आगे अगले भाग मे...
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड।
My skills and Characteristics are Painting, Fashion Photography, Heritage Photography, Logo Designing, Writing, Blogging and Getting things Done in Creative Way.
मिडिल क्लास लड़के.......
पढ़ना👨🏫 कुछ और चाहते हैं, पढ़ाया कुछ और जाता है और बन कुछ और जाते हैं।
पसन्द😍 किसी और को करते हैं, प्यार🥰 किसी और का मिलता है शादी किसी और से हो जाती है।
चाय☕️ से लेकर खाना🍛 भी बना लेते हैं, कर्ज़ लेने और देने में जरा सी भी देरी नही करते। रिश्तेदारों को शहर घुमाने की जिम्मेदारी भी यही निभाते हैं।
5G फोन लेने में इन्हें साल भर लगता है। गैस भरवाने की जिम्मेदारी, सुबह दूध और शाम की सब्जी लाने जैसा कठिन और दर्दनाक काम भी यही करते हैं।
खुद की प्रेमिका की शादी में 'नागिन डांस'🐍 करने का गौरव केवलः इन्हें ही प्राप्त है। इनके पास इतना ज्यादा अनुभव होता है कि ये आइसक्रीम🍦 को टेस्ट कर के शादी में हुए खर्चों का अंदाजा लगा लेते है।
लुसेंट👨🏫 इनकी जिंदगी में उस गर्लफ्रेंड की तरह होती है जो साथ तो रहती है लेकिन कभी समझ में नही आती।
रीजनिंग के प्रश्न चुटकी में हल कर देने वाले ये मिडिल क्लास लौंडे खुद की जिंदगी की समस्याओं में उलझे रह जाते हैं।
घर🏡 और अपनी 'जान'👩🏻🦰 से किसी लायक बनने का वादा करके निकले ये मिडल क्लास लौंडे जब तक लायक हो के घर लौटते हैं तब तक उनकी जान 'दो चार जानो' की 'जननी'👨👩👧👦 बन चुकी होती है।
पापा की बेइज्जती इन्हें कतई पसन्द नही आती, पापा से खूब डरते भी है। मम्मी से अक्सर रुडली बात करने के बावजूद माँ के गोद मे सर रख कर रोने वाले ये लौंडे बहुत कमजोर भी होते हैं।
जिम्मेदारियां जल्दी निभाना सीख जाते हैं, रिश्तेदारों के तमाम अड़ंगों के बावजूद मां-बाप का विश्वास कैसे बनाये रखना है इन्हें बखूबी आता है।
चीटिंग कभी कर नही पाते क्योंकि मौका ही नही मिलता।😓
इश्क़🥰 करने की औकात ही नही क्योंकि रिजेक्शन झेलने की हिम्मत नही। कोई इनपर 'यु आर चीप' का आरोप नही लगाता क्योंकि ये किसी भी लड़की के साथ सोए नही होते हैं। अजी!!! सोना छोड़िए, ये किसी लड़की के साथ जागे तक नही होते हैं।
इनकी शादियाँ अक्सर अरेंज्ड ही होती हैं, ऑफकोर्स रिश्तेदारों द्वारा..
इनका इश्क़🥰 अक्सर अधूरा💔 रह जाता है, इनके सपने, इनकी जिंदगी सब-कुछ अधूरी......
पर ये बेहया लड़के किसी को एहसास तक नही होने देते।
पहले पापा-मां के सपने फिर सोशायटी मेंटेन करना और उसके बाद अरेंज्ड मैरिज वाली बीबी की एक्सपेक्टेशंस पूरी करते हैं ये अधूरे लड़के।
सबको पूरा करने के चक्कर मे अधूरे रह जाते हैं ये मिडिल क्लास लड़के.👏🏻🥺
......लेकिन आखिर दम तक कभी भी हार नहीं मानते और जिंदगी को पूरे उत्साह के साथ जीते हैं यह लडके.....👍🏻
साभार - सोशल मीडिया
महाराज दशरथ इस बात से हमेशा दुःखी और चिंतित रहते थे कि उनका कोई पुत्र नहीं था।
यही सब सोचते-सोचते एक दिन उनके मन में विचार आया कि क्यों न पुत्र प्राप्ति के लिए मैं अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करूँ। उन्होंने अपने सभी मंत्रियों को बुलाकर इस बारे में उनसे परामर्श लिया और सबने इसके लिए सहमति दी।
तब दशरथ जी ने अपने मंत्री सुमंत्र से कहा, “तुम शीघ्र जाकर मेरे सभी गुरुजनों व पुरोहितों को यहाँ बुला लाओ।”
कुलपुरोहित महर्षि वसिष्ठ, सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप आदि सबके आ जाने पर महाराज ने उनसे भी अपने मन की बात कही। यह विचार सुनकर वसिष्ठ जी ने इसकी बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “ महाराज! यह बहुत अच्छा विचार है और चूँकि आपके मन में यह धार्मिक विचार पुत्र प्राप्ति की पवित्र कामना से उत्पन्न हुआ है, अतः आपका यह मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा।”
