना प्रकार के विहंगम पक्षी वहां चहचहा रहे थे। सिंह, बाघ, सुअर व हाथी भी इस जंगल में विचरण कर रहे थे। धौरा, अश्वकर्ण, अर्जुन, बेल, तेंदू, पाड़र और बेर के वृक्षों से वह वन भरा हुआ था।
  
     महर्षि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को बताया कि "पूर्वकाल में यहां मलद व करुष नामक दो समृद्ध जनपद थे। वृत्रासुर का वध करने के पश्चात देवराज इन्द्र मल से लिप्त हो गए थे और क्षुधा से भी पीड़ित थे। तब देवताओं व ऋषियों ने गंगा जल से भरे कलशों द्वारा इन्द्र को नहलाकर उनके मल और कारुष (क्षुधा) को छुड़ाया। इसके बाद वे पहले की ही भांति निर्मल व क्षुधाहीन हो गए। तब उन्होंने प्रसन्न होकर यह वरदान दिया कि 'यहां मलद व करुष नामक दो समृद्ध जनपद होंगे।'

"इन्द्र के वरदान से वे दोनों जनपद दीर्घकाल तक अत्यंत समृद्धशाली व धन-धान्य से संपन्न रहे। लेकिन इच्छानुसार रूप धारण कर लेने वाली एक यक्षिणी एक दिन वहां आई। उस यक्षिणी का नाम ताटका है और वह सुन्द नामक दैत्य की पत्नी है। उसके शरीर में हजार हाथियों का बल है। वह सदा ही इन दोनों जनपदों का विनाश करती रहती है। यह प्रदेश इतना रमणीय है, किंतु उस दुराचारिणी के कारण कोई भी अब यहां नहीं आ सकता। वह डेढ़ योजन (छः कोस) के मार्ग को घेरकर इस वन में रहती है। मारीच नामक राक्षस उसका पुत्र है। उसका बहुत बड़ा मस्तक, गोल भुजाएं, फैला हुआ मुंह और बहुत विशाल शरीर है। वह भी यहां की प्रजा को सदा ही पीड़ा देता रहता है।"
"अब हम लोगों को उस ताटका वन की ओर ही चलना चाहिए। मेरी आज्ञा है कि अपने बाहुबल से तुम उस दुराचारिणी ताटका को मार डालो और इस क्षेत्र को पुनः निष्कंटक बना दो।"
यह सुनकर श्रीराम ने पूछा, "मुनिवर! वह यक्षिणी यदि अबला है, तो उसमें एक हजार हाथियों का बल कैसे हो सकता है?"
तब विश्वामित्र जी बोले, "पूर्वकाल में सुकेतु नामक एक यक्ष थे। वे बड़े पराक्रमी व सदाचारी थे, किंतु उनकी कोई संतान नहीं थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एक कन्यारत्न प्रदान किया व उसे हजार हाथियों के समान बल भी दिया। वही कन्या ताटका है।"
"उचित समय पर सुकेतु ने जम्भ के पुत्र सुन्द से ताटका का विवाह करवा दिया और कुछ काल बीत जाने के बाद ताटका ने मारीच को जन्म दिया।"
"मुनि अगस्त्य जी के शाप से सुन्द की मृत्यु हो गई। अब ताटका भी अगस्त्य मुनि को मारने की चेष्टा करने लगी और तीव्र गर्जना करती हुई उन्हें खा जाने के लिए दौड़ी। तब मुनि अगस्त्य ने उसे व मारीच को भी शाप दे दिया। तभी से ताटका व मारीच दोनों ही राक्षस भाव को प्राप्त हो गए और उनका रूप विकराल हो गया।"

