गुरुवार, 15 जनवरी 2026

रतन सराय से पटना की यात्रा और ललित से मुलाक़ात।

         छठ पूजा की समाप्ति के बाद ठेकुआं को पैक किये और घर से रतनसराय स्टेशन ससमय तो नहीं लेकिन एक घंटा विलम्ब से आये क्योंकि ट्रैन ही विलम्ब से आने वाली थी। मेरे स्टेशन आने के उपरांत ट्रेन ने विलम्ब नही किया और वो अपने नियत समय से 02 घंटे की देरी से स्टेशन पर आ ही गई। ट्रेन के आने से थोड़ी देर पहले हम स्टेशन पर बैठकर छठ पूजा के विडियो को एडिट कर रहे थे तभी मेरे कानो में एक आवाज सुनाई दी। 

  • विडियो एडिट कर रहे है क्या ?
  • कौन सा App है ?
  • एक विडियो को एडिट करने में कितना समय लगता है ?
  • कुछ कमाई होता है ई सब से ?
 किसी ने एक साथ कई प्रश्न पूछ दिए थे, मैंने उसे देखा और फिर अपना कार्य करते हुए उसके एक-एक प्रश्न का उत्तर देते गए। फिर उसने मुझसे पूछा - आप कौन-सी परीक्षा देने जा रहे है ? 
मैंने हँसते हुए कहा - छठ पूजा के दिन कौन परीक्षा देने जाता है ?
वह थोड़ा मायुश हो गया और बोला - मेरी कल परीक्षा है और सेंटर आरा दिया है यहां से पटना एवं फिर वहां से आरा जायेंगे...
वह अपनी बात पूरी करता उससे पूर्व ही ट्रेन आ चुकी थी, फटाफट हम ट्रेन में चढ़े। हमें अपने लिए सीट ढूढना नही पड़ा क्योंकि पूरी ट्रेन ही खाली थी। कुछ लोग सीटो पर सोये हुए थे। हम आराम से एक विंडो सीट लिए और बैठ गए मेरे सामने की सीट पर वही बैठे जिनसे अभी मेरी वार्तालाप हुई थी और आज के मेरे इस यात्रा के सहयात्री बनने वाले थे। सीट पर बैठने के साथ ही सबसे पहले हमने उनका नाम पूछा - तब उसने कहा - ललित।
मैंने कहा - मेरी किताब "डायरी के पन्नों से..." जो की आने वाली है उसका कवर डिज़ाइन भी ललित नाम के ही एक कलाकार ने किया है और उनका भी घर गोपालगंज में ही है। 
मैंने किताब लिखी है उक्त बाते सुनकर उसे बहुत आश्चर्य लगा। फिर मैंने उसे अपने बारे में संक्षेप में बताया। वजह जो भी रहा हो उसने मेरी बातो को बीच में काटते हुए बोला - मेरी ना कल परीक्षा है और मुझे पढना है। ऐसे भी, "किसी की उपलब्धि किसी बेरोजगार को सुनने में अच्छा नहीं लगता है।" मुझे ऐसा प्रतीत हुआ या यह भी हो सकता है कि मैं कुछ ज्यादा डिटेल में बताने लग गया था। ख़ैर!!! वजह जो भी हो... मैंने कहा - आरे!!! हाँ-हाँ  पढिये ना... आपको कल परीक्षा देना है। फिर हम दोनों अपने-अपने मोबाईल में व्यस्त हो गए।

   पुरी ट्रैन मच्छरो🦟 की गुनगुनाहट से संगीतमय🎶 हो रहा था। मैं तो अपने मोबाईल में और बाकी लोग सोने में व्यस्त थे। एक व्यक्ति अपने मोबाइल का फुल स्पीकर करके छठ का गाना बजा रहे थे। "बहँगी लचकत जाओ"🎶🎶 ट्रेन चलने की स्पीड से ट्रैन में बैठे और सोये लोग भी बहँगी की तरह ही लचक रहे थे। छठ बीतने के बाद भी उसका गाना सुनना सुखद अनुभूति करा रहा था। हमारे सामने की सीट पर बैठे ललित जी कभी सो रहे थे तो कभी-कभी अपने मोबाइल से कुछ नोट्स को पढ़ रहे थे पुरी ट्रैन में कुछ ऐसे भी लोग थे जो की इन सभी से बेखबर ऊँची-ऊँची खराटे💤 ले रहे थे। यह वही लोग थे जो इस कहावत को चरितार्थ कर रहे थे की "स्थिति कोई भी हो हमें अपने कार्य में मग्न रहना चाहिए" पुरी ट्रैन में बाकी लोग तो कुछ-कुछ अंतराल पर अपने कार्यों में परिवर्तन कर रहे थे लेकिन दो ही कार्य था जो कि लगातार चल रहा था और वह यह था -