यह सुनकर दशरथ जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने मंत्रियों को आज्ञा दी कि सरयू नदी के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि का निर्माण हो और गुरुजनों की आज्ञा के अनुसार यज्ञ की सारी सामग्री वहाँ एकत्र की जाए। शक्तिशाली वीरों के संरक्षण में एक उपाध्याय सहित अश्व को छोड़ा जाए और सारे विघ्नों का निवारण करने के लिए शान्तिकर्म किया जाए। दशरथ जी ने यह भी कहा कि विद्वान ब्रह्मराक्षस ऐसे यज्ञों में विघ्न उत्पन्न करने का अवसर ढूँढते रहते हैं, इसलिए इस बात का पूरा ध्यान रखा जाए कि यज्ञ में कोई विघ्न न डाल सके और यज्ञ के सभी कार्य पूरे विधि-विधान के अनुसार संपन्न हों क्योंकि विधिहीन यज्ञ करने वाला यजमान अवश्य ही नष्ट हो जाता है।
यह आज्ञा पाकर सभी मंत्रीगण अपने-अपने कार्य के लिए चले गए और गुरुजनों ने भी दशरथ जी से विदा ली।
अब महाराज ने अपने महल में जाकर रानियों को बताया, “देवियों! दीक्षा ग्रहण करो। मैं पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करूँगा।” यह सुनकर रानियों को बहुत प्रसन्नता हुई।
कुछ समय बाद एकांत पाकर सुमंत्र ने दशरथ जी से कहा, “महाराज! महर्षि कश्यप के पुत्र विभाण्डक हैं और उनके पुत्र ऋष्यश्रृंग हैं जो कि वेदों के सर्वश्रेष्ठ विद्वान हैं। उनका विवाह आपके मित्र व अंगदेश के राजा रोमपाद की पुत्री शांता से हुआ है। यदि महर्षि ऋष्यश्रृंग आकर आपका यह यज्ञ संपन्न करें, तो आपका मनोरथ अवश्य ही सफल होगा क्योंकि भगवान सनत्कुमार ने भी बहुत पहले ही ऐसी भविष्यवाणी की है। अतः आप स्वयं अंगदेश में जाकर महर्षि ऋष्यश्रृंग को सत्कारपूर्वक यहाँ ले आइए।
यह सलाह सुनकर राजा दशरथ को बहुत हर्ष हुआ। उन्होंने वसिष्ठजी से परामर्श किया और फिर अपनी रानियों तथा मंत्रियों के साथ अंगदेश को गए। वहाँ के राजा से उनकी गहरी मित्रता थी। अपने मित्र के यहाँ सात-आठ दिन बिताने के बाद दशरथ जी ने उनसे कहा कि ‘अयोध्या में एक बहुत आवश्यक कार्य आ पड़ा है, इसलिए महर्षि ऋष्यश्रृंग व उनकी पत्नी शांता को मेरे साथ अयोध्या जाने की अनुमति दें।’ इस प्रकार उन दोनों को साथ लेकर महाराज दशरथ अयोध्या लौटे।
बहुत समय बीत जाने के बाद वसंत ऋतु का आगमन हुआ। तब एक अच्छा मुहूर्त देखकर दशरथ जी ने यज्ञ करने का अपना विचार महर्षि ऋष्यश्रृंग को बताया और यज्ञ करवाने के लिए उनसे प्रार्थना की। महर्षि ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। अब यज्ञ के अश्व को छोड़ा गया और इधर राजा दशरथ ने अपने कुलगुरु वसिष्ठ जी से यज्ञ की तैयारी के लिए मार्गदर्शन माँगा।
तब वसिष्ठ जी ने यज्ञ के कार्यों में निपुण व यज्ञविषयक शिल्पकर्म में कुशल कारीगरों, बढ़इयों, शिल्पकारों, भूमि खोदने वालों, ज्योतिषियों, नटों, नर्तकियों, शास्त्रवेत्ताओं और सेवकों आदि सबको बुलवाया और उनसे यज्ञ के लिए आवश्यक प्रबंध करने को कहा।
उनके आदेश पर शीघ्र ही हजारों ईंटें यज्ञ-स्थल पर लाई गईं। यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए देश-विदेश से आने वाले राजाओं के ठहरने के लिए अनेक महल बनाने की आवश्यकता थी। यज्ञ में आने वाले ब्राह्मणों और अन्य प्रजाजनों के निवास और भोजन के लिए भी अनेक घर बनाए जाने थे। घोड़ों और हाथियों के लिए भी अस्तबल बनाने थे और सैनिकों के लिए छावनियाँ बनाई जानी थीं। वसिष्ठ जी ने यह भी आदेश दिया कि इन सभी स्थानों पर लोगों के भोजन और विश्राम की बहुत अच्छी व्यवस्था की जानी चाहिए। वह भोजन सबको सत्कारपूर्वक दिया जाना चाहिए, किसी की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। क्रोध के कारण किसी का अपमान न किया जाए और जो शिल्पी तथा सेवक वहाँ कार्यरत हैं, उन सबके पारिश्रमिक व भोजन की भी उचित व्यवस्था हो।
इन सब बातों के बाद वसिष्ठ जी ने सुमंत्र को बुलावाया और उनसे कहा कि इस पृथ्वी के सभी धार्मिक राजाओं को और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र, सभी वर्णों के लोगों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया जाए।