     "हे राम!!! इस शापग्रस्त ताटका को मारने की शक्ति केवल तुम्हारे ही पास है। जिनके ऊपर राज्य के पालन का भार है, प्रजा की रक्षा करना उनका धर्म ही है। अतः तुम अब मेरे आदेश का पालन करो और यहां की प्रजा को संकट से मुक्ति दिलाने के लिए इस राक्षसी का वध कर दो।"
यह सुनकर श्रीराम बोले, "महर्षि! अयोध्या में मुझे विदा करते समय पिताजी ने मुझसे कहा था कि महर्षि विश्वामित्र की प्रत्येक आज्ञा का सदा पालन करना। अतः मैं अब आपकी आज्ञानुसार उस राक्षसी ताटका का वध करूंगा, इसमें कोई संशय नहीं है।"
ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीराम ने अपने धनुष के मध्यभाग में मुट्ठी बांधकर उसे जोर से पकड़ा और उसकी प्रत्यंचा पर तीव्र टंकार दी। उनके धनुष की आवाज से दसों दिशाएं गूंज उठीं।
उस भीषण स्वर को सुनकर राक्षसी ताटका भी एक क्षण के लिए अचेत-सी हो गई थी। लेकिन अगले ही क्षण सतर्क होकर वह क्रोध से फुफकारती हुई उसी स्वर की दिशा में तेजी से दौड़ पड़ी।
महर्षि विश्वामित्र के आदेश पर श्रीराम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा पर तीव्र टंकार दी और उनके धनुष की आवाज से दसों दिशाएं गूंज उठीं। उस भीषण स्वर को सुनकर राक्षसी ताटका भी क्रोध से फुफकारती हुई उसी स्वर की दिशा में तेजी से दौड़ पड़ी।
ताटका के शरीर की ऊंचाई बहुत अधिक थी। उसकी मुखाकृति विकृत थी। क्रोध में भरी उस राक्षसी को देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! देखो तो इसका शरीर कितना भयंकर है। भीरू लोग तो इसे देखकर ही भय से कांप उठते होंगे। स्त्री होने के कारण यह रक्षित है, अतः मैं इसे मारना नहीं चाहता। मैं इसके नाक और कान काटकर इसे पीछे लौटने पर विवश कर देता हूं अथवा इसके हाथ पैर तोड़कर इसकी शक्ति नष्ट कर देता हूं, ताकि अब यह किसी को पीड़ा न दे सके।"
ऐसी बातें हो ही रही थीं कि क्रोध से फुफकारती हुई वह राक्षसी वहां आ पहुंची। उसने दोनों भाइयों पर भयंकर धूल उड़ाना आरंभ कर दिया। वहां धूल का विशाल बादल छा गया। फिर वह उन पर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा करने लगी।
यह देखकर श्रीराम बड़े कुपित हुए। उसके सभी पत्थरों का प्रहार अपने बाणों से रोकते हुए उन्होंने उस निशाचरी की दोनों भुजाएं काट डालीं। लेकिन अभी भी वह घोर गर्जना करती हुई उनकी ओर बढ़ती रही। तब लक्ष्मण जी ने क्रोध में भरकर उसके नाक-कान काट लिए।
लेकिन इसके बाद भी वह राक्षसी परास्त नहीं हुई। अब वह मायावी रूप धरकर आकाश में विचरने लगी और वहां से पुनः दोनों भाइयों पर पत्थरों की भारी वर्षा करने लगी।
यह सब देखकर विश्वामित्र जी ने श्रीराम से कहा, "राम! इस पापिणी पर दया करने का तुम्हारा विचार व्यर्थ है। यह बड़ी दुराचारिणी है और यज्ञों में सदा विघ्न डाला करती है। यह अपनी माया की शक्ति से पुनः प्रबल हो जाए, उसके पहले ही तुम इसे मार डालो। अभी संध्या का समय होने वाला है। इस समय के बाद राक्षस दुर्जय हो जाते हैं, इसलिए उससे पहले ही यह कार्य तुम्हें पूर्ण कर लेना चाहिए।"


यह सुनकर श्रीराम जी ने अपना कौशल दिखाते हुए उस राक्षसी को सभी ओर से अवरुद्ध कर दिया। तब वह आक्रमण करने के लिए दोनों भाइयों की ओर बहुत तेज गति से लपकी। यह देखकर श्रीराम ने एक ही बाण में उसकी छाती चीर डाली। भीषण चीत्कार करती हुई ताटका पृथ्वी पर गिरी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

            यह देखकर देवराज इन्द्र समेत सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रीराम के पराक्रम की बड़ी सराहना की और विश्वामित्र जी से कहा, "हे ब्रह्मन!!! कृपया आप अपने सभी दिव्यास्त्र अब राम को समर्पित करें। केवल ये ही उन अस्त्रों के योग्य हैं। राजकुमार राम के हाथों देवताओं का एक महान कार्य संपन्न होने वाला है।" ऐसा कहकर सभी देवता आकाशमार्ग से वापस लौट गए।
तब विश्वामित्र जी ने दोनों भाइयों से कहा, "आज की रात हम लोग इसी ताटका वन में निवास करेंगे और कल सुबह अपने आश्रम पर चलेंगे।" उसी के अनुसार उन तीनों ने सुखपूर्वक वन में वह रात्रि व्यतीत की।
श्रीराम की कृपा से उसी दिन वह भीषण वन उस राक्षसी के प्रकोप से मुक्त होकर पुनः रमणीय बन गया था। ताटका का वध करके श्रीराम भी देवताओं की प्रशंसा के पात्र बन गए।

आगे अगले भाग में…


जय श्रीराम 🙏

पं. रविकांत बैसान्दर✍🏻

सोमवार, 10 जुलाई 2023

वाल्मीकि रामायण (भाग - 4) Valmiki Ramayana (Part - 4)