  1. एक सोने वाले का खराटा 💤 और 
  2. दुसरा मच्छरो🦟 का सुरमई संगीत🎶.
    मैं इन सब से बेखबर अपने राइटिंग✍🏻 के कार्य में लगा हुआ था। अचानक से मेरे मोबाइल पर कुछ पानी की बुंदे गिरी, मालूम चला की बाहर हल्की बारिश हो रही हैं। हम मोबाइल को रख कर फिर बाहर के मौसम का आनंद लेने लगे। उस समय 12:00 बज चुका था लेकिन हमारी ट्रेन अभी दीघा ब्रिज से पहले ही बहुत देर से रुकी हुई थी, मतलब साफ था कि हम 02:00 से पहले रूम पर नहीं पहुंचने वाले थे।


         ...कुछ देर बारिश का एन्जॉय करने के उपरांत फिर हम अपने ब्लॉग लिखने✍🏻 के कार्य में लग गए। अभी तक ललित जी अपने मोबाइल में वीडियो देखने में ही व्यस्त थे। मेरी एक बार ईच्छा हुई की पूछे की परीक्षा कौन सी है?  लेकिन उन्हें मोबाइल में व्यस्त देख करके अपने विचार को त्याग दिए और हम फिर अपने कार्य में लगे रहे। अक्सर हम अपनी "यात्रा-वृतांत" में अपने आसपास के चरित्रो का चित्रण करते हैं लेकिन इस यात्रा वृतांत में वह कार्य भी हम नहीं कर पा रहे थे क्योंकि हमारी बोगी में लाइट ही नहीं थी, और पूरा वातावरण अँधेरे में खोया हुआ था। शक्तिमान के तमराज किलविश का "अंधेरा कायम रहेगा" वाला डायलॉग चरितार्थ हो रहा था। क्योंकि छठ के बाद उसी दिन की यात्रा होने से लगभग ट्रेन खाली थी जनरल बोगी में एक-एक सीट पर एक-एक लोग लेते हुए थे। पुरी बोगी में केवल 02 लोग ही जगे थे, केवल मैं और मेरे सामने की सीट पर बैठे ललित जी। हम दोनों जनरल बोगी के विंडो सीट पर बैठे हुए थे और मोबाइल के विंडो के साथ-साथ ट्रैन के विंडो से भी बाहर का नजारा देख रहे थे। 

        अचानक से मेरा ध्यान ट्रेन की बोगी में आ गया क्योंकि जो सज्जन तभी से छठ का गाना बजा रहे थे अचानक से वह भोजपुरी की ओर शिफ्ट कर गए थे। किसी एक गाने में नायक के द्वारा नायिका से प्रश्न किया जा रहा था। 

प्रश्न - बताओ लिंग केतना तरह के होला?

उत्तर - तीन

नायक - कौन-कौन

नायिका - स्त्रीलिंग, पुलिंग, और डार्लिंग।

     हम यह उत्तर सुनकर भोजपुरी के लेखकों को झुककर नमस्ते 🙏🏻 करने का मन हुआ। लेकिन हम यह नहीं कर पायें क्योंकि तबतक हमारी ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी और रफ्तार ऐसी की सीधे हम पटना जंक्शन पहुँच चुके थे। मैंने ललित से पूछा - आपकी पढ़ाई पूरी हो गई ?

उसने कहा - हां, थोड़ा सा बचा हुआ है। 

तब मैंने पूछा - किस चीज की परीक्षा है, तब उसने कहा - STET

मैंने आश्चर्य से पूछा - आपका अभी उम्र बचा हुआ है ? आपने B.Ed. कब किया ? CTET निकला है या नहीं ?

इस बार मैंने एक साथ कई प्रश्न पूछ दिए थे जिनसे वो बचने की कोशिश कर रहे थे। अबकी बार मुझे मेरा पंसदीदा टॉपिक मिल गया था। उसने बस इतना कहा - UP से किये है और बिहार सरकार ने उम्र में छुट दे रखी है। उस समय तक ट्रेन थोड़ी धीरे हो गई थी लेकिन रुकी नही थी लेकिन वो चलती ट्रेन से उतर गए और जाते-जाते बोले - By Sir👋🏻.

मै ट्रेन के दरवाजे पर खड़ा उन्हें जाते हुए देख रहा था शायद वो अपनी मंजिल की ओर तेज कदमो से बढ़ चले, हमारी ट्रेन अब पूरी तरह से रुक गई थी। ट्रेन से उतरने के बाद मेरी नजरे उन्हें ढुढने की कोशिस की लेकिन वह नही दिखे, शायद!!! पटना जंक्शन की इस भीड़ में कही खो चूके थे। अक्सर कई प्रतिभायें नित्य दिन यूँ ही भीड़ में खोती जा रही है और कुछ उसमे से निकलकर आसमां में अपनी बुलंदी का पटाखा भी फहरा रही है। हम स्टेशन से बाहर आ गए थे और रात के 02:00 बजे जब ऑटो नही मिला तो पैदल ही रूम आयें। रूम आने के उपरांत वही ठेकुआं निकाले जो घर से लाये थे और उसे खाते हुए आज की यात्रा की विवेचना करते रहे।