वसिष्ठ जी ने सुमंत्र से कहा कि ‘सब देशों के अच्छे लोगों को तुम सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ। मिथिला के महाराज जनक हमारे बहुत पुराने संबंधी हैं, इसलिए तुम स्वयं जाकर बड़े आदरपूर्वक उन्हें यहाँ लाओ। काशी के राजा भी अपने स्नेही और मित्र हैं, इसलिए उन्हें भी तुम स्वयं जाकर ले आओ। केकय देश के बूढ़े राजा तो स्वयं हमारे दशरथ जी के ससुर हैं, इसलिए उन्हें और उनके पुत्र को विशेष सम्मान के साथ अयोध्या लाया जाए। इसी प्रकार अंगदेश के राजा रोमपाद, कोशलराज भानुमान और मगध के राजा प्राप्तिज्ञ को भी तुम स्वयं जाकर अपने साथ लाओ। पूर्वदेश के श्रेष्ठ नरेशों को, सिन्धु, सौवीर व सुराष्ट्र के भूपालों को तथा दक्षिण भारत के भी सभी श्रेष्ठ नरेशों को भी इस यज्ञ में आमंत्रित करो।’
कुछ दिनों के बाद ये सभी राजा लोग महाराज दशरथ के लिए बहुत-से रत्नों की भेंट लेकर उनके इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए अयोध्या पहुँच गए।
यह सब होते-होते एक वर्ष बीत गया। यज्ञ की सारी तैयारियाँ अब पूर्ण हो चुकी थीं। यज्ञ का अश्व भी भूमण्डल में भ्रमण करके अयोध्या लौट आया था। अब महर्षि वसिष्ठ और ऋष्यश्रृंग के आदेश से एक शुभ नक्षत्र वाले दिन महाराज दशरथ यज्ञ के लिए अपने राजभवन से निकले। महर्षि ऋष्यश्रृंग के मार्गदर्शन में महाराज दशरथ व उनकी रानियों ने शास्त्रोक्त विधि से यज्ञ की दीक्षा ली और इस प्रकार यह यज्ञकर्म आरंभ हुआ।
महर्षि ऋष्यश्रृंग के मार्गदर्शन में श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने महाराज दशरथ के अश्वमेध महायज्ञ का प्रारंभ किया। वे सभी ब्राह्मण अत्यंत विद्वान थे, अतः यज्ञ के प्रत्येक कर्म को शास्त्रों में वर्णित क्रम के अनुसार व उचित रीति से करने में वे सक्षम थे। सबसे पहले उन्होंने शास्त्रोक्त विधि से प्रवर्ग्य का संपादन किया और फिर उपसद नामक अनुष्ठान किया। इसके बाद कर्मों के अंगभूत देवताओं का पूजन करके सवन किया गया और फिर इन्द्रदेव को विधिपूर्वक हविष्य का भाग अर्पित किया गया। सभी महर्षियों ने अत्यंत शुद्ध स्वर में मन्त्रों का गायन किया और सभी श्रेष्ठ देवताओं का आवाहन किया गया। सभी देवताओं को उनके योग्य हविष्य के भाग अर्पित किए गए। उस यज्ञ में न कोई भूल हुई, न कोई विपरीत या अयोग्य आहुति पड़ी। सभी कर्म निर्विघ्न पूर्ण हुए।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, तापस, श्रमण, बूढ़े, रोगी, स्त्री और बच्चे सभी को उस यज्ञ में यथेष्ट भोजन प्राप्त हुआ। वहाँ कोई भूखा-प्यासा नहीं रहा और सभी लोग भली-भांति तृप्त हुए। यज्ञ का एक सवन समाप्त होने के बाद अगला सवन शुरू होने तक जो खाली समय मिलता था, उसमें उत्तम ब्राह्मण एक-दूसरे से शास्त्रार्थ किया करते थे। वह यज्ञ संपन्न करवाने वाले सभी विद्वान बहुश्रुत तथा व्याकरण के सभी छः अंगों के ज्ञाता थे।
सूत्र-ग्रन्थों में दिए गए वर्णन के अनुसार ठीक माप वाली ईंटें तैयार कराई गई थीं। यज्ञकर्म के कुशल ब्राह्मणों ने अग्नि का चयन किया। उस अग्नि की आकृति गरुड़ जैसी बनाई गई थी।
इस यज्ञ के लिए बेल, खैर, और पलाश के साथ बिल्व के छः छः यूप खड़े किए गए। बहेड़े के वृक्ष का एक यूप खड़ा किया गया और दोनों बाहें फैलाने पर जितनी दूरी होती है, उतनी दूरी पर देवदार के दो यूप खड़े किए गए। यज्ञ की शोभा बढ़ाने के लिए उन सबमें सोना जड़ा गया था। इन सभी इक्कीस यूपों में से प्रत्येक की ऊँचाई इक्कीस अरन्ति (पाँच सौ चार अंगुल) थी और सभी को इक्कीस अलग-अलग कपड़ों से सजाया गया था। ये सब आठ कोणों से सुशोभित थे और उनकी आकृति सुन्दर व चिकनी थी। पुष्प-चंदन से उन सबकी पूजा की गई और उन्हें विधिपूर्वक स्थापित किया गया। उन यूपों में विभिन्न देवताओं के उद्देश्य से शास्त्रविहित पशु, सर्प और पक्षी बांधे गए थे। शामित्र कर्म में यज्ञीय अश्व और कूर्म आदि जलचर जन्तु भी यूपों में बांधे गए थे। सब मिलाकर उन यूपों में तीन सौ पशु बंधे हुए थे।