           दो घड़ी बाद होश में आने पर वे दुःखी स्वर में महर्षि विश्वामित्र से बोले, "राक्षस तो छल कपट से युद्ध करते हैं। लेकिन मेरा राम अभी सोलह वर्षों का भी नहीं हुआ है। वह अभी युद्ध-कला में निपुण नहीं हुआ है और न ही अस्त्र-शस्त्र चलाना भली-भांति जानता है। इसलिए वह राक्षसों से लड़ने के लिए किसी भी प्रकार से उपयुक्त नहीं है।"
"मुझे इस बुढ़ापे में बड़ी कठिनाई से पुत्र प्राप्ति हुई है। राम मेरे चारों पुत्रों में सबसे बड़ा है और उस पर मेरा प्रेम भी सबसे अधिक है। उससे वियोग हो जाने पर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता। इसलिए आप राम को न ले जाइए।"
"यदि आपको उसे ले ही जाना है तो उसके साथ मैं भी अपनी सेना लेकर चलता हूं। मेरे शूरवीर सैनिक अस्त्र-विद्या में कुशल और पराक्रमी हैं। उनके साथ मैं स्वयं हाथ में शस्त्र लेकर आपके यज्ञ की रक्षा करूंगा।"
यह सुनकर विश्वामित्र जी बोले, "रावण नाम का एक कुख्यात राक्षस है, जिसने ब्रह्माजी से मुंह मांगा वरदान प्राप्त कर लिया है और अब वह निशाचर तीनों लोकों के निवासियों को कष्ट दे रहा है। उसी के आदेश से ये दोनों राक्षस मारीच और सुबाहु मेरे यज्ञ में विघ्न डालते हैं। उन्हें मारने के लिए मैं श्रीराम को ही ले जाना चाहता हूं।"
यह सब सुनकर दशरथ जी और भी चिंतित हो उठे। वे बोले, "महर्षि! उस रावण के सामने युद्ध में तो मैं भी नहीं ठहर सकता। उसका सामना तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग भी नहीं कर सकते। फिर मेरे जैसे मनुष्यों की तो बात ही क्या है। मारीच और सुबाहु दैत्य सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं। वे तो प्रबल पराक्रमी योद्धा हैं। उनसे युद्ध करने के लिए मैं सुकुमार राम को नहीं भेज सकता।"
राजा दशरथ की ऐसी बातों को सुनकर महर्षि विश्वामित्र बहुत क्रोधित हो गए। वे बोले, "राजन! पहले तुमने स्वयं ही मुझे मुंह मांगी वस्तु देने की प्रतिज्ञा की और अब तुम स्वयं ही उससे पीछे हट रहे हो। तुम्हें यदि ऐसा ही व्यवहार उचित लगता है, तो मैं जैसा आया था, वैसा ही वापस लौट जाता हूं। तुम अपनी प्रतिज्ञा को झूठी सिद्ध करके अपने परिवार और बन्धु बांधवों के साथ सुखी रहो।"
उनके इस क्रोध को देखकर सभी लोग भयभीत हो गए। यह देखकर अब महर्षि वसिष्ठ आगे बढ़े और उन्होंने दशरथ को समझाते हुए कहा, "महाराज! आप महान इक्ष्वाकु वंश में जन्मे हैं और आपकी धर्मपरायणता सारे संसार में प्रसिद्ध है। अतः आप अपने धर्म का पालन कीजिए और अधर्म का भार अपने सिर पर न उठाइए।"
"आप निश्चिंत होकर श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेज दीजिए। श्रीराम अभी अस्त्र-विद्या जानते हों या न जानते हों, किंतु महर्षि के होते हुए वे राक्षस श्रीराम का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।"
"महर्षि विश्वामित्र सभी बलवानों में सबसे श्रेष्ठ हैं और तपस्या के तो ये विशाल भंडार ही हैं। तीनों लोकों में जितने भी प्रकार के अस्त्र हैं, ये उन सभी को जानते हैं। जब विश्वामित्र जी राज्य का शासन करते थे, तब प्रजापति कुशाश्व ने स्वयं ये सारे अस्त्र उन्हें समर्पित किए थे।"
"महाप्रतापी विश्वामित्र जी चाहें तो स्वयं ही उन सब राक्षसों का अकेले संहार करने से समर्थ हैं, किंतु वे आपके पुत्र का कल्याण करना चाहते हैं, इसलिए यहां आकर आपसे याचना कर रहे हैं। आप निःशंक होकर श्रीराम को इनके साथ जाने दीजिए।"
यह बातें सुनकर दशरथ जी की चिंता दूर हो गई और उनका मन प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही राम और लक्ष्मण को अपने पास बुलाया। फिर माता कौशल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वसिष्ठ जी ने स्वस्ति वाचन किया और यात्रा की सफलता के लिए श्रीराम को मंगलसूचक मंत्रों से अभिमंत्रित किया गया।
इसके बाद दशरथ जी ने श्रीराम को प्रसन्नतापूर्वक महर्षि विश्वामित्र को सौंप दिया। आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे श्रीराम व उनके पीछे सुमित्रानंदन लक्ष्मण चल पड़े।

आगे अगले भाग में…

(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड। गीताप्रेस)


जय श्रीराम🙏

पं रविकांत बैसान्दर✍🏻