अश्वमेध का घोड़ा भी वहीं बांधा गया। महारानी कौशल्या ने चारों ओर से उस अश्व का प्रोक्षण आदि संस्कार करके तीन तलवारों से उसे स्पर्श किया। अध्वर्यु और उद्गाता ने राजा की क्षत्रिय महिषी कौसल्या, वैश्य स्त्री वावाता तथा शूद्रजातीय स्त्री परिवृत्ति के हाथों भी उस अश्व का स्पर्श करवाया। अब ऋत्विक ने विधिपूर्वक अश्वकन्द के गूदे को निकालकर शास्त्रोक्त रीति से पकाया। फिर उसे गूदे की आहुति दी गई और महाराज दशरथ को ठीक समय पर वहाँ आकर उस धुएँ की गंध को सूंघने के लिए कहा गया।
इसके बाद दशरथ जी ने दक्षिणा के रूप में होता को अयोध्या से पूर्व की दिशा का सारा राज्य दे दिया। अध्वर्यु को पश्चिम दिशा, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा व उद्गाता को उत्तर दिशा की सारी भूमि दे दी। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ पूरा करके राजा दशरथ ने सारी भूमि ऋत्विजों को दान कर दी।
इस पर उन ऋत्विजों ने कहा कि ‘महाराज! केवल आप ही इस पृथ्वी की रक्षा करने में समर्थ हैं। हम सदा वेदों के अध्ययन में लगे रहते हैं और हमें इस भूमि से कोई प्रयोजन नहीं है। अतः इस भूमि की रक्षा आप ही करें और इसके बदले में हमें कोई और दक्षिणा दे दें।’ तब महाराज दशरथ ने उन्हें दस लाख गाएँ, दस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ और चालीस करोड़ चांदी के सिक्के दान में दिए। उन ऋत्विजों ने वह सारा धन महर्षि ऋष्यश्रृंग व कुलगुरु वसिष्ठ को सौंप दिया। उन दोनों से उसका उचित बँटवारा करके न्यायपूर्वक सभी के बीच उसे बाँट दिया। सभी लोग इससे बहुत प्रसन्न हुए।
अब दशरथ जी ने हाथ जोड़कर मुनि ऋष्यश्रृंग से कहा, “मुनीश्वर! अब आप वह कर्म करें, जो मेरी कुल परम्परा को आगे बढ़ाने वाला हो।’ तब ‘तथास्तु’ कहकर मुनि थोड़ी देर तक ध्यानमग्न हो गए। कुछ समय बाद ध्यान से विरत होकर उन्होंने कहा, “राजन! आपको पुत्र की प्राप्ति कराने के लिए मैं अथर्ववेद के मन्त्रों से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधि के अनुसार अनुष्ठान करने पर यह यज्ञ अवश्य सफल होगा और आपका मनोरथ पूर्ण होगा। आपके चार पुत्र होंगे और वे इस कुल का भार वहन करने में सर्वथा सुयोग्य होंगे।”
ऐसा कहकर उन तेजस्वी ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ का आरंभ किया और श्रौत विधि के अनुसार अग्नि में आहुति डाली। यज्ञ में देवताओं का आवाहन किया गया और विधि के अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिए देवता, सिद्ध, गंधर्व और महर्षिगण उस यज्ञ में एकत्र हुए।
वहाँ एकत्रित देवता अन्य लोगों की दृष्टि में अदृश्य थे। उन सभी देवताओं ने वहाँ ब्रह्माजी से निवेदन किया कि ‘भगवन्! आपसे वरदान पाकर रावण नाम का राक्षस हम सब लोगों को बहुत कष्ट दे रहा है। आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है, लेकिन उस वरदान की शक्ति से वह अत्यधिक उद्दंड हो गया है और उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया है। वह जिस किसी को भी अच्छी स्थिति में देखता है, उससे द्वेष करने लगता है। वह देवराज इन्द्र को भी परास्त करने की अभिलाषा रखता है।
ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों व ब्राह्मणों को वह बहुत पीड़ा देता है और सबका अपमान करता फिरता है। वह देखने में भी बड़ा भयंकर है। हमें उसे देखकर बहुत भय होता है, किन्तु अपने पराक्रम से उसे दबाने की शक्ति हमारे पास नहीं है। अतः आपको ही उसके वध का कोई न कोई उपाय करना चाहिए।’
यह सुनकर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले, ‘देवताओं! उस दुरात्मा के वध का उपाय मेरी समझ में आ गया है। वह मैं आपको बताता हूँ।’
आगे अगले भाग मे......
स्रोत: वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड।
जय श्रीराम🙏🏻
पं. रविकांत बैसान्दर✍️
सरयू नदी के किनारे पर कोसल नामक एक बहुत बड़ा और प्रसिद्ध जनपद था। उसमें अयोध्या नामक एक बहुत प्रसिद्ध नगरी थी।
इस महानगरी अयोध्या की लंबाई बारह योजन और चौड़ाई तीन योजन थी। इसमें कई प्रकार के अलग अलग बाजार थे, और उनमें सब प्रकार के यन्त्र और अस्त्र शस्त्र संचित थे। अयोध्या में सभी कलाओं के शिल्पी निवास करते थे। नगर में ऊंची ऊंची इमारतें थीं, और बड़े बड़े फाटक व किवाड़ थे। चारों ओर उद्यान व आमों के बगीचे थे।
अयोध्या की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर गहरी खाई खुदी थी, जिसमें प्रवेश करना या उसे लांघना बहुत कठिन था। अयोध्या को जीतना किसी भी योद्धा के लिए संभव न था। उस नगर में हाथी, घोड़े, गाय बैल, ऊंट आदि सभी प्रकार के उपयोगी पशु बड़ी संख्या में उपलब्ध थे।
अयोध्या में इतनी समृद्धि थी कि उसके महलों के निर्माण में भी कई प्रकार के रत्नों का उपयोग हुआ था और दीवारों पर सोने का पानी चढ़ाया हुआ था। यह नगर समतल भूमि पर बसा हुआ था और चावल से भरपूर था। वहां के पानी की मिठास भी अद्भुत थी। विभिन्न राज्यों के व्यापारी यहां व्यापार के लिए आते थे और उत्तम गुणों से संपन्न और सभी वेदों में पारंगत विद्वान ब्राह्मण भी वहां थे। हजारों बलशाली, वीर और कुशल योद्धा व महारथी इस अयोध्या नगरी में निवास करते थे।
अयोध्या में कोई भी दुखी, पीड़ित, शोषित, वंचित, चोर या लालची नहीं था। वहां कोई कंजूस, क्रूर, मूर्ख या नास्तिक भी नहीं था। अपवित्र अन्न को खाने वाला या साफ सुथरा न रहने वाला कोई व्यक्ति भी अयोध्या में नहीं था।
वहां ऐसा कोई परिवार नहीं था, जिसके पास गाय, बैल, घोड़े, अनाज या धन संपत्ति का कोई अभाव हो। बिना आभूषणों वाला कोई व्यक्ति वहां दिखाई नहीं पड़ता था। यज्ञ न करने वाला या अपने कर्तव्य में कोई कमी रखने वाला भी अयोध्या में कोई नहीं था।
इक्ष्वाकु वंश के महाराज दशरथ इस अद्वितीय नगरी के शासक व रक्षक थे। वे दूरदर्शी, धर्मपरायण और महापराक्रमी थे। वे प्रजा का पालन परिवार की भांति ही करते थे और प्रजा भी उनसे बिल्कुल वैसा ही प्रेम करती थी।
महाराजा दशरथ के आठ कुशल मंत्री थे - धृष्टि, जयन्त, विजय, सुरष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र। महर्षि वसिष्ठ और वामदेव उनके ऋत्विज (पुरोहित) थे।
राजा के सभी मंत्री बहुत व्यवहारकुशल, योग्य और निष्पक्ष थे। कई प्रकार से उनकी परीक्षा ली जा चुकी थी। अपने गुप्तचरों के द्वारा राजा को शत्रु पक्ष के राजाओं की पूरी जानकारी भी मिलती रहती थी।
लेकिन सब कुछ होते हुए भी महाराज दशरथ केवल इस एक बात के लिए सदा दुखी और चिंतित रहते थे कि उनका कोई पुत्र नहीं था..🤔🤔
आगे अगले भाग में......
स्रोत:- वाल्मीकि रामायण। बालकाण्ड। गीताप्रेस।
नोट: वाल्मीकि रामायण में इन सब घटनाओं को बहुत विस्तार से बताया गया है। मैं बहुत संक्षेप में केवल उसका सारांश ही लिख रहा हूँ।
जय श्रीराम🙏🏻
पं. रविकांत बैसान्दर✍️
हनुमान जी आदिपुरुष देखकर अभी सिनेमा हाल से निकले ही थे कि एक पत्रकार नें उन्हें पहचान लिया, "प्रभु", एक इंटरव्यू दे देते तो मेरा चैनल मोनेटाइज हो जाता..!"
हनुमान जी नें पत्रकार को गौर से देखा। आंखे बंद कर गहरी सांस ली.. मन में जय श्रीराम का जाप किया और पूछा - "इसके पहले क्या करते थे ?"
"भगवन, एक राष्ट्रीय चैनल में पत्रकार था, दो महीने पहले निकाल दिया गया...अब यू ट्यूबर हूँ।"
"क्या नाम है, - रवीश कुमार ?"
"नहीं.."
"अजीत अंजुम ?"
"नहीं-नहीं..!"
"पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार शर्मा ?"
नहीं, पवन सुत, मैं इनमें से कोई नहीं हूँ.."
"तब तुम कौन हो ? शकल से तो विनोद कापड़ी भी नहीं लगते.. ?"
"मैं मनोज हूँ प्रभु.. एक सत्ता विरोधी पत्रकार.. !"
सत्ता विरोधी सुनते ही हनुमान जी के माथे पर बल पड़ गया.. जोर से पूछा, "कौन सी सत्ता के विरोधी हो..? "
ऐसा सवाल सुनकर पत्रकार खामोश हो गया। हनुमान जी नें कहा -
"बोलते क्यों नहीं ? कौन सी सत्ता के विरोधी हो ?"
"बस, सत्ता का विरोधी हूँ प्रभु..।"
"वही तो पूछ रहा, मोदी की सत्ता या केजरीवाल-ममता बनर्जी की सत्ता ? नीतीश, एम के स्टालिन की सत्ता ? या सिद्धारमैया, चंद्रशेखर राव और पिनराई विजयन की सत्ता..?"
किस सत्ता के विरोधी हो..?"
हनुमान जी के इस कठिन सवाल पर पत्रकार बगले झांकनें लगा.. उसने गिड़गिड़ाते हुए पैर पकड़ लिया,
"प्रभु ऐसा सवाल करके मुझे धर्मसंकट में मत डालिये। हफ़्ते में एक दिन ट्विटर पर सबको गाली देकर निरपेक्ष रहने की पूरी कोशिश करता हूँ। फिर भी अर्निंग नहीं हो रही। ये चैनल न चला तो मर जाऊंगा, प्लीज एक इंटरव्यू दे दीजिए...!"
"तुम्हारा भी नाम मनोज है ?" हनुमान जी नें पूछा।
" जी प्रभु... मनोज मुंतसिर की कसम.. मैं कल से ही कालीन बिछाकर सिनेमा हॉल के सामने आपका इंतज़ार कर रहा हूँ..
बस एक इंटरव्यू..!"🙏🏻🙏🏻🙏🏻
हनुमान जी मनोज को इंटरव्यू देते इसके पहले ही उनके व्हाट्सएप पर अंगद का मैसेज आ गया।
"हे आंजनेय.. सादर चरण स्पर्श.."🙏🙏
"कैसे हो अंगद..क्या समाचार ? "
अंगद नें इयरफोन निकालकर कहा," प्रभु, एकदम चौचक चल रिया है। अभी बुआ के बगीचे में बैठकर आम खा रहा था तो आपकी याद आ गई।"
हनुमान जी चौंके, "ये कैसी भाषा बोल रहे हो अंगद, क्या तुमनें भी आदिपुरूष देख लिया ?"
" देख लिया...? हे पवनसुत, मुझे तो ट्विटर पर पॉजिटिव ट्विट लिखने के नौ हजार रुपये भी मिल रहे थे लेकिन लंका से रावण अंकल नें वीडियो कॉल करके सारा स्कीम खराब कर दिया..."
"क्या हुआ, रावण नें भी आदिपुरूष देख लिया ?"
"HAA!!!, फर्स्ट डे, फर्स्ट शो.."
"कैसी लगी उसको ? "
"प्रभु फ़िल्म देखने के बाद रावण कत्तई लोहार हो चुका है। दिन-रात लोहा पीट रहा है। कह रहा,अपने पापा बाली को भेजो, साझे में लोहे का बिजनेस करते हैं।"
"अच्छा, ऐसा हो गया ?"
"हं,प्रभु...उधर विभीषण बो चाची नें तो मुम्बई से फैशन डिजायनर रितु कुमार को बुला लिया है।"
"अरे, उन्हें क्या हुआ ? "
"कह रही हैं, माई लहंगा शुड बी चेंज्ड नॉऊ.."
" उफ्फ...! घोर अनर्थ..."
"यही नहीं, अभी और सुनिये..
"अब क्या हुआ ?"
" हुआ ये है कि कुंभकर्ण और अक्षय कुमार नें मुम्बई से वीएफक्स वालों को बुलाकर अशोक वाटिका के सारे राक्षसों का मेकअप करवा दिया है। ऊपर से आज सुबह रावण नें पुष्पक विमान भेजकर अलाउदीन खिलजी को महल में आमंत्रित कर दिया..।"
"अलाउद्दिन खिलजी को... किसलिए ?"
"अपनी दाढ़ी बनाने के लिए ?"
" जय श्रीराम,जय श्रीराम, बस यही दिन देखना बाकी रह गया था अंगद ......"
"हं,प्रभु, लेकिन समाचार सबसे बुरा है।
"अब क्या हुआ ? "
"अपनी वानर सेना के सारे वानर आदिपुरूष में अपना रूप देखकर सदमे में हैं.. सबने विरार से लोकल पकड़कर अंधेरी की तरफ कूच कर दिया है। सबके हाथ में गदा है। अब ओम राउत और मनोज मुंतशिर की खैर नहीं, उन्हें आप ही बचा सकतें हैं प्रभु, प्लीज कुछ करिये...।"
इतना सुनते ही हनुमान जी चिंतित हो उठे।
" ठीक है अंगद, तुम चिंता न करो, मैं कुछ करता हूँ।"
इधर मनोज पत्रकार हनुमानजी को चैटिंग करता देख धीरज खो उठा।
"प्रभु, अब हो गई न चैटिंग, मेरे कुछ सवालों का जबाब दे दीजिए, आज सुबह से एक भी इन्टरव्यू नहीं किया...? "
इतना चिरौरी के बाद भी हनुमान जी नें पत्रकार की एक न सुनी। तुरन्त एक ऑटो वाले को हाथ दिया और मलाड से अंधेरी की तरफ चल पड़े... मनोज पत्रकार भी उचककर ऑटो में बैठ गया...
"तुम नहीं मानोगे ?" हनुमान जी ने फिर डांटा..
"प्रभु बस एक इंटरव्यू, बस एक.."
अगले ही पल मुम्बई के जाम नें हनुमान जी का हाल-बेहाल कर दिया। बढ़ते तापमान और गर्मी देखकर हनुमान जी से भी रहा न गया, उन्होंने कहा, "ठीक है, पूछ लो...."
"प्रभु, मनोज मुंतशिर नें कल टीवी पर कहा है कि हनुमान जी भक्त हैं, मैंने उन्हें भगवान बनाया है, आप क्या कहना चाहेंगे ? क्या आप क्रोधित हैं ?
"नहीं,बिल्कुल नहीं.. मुझे तो बस उन पर दया आ रही है। मैं उनकी सद्बुद्धि की कामना करूँगा। शायद मनोज भूल गए हैं कि जनता नें ही उन्हें लेखक✍🏻बनाया है।"
"प्रभु क्या भगवान राम पर इस फ़िल्म का कोई असर पड़ेगा, या आप पर ?"
"कैसी बात करते हो, जिस राम के पास आकर शील अपना श्रृंगार करता है। विनय विभूषित होता है। संस्कार, विवेक और ज्ञान शरण लेते हों। जो मेरे जैसे करोड़ो भक्तों के हृदय में बसते हों, उन पर एक फ़िल्म का असर पड़ेगा ?"
"फिर आप मनोज मुंतशिर से क्या कहना चाहेंगे ?"
"मैं यही कहूंगा कि मनोज जितना जल्दी हो सके अपने असिस्टेंट राइटर की तनख़्वाह बढ़ा दें...!"
"यू मीन ये सब असिस्टेंट राइटर नें लिखा है ?"
"तुम ही बताओ... एक आदमी स्वयं रियलिटी शो, डाक्यूमेंट्री होस्ट करेगा, जज भी बनेगा, फिर दिन भर हिन्दू राष्ट्र और सनातन की रक्षा करेगा तो कैसे लिख पाएगा.. ? प्रभावी लेखन एकांत की साधना वत्स.....असिस्टेंट तो रखना पड़ेगा न ?
"वैसे, आजकल लेखकों की बाढ़ सी आ गई है.. उनके लिए कोई सलाह...."!
"सलाह तो यही है कि लेखक की जबान उसकी कलम है। जिस दिन कलम से ज्यादा जबान चलने लगेगी, उस दिन उसका यही हश्र होगा।"
"ओम राउत को क्या कहेंगे प्रभु...?"
"मैं यही कहूँगा, पर्दे पर राम को उतारने से पहले, कुछ महीने हृदय में राम को उतारते, तो ये हश्र न होता।"
"और बॉलीवुड के लेखकों-निर्देशको, कलाकारों को कोई मैसेज ?
"उनसे तो यही कहूंगा कि इस दौर में लोकप्रिय होना आसान है। लोकप्रियता बनाए रखना कठिन है। सफल होना आसान है, सफलता को बचाए रखना कठिन है। आज का सारा युद्ध इसी सफलता और इसी लोकप्रियता को बचाए रखने का युद्ध है।
"ये लोकप्रियता और सफलता कैसे बचती है प्रभु..? "
"अहंकार रहित विनयशीलता के सतत अभ्यास और अपने कार्य पर एकाग्र होकर ध्यानस्थ होने से..! "
जय हे बजरंगबली.. मैं धन्य हो गया।
तब तक मनोज पत्रकार की आंखें खुल गईं.. सपने से जागा, तो बिजली जा चुकी थी।
©- atulkumarrai.com✍🏻
Never pray for lesser burdens pray for stronger back.
कभी भी कम बोझ के लिए प्रार्थना न करें, मजबूत पीठ के लिए प्रार्थना करें।
***
Take into account that great achievements involve great risk. See the positive side, the potential and make an effort.
ध्यान रखें कि महान उपलब्धियों में बड़ा जोखिम शामिल होता है। सकारात्मक पक्ष, क्षमता देखें और प्रयास करें।
***
From a mental vision of your goal and cling to it through thick and thin.
अपने लक्ष्य की मानसिक दृष्टि से और हर अच्छे और बुरे दौर में उससे चिपके रहें।
***
Do not see anything as an obstacle: Instead treat it as an opportunity.
किसी भी चीज़ को बाधा के रूप में न देखें: इसके बजाय इसे एक अवसर के रूप में लें।
***
What looks like the end of the road is more often just a bend in the road.
जो सड़क का अंत दिखता है वह अक्सर सड़क में एक मोड़ मात्र होता है।
***
He is only exempt from failures who makes no effort.
केवल वही असफलताओं से मुक्त है जो कोई प्रयास नहीं करता।
***
Strengthening our identity is one way of reinforcing people's confidence.
अपनी पहचान को मजबूत करना लोगों के विश्वास को मजबूत करने का एक तरीका है।
***
Be always prompt in doing good.
भलाई करने में सदैव तत्पर रहो।
***
Teamwork: Simply stated, it is less me and more we.
टीम वर्क: सीधे तौर पर कहा जाए तो इसमें मैं कम और हम ज्यादा हैं।
***
Sense of Identity means a way of defining how you wish to live your life.
पहचान की भावना का अर्थ यह परिभाषित करने का एक तरीका है कि आप अपना जीवन कैसे जीना चाहते हैं।
***
To laugh at someone else's Misfortune is to display your own ignorance.
किसी और के दुर्भाग्य पर हंसना अपनी अज्ञानता को प्रदर्शित करना है।
***
Vision without action is a daydream. Action without vision is nightmare.
कार्रवाई के बिना विजन एक सपना है। बिना दूरदर्शिता के कार्य करना दुःस्वप्न है।
***
Your conscience is a good friend, listen to it more often.
आपका विवेक एक अच्छा मित्र है, इसे अधिक बार सुनें।
***
Jumping to conclusions does not make for happy landing.
जल्दबाजी में निष्कर्ष पर पहुंचने से सुखद परिणाम नहीं मिलते।
***
Each relationship nurtures a strength or Weakness within you.
हर रिश्ता आपके भीतर एक ताकत या कमजोरी पैदा करता है।
***
Goals are simply tools to focus your energy in positive directions.
लक्ष्य आपकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशाओं में केंद्रित करने के उपकरण मात्र हैं।
***
You are never too old to set another Goal in your life.
आप अपने जीवन में दूसरा लक्ष्य निर्धारित करने के लिए कभी भी बूढ़े नहीं होते।
***
Courage is the ladder in which all other virtues mount.
साहस वह सीढ़ी है जिस पर अन्य सभी गुण स्थापित होते हैं।
***
The faith of each is in accordance with one's own nature.
प्रत्येक की आस्था उसके अपने स्वभाव के अनुरूप होती है।
***
Only a fool Knows everything.
केवल मूर्ख ही सब कुछ जानता है।
***
Hell has three gates: lust, anger and greed.
नरक के तीन द्वार हैं: काम, क्रोध और लोभ।
***
To map out a course of action and follow it to an end requires Courage.
कार्रवाई की रूपरेखा तैयार करने और अंत तक उसका पालन करने के लिए साहस की आवश्यकता होती है।
***
There are two things to Aim at to get what you want and enjoy it.
आप जो चाहते हैं उसे पाने और उसका आनंद लेने के लिए लक्ष्य रखने वाली दो चीजें हैं।
***
Success is not in never falling, but rising every time you fail.
सफलता कभी न गिरने में नहीं है, बल्कि हर बार असफल होकर उठ खड़े होने में है।
***
Think ahead don't let day to day operations drive out planning.
पहले से सोचें, दिन-प्रतिदिन के कार्यों को योजना पर हावी न होने दें।
***
There is always a better Strategy than the one you have.
आपके पास जो रणनीति है, उससे बेहतर रणनीति हमेशा मौजूद होती है।
***
Creativity is a natural extension of our enthusiasm.
रचनात्मकता हमारे उत्साह का स्वाभाविक विस्तार है।
***
The secret of happiness is freedom, and the secret of freedom, Courage.
ख़ुशी का रहस्य स्वतंत्रता है, और स्वतंत्रता का रहस्य साहस है।